Pavan Kumar Paavan Personal Blog Pavan Kumar Paavan Personal Blog Pavan Kumar Paavan Personal Blog
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असग़र हुसैन ‘असग़र’ गौंडवी असग़र हुसैन ‘असग़र’ गौण्डा के बाशिन्दे थे और सन् 1884 ई. में पैदा हुये। इनका सन् 1936 में इंतकाल हुआ। यूं तो आपको उर्दू, फारसी और अरबी का अच्छा ज्ञान था परन्तु व्यवस्थित तालीम हासिल करना आपके नसीब में न था। आपने दो दीवान शेरों और गज़लों के लिखे जिनके नाम थे- ‘निशाते-रूह’ और ‘सरोदे-जिन्दगी’। कुछ पत्रिकाओं के सम्पादन का काम लाहौर और लखनऊ में किया। लेकिन रोजी रोटी के लिए चश्मों का कारोबार भी किया। उस समय ‘दाग’ और ‘अमीर-मीनाई’ की तूती बोलती थी और गज़ल-गोई पुराने दिनों की बात हो चली थी लेकिन आपने गज़ल को ही अपना माघ्यम चुना और उसकी काया को बदलने की भरपूर कोशिश की। आपने जो कुछ भी कहा गहरी समझ बूझ के साथ कहा। गज़ल तो प्रेम के प्रकटन का ही माघ्यम है। ‘असगर’ का इश्क़ पाक इश्क़ है और उनका माशूक़ भी पाकीज़ा हैं। उनके इश्क़ में कहीं पर भी कोई बाज़ारूपन नहीं दिखता। वे प्रेम को छुपाने के हिमायती भी नहीं है बल्कि स्पष्ट कहते हैं कि यही इश्क़ मेरे जीवन की आरजू है, कमाई है और मंजिल है। इश्क़ ही सअई1 मेरी, इश्क़ ही हासिल2 मेरा। यही मंजिल है मेरी, यही जाद-ए-मंजिल3 मेरा।। यह इश्क कभी-कभी इश्के-हक़ीक़ी नज़र आने लगता है क्योंकि माशूक खुदा नजर आता है और माशूक का कूचा मंदिर और मस्जिद दोनों से ज्यादा प्यारा नज़र आता है। दैर-ओ-हरम भी कूचए-जानाँ में आये थे। पर शुक्र है कि बढ़ गये दामन बचाके हम।। ऐसे इश्क़ में आशिक के लिए वस्ल (मिलन) और हिज्र (जुदाई) दोनों में कोई फर्क नहीं रह जाता, वह इन सब से ऊपर उठ जाता है। 1. सअई- कोशिश; 2. हासिल- नतीजा; 3. जाद ए मंजिल- मंजिल तय करने का साधन। क्या दर्दे-हिज्र और क्या लज़्ज़ते-विसाल। उससे भी कुछ बुलन्द मिली है नज़र मुझे।। ऐसे आशिक का सर जहाँ सजदे के लिए झुकता है वहीं पर ‘काबा’ बन जाता है। नियाजे-इश्क1 को समझा है क्या ऐ वाइजे-नादाँ। हजारों बन गये काबे जहाँ मैंने जबीं रख दी।। इस इश्क़ में आशिक और माशूक दोनों की जुदा सख्शियतें नहीं रहती, मिल जाती हैं और दुनिया का तो वजूद ही खत्म हो जाता है। अब न यह मेरी ज़ात है, अब न ये कायनात2 है। मैंने नवाये-इश्क़3 को साज़ से यूं मिला दिया।। इश्क़ की इंतिहा की यही मंजिल ‘असगर’ के इन शेरों में भी देखी जा सकती है। मेरे मजाज़े-शौक4 का इसमें भरा है रंग। मैं खुद को देखता हूँ, कि तस्वीरे-यार को।। जहान है कि नहीं जिस्मो-जान है कि नहीं। वोह देखता है मुझे, मैं उसको देखता हूँ।। अब न कहीं निगाह है, अब न कोई निगाह में। महव5 खड़ा हूँ मैं हुस्न की जलवागाह में।। अब मुझे खुद भी नहीं होता है कोई इम्तियाज़6। मिट गया हूँ इस तरह मैं उस नक़्शे-पा के सामने।। जूनूने-इश्क़ में हस्ती-ए-आलम पै नज़र कैसी ? रूखे-लैला को क्या देखेंगें महमिल7 देखने वाले।। नज़र में वो गुल समा गया है, तमाम हस्ती पै छा गया है। चमन में हूँ या क़फ़स में हूँ मैं, मुझे इसकी अब खबर नहीं है।। असगर ने माशूक के हुस्न की तारीफ भी की है तो कुछ ऐसे कि उसमें जरा भी बाजारूपन या हल्कापन न आ पाये जरा बानगी देखिये- तुम सामने क्या आये, इक तरफा बहार आई। आँखों ने मेरी गोया फ़िरदौसे-नज़र8 देखा।। 1. नियाजे इश्क़- इश्क की सफलता; 2. कायनात- सृष्टि, संसार; 3. नवाये इश्क- इश्क की लय (आवाज़); 4. मजाजे शौक- इश्क की सामर्थ्य; 5. महव- खोया हुआ; 6. इम्तियाज- अंतर, फर्क; 7. महमिल- ऊँट का हौदा; 8. फिरदौसे नज़र- स्वर्ग सी नज़र। उठ्ठे अज़ब अन्दाज़ से वो ज़ोशे-गज़ब में। चढ़ता हुआ इक हुस्न का दरिया नज़र आया।। यूं मुस्कुराये जान सी कलियों में पड़ गई। यूं लब-कुशां हुए कि गुलिस्ताँ बना दिया।। मैं इज़्तराबे-शौक1 कहूँ या जमाले-दोस्त। इक बर्क़ है जो कौंद रही है नक़ाब में।। अगर खामोश रहूँ मैं तो तूँ ही सब कुछ है। जो कुछ कहा तो तेरा हुस्न हो गया महदूद2।। महबूब से मिल कर प्यास बुझाने को भी वे बुल हविस मानते हैं और माशूक की खोज में भटकते रहने को ही जिन्दगी का सार मानते हैं। यह होता है ‘निष्काम-प्रेम’- मैं बुल-हविस नहीं कि बुझाऊँगा तिश्नगी3। मेरे लिये तो उठती हैं मौजें मृग तृष्णा की।। और अगर एक बार जलवा अफरोज़ हो गया तो फिर किसी को देखने की इच्छा नहीं रखते अपनी नज़रें ही सुपुर्द कर देंगे उसे- अब तो यह तमन्ना है कि किसी को भी ना देखूँ। सूरत जो दिखा दी है तो ले जाओ नज़र भी।। कोई कहे कि मैं शायर हूँ और सागरो-मीना की बात न करे तो क्या आपको यकीं आयेगा उसकी बात पर। शर्तिया तौर पर आप कहेंगे कि नहीं। तो ‘असगर’ साहब क्यूँ शायरी का अपवाद बनते। एक शेर मुलाहिजा फर्माईये- रहा जो होश तो रिन्दी और मैकशी क्या है। ज़रा ख़बर जो हुई तो फिर वोह आग ही क्या है।। और शेखो-जाहिद का जिक्र भी देखिये- न होगा काविशे-बेमुद्दआ4 का राजदाँ बरसों। वोह जाहिद जो रहा सरगुश्तए-सूदो-ज़ियाँ5 बरसों।। (जाहिद तो बरसों से हूरों की अभिलाषा में नमाज, रोज़े का पाबन्द रहा है। ऐसा भला चाहने वाला और फायदा-नुकसान देखने वाला सच्चे और निस्वार्थ प्रेेम (भक्ति) को क्या जानें।) सनम-कदे में तजल्ली6 की ताब मुश्किल है। हरम में शेख को महवे-नमाज़ रहने दे।। 1. इज़्तराबे शौक- इश्क की बेचैनी; 2. महदूद- सीमित; 3. तिश्नगी- प्यास; 4. काविशे बेमुद्दा- बिना मुद्दे की तलाश; 5. सरगुश्तए सूदो ज़ियाँ- नफा नुकसान की तलाश में रहने वाला; 6. तजल्ली- रोशनी, नूर। (सनम के घर में तो उनके वजूद की चमक असहनीय है। शेख को तो मस्जिद ही में नमाज़ पढ़ना उचित रहेगा।) अब ‘असगर’ साहब के तसव्वुफ और फ़लसफे के अन्दाज देखिये- फ़ित्ना-सामानियों1 की खू2 न करे। मुख़्तसर ये कि आरजू न करे।। पहले हस्ती की तलाश जरूर करे। फिर जो गुम हो तो ज़ुस्तज़़ू न करे।। मावराये-सुख़न3 भी है कुछ बात। बात यह है कि गुफ़्तगू न करे।। (संसार की वस्तुओं की इच्छा मत करो। अपने अस्तित्व को जरूर खोजो परन्तु जो खो गया है उसे भूल जाओ उसके पीछे समय व्यर्थ न करो। चुप रहना भी एक मुश्किल काम है। दम तो इसमें है कि अधिक बात न करो।) उसकी राह में मिटकर बेनियाज़े-ख़लकत4 बन जा। हुस्न पर फ़िदा हो कर हुस्न की अदा बन जा।। तू है जब पयाम उसका फिर पयाम क्या तेरा। तू है जब सदा उसकी, आप बेसदा हो जा।। आदमी नहीं सुनता आदमी की बातों को। पैकर-अमल बन कर ग़ैब की सदा हो जा।। तलब कैसी? कहाँ का सूदो-हासिल कैफ़े-मस्ती में। दुआ तक भूल जाते हैं, मुद्दआ इतना हसीं होता।। (इच्छा कैसी और हिसाब-किताब कैसा, आदमी आत्म लीनता में तो दुआ के लिये हाथ उठाना भी भूल जाता है अपने ध्येय को पाने के लिये।) चला जाता हूँ हँसता-खेलता मौज़े-हवादस5 से। अगर आसानियाँ हों जिन्दगी दुश्वार हो जाये।। (अगर जिन्दगी में हवादिस न हों उतार चढ़ाव न हों तो उसका मज़ा ही न रहे। अगर डगर आसान हो तो उसका कटना मुश्किल हो जाता है।) (सारे रंग देखने के बाद अब असगर साहब के चन्द अशआर जो यादगार बन गये हैं पेशे-खिदमत हैं-) 1. फ़ित्ना सामानियों- अशांति के साधन; 2. खू- इच्छा, आदत; 3. मावराये सुखन- चुप रहना, जब्त करना; 4. बेनियाजे खलकत- वैराग्य, एकान्तवास; 5. मौजे हवादस- बुरी घटनाओं की लहरें। मेरी वहशत पै बहस-आराइयाँ1 अच्छी नहीं नासेह। बहुत से बाँध रखे हैं गरेबाँ मैंने दामन में।। इलाही कौन समझे मेरी आशुफ़्ता-मिज़ाज़ी2 को। कफ़स में चैन आता है, न राहत है नशेमन में।। तुम बाख़बर हो चाहने वालों के हाल से। सबकी नज़र का राज तुम्हारी नज़र में है।। मुझको जला के गुलशने-हस्ती न फूंक दे। वोह आग जो दबी हुई मुझ मुश्ते-पर3 में हैं।। मरते-मरते न कोई आक़िलो-फ़रज़ाना4 बने। होश रखता हो जो इन्सान तो दीवाना बने।। कार फ़रमा है फ़क़त हुस्न का नैरंगे-कमाल5। चाहे वो शम्अ बने, चाहे वो परवाना बने।। ऐसा कि बुतकदे का जिसे राज हो सुपुर्द। अहले-हरम में कोई न आया नज़र मुझे।। गो नहीं रहता कभी परदे में राजे-आशिक़ी। तुमने छुपाकर और भी उसको नुमाया6 कर दिया।। वोह शोखियों से ज़लवा दिखाकर तो चल दिये। उनकी ख़बर को जाऊँ कि अपनी ख़बर को मैं।। होता है राजे-इश्क़ो-मुहब्बत उन्हीं से फ़ाश7। आँखें जबाँ नहीं हैं मगर बेजबाँ नहीं।। यह इश्क ने देखा है यह अक्ल से पिन्हा8 है। क़तरे में समन्दर है जर्रे में बयाबाँ है।। घोखा है ये नज़रों का, बाज़ीचा9 है लज़्जत का। जो कुंजे-कफ़स10 में था, वोह अस्ल गुलिस्ताँ है।। समा गये मेरी नज़रों में छा गये दिल पर। ख़याल करता हूँ, उनको कि देखता हूँ मैं।। न कामयाब हुआ और न रह गया महरूम। बड़ा गज़ब है कि मंजिल पै खो गया हूँ मैं।। 1. बहस आराईयाँ- बहसबाजी; 2. आशुफ़्ता मिज़ाज़ी- परेशान रहने वाला मिज़ाज़; 3. मुश्ते पर- एक मुट्ठी पंखों वाला; 4. आकिलो फरजाना- बुद्धिमान और विद्यावान, गुणी; 5. नैरंगे कमाल- विलक्षण दक्षता/कपट, छल; 6. नुमाया- उज़ागर; 7. फाश- खुलना; 8. पिन्हा- छुपे हुए; 9. बाज़ीचा- कौतुक, खिलौना; 10. कुंजे कफ़स- कैद खाना। चमन में छेड़ती है किस मज़े से गुंचओ-गुल को। मगर मौज़े-सबा की पाक दामनी नहीं जाती।। मह-ओ-अंजुम1 में भी अन्दाज़ हैं पेैमानों के। शब को दर बन्द नहीं होते हैं मैखानों के।। कभी हैं महवे-दीद2 ऐसे कि समझ बाकी नहीं रहती। कभी दीदार से महरूम है इतना समझते हैं।। यही थोड़ी सी मैं है और यही छोटा सा पैमाना। इसी से रिन्द राजे-गुम्बदे-मीना3 समझते हैं।। कभी तो जुस्तज़़ू जलवे को भी परदा बताती है। कभी हम शौक में परदे को भी जलवा समझते हैं।। यह जोै़क़े-दीद की शोखी, वोह अक्से-रंगे-महबूबी4। न जलवा है न परदा हम उसे तनहा समझते हैं।। इसी के साथ मैं ‘असगर’ गौंड़वी साहब को सलाम कह उनसे रूखसत लेता हूँ। * 1. मह ओ अंजुम- चाँद और तारों; 2. महवे दीद- देखने में रत; 3. राजे गुम्बदे मीना- सुराही के ऊपरी भाग का भेद; 4. अक्से रंगे महबूबी- प्रेम के रंग की छाया।

हाफ़िज़ मुहम्मद अली ‘हफ़ीज’ जौनपुरी हाफ़िज़ मुहम्मद अली ‘हफ़ीज’ जौनपुर उ.प्र. के बाशिन्दे होने से ‘हफ़ीज’ जौनपुरी के नाम से जाने जाते हैं। आप पहले ‘वसीम’ अज़ीमाबादी साहब से इस्लाह लेते रहे और फिर ‘अमीर’ मीनाई साहब से। आप कभी मीर-तकी-मीर और आतिश के रंग में लिखते थे तो कभी दाग देहलवी साहब के रंग में। अपने बारे में आपका फरमाना था कि - शेर हर रंग में कहना है तेरा काम हफ़ीज। आज हम मान गये, मान गये, मान गये।। जब ‘आतिश’ के अन्दाज में लिखा तो तबीयत फ़कीराना हो गई। चन्द नमूने पेश हैं- देखिये तो हर इक जगह है वोह। ढूँढ़िये तो कहीं नहीं मिलता।। अजब नहीं है कि छोटी ताअतें1 मक़बूल2। कनीज़ें होती हैं शाहों को ख़ुर्द-साल3 पसंद।। हफ़ीज ! जाहो-हशम4 से किसी के क्या मतलब ? फ़क़ीर मस्त हूँ अपना है मुझको माल पसंद।। जहादे-नफ़्स5 की सर हो मुहिम तो क्या कहना ? ज़हे-नसीब मिले मर्तबा जो ग़ाज़ी का। रहके दुनियाँ में कोई काम न उक़बा6 का किया।। यूँ सफ़र में हैं कि कुछ ज़ादे-सफ़र7 पास नहीं।। (अपनी इन्द्रियों को वश में कर लेने की मुहिम में सफलता मिले तभी मज़ा है। नसीब अच्छा तभी हो जब ग़ाज़ी का मर्तबा हासिल हो। दुनिया में रह कर तो परलोक सुधारने के लिए कुछ न कर पाये और सफ़र ऐसे काट दिया जैसे सफ़र में खर्चे के लिये कुछ न हों।) 1. ताअतें- पूजायें; 2. मकबूल- कुबूल, स्वीकृत; 3. खुर्द साल- कम उम्र; 4. जाहो हशम- शान शौकत; 5. जहादे नफ़्स- इच्छाओं से लड़ाई; 6. उक़बा- परलोक; 7. ज़ादे सफ़र- यात्रा में साथ ले जाने वाला सामान। दुनिया का कारखाना है इक तिलिस्मे-इबरत1। दौलत जहाँ गड़ी थी-मुर्दे वहाँ गड़े हैं।। जब ‘दाग’ के अन्दाज में लिखा तो सोज़ो-गुदाज़ आ गया, रवानी आ गई। नमूने के तौर पर- ‘‘मेरा दिल आ गया इक हसीं पर।’’ ये सुनना था कि वोह बोले हमीं पर।। ये फ़िक़रे, ये चालें, ये बातें ये घातें। तुझे ओ दग़ाबाज ! हम जानते हैं।। अदा परियों की, सूरत हूर की, आँखें ग़ज़ालों2 की। ग़रज़ माँगे की हर इक चीज़ है, इन हुस्न वालों की।। या तो बिगड़े हुए तेवर मेरे पहचान गये। या कुछ बात ही ऐसी थी कि झट मान गये।। यह आज आते ही जाने की तुमने ख़ूब कही। हँसे न थे कि रूलाने की तुमने खूब कही।। शेख बरसात में जाकर लबे-जू3 पीते हैं। क़िब्ला-रू4 बैठते हैं, करके व़जू पीते हैं।। मेरे शबाब ? की तौबा पे जा न ऐ वाइज़ ! नशे की बात नहीं एतबार के काबिल।। कभी ‘मीर’ के अदांज को हासिल करना चाहा पर बात न बनी! बैठे-बैठे रास्ता कासिद का दिन भर देखना। तारे गिनना शाम से या जानिबे-दर देखना।। जिस रोज़ रूका नामा-औ-पैगाम तुम्हारा। मर जायेगा ले-ले के कोई नाम तुम्हारा।। हम कब के मर चुके थे जुदाई में ऐ अजल5 ! जीना पड़ा कुछ और तेरे इन्तज़ार में।। इसीलिए कह बैठे कि- ‘मीर’ के अंदाज़ पर किसने गज़ल लिखी ‘हफ़ीज़’! मुझे ज़ेबा6 है अगर इस बात का दावा मैं करूँ।। 1. तिलिस्मे इबरत- नसीहत, ज्ञान का तिलिस्म; 2. गज़ालों- हिरणों; 3. लबे जू- नदी के किनारे; 4. किब्ला रू- पश्चिम मुखी (काबे की तरफ मुँह); 5. अजल- मृत्यु; 6. ज़ेबा- शोभा नहीं देना। लेकिन इनका कलाम लख़नवी अंदाज के कलामों में से यादगार कलाम कहा जा सकता है। चंद अशआर पेशे-खिदमत हैं- दुश्मन न था शबाब तो नादान दोस्त था। बदनाम कर गया मुझे, बदनाम हो गया।। मसरूफ1 कब हुए हैं वोह फ़िक्रे-इलाज़ में। जब दागे-दिल कलेजे का नासूर2 हो गया।। दमे-रूख़सत3 तो मिल लेते गले आप। तड़पता छोड़ कर मुझको क्यों चले आप।। आदमी से मुहब्बत में जो न हो थोड़ा है। इतनी सी जान पै हिम्मत है यह परवाने की।। शम्अ सर धुनती है, यह रोती है खड़ी बाली4 पर। जिंदगी से कहीं मौत अच्छी है परवाने की।। हम भूले हुए हैं राह! ऐ काबानशीनों5 ! जाते थे कहीं और, निकल आये कहीं और।। जाते हैं मिटाते हुए वोह नक़्शे-क़दम को। कहदे कोई उनसे कि है इक खाकनशीं6 और।। उनकी नज़रों में जँची कुछ भी न यूसुफ़ की शबीह7। मुंह बनाकर यह कहा-‘‘हाँ ख़तोख़ाल8 अच्छा है’’।। दर्दे-दिल सुनके मेरा समझे फ़साना है कोई। बोले-‘रूकिये न, कहे जाइये, हाल अच्छा है’।। आहो-फ़ुगा9 से बन गई बुलबुल की जान पर। और गुल वोह है कि जूँ कभी रेंगी न कान पर।। इंकार का गुमाँ है न इकरार का यक़ीन। यह बात खत्म हो गई, उनकी ज़बान पर।। कयामत का मुझे डर क्या, जो कल आती है आज आये। तुम्हारे साथ की खेली है, मेरी देखी-भाली है।। 1. मसरूफ- व्यस्त; 2. नासूर- न भरने वाला घाव; 3. दमे रूख़सत- बिदाई के वक्त; 4. बाली- सिरहाने पर; 5. काबानशीनों- काबे में बैठने वाले; 6. खाकनशीं- खाक पर बैठने वाला; 7. शबीह- तस्वीर; 8. ख़तोख़ाल- चेहरा मोहरा; 9. आहो फुगा- रोना चिल्लाना और आहें भरना। मुख़्तसर1 हाले-जिन्दगी यह है। लाख सौदा था और इक सर था।। उनकी रूखसत का तो दिन याद नहीं। यह समझिये कि रोज़े-महशर था।। खाक बनती तेरे-मेरे दिल में। एक शीशा था एक पत्थर था।। गर्मी का जमाना हो कि जाड़े का जमाना। हमने कभी छोटी, शबे-फुर्कत2 नहीं देखी।। नासेह मेरा ज़ी होश है, दीवाना नहीं है। बात इतनी है उसने तेरी सूरत नहीं देखी।। उठ गया कैस जो सहरा से तो आई आवाज। ’अपने घर को तो न वीराना बनाया होता’। मैं अपने होश में ऐ फ़ित्नागर3 नहीं, न सही। तेरी खबर तो है, अपनी खबर नहीं, न सही।। न खुशी अच्छी है ऐ दिल ! न मलाल4 अच्छा है। यार जिस हाल में रक्खे वही हाल अच्छा हैं।। * 1. मुख़्तसर- संक्षेप; 2. शबे फुर्कत- जुदाई की रात; 3. फ़ित्नागर- उपद्रवी; 4. मलाल- अफसोस।

शाह अब्बुल अलीम ‘आसी’ गाज़ीपुरी लख़नवी स्कूल वाले शायद सूफियाना कलाम को शायरी मानने से ही इंकार कर दे। जैसे उन्होंने ‘नज़ीर’ अकबराबादी साहब के साथ किया। लेकिन देहली वालों के बीच सूफियाना कलाम भी शायरी में माना जाता था। अगर कोई शायर अपने ऐसे कलाम के लिये याद किया जाता हैं तो वे हैं जनाब हजरत शाह अब्बुल अली ‘आसी’ गाज़ीपुरी। आप नासिख की लख़नवी स्कूल के शागिर्द होकर भी सूफियाना कलाम कहते थे। अब सूफियाना कलाम कहाँ और खारजी रंग कहाँ? पर गाज़ीपुरी साहब ने इस मुश्किल काम को भी कर दिखाया। उन्होंने माशूक को खुदा का दर्जा देते हुए उसे हश्र में इंसाफ करते बताया है इस शेर में- हश्र में मुँह फेरकर कहना किसी का हाय ! हाय !! ‘आसी-ए-गुस्ताख’ का हर जुर्म ना-बख़्शीदा1 है !! आपने खुदा से एक दिल माँगा और वो कैसा दिल माँगा? यह देखिये- ताबे-दीदार2 जो लाये मुझे वो दिल देना। मुँह कयामत में दिखा सकने के काबिल देना।। अस्ल फ़ित्ना3 है कयामत में बहारे-फ़िरदौस4। ज़ुज़5 तेरे कुछ भी न चाहे मुझे वह दिल देना।। और फिर जैसा दिल माँगा उसी के मुकाबिल दिलबर भी माँग लिया- रश्के-खुरशीदे-जहाँ6 ताब दिया दिल मुझको। कोई दिलबर भी इसी दिल के मुकाबिल देना।। अपने इश्क के बारे में ‘आसी’ साहब का फरमाना है कि- आशिकी में है महवियत दरकार। राहते-वस्ल7 ओ रेज़े-फ़ुरकत8 क्या ?? 1. ना बख़्शीदा-माफ न करने लायक; 2. ताबे दीदार- देखने की क्षमता रखने वाला; 3. फ़ित्ना- हंगामा, फ़साद; 4. बहारे फिरदौस- स्वर्ग की वाटिका की बहार; 5. ज़ुज़- सिवा, अलावा; 6. रश्के खुरशीदे जहाँ- सूर्य भी जिससे ईर्ष्या करे; 7. राहते वस्ल- मिलने का सुख; 8. रेज़े फुरकत- जुदाई का गम, दर्द। न गिरे उस निगाह से कोई। और उफ़्ताद1 क्या, मुसीबत क्या?? जिनमें चर्चा न कुछ तुम्हारा हो। ऐसे अहबाब2 ऐसी सुहबत क्या ?? जाते हो जाओ हम भी रूख़सत3 हैं। हिज्र में जिंदगी की मुद्दत क्या ?? तो यह तो पाक इश्किया कलाम हुआ खारज़ी शायरी नहीं। जो माशूक के दीदार को कयामत समझे या फिर ख़्वाब माने उस आशिक का इश्क तो हकीकी इश्क जैसा ही पाक हो गया। मेरी आँखें और दीदार आपका ? या कयामत आ गई या ख़्वाब है। इश्क़ में आशिक के दिल की हालत का बयान देखिये- जो रही और कोई दम यही हालत दिल की। आज है पहलुए-ग़मनाक से रूख़सत दिल की।। घर छुटा, शहर छुटा, कूचये-दिलदार छुटा। कोहो-सहरा4 में लिए फिरती है वहशत दिल की।। और माशूक के हुस्न का जलवा देखिए- इश्क ने फरहाद परदे में पाया इंतक़ाम। एक मुद्दत से हमारा खून दामनगीर था।। वोह मुसव्वर5 था कोई या आपका हुस्ने-शबाब। जिसने सूरत देख ली, इक पैकरे-तस्वीर6 था।। तुम्हीं सच-सच बतादो कोैन था शीरी की सूरत में। कि मुश्ते-ख़ाक7 की हसरत में कोई कोहकन क्यों हो।। इश्क के जूनून का मंजर देखिये- कभी न जोशे-जुनूँ में, पाँव में ताक़त। कोई नहीं जो उठा लाये घर में सहरा को।। गुबार हो के ‘आसी’ फिरोगे आवारा। ज़ूनूने-इश्क से मुमकिन नहीं है छुटकारा।। 1. उफ़्ताद - मुसीबत, परेशानी; 2. अहबाब- मित्र, दोस्त; 3. रूख़सत- विदा; 4. कोहो सहरा- पहाड़ों और बयाबाँ; 5. मुसव्वर- चित्रकार; 6. पैकरे तस्वीर- तस्वीर सी सूरत; 7. मुश्ते ख़ाक- मुट्ठी भर मिट्टी (से बना पुतला)। नहीं होता कि बढ़कर हाथ रख दे। तड़पता देखते हैं, दिल हमारा।। अगर काबू न था दिल पर, बुरा था। वहाँ जाना सरे-महफ़िल हमारा।। माशूक को कभी खुदा का दरजा देते हैं तो कभी खुदा के बाद का- तूने दावाऐ-खुदाई1 न किया खूब किया। ऐ सनम ! हम तेरे दीदार को तरसा करते।। वहाँ पहुँच के यह कहना सबा ! सलाम के बाद। कि तेरे नाम की रट है खुदा के नाम के बाद।। और खुदा से यह पूछते हैं कि- तुम कोई नहीं तो सबमें नज़र आते क्यों हो ? सब तुम ही तुम हो तो फिर मुँह को छुपाते क्यों हो ?? उनका माशूक भी दीदार से इंकार करता है तो उनका खुदा भी इसे टालता रहता है। वहाँ भी वादये-दीदार इस तरह टाला। कि खास लोग तलब होंगे बारे-आम के बाद।। जब तबीयत सूफियाना हो तो फिर खुदा ही माशूक बन जाता है। आप बुत परस्तों को मुसलमानों से ज्यादा खुदा के पुुजारी मानते हैं क्योंकि - इतने बुतखानों में सज़दे एक काबे की एवज़। कुफ्र तो इस्लाम से बढ़कर तेरा गरवीदा2 है।। उनके फ़लसफे की बात करें तो जैसे गागर में सागर। बानगी देखिये- वस्ल है, पर दिल में अब तक ज़ाैके-ग़म पेचीदा है। बुलबुला है एन दरिया में मगर नम-दीदा3 है।। (मिलन तो हो गया पर दिल अभी तक गमज़दा है, जैसे पानी का बुलबुला पानी में होते हुए भी इसलिए रोता है कि उसकी हस्ती मात्र कुछ पल की होती है।) तसव्वुफ और इश्क के बीच में फँसे ‘आसी’ फरमाते हैं कि- इश्क कहता है कि आलम से जुदा हो जाओ। हुस्न कहता है कि जिधर जाओ नया आलम है।। 1. दावा ए खुदाई- खुदा होने का दावा; 2. गरवीदा- चाहने वाला; 3. नम दीदा- भीगी आँखों। अन्त में गाज़ीपुरी साहब के चंद और शेर पेश कर उनसे रूखसत लेता हूँ। न कभी बादापरस्त हम, न हमें कैफ़े-शराब1 है। लबे-यार चूमे है ख़्वाब में, वही जोशे-मस्तिये-ख़्वाब है।। उन्हें किब्रे-हुस्न2 की नखवतें3, मुझे फैज़े-इश्क4 की है हसरतें। न कलाम है, न पयाम है, न सवाल है, न जवाब है।। तेरे दीवाने का बेहाल ही रहना अच्छा। हाल देना हो अगर रहम के काबिल देना।। हाय रे हाय तेरी उक्दाकुशाई5 के मज़े। तू ही खोले जिसे वोह उक़्दये-मुश्किल6 देना।। बिन तेरे, जीने की किस जी से तमन्ना करते। मर न जाते शबे-हिज्र तो हम क्या करते।। दाग़े-दिल दिलबर नहीं, सीने से फिर लिपटा हूँ क्यों ? मैं दिले-दुश्मन नहीं, फिर यूं जला जाता हूँ क्यों ?? वोह कहते हैं ‘मैं जिंदगानी हूँ तेरी’। यह गर सच है तो फिर इसका भरोसा नहीं।। * 1. कैफै शराब- शराब का नशा; 2. किब्रे हुस्न - हुस्न का घमंड; 3. नखवतें- नाज; 4. फैज़े इश्क- इश्क के लाभ; 5. उक्दाकुशाई- भेद खोलना; 6. उक्दये मुश्किल- मुश्किल भेद (समस्या)।

जलील हसन ‘जलील’ मानिकपुरी लख़नवी रंग के शायरों में ‘जलील’ मानिकपुरी साहब का नाम भी बहुत शान से रोशन है। आपका पूरा नाम जलील हसन ‘जलील’ था और आप 1864 में मानिकपुर (अवध) में पैदा हुए थे। आप ‘अमीर मीनाई’ साहब के शागिर्द थे और ‘अमीरूललुगात’ जैसे वृहद कोष के संपादक थे। आप हैदराबाद के निज़ाम के उस्ताद भी रहे और आपको ‘इमामुल-मुल्क’ के ओहदे से नवाज़ा गया था। आपके तीन दीवान प्रकाशित हुए जिनमें दो के नाम थे-‘जाने-स़ुखन’ और ‘सरताजे-सुखन’। आपका इंतकाल सन् 1946 में हुआ। आपके चंद यादगार अशआर पेशे-खिदमत हैं- किधर चले मेरे अश्के-रवां 1 नहीं मालूम। भटक रहा है कहाँ करवाँ नहीं मालूम।। उठा दिया तो है लंगर हवा के झोंकों में। किधर सफ़ीना2 है, साहिल कहाँ नहीं मालूम। जमाना है कि गुज़रा जा रहा है। यह दरिया है कि बहता जा रहा है।। जमाने पै हँसे कि कोई रोये। जो होना है, वोह होता जा रहा है।। क्या पूछता है तूं मेरी बर्बादियों का हाल। थोड़ी सी खाक ले के हवा में उड़ा के देख।। अब क्या करूँ तलाश किसी कारवाँ को मैं। गुम हो गया हूँ पा के तेरे आस्ताँ 3 को मैं।। तेरे ख़याल में आये जो उनसे कह देना। मेरी समझ में तो कुछ नामाबर नहीं आता।। जुदा होने पै दोनों का यही मामूल4 ठहरा है। वोह हम को भूल जाते हैं, हम उनको याद करते हैं।। 1. अश्के रवां- बहते रहने वाले आँसू; 2. सफ़ीना- नाव, जाहज; 3. आस्तां- ठिकाना, दर; 4. मामूल- दस्तूर, रिवाज। हसरतों का सिलसिला कब खत्म होता है ‘जलील’। खिल गये जब गुल तो पैदा और कलियाँ हो गई।। यार तक पहुँचा दिया बेताबिये-दिल1 ने मेरे। इक तड़प में मंजिलों का फ़ासला जाता रहा।। शाम होते ही कभी जान सी आ जाती थी। अब वही शब है कि मर-मर के जिये जाते हैं।। आज ही आ जो तुझको आना है। कल खुदा जाने मैं हुआ न हुआ।। ए जलील आँसू बहाये तुमने क्यों। उनको हँसने का बहाना मिल गया।। थी इश्को-आशिकी के लिए शर्ते-जिंदगी। मरने के वास्ते मुझे जीना जरूर था।। वोह बेखुदी की आड़ में लिपटे जलील से। क्यों कर कहूँ कि होश न था, था, जरूर था।। ये जो सर नीचे किये बैठे हैं। जान कितनों की लिए बैठे हैं।। हमारी बेखुदी का हाल वोह पूछें तो ए कासिद। यह कहना होश इतना है कि तुमको याद करते हैं।। जलील अच्छा नहीं आबाद करना घर मुहब्बत का। यह उनका काम है जो जिन्दगी बरबाद करते हैं।। आते-आते आयेगा उनको ख्याल। जाते-जाते बे-ख़याली जायेगी।। देखते हैं गौर से मेरी शबीह2। शायद इसमें जान डाली जायगी। ऐ तमन्ना तुझको रो लूं शामे-वस्ल। आज तू दिल से निकाली जायेगी।। कब्र में भी होगा रोशन दागे-दिल। चाँद पर क्या ख़ाक डाली जायेगी।। मज़े बेताबियों के आ रहे हैं। वोह हमको, हम उन्हें समझा रहे हैं।। 1. बेताबिये दिल- दिल की बेताबी (उत्कंठा); 2. शबीह- तस्वीर, बुत। भला तौबा का मयख़ाने में क्या जिक्र। जो है भी तो कहीं टूटी पड़ी है।। हुए क्या हसरत-कदा1 था दिल हमारा ऐ जलील। हो गया दो रोज में आबाद भी बरबाद भी।। इज़हारे- हाल पै मुझे कुदरत नहीं रही। उनको ये वहम है कि मुहब्बत नहीं रही।। दिलचस्प हो गई तेरे चलने से रहगुज़र। उठ-उठ के गर्दे-राह लिपटती है राह से।। या खुदा दर्दे-मुहब्बत में असर है कि नहीं। जिस पै मरता हूँ उसे मेरी ख़बर है कि नहीं।। आप से आँख मिलाऊँ यह ताकत नहीं। देखता यह हूँ कि अगली-सी नज़र है कि नहीं।। कह दो ये कोहकन से कि-मरना नहीं कमाल। मर-मर के हिज्रेयार में जीना कमाल है।। इस महवियत2 पै आपकी कुर्बान मैं जलील। इतना नहीं ख़याल कि किसका ख़याल है।। उन शोख हसीनों पै जो आती है जवानी। तलवार बना देती है एक-एक अदा को।। चमन के फूल भी तेरे ही ख़ोशाची3 निकले। किसी पै रंग है तेरा किसी पै बू तेरी।। बनी है जान पै, जाने की तुमने खूब कही। मेरा यह हाल फिर आने की तुमने खूब कही।। मुझको जमाना बुरा कह रहा है, कहने दो। गरज़ है तुमसे ज़माने की तुमने खूब कही।। मस्त कर दे मुझे साकी पर इस शर्त के साथ। होश इतना रहे बाकी कि तुझे याद करूँ।। हुस्न देखा जो बुतों का तो खुदा याद आया। राह काबे की मुझे मिली है बुतखाने से।। 1. हसरत कदा - अपूर्ण इच्छाओं का घर; 2. महवियत- खोया रहना; 3. खोशाचीं- दूसरों के गुणों को अपनाने वाले। हम तुम मिले न थे तो जुदाई का मलाल था। अब यह मलाल है कि तमन्ना निकल गई।। कुछ अख़्तियार1 नहीं किसी का तबीयत पर। यह जिस पै आती है बे-अख़्तियार आती है।। बयाबाँ से निकलना अब मेरे मजनूँ का मुश्किल है। ये काँटा भी उलझ के रह गया सेहरा के दामन से।। हवास2 आये हुए फिर खो दिये लैला ने मजनूं के। यह कहना ताज़याना3 था, ‘मेरा दीवाना आता है’।। इस इत्तफ़ाक़ को फ़ज्ले-खुदा4 समझ वाइज। कि हिजवये-मय5 तेरे लब पै थी मुझे होश न था।। दुकाने-मय जो पहुँच कर खुली हकी़क़ते-हाल। हयात बेच रहा था वोह मय-फ़रोश न था।। ऐ चर्ख6 ! कितने खाक से पैदा हुए हसीन ? तूं एक आफ़ताब को चमका के रह गया।। किसी का हुस्न अगर बेनकाब हो जाता। निज़ामे-आलमे-हस्ती7 ख़राब हो जाता।। कासिद पयामे-शौक़8 को देना बहुत न तूल। कहना फ़क़त यह उनसे कि ‘आँखें तरस गई’। न इशारा, न कनाया9, न तबस्सुम, न कलाम। पास बैठे हैं मगर दूर नज़र आते हैं।। क्या कहूँ ! मर-मर के जीने का मज़ा। ऐ खिज़र10 ये जिन्दगानी और है।। गज़ब होता जो तेरी सूरत बे-परदा कहीं होती। कि तुझपे जो निगाह पड़ती वापसी होती।। नज़र पड़ती है तुम पर सर्वकद11 मुझको रश्क़ आता है। चलो ख़िलवत12 में चल बैठें निकलकर बज़्मे-मशहर13 से।। 1. अख़्तियार- काबू; 2. हवास- होश, औसान; 3. ताजयाना- चाबुक लगाना; 4. फज़्ले खुदा- खुदा का रहम; 5. हिज़वयेमय- शराब की बुराई; 6. चर्ख- आस्मां; 7. निजामे आलमे हस्ती- संसार के अस्तित्व का इंतजाम; 8. पयामे शौक- प्रेम संदेश; 9. कनाया- संकेत, गुप्त बात; 10. खिजर- रहनुमाँ, मार्गदर्शक; 11. सर्वकद- लम्बे कदवाली; 12. ख़िलवत- अकेले में; 13. बज़्मे मशहर- मशहूर लोगों की महफिल। तुम ने आ कर मिज़ाज पूछ लिया। अब तबीयत कहाँ बहलती है।। दे रहे हैं मय वो अपने हाथ से। अब यह शय इन्कार के काबिल नहीं।। अजब हौसला हमने देखा गुंचे का। तबस्सुम पे लुटा दी सारी जवानी अपनी।। आके दो दिन को फस्ले-गुल1 स़ाकी। मुब्तला2 कर गई गुनाहों में।। खिज्र3 को ढूंढ़ने मैं निकला था। मिल गये मय कदे की राहों में।। गुजरी इस तरफ से हसीनों की टुकड़ियाँ। कुछ रो गईं तो कुछ मेरे रोने पे हँस गई।। * 1. फ़स्ले गुल- जवानी, बहार; 2. मुब्तला- फँस जाना; 3 खिज्र- वह फरिश्ता जिसे अमृत का पता मालूम है

मिर्ज़ा वाजिद हुसैन ‘यगाना’ चंगेजी ‘शाद’ के शागिर्द मिर्ज़ा वाजिद हुसैन ‘यगाना’ चंगेजी खानदान के थे इसलिये ये यगाना चंगेजी के तख़ल्लुस से जाने जाते हैं। इन्होंने ‘यास’ तख़ल्लुस से भी शायरी की। आपका जन्म अज़ीमाबाद, बिहार में हुआ (सन् 1884) लेकिन ज्यादातर आप लखनऊ में ही रहे। लखनऊ के शायरों का आपकी शायरी से हमेशा 36 का आँकड़ा रहा इसलिये उनकी दुश्मनी आपको हमेशा झेलनी पड़ी। ज़नाब अपनी राह हमेशा बाकियों से अलग रखते थे। जब सभी मिर्ज़ा गालिब के अंदाज को सराहने लगे तब ये उनके रकीब बन बैठे और यहाँ तक कि खुद को गालिब-शिकन कहने लगे। गालिब के लिए इनका फर्माना था कि- भोण्डापन है मज़ाके-गालिब में रचा। मिर्ज़ा का कलाम अपनी न नजरों में जँचा।। अपने विरोध के चलते एक बार तो आप लखनऊ छोड़ कर लाहौर चले गये लेकिन वहाँ भी इनको पंजाबियों का रवैया पसन्द नहीं आया और वापस लखनऊ आना पड़ा। लखनऊ में एक बार अपने एक मुसलमान दोस्त को इस्लाम के खिलाफ़ कुछ लिख कर भेज दिया तो जुनूनी विरोधियों ने आपका मुहँ काला करके जूतों की माला पहना के गधों से जुते रिक्शा में बैठाकर पूरे लखनऊ के बाजारों में घुमा दिया। इतना कुछ सहन करके भी अपनी राह पर डटे रहे। सर्व-धर्म सम्भाव में विश्वास रखते थे और कहते थे कि- कृशन का हूँ मैं पुजारी अली का बंदा हूँ। ‘यगाना’ शाने-खुदा1 देखकर रहा न गया।। दिखावा और पूजा पाठ का ढोंग आपको पसन्द न था और समझते थे कि दिल से खुदा को याद करना ही उनकी अस्ल इबादत होती है। कलमा पढूँ तो क्यूँ पढूँ, सबकी नजर पै क्यूं चढूँ। यादे-खुदा तो दिल से है, दिल से जुबाँ तक आये क्यूँ।। 1. शाने खुदा- खुदा की शान। मजहबी जुनून को इन्सानियत का दुश्मन मानते थे और उसमें अन्धे दीन-परस्तों को जानवर बताते थे। दुनिया के साथ दीन की बेगार ! अलअमाँ1। इन्सान आदमी न हुआ जानवर हुआ।। यहाँ तक कि खुदा को भी ललकार देते थे- आई को टाल दे जभी जानें। दम-ब-खुद2 है तो फिर खुदा क्या है।। हिन्दू-मुसलमानों की एकता के हिमायती थे और इस बात से डरते थे कि उसमें कहीं मजहब बीच में न आ जाये- सुलह ठहरी तो है बिरहमन से। कहीं मज़हब अड़ा न दे कोई टाँग।। खुदा को मन ही में छिपा मानते थे और उसे मन से बाहर ढूँढ़ने वालों को कहते थे कि- आपसे बाहर चले हो ढूँढ़ने। आह पहला ही कदम झूठा पड़ा।। दुनिया के फ़रेब देखकर आपका मानना था कि उसको बनाने वाला भी अपने को अपराधी समझने लगा होगा- तख़लीके-कायनात3 के दिलचस्प जुर्म पर। हँसता तो होगा आप भी यज्दाँ4 कभी कभी।। आपके कहे चन्द यादगार अशआर पेशे-खिदमत है- पहले अपनी तो जात पहचाने। राजे-कुदरत बखानने वाला।। जानकर और हो गया अनजान। हो तो ऐसा हो जानने वाला।। पेट के हलके लाख बड़मारे5। कोई खुलता है जानने वाला।। खाक़ में मिल के पाक हो जाता। छानता क्या है छानने वाला।। दिन को दिन समझे और रात को रात। वक़्त की कद्र जानने वाला।। 1. अलअमाँ- ईश्वर बचाये, खुदा की पनाह; 2. दम व खुद- चुपचाप; 3. तखलीके कायनात- संसार के निर्माण; 4. यज्दाँ- ईश्वर; 5. बड़मारे- डींगें मारना। किधर चला है ? इधर एक रात बसता जा। गरजने वाले गरजता है क्या, बरसता जा।। रूला-रूला के गरीबों को हँस चुका कल तक। मेरी तरफ से अब अपनी दशा पै हँसता जा।। बस एक नुक़्तये-फर्ज़ी1 का नाम है काबा। किसी को मऱकजे-तहकीक2 का पता न चला।। उमीदो-बीम3 ने मारा मुझे दो राहे पर। कहाँ के दैरो-हरम ? घर का रास्ता न मिला।। दिल बेहौसला4 है इक जरा सी ठेस का महमाँ। वह आँसू क्या पियेगा, जिसको ग़म खाना नहीं आता।। सरापा-राज हूँ मैं क्या बताऊँ कौन हूँ क्या हूँ। समझता हूँ मगर दुनिया को समझाना नहीं आता।। रोशन तमाम काबा-ओ-बुतखाना हो गया। घर-घर जमाले-यार का अफ़साना हो गया।। आप खुद अपने कलाम की बराबरी जनाब ‘आतिश’ से करते थे और अंदाज में ‘मीर’ समझते थे - जमाना फिर गया चलने लगी हवा उलटी। चमन को लगा के आग जो बागबाँ निकला।। कलामे-‘यास’ से दुनिया में फिर इक आग लगी। यह कौन हज़रते-आतिश का हम जबाँ निकला।। अंजाम की परवाह करना आपको भाता न था, कोई आगाह भी करे तो क्यों कर करे? दिले-आगाह5 ने बेकार मेरी राह खोटी की। बहुत अच्छा था अंजामे-सफ़र से बेख़बर होना।। ख़री ख़री कहते थे और चूकते न थे। जरा गौर फर्माइयेगा- आप क्या जाने मुझपै क्या गुज़री सुब्ह-दम देखकर गुलों का निखार। दूर से देखलो हसीनों को, न बनाना कभी गले का हार।। अपने साये ही से भड़कते हो, ऐसी वहशत पै क्यों न आये प्यार। तूं भी जी और मुझे भी जीने दे, जैसे आबाद गुल से पहलू-ए-खार6।। 1. नुक्ता ए फर्जी- काल्पनिक बिन्दु; 2. मरकजे तहकीक- घरती का केन्द्र बिन्दु; 3. उमीदो बीम- आशा तथा शंका; 4. बेहौसला- बिना साहस; 5. दिले आगाह- दिल की सावधानी; 6. पहलु ए खार- काँटे के पास। बंदगी का सबूत दूँ क्यों कर, इससे बेहतर है कीजिए इन्कार। ऐसे दो दिल भी कम मिले होंगे, न कशाकश हुई न जीत, न हार।। कलाम में जबर्दस्त असर रखते थे और दुश्मनों के दिल इसी से जलते थे, बानगी देखिये- जमीं करवट बदलती है बलाये-नागहाँ 1 होकर। अज़ब क्या सरपै आये पाँव की खाक आसमाँ होकर।। उठो ऐ सोने वालों ! सर पै धूप आई क़यामत की। कहीं ये दिन न ढल जाये नसीबे-दुश्मनाँ 2 होकर।। अरे ओ जलने वाले ! काश जलना ही तुझे आता। यह जलना कोई जलना है कि रह जायें धुँआ होकर।। पसीना तक नहीं आता तो ऐसी खुश्क तौबा क्या ? नदामत3 वो कि दुश्मन को तरस आ जाए दुश्मन पर। अब अगर लख़नवी शायर हो तो खारिज़ी रंग तो दिखाना ही होगा ना! चन्द नमूने इसके भी पेशे-खिदमत हैं - मज़ाल थी कोई देखे तुम्हें नज़र भरकर। यह क्या है आज पड़े हो मले-दले क्यों कर।। फिरते हैं भेस में हसीनों के। कैसे-कैसे डकैत थांग-की-थांग4।। कोई क्या जाने बाँकपन के यह ढंग। सुलह दुश्मन से और दोस्त से जंग।। क्या जमाना था कैसे दुश्मन थे। रातभर सुलह और दिनभर जंग।। बदल न जाये जमाने के साथ नीयत भी। सुना तो होगा जवानी का एतबार नहीं।। जो ग़म भी खायें तो पहले खिलायें दुश्मन को। अकेले खायेंगे ऐसे तो हम गँवार नहीं।। गले में बाँहे डाले चैन से सोना जवानी में। कहाँ मुमकिन फिर ऐसा ख्बाब देखूँ जिन्दगानी में।। 1. बलाये नागहाँ- अचानक आने वाली मुसीबत; 2. नसीबे दुश्मनाँ- दुश्मन नसीब; 3. नदामत- शार्मिन्दगी, पश्चाताप; 4. थांग की थांग- चोरी का माल छुपाये हुए। दीवाना बन के उनके गले से लिपट भी जाओ। काम कर लो ‘यास’ अपना बहाने-बहाने में।। तौबा भी भूल गये इश्क़ में वोह मार पड़ी। ऐसे औसान गये हैं कि खुदा याद नहीं।। खटका न लगा हो तो मज़ा क्या है गुनाह में। लज़्ज़त ही और होती है चोरी के माल में।। ताअत1 हो या गुनाह पसे-परदा2 खूब है। दोनों का मज़ा जब है कि तनहा करे कोई।। दीवाना वार दौड़ के कोई लिपट ना जाये। आँखों में आँखें डाल कर देखा ना कीजिये।। अल्लाह री बेताबियेदिल वस्ल की शब को। कुछ नींद भी आँखों में है कुछ मय का असर भी।। सलामत रहें दिल में घर करने वाले। इस उजड़े मकाँ में बसर करने वाले।। गले पै छुरी क्यों नहीं भौंक देते। असीरों3 को बेबालोपर1 करने वाले।। आपके कलाम में तसव्वुफ और फ़लसफे की तो इंतिहा ही नहीं है लेकिन चंद शेर बहुत ही बेहतरीन बन पाए हैं। अर्ज किया है कि- नतीजा कुछ भी हो लेकिन अपना काम करते हैं। सवेरे ही से दूरंदेश5 फिक्रे-शाम6 करते हैं।। पढ़के दो कलमे अगर कोई मुसलमाँ हो जाय। फिर तो हैवान भी दो रोज में इन्साँ हो जाय।। आग में हो जलना जिसे वोह हिन्दू हो जाय। ख़ाक में हो जिसे मिलना वोह मुसलमाँ हो जाय।। जैसे दोज़रव की हवा खा के अभी आया है। किस कदर वाइजे-मक्क़ार डराता है मुझे।। जलवये-दारोरसन7 अपने नसीबों में कहाँ ? कौन दुनिया की निगाहों में चढ़ाता है मुझे।। 1. ताअत- पूजा, उपासना; 2. पसे परदा- परदे के पीछे, अकेले में; 3. असीरों- कैदियों (पक्षी); 4. बेबालोपर- बिना बाल और परों के; 5. दूरंदेश- दूरदर्शी; 6. फिक्रे शाम- शाम की फिक्र; 7. जलवाये दारोरसन- धर्म के लिए शहादत का सुख। हासिले-फिक्रे-नारसा1 क्या है ? तूं खुदा बन गया बुरा क्या है।। कैसे-कैसे खुदा बना डाले। खेल बंदे का है खुदा क्या है।। नूर ही नूर है कहाँ का ज़हूर2। उठ गया परदा अब रहा क्या है।। रहने दे हुस्न का ढका परदा। वक्त बेवक्त झाँकता क्या है।। ऐसी आज़ाद रूह इस तन में। क्यों पराये मकान में आई।। बात अधूरी मगर असर दूना। अच्छी लुक़नत3 जबान में आई।। आँख नीची हुई अरे यह क्या। क्यों गरज़ दरमियान में आई।। मैं पयम्बर4 नहीं ‘यगाना’ सही। इसमें क्या असर शाम में आई।। ‘यगाना’ चंगेजी साहब का कलाम दो दीवानों में छपा है जिनके नाम हैं ‘गंजीना’ और ‘आयाते वज़दानी’। अंत में उन्हीं के कलाम से शेर पेश कर यगाना साहब को सलाम भेज कर रूखसत मांगता हूँ। खड़े हैं दुराहे पै दैरो-हरम के। तेरी ज़ुस्तजू में सफ़र करने वाले।। कुजा5 सहने-आलम6, कुजा कुंजे-मरक़द7। बसर कर रहे हैं बसर करने वाले।। * 1. हासिले फिक्रे नारसा -मंजिल तक न पहुँचने की फिक्र; 2. जहूर- प्रकट होना; 3. लुकनत- हकलापन; 4. पयम्बर- ईशदूत; 5. कुजा- कहाँ; 6. सहने आलम- खुला स्थान, आँगन; 7. कुंजे मरकद- कब्र की तंगी।

सैयद रियाज़ अहमद ‘रियाज’ खैराबादी सैयद रियाज़ अहमद ‘रियाज’ खैराबाद जिला सीतापुर उ.प्र. में पैदा हुए और लख़नवी स्कूल के नामाचीन शायर थे। आपने पहले ‘असीर’ से और बाद में ‘अमीर मीनाई’ साहब से इस्लाह हासिल की। खैराबाद छोड़कर आप गोरखपुर आ गये और वहाँ पर 1907 तक आबाद रहे। गोरख़पुर आपके जी को इतना भा गया था कि वहाँ से लखनऊ जाते वक्त आपके मुँह से बे-साख्ता ये शेर निकल पड़ा- जवानी जिनमें खोई है वोह गलियाँ याद आती है। बड़ी हसरत से लब पर जिक्रे-गोरखपुर आता है।। ‘रियाज’ साहब गज़लगो शायर थे और अक्सर शबाब की बातें किया करते थे। कोई ऐसी जमीं नहीं जिस पर वे गज़ल न कह सकें। अपनी तबीयत की रंगीनी के बारे में वे खुद कहते थे कि - वाह क्या रंग है, क्या खूब तबीयत है रियाज। हो जमीं कोई तुम्हें फूलते-फलते देखा।। और जिस अंजुमन में बैठ गया रौनक आ गई। कुछ आदमी ‘रियाज़’ अज़ब दिल्लगी का था।। शराब और मैखाने पर रियाज ने खूब लिखा लेकिन खुद कभी शराब न पी। बकौल ‘जलील’‒ मस्ते-मय कर दिया जहाँ भर को। खुद लगाया न मुँह से सागर को।। और जब किसी ने पूछा कि आप पीते हैं कि नहीं ? तो फ़र्माया - शेरे-तर मेरे छलकते हुए सागर है रियाज़। फिर भी सब पूछते हैं-आपने पी है कि नहीं ? रियाज के दीवान का नाम है, ‘रियाज़े-रिज़वाँ’ इसमें तकरबीन 7000 अशआर है जिनमें से तकरीबन 1350 अशआर सागरो-मीना से छलकते हैं और 600 गजलों में से एक भी गज़ल ऐसी नहीं जिसमें सागरो-मीना न हों। इस तरह के कुछ शेर पेशे खिदमत है - रहने देगा न दमे-नजअ1 कोई हल़क को खुश्क़। मैकदे में हमें इतना तो सहारा होगा। आबे-ज़मज़म2 के सिवा कुछ नहीं काबे में ‘रियाज़’। मैकदा तुम जिसे समझे हो मदीना होगा। बज़्मे-महशर3 गर बने साक़ी की बज़्म। मैं न उठूंगा गर पी के गिरा।। नमाजे-ईद हुई मैकदे में धूम से आज। रियाज़ बादाकशों ने आज हमें इमाम किया।। दुनिया से अलग हमने मैख़ाने का दर देखा। मैख़ाने का दर देखा, अल्लाह का घर देखा।। दोनों के मजे लूटे, दोनों का असर देखा। अल्लाह का घर देखा, मैख़ाने का दर देखा।। काबे में नजर आये जो सुबह अजाँ देते। मैख़ाने में रातों को उनका भी गुज़र देखा।। कुछ काम नहीं मय से गो इश्क़ है इस शय से। है रिन्द ‘रियाज़’ ऐसे दामन भी न तर देखा।। यह अपनी व़ज़अ और यह दुश्नामे-मय-फरोश4। सुनकर जो पी गये यह मजा मुफ़लिसी का था।। जा जा के बज़्मे-वाज में सौ बार हमने पी। चोरी किसी की थी न हमें डर किसी का था।। अहले-हरम5 भी आके हुए थे शरीके-दौर। कुछ रंग आज और मेरी मैकशी का था।। राह से काबे के हमने रेजये-मीना6 चुने। क्या अजब इसके सबब हम को मिले हज का सबाब।। ईद के दिन मैकदे में है कोई ऐसा ‘रियाज़’। एक चूल्लू दे के जो ले तीस रोजों का सबाब।। 1. दमे नजअ- जाँकनी के वक्त, अन्तिम श्वास तक; 2. आबे ज़मज़म- काबे में सोते का पानी; 3. बज़्मे महशर- कयामत के दिन की महफिल; 4. दुश्नामे मय फरोश- मदिरा बेचने वाले की बदनामी; 5. अहले हरम - मस्जिद के मौलवी; 6. रेजये मीना- शराब रखने का पात्र (पैमाने) के टुकड़े। आबाद करे बादाकश अल्लाह का घर आज। दिन जुम्मे का है बन्द है मैख़ाने के दर आज।। मैख़ाना हमारा कोई मस्जिद तो नहीं है। तसबीह1 लिये कौन बुज़ुर्ग आये इधर आज।। मेरा यही खयाल है गो मैने पी नहीं। कोई हसीं पिलाये तो यह शय बुरी नहीं।। खुदा के हाथ है बिकना न बिकना मय का ऐ साक़ी। बराबर मसज़िदे-जामा2 के हमने अब दुकां रख दी।। बिना3 है एक ही दोनों की काबा हो कि बुतखाना। उठा कर खिश्ते-खुम4 हमने यहाँ रख दी वहाँ रख दी।। रियाज़ की मैकशी की शायरी में फ़लसफाना रंग है। एक शेर पेश है जो यह कहता है कि पीने वालों के मुँह पर तेज नहीं आता और उसका कारण बताता है कि केवल ईश्वर में लीन होने से चेहरे पर तेज नहीं आता इसके लिये नीयत का पाक साफ होना जरूरी है। पीकर भी झलक नूर की मुँह पर नहीं आती। हम रिन्दों में जो साहबे-ईमाँ नहीं होते।। काजल की कोठरी में न जाने में ही बेहतर है क्योंकि वहां जाने पर जो दाग लगेगा उसे छुड़ाना मुश्किल होता है। अगर दामन पर दाग लगा तो जग में रूसवाई हो ही जायेगी, भले दिल आपका कितना ही पाक क्यूं न हो। इस बात को क्या खूब कहा है - दिल पाक साफ़ लाख है दामन को क्या करूँ। जा जा के मैकदे में ये धब्बा लगा दिया।। कर्ज लेकर पीने वाले हमेशा यह सोचते रहते हैं कि मुफ़्त की पी रहे हैं लेकिन उधार चढ़ता जाता है और वह कंगाल हो जाता है। इस बात को कहता ये शेर देखें - जब तक मिलेगी कर्ज़ पिये जायेंगे जरूर। हम जानते हैं मुफ्त है सौदा उधार का।। मैकशी की सुखन-फहमी में, रस्म है कि वाइज और नासेह जो मैकेशी की खिलाफ़त करते हैं तथा जाहिद जो पीने से परहेज रखता है पर तंज कसे जायें। इसी रस्म को निभाते हुए ‘रियाज’ साहब ने भी शेर लिखे जिनका नमूना देखते हैं‒ 1. तसबीह- माला; 2. मस्जिदे जामा- बड़ी मस्जिद; 3. बिना- बुनियाद, कारण; 4. खिश्ते खुम- शराब रखने का पात्र। पी-पी के उसके सज़दे किये हैं तमाम रात। अल्लाह रे शगल जाहिदे-शब-जिन्दादार1 का।। किया जो मना मैकदे जाने से वाइज ने। तो रोज उठ के यही काम सुबह-ओ-शाम किया।। महफ़िले-वाज में वाइज न मेरे सर होता। एवज़े-शीशा2 अगर हाथ में पत्थर होता।। देखकर शोख़ हसीनों को बता ऐ नासेह। गुदगुदी दिल में कभी तेरे उठी है कि नहीं।। शेख ये कहता गया पीता गया। है बहुत ही बदमज़ा3 बू भी नागवार है।। जी न माना हज़रते-नासेह को देखकर। कुछ यूँ ही थोड़ी सी पी ली दिल्लगी के वास्ते।। जिस काम को तू मना करेगा हमें नासेह। हम छोड़ के सौ काम वही काम करेंगे।। ऐ शेख तू चुरा के पिये जब कभी पिये। तेरी तरह किसी की न नीयत खराब हो।। जनाबे-शेख ने जब पी तो मुँह बना के कहा। ‘‘मजा भी तल्ख़ है कुछ बू भी खुशगवार नहीं’’।। पाक-ओ-साफ़ इतनी जिसने पी फ़रिश्ता हो गया। जाहिदों यह हूर के दामन में है छानी हुई। यह तो हुई मैकशी की बात। अब रियाज़ के इश्क़, आशिक और माशूक की बात करते हैं। माशूक के हुस्न की तारीफ का अंदाज देखिये। तेरा यह रंग रूप, यह जोबन शबाब का। जैसे चमन बहार में फूला-फला हुआ।। थी दिल में गुदगुदी कि पूछूँ दमे-विसाल। यह तूँ हँसा कि फूल खिला तेरे हार का।। और - वोह तस्वीर आज तक महफ़ूज4 है चश्मे-तसव्वुर5 में। तेरे बचपन से जब अठखेलियाँ करता शबाब आया।। 1. जाहिदे शब जिन्दादार- रातों को जाग कर इबादत करने वाला; 2. एवजे शीशा- गिलास के बजाय; 3. बदमजा - खराब स्वाद वाली; 4. महफूज- सुरक्षित; 5. चश्मे तसव्वुर- कल्पना की नज़र। हुए हंगामा-ए-हश्र1 कितने गोशाये2-दिल में। वोह मेरे सामने कुछ इस अदा से बेनकाब आया।। और उसकी नजाकत का अंदाज देखिये - वोह सिन3 ही क्या है समझ हो जो ऐसी बातों की। वोह पूछते हैं कि-‘‘रोजे-विसाल क्या होगा ?’’ शर्माेहया का आलम देखिये- नशे से झुकी पड़ती थी यूं ही तेरी आँखें। छेड़ों से मेरी और बढ़ा बोझ हया का।। दिल छीनती हैं और झुकी जाती हैं आँखें। शोखी में भी जाता नहीं अन्दाज़ हया का।। कह उठे-‘‘चुप क्यों हो विसाल के बाद ?’’ खुद ही शरमा गये इस सवाल के बाद।। और शोखियों की तो बात ही क्या है‒ वक़्त ही ऐसा था रूख़सत हो गयी उनकी हया। बात ही ऐसी थी खुल खेले वो शरमाने के बाद।। माशूक का हरज़ाईपन और बेवफाई तो लख़नवी स्कूल की विशेषता है, तो फिर रियाज़ का हबीब क्यूँ कम हरज़ाई या बेवफ़ा होगा‒ गैर के घर से झिझकते हुए तुम निकले थे। रुकते देखा तुम्हें फिर छुपके निकलते देखा।। कभी कुछ रात गये या कभी कुछ रात रहे। हमने इन परदानशीनों को निकलते देखा।। और आशिक मियाँ फिर आवारा क्यूं न हो - बाज़ार में भी चलते हैं तो कोठों को देखते। सौदा खरीदते हैं तो बस ऊँची दुकान का।। लूटी है बहुत हमने हसीनो की जवानी। पीरी में भी अब तक है जवानी की वही बात।। हमको मिल जायें तो आ जाये मजा, अच्छे माशूक और सस्ते दाम के। जितने माशूक हैं मिल जायें हमें, हैं ये काफ़िर सब हमारे काम के।। 1. हंगामा ए हश्र- कयामत के दिन के हंगामे; 2. गोशये दिल - दिल के कोने में; 3. सिन- उम्र। जब माशूक और आशिक बाज़ारी है तो फिर इश्क़ कैसा होगा? ये भी देखिये- कहते हैं ‘‘जान पड़ गई आफ़त में वक्ते-वस्ल’’। ‘‘मल दल के रख दिया मुझे अच्छा ये प्यार है’’।। कहना किसी का सुबहे-शबे-वस्ल1 नाज़ से। ‘‘हसरत तुम्हारी जान हमारी निकल गई’’।। मैंने लिया जो हश्र में दामन बढ़ा के हाथ। बोले वोह, ‘‘आबरू है मेरी अब खुदा के हाथ’’।। बढ़ने लगे थे दस्ते-अदब2 बनके दस्ते-शौक3। ज़ालिम ने आज थाम लिये मुस्कुरा के हाथ।। लेकिन इक्का दुक्का शेर पाक-इश्क पर भी मिलता है कलामे-रियाज़ में, नमूना देखिये- ताअत4 का इन बुतों ने सलीका सिखा दिया। खुद क्या मिले कि मुझको खुदा से मिला दिया।। और तसव्वुफ तथा फ़लसफा तो पहले आप देख ही चुके हैं, फिर भी एक और नमूना देखिये- जिनके दिल में है दर्द दुनिया का। वही दुनिया में जिन्दा रहते हैं।। जो मिटाते हैं खुद को जीते जी। वही मरकर भी जिंदा रहते हैं।। और अंत में‒ ऐसे हर शख़्स को मेरा झुककर सलाम। खुलकर जो कहे हर बात को सरेआम।। * 1. सुब्हे शबे वस्ल- मिलन की रात्रि की सुबह; 2. दस्ते अदब- अदब से उठने वाले हाथ; 3. दस्ते शौक- मज़े लेने वाले हाथ; 4. ताअत - पूजा, उपासना।

सैयद अकबर हुसैन ‘अकबर’ इलाहाबादी अब हम ‘अकबर’ इलाहाबादी साहब का जिक्र करेंगे। जब अकबर साहब ने शायरी शुरू की उस समय अँग्रेजी शासन और पाश्चात्य संस्कृति हमारी जमीन और समाज पर प्रभावी हो रहा था। अकबर इन दोनों ही के खिलाफ़ थे और इसी कश्मकश की गूँज उनकी शायरी में मिलती है। अकबर हिन्दोस्तान के नैतिक मूल्यों के हिमायती थे और जन-मानस की भावनाओं के साथ खिलवाड़ भी उन्हें ना पसन्द था। अपनी शायरी के जरिये उन्होंने यहाँ के नैतिक मूल्यों और भावनाओं की रक्षा करनी चाही। उन्होंने अँग्रेजों के द्वारा भारत की राजनैतिक और आर्थिक लूट खसोट के षड्यंत्र को भली प्रकार से समझ लिया था। अकबर की शायरी का अंदाज मजाकिया था परन्तु बात वे दर्द की करते थे। वे शायद अपने मन की पीड़ा को मुस्कान में छिपाना चाहते थे। उन्होंने उर्दू के साथ अँग्रेजी, फ़ारसी, अरबी और हिन्दी शब्दों का प्रयोग करके अपना एक नया भाषाई अंदाज बनाया। उन्होंने औरतों की बेपर्दगी, फैशन और नये वैज्ञानिक आविष्कारों पर तंज कसे। उस समय में विद्यमान परिस्थितियों को परिलक्षित करती उनकी एक रचना पेशे-खिदमत है। है क्षत्तिरी1 भी चुप कि न पट्टा, न बाँक2 है ! पूरी भी ख़ुश्क़ लब है कि घी छः छटाँक है।। गो हर तरफ़ हैं खेत फलों से भरे हुए ! थाली में ख़रबूज़े की फ़कत एक फाँक है !! कपड़ा-गराँ3 हैं, सत्र4 है औरत का आशकार5। कुछ बस नहीं जबाँ पे फ़कत ढाँक ढाँक है !! भगवान का करम हो स्वदेशी के बैल पर ! लीडर की खींच खाँच है, गाँधी की हाँक है! अकबर पे बार है यह तमाशाए-दिलशिकन6। उसकी तो आख़िरात7 की तरफ ताँक झाँक है।। 1. क्षत्तिरी- क्षत्रिय; 2. बाँक- सजधज; 3. कपड़ा गराँ- कपड़ा बोझ है; 4. सत्र- अंग; 5. आशकार- जाहिर; 6. तमाशाए दिलशिकन- दिल तोड़ने वाले नजारे; 7. आख़िरत- मृत्यु, अन्त की और। अकबर को अपने सोच अपने नज़रिये को जाहिर करने हेतु एक माध्यम की तलाश रहती थी। यह माध्यम शेरो-शायरी बनी। लेकिन देखिये उन्होंने खुद क्या कहा इस बाबत- हुक्काम से नियाज़1 न गाँधी से रब्त2 है। अकबर को सिर्फ़ नज़्मे-मजाज़ी3 का ख़ब्त है।। हँसता नहीं वह देख के इस कूद फाँद को। दिल में तो कहकहे हैं, मगर लब पे ज़ब्त है।। अकबर साहब के शेर ही नहीं गजलें भी फड़कती हुई होती थी, एक ऐसी ही गज़ल पेश है- हस्ती-के-शज़र4 में जो यह चाहो कि चमक जाओ। कच्चे न रहो बल्कि किसी रंग में पक जाओ।। मैंने कहा कायल मैं तसव्वुफ का नहीं हूँ। कहने लगे इस बज़्म में जाओ तो थिरक जाओ।। मैंने कहा कुछ ख़ौफ़ कलेक्टर का नहीं है। कहने लगे आ जाएँ अभी वह तो दुबक जाओ।। मैंने कहा वर्जिश की कोई हद भी है आख़िर। कहने लगे बस इसकी यही हद है कि थक जाओ।। मैंने कहा अफ़कार5 से पीछा नहीं छुटता। कहने लगे तुम जानिबे-मयख़ाना6 लपक जाओ।। मैंने कहा ‘अकबर’ में कोई रंग नहीं है। कहने लगे शेर उसके जो सुन लो तो फड़क जाओ।। हिंदू-मुस्लिम कौमों को आपस में लड़ाकर अंग्रेजों ने बाँटो और राज करो की नीति का प्रचलन किया। ‘अकबर’ ने इस रणनीति को समझ कर यह नसीहत दी कि- जिस बात को मुफ़ीद7 समझते हो ख़ुद करो। औरों पे उसका बार न इसरार8 से धारो।। हालात मुख़्तलिफ़9 हैं, जरा सोच लो ये बात। दुश्मन तो चाहते हैं कि आपस में लड़ मरो।। 1. नियाज- मुलाकात; 2. रब्त - लगाव; 3. नज़्मे मजाज़ी- वास्तविकता बयान करने वाली नज़्म; 4. हस्ती का शजर- अस्तित्व का पेड़; 5. अफ़कार- चिन्ताएं, फिकर; 6. ज़ानिबे मयखाना- मयखाने की तरफ; 7. मुफ़ीद- फायदे मंद; 8. इसरार- जबर दस्ती; 9. मुख़्तलिफ़- अलग। बिजली की रोशनी और उसके लैम्पों की चका-चौंध से आँखों को परेशानी न हो, इस बात के डर का खुलासा करता अकबर का शेर पेश है- बर्क1 के लैम्प से आँखों को बचाए अल्लाह। रोशनी आती है और नूर चला जाता है।। महात्मा गाँधी के आजादी और स्वराज आंदोलनों ने भी अकबर के जेहन को खूब झकझोरा। गाँधी के स्वदेशी आंदोलन पर अकबर का लिखा कतआ पेश है- किया तलब जो स्वराज भाई गाँधी ने। मची यह धूम कि ऐसे ख़याल की क्या बात।। कमाले-प्यार से अँग्रेज़ ने कहा उनसे। हमीं तुम्हारे हैं, फिर मुल्क-ओ-माल की क्या बात।। उस समय ‘गाँधी’ का नाम आजादी की लड़ाई में तेजी के साथ उभर रहा था और वे अंग्रेजों के लिये एक सर दर्द बन रहे थे। अँग्रेज उनको गिरफ़्तार करते थे और छोड़ देते थे। अस्ल में वो आजादी के आंदोलन में भी दो फाँक कर देना चाहते थे। अकबर ने इस मौजू पर कहा कि- पूछता हूँ ‘‘आप गाँधी को पकड़ते क्यूं नहीं’’? कहते हैं ‘‘आपस ही में तुम लोग लड़ते क्यूं नहीं’’?? पेच किस्मत के तुम्हारे जब दिखायेंगे कभी। ‘‘आदिलाना2 रंग में उठ कर करेंगे हम जजी’’ ।। उनकी शायरी का दौर सियासत में गाँधी और अँग्रेजों का दौर था और सब आँख बंदकर गाँधी की आँधी में बह रहे थे। इस बात का बयान देखिये- नहीं हरगिज़ मुनासिब पेश-बीनी3 दौरे-गाँधी में। जो चलता है वह आँखें बन्द कर लेता है आँधी में।। इस दौर में आम आदमी अँग्रेज सरकार में क्लर्की करने ही को सफलता मान लेता था। वह पढ़ लिखकर, अँग्रेजी तालीम हासिल करता, बी.ए. की डिग्री हासिल करता, फिर नौकरी पा लेता और पेन्शन याफ़्ता होकर मर जाता। इस बात को बयां करता शेर पेश है- हम क्या कहें अहबाब4 क्या कारे-नुमायाँ5 कर गए। बी.ए.किया, नौकर हुए, पेन्शन मिली, फिर मर गए।। 1. बर्क- बिजली; 2. आदिलाना- न्याय संगत; 3. पेशबीनी- आगे देखना; 4. अहबाब- रिश्तेदार; 5. कारे नुमायाँ- बड़ा काम कारनामा। अँग्रेजी सरकार में सेवारत ये बाबू लोग अंत पंत यही नतीजा निकालते कि अंग्रेजों ने उन्हें बेवकूफ बनाया है। अकबर ने उनकी भावनाओं को समझ कर फरमाया कि- हमें भगवान की कृपा ने तो बाबू बनाया है। मगर योरप के शाला लोग ने उल्लू बनाया है।। मगर उस समय का आम हिन्दोस्तानी इसी बाबूगिरी में अपनी किस्मत मानता था- चार दिन की जिन्दगी है कोफ़्त से क्या फायदा। खा डबल रोटी, क्लर्की कर, खुशी से फूल जा।। उर्दू शायरी में अंग्रेजी शब्दों का चलन सबसे पहले अकबर साहब ही ने आरंभ किया। यद्यपि अंग्रेजी में काफ़िये मिलाने का काम किन्हीं दूसरे शायर साहब ने किया। अँग्रेजी के शब्दों के काम में लेने के पीछे अकबर साहब का खास मतलब शेरों में तंज डालना होता था। चन्द अशआर पेशे-खिदमत हैं। ‘कान्फ्रेंस’ अहबाब से पुर है, जो सफ़ है वह सिल्के-दुर1 है। सब को याद उस्ताद का गुर है, दिलकश हर ‘इस्पीच’ का सफ़र है।। शेख को उल्फ़त हो गई ‘मिस’ की, खूब पिये अब शौक़ से ‘व्हिस्की’। अगली दुनिया दह्र से खिसकी, बैठा कौन है शर्म है किसकी।। छोड़ ‘लिट्रेचर’ को अपनी ‘हिस्ट्री’ को भूल जा। शेखो-मस्जिद से तअल्लुक़2 तर्क3 कर, ‘स्कूल’ जा।। ‘एग्ज़िबीशन’ की शान अनोखी, हर राय उम्दा हर शय चोखी। ‘ओक्लीदस’ की नापी-जोखी, मन भर सोने की लागत सोखी।। हर चन्द कि ‘कोट’ भी है ‘पतलून’ भी है। ‘बँगला’ भी है ‘पॉट’ भी है साबुन भी है।। लेकिन यह मैं तुझसे पूछता हूँ हिन्दी। ‘योरोप’ का तेरी रगों में कुछ खून भी है।। ‘नेटिव’ नहीं हो सकते जो गोरे हैं तो है क्या ग़म। गोरे भी तो बन्दे से खुदा हो नहीं सकते।। हम हों जो ‘कलेक्टर’ तो वह हो जाएं ‘कमिश्नर’। हम उनसे कभी ओहदाबरां4 हो नहीं सकते।। 1. सिल्के दुर- मोतियों की लड़ी; 2. तअल्लुक- सम्बन्ध; 3. तर्क- खत्म; 4. ओहदाबरां- ऊँचे ओहदे वाला। मयख़ानये ‘रिफ़ार्म’ की चिकनी जमीन पर। वायज़ का ख़ानदान भी आख़िर फिसल गया।। कैसी नमाज़ ‘बाल’ में नाचो जनाबे-शेख़। तुमको ख़बर नहीं कि ज़माना बदल गया।। न कुछ इन्तज़ारे-गज़ट कीजिए। जो ‘अफसर’ कहे बस वह झट कीजिए।। बहुत शौक है अँग्रेज़ बनने का। तो चेहर पे अपने गिलट कीजिए।। अजल1 आई ‘अकबर’ गया वक़्ते बहस। अब ‘इफ’ कीजिए और न ‘बट’ कीजिए।। समाज में अँग्रेज़ियत आने की मुख़ालफ़त2 भी अकबर साहब ने बहुत जोरों से की। खासकर मुस्लिम समाज में जो बे-पर्दगी का आलम आया वह उन्हें नागवार था। इस बेहयाई के लिए उनका लिखा कतआ पेशे-ख़िदमत है। बे-पर्दा कल जो आईं नज़र चन्द बीबियाँ। ‘अकबर’ ज़मीं में ग़ैरते-क़ौमी3 से गड़ गया।। पूछा जो उनसे आपका पर्दा वह क्या हुआ। कहने लगी कि अक़्ल पे मर्दों की पड़ गया।। मगरिबी तालीम ने जो देश की हवा खराब की उस पर लिखा एक तंज पेशे ख़िदमत है। नज़्द4 में भी मग़रिबी तालीम जारी हो गई। लैला-ओ-मजनूँ में आखिर फ़ौज़दारी हो गई।। मगरिब में औद्योगिक क्रांति आई तो भाप का आविष्कार हुआ, बिजली की खोज़ हुई और इन चीजों की सामाजिक अहमियत लोगों को समझ आई। लेकिन अकबर को इन आविष्कारों से डर ज्यादा लगता था क्योंकि ये कल-कारखाने इंसानियत को ख़तरे में डाल रहे थे। इस विचार को प्रकट करते उनके कुछ कतआत पेश हैं। भूलता जाता है योरप आसमानी बाप को। बस ख़ुदा समझा है उसने बर्क़ को और भाप को।। बर्क गिर जाएगी इक दिन और उड़ जायेगी भाप। देखना ‘अकबर’ बचाए रखना अपने आपको।। 1. अजल- मृत्यु; 2. मुख़ालफत- विरोध; 3. गैरते कौमी- जातिगत लज़्ज़ा, शर्म; 4. नज्द- वह शहर जहाँ लैला तथा मज़नू रहते थे। इंजन आया निकल गया ज़न से, सुन लिया नाम आग पानी का। बात इतनी और इसपे यह तूमार1, गुल है योरप में जाँफ़शानी2 का।। शेख-दरगोर-औ-क़ौम-दर-कालेज3, रंग है दौरे-आस्मानी का। कत्ल से पहले दी ‘क्लोरोफ़ार्म’, शुक्र है उनकी मेहरबानी का।। अजानों से सिवा बेदार-कुन4 इंजन की सीटी है। इसी पर शेख़ बेचारे ने छाती अपनी पीटी है।। गए शरबत के दिन यारों के आगे अब तो ए ‘अकबर’। कभी ‘सोडा’ कभी ‘लिमनेड’ कभी ‘व्हिस्की’ कभी ‘टी’ है।। आपकी एक खूबसूरत गज़ल पेशे-खिदमत है। आँखें मुझे तलवों से वह मलने नहीं देते। अरमान मेरे दिल का निकलने नहीं देते।। खातिर से तेरी याद को टलने नहीं देते। सच है कि हमीं दिल को संभलने नहीं देते।। किस नाज़ से कहते हैं वह झुंझला के शबे-वस्ल। तुम तो हमें करवट भी बदलने नहीं देते।। पर्वानों ने फ़ानूस को देखा तो यह बोले। क्यों हमको जलाते हो कि जलने नहीं देते।। हैरान हूँ किस तरह करूँ अर्जे-तमन्ना5। दुश्मन को तो पहलू से वह टलने नहीं देते।। दिल वह है कि फरियाद से लबरेज है हर वक्त। हम वह हैं कि कुछ मुँह से निकलने नहीं देते।। गर्मीए-मुहब्बत में वह हैं आह से माने। पंखा नफ़से-सर्द6 का झलने नहीं देते।। अब चन्द नसीहती अशआर जिनमें अकबर साहब का दुनियावी तजुर्बा झलकता है पेश करता हूँ। अंदाज कभी कभी मज़ाकिया है पर बातें सटीक हैं। आप ग़ौर करें। तरकीबो-तकल्लुफ़7 लाख करो फितरत नहीं छुपती ऐ ‘अकबर’। जो मिट्टी है वह मिट्टी है, जो सोना है वह सोना है।। 1. तूमार- झूठी बातें, बढ़ी-चढ़ी बातें; 2. जाँफशानी- बड़ी मेहनत; 3. शेख दरगोर औ कौम दर कालेज- शेखजी कब्र में और कौम कॉलेज में; 4. बेदार कुन- जगाने वाली; 5. अर्जे तमन्ना- इच्छा की अभिव्यक्ति; 6. नफस ए सर्द- ठंडी साँसों; 7. तरकीबो-तकल्लुफ़- दिखावट की तरकीबें। काम कोई मुझे बाक़ी नहीं मरने के सिवा। कुछ भी करना नहीं अब कुछ भी न करने के सिवा।। हसरतों का भी मेरी तुम कभी करते हो ख़याल। तुमको कुछ और भी आता है सँवरने के सिवा।। फिर गई आप की दो दिन में तबीयत कैसी। ये वफ़ा कैसी थी, साहब ये मुरव्वत कैसी।। है जो किस्मत में वही होगा, न कुछ कम न सिवा। आरजू कहते हैं किस चीज़ को, हसरत कैसी।। इनायत1 मुझपे फ़रमाते हैं शेख़-ओ-बिरहमन दोनों। मवाफ़िक2 अपने-अपने पाते हैं मेरा चलन दोनों।। मुझे होटल भी खुश आता है और ठाकुर द्वारा भी। तबर्रूक3 है मेरे नज़दीक परशाद-ओ-‘मटन’ दोनों।। सिधारें शेख काबे को, हम ‘इंगलिस्तान’ देखेंगे। वह देखें घर खुदा का, हम खुदा की शान देखेंगे।। तेरी दीवानगी पर रह्म आता है हमें ‘अकबर’। कोई दिन वह भी होगा हम तुझे इंसान देखेंगे।। मुल्क में मुझको जलीलो-ख़्वार4 रहने दीजिए। आप अपनी इज़्ज़ते-दरबार5 रहने दीजिए।। ‘टेम्ज’ में मुमकिन नहीं नज़्ज़ारा-ए-मौज़े-फ़रात6। ऐसी ख़्वाहिश को समुन्दर पार रहने दीजिए।। दीन-ओ-मिल्लत की तरक्की का ख़्याल अच्छा है। अस्ल मजबूत हो जिसकी वह निहाल अच्छा है।। बखुदा हिन्द के पुर्जें भी गज़ब ढ़ाते हैं। यह गलत है कि विलायत ही का माल अच्छा है।। अपना रंग उनसे मिलाना चाहिए। आज-कल पीना-पिलाना चाहिए।। 1. इनायत- कृपा, रहम, मेहरबानी; 2. मवाफिक- अनुसार; 3. तबर्रूक- बरकत, प्रसाद; 4. जलीलो ख्वार- बे-इज़्ज़त और पीड़ित; 5. इज़्ज़ते दरबार- दरबार की इज़्ज़त; 6. नज़्ज़ारा ए मौजे फरात- फरात नदी की मौज (लहरों) का नज़ारा। खूब वह दिखला रहें हैं सब्ज़-बाग। हम को भी कुछ गुल खिलाना चाहिए।। कुछ न हाथ आए मगर इज़्ज़त तो है। हाथ उस मिस से मिलाना चाहिए।। अकबर एक अलग अंदाज में लिखते थे। एकदम साफ गोई पसन्द ! जो मन में आया कह दिया। अपने लिये खुद उनका कहना था कि- आप क्या पूछते हैं मेरा मिज़ाज़। शुक्र अल्लाह का है, मरता हूँ।। यह बड़ा ऐब मुझ में है ‘अकबर’। दिल में जो आये कह गुज़रता हूँ।। लेकिन इस बात का भी उनको पूरा अहसास था कि दुनिया पर उनकी बातों का कुछ खास असर नहीं होता। इसीलिए उन्होंने फर्माया कि- फ़ारसी उठ गई, उर्दू की वह इज़्ज़त न रही। है जुबाँ मुँह में मगर उसकी वह कुव्वत न रही।। बन्द कर अपनी ज़ुबाँ, तर्के-सुखन1 कर ‘अकबर’। अब तेरी बात की दुनिया को ज़रूरत न रही।। अपनी जुबान को वह इसी बात पर राज़ी करने की कोशिश करते रहे कि वह ज्यादातर चुप ही रहे। उन्हीं की ज़ुबानी- ज़क़-ज़क़-ओ बक़-बक़ में दुनिया के न हो ‘अकबर’ शरीक। चुप ही रहने पर ज़बाने-तेज़ को राज़ी करो।। पर शेर कहना बदस्तूर जारी रहा क्यों कि शेरों पर दाद भी तो बहुत मिलती थी- ताने सुनते हैं मगर शेर कहे जाते हैं। दाद के शौक़ में बेदाद2 सहे जाते हैं।। आप फ़रमाते हैं हो लह्र तरक्की की तो आ। मौजें कहती हैं कि यह खुद ही बहे जाते हैं।। हर आदमी अपने नाम के लिये जीता है। शायर भी शायद दाद पाने के लिए शायरी करते हैं। कुछ खुद को अमर करने के लिए दीवान छपवाते हैं परन्तु अंत-पंत सब मर खप जाते हैं। इस पर ‘अकबर’ ने कहा कि- 1. तर्के सुखन- शेरो शायरी को खत्म; 2. बेदाद - जुल्मोसितम। हुलिया बदली, घर को छोड़ा, कागजों में छप गये। चन्द रोजा खेल था आखिर को सब मर खप गये।। अकबर साहब को कौम के अनपढ़ होने का भी गम था। उन्होंने तत्कालीन जूता बनाने वाली कम्पनी से तुलना करके इस अंदाज में अपना दर्द जाहिर किया। बूट डासन ने बनाया, मैंने एक मजमूँ लिखा। मुल्क में मज़मूँ न फैला और जूता चल गया।। इसके साथ ‘अकबर’ साहब को खुदा हाफिज़ कह हम अपना सफ़र आगे बढ़ाते हैं। *

Rasleela Nathdwara Style | Twin Eternals - Matter & Energy

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