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खुशी का विज्ञान(The Science of Happiness)

"खुशी का विज्ञान" (The Science of Happiness) मैं यह विश्वासपूर्वक कह सकता हूँ कि सच्चा आनंद, मानसिक संतुलन और खुशहाली कोई कोरी कल्पना या केवल भाग्य का खेल नहीं है। यह पूरी तरह से एक प्रामाणिक विज्ञान है, जिसे समझा, सीखा और अपने दैनिक जीवन में उतारा जा सकता है। यह वैज्ञानिक समझ और मेरे दशकों के चिकित्सकीय अनुभव का एक अत्यंत मूल्यवान संगम है, जो हमारे जीवन की दिशा बदल सकता है। एक साझा मिशन: 'प्रसन्नता के संदेशवाहक' बनें दुनिया भर के प्रमुख वैज्ञानिकों और विचारकों का मानना है कि खुशी से जुड़े इन वैज्ञानिक सिद्धांतों को केवल किताबों या शोध-पत्रों तक सीमित नहीं रहना चाहिए। हमें इसे एक जन-आंदोलन का रूप देना होगा। जब आप इन विचारों को सीखते हैं, तो आपकी जिम्मेदारी केवल स्वयं तक सीमित नहीं रहती—आपको अपने परिवार, मित्रों और समाज के लिए एक "हैप्पीनेस टीचर" बनना होगा ताकि हम सब मिलकर एक स्वस्थ समाज की नींव रख सकें। आज की सबसे बड़ी चुनौती: 'डिजिटल मायाजाल' और डोपामाइन की लत अगर हम गहराई से देखें, तो आज हममें से अधिकांश लोग 'द मैट्रिक्स' की काल्पनिक दुनिया की तरह लगातार मोबाइल स्क्रीन स्क्रॉल करते हुए एक आभासी जीवन जी रहे हैं। हमारा ध्यान, समय और मानसिक ऊर्जा केवल डिजिटल अल्गोरिदम के मुनाफे के लिए खींची जा रही है। सोशल मीडिया और स्क्रीन की यह निरंतर लत हमारे मस्तिष्क के डोपामाइन सिस्टम को उसी तरह प्रभावित करती है जैसे कोई गहरा नशा। इसका सीधा परिणाम मानसिक थकान (Brain Rot), भावनात्मक खोखलापन, एकाकीपन और अवसाद के रूप में सामने आ रहा है। वास्तविक जीवन की ओर वापसी और भारत का 'हैप्पीनेस इंडेक्स' इस चक्रव्यूह से बाहर निकलने की शुरुआत एक सचेत निर्णय से होती है—स्क्रीन के कृत्रिम रोमांच से खुद को अनप्लग (Unplug) करने का निर्णय। जब हम आभासी दुनिया से बाहर आते हैं, तभी हम अपनों से जुड़ पाते हैं और वास्तविक जीवन की सार्थकता को महसूस कर पाते हैं। हमारा उद्देश्य केवल दिन काटना नहीं, बल्कि एक सार्थक (Meaningful), सुखी (Happy) और निरंतर प्रगतिशील (Growth-oriented) जीवन जीना है। यदि हम सब मिलकर खुशी के इस विज्ञान को समझें और अपने निकटतम दायरे में फैलाएँ, तो हम निश्चित रूप से भारत के प्रसन्नता सूचकांक (Happiness Index of India) को एक नई ऊँचाई पर ले जा सकते हैं। मेरा आपसे विशेष आग्रह एवं आह्वान: 1. स्वयं के सुधार के लिए जुड़े रहें: अपने व्यक्तित्व के विकास, मानसिक स्वास्थ्य और आत्म-सुधार की नियमित और प्रामाणिक वैज्ञानिक खुराक पाने के लिए इस पेज को लाइक (Like), सब्सक्राइब (Subscribe) और फॉलो (Follow) अवश्य करें। 2. संबंधित ग्रुप्स में साझा करें: इस पोस्ट और जानकारी को अपने महत्वपूर्ण ग्रुप्स—चाहे वे परिवार, मित्र, सहकर्मी या सामाजिक मंच हों—में शेयर (Share) करें, ताकि हम अधिक से अधिक लोगों के जीवन में एक सकारात्मक और मूल्यवान बदलाव ला सकें।

Shakeel Badayuni( Ghazal)

Shakeel Badayuni( Ghazal) ला रहा है मय कोई शीशे में भर के सामने किस कदर पुर कैफ है मंजर नज़र के सामने। मैं तो इस आलम को क्या से क्या बना देता मगर किसी की चलती है हयात ए मुक्तसर के सामने। फिर न देना ता'ना ए नाकामी ए जौक ए नज़र हौसला है कुछ त आ जाओ नज़र के सामने। आह ये रूदाद ए हंगामा ए तरब ऐ गम गुसार जिक्र ए गुलशन जैसे इक बे बात ओ पर के सामने। हो चुका है जब खात्मा सारी उम्मीदों का तो फिर जा रहे ही क्यूँ ' शकील ' उस फ़ितनागर के सामने। पुर कैफ = भरपूर ता' ना ए नाकामी ए जौक ए नज़र = निंदा, असफलता रूदाद ए हंगामा ए तरब = किसी घटना पर हलचल पर प्रसन्नता फितना गर = उपद्रवी। " शकील बदायूंनी "

सहूलियत (कविता)

नहीं होती क्रांति कविता से न ही दूर होता है कदाचार न ही थमती है निरंकुशता सरकार की न ही कमी आती है किंचित्‌ भी विशेषाधिकारियों के विशेषाधिकार में और आम आदमी की आम दिक़्क़त में. कुछ भी नहीं होता जो चाहती है कविता पाठक बस धन्य करता है पढ़कर कविता को और कवि को भी. कविता का पाठक बस पाठक होता है नहीं उतरता वह किसी दिव्य लोक से हो सकता है वह भी विशेषाधिकारों से लैस निरंकुश सरकार का निरंकुश कारिंदा आम आदमी की दिक़्क़तों का जनक शोषण और लफंगई में मुब्तला भी हो सकता है पाठक. लेकिन कुछ भी होने से पहले ‘दुनियादार’ होता है पाठक कवि से ज़्यादा होशियार होता है पाठक और लग जाता है ‘धंधे’ में तुरंत धन्य करने के बाद कवि और कविता को. पता नहीं, जिस आदमी की लड़ाई लड़ती है कविता पढ़ना मयस्सर भी है उसे कविता उसके लिए तो ज़ंग लगा औज़ार है कविता. उसका कर्ज़ अदा नहीं करती कविता उसकी बेटी की शादी नहीं कराती कविता बच्चों की पढ़ाई का ख़र्च भी नहीं उठाती कविता बस क्रांति और आम आदमी की बात करती है कविता. कवि लिखता है फिर भी कविता कर लेता है क्रांति वह कविता में ही फिर रहता है मगन सफलता के नशे में क्रांति कर पाने की नहीं,कविता लिख पाने की. ख़ुश होता है लिखकर हर बार एक कविता और भी ख़ुश होता है पाकर सम्मान,पुरस्कार बढ़ जाती है हैसियत उसकी दुनिया में हो जाती है थोड़ी सहूलियत खड़े होने में‘विशिष्ट’लोगों की कतार में जिसके लिए दरअसल उसने लिखनी शुरू की थी कविता. ……………..

कार्डियक केयर में एक सफलता

कार्डियक केयर में एक सफलता दिल तो पागल है दिल दीवाना है। कार्डियक केयर में एक सफलता इसे चित्रित करें: हृदय उपचार जिसमें चीरों, तारों या अस्पताल में रहने की आवश्यकता नहीं होती है । एमआईटी की एक टीम ने एक पतला, लचीला पैच बनाया है जो पहनने योग्य पेसमेकर के रूप में काम करता है, शरीर के बाहर से दिल की धड़कन को ट्रैक पर रखने के लिए केंद्रित अल्ट्रासाउंड का उपयोग करता है । कोई सर्जरी की आवश्यकता नहीं है । पैच सीधे त्वचा के माध्यम से दालों को वितरित करता है । ध्वनि की शक्ति का दोहन डिवाइस हृदय की मांसपेशी तक पहुंचने के लिए छाती में सावधानीपूर्वक लक्षित अल्ट्रासाउंड तरंगों को भेजता है । रास्ते में कुछ भी नुकसान पहुंचाए बिना लहरें छाती की दीवार से गुजरती हैं । सिस्टम कुछ मुख्य नौकरियों को संभालता है: * धीमी हृदय गति वाले रोगियों के लिए गैर-इनवेसिव पेसिंग । * गहरी ऊतक इमेजिंग के माध्यम से हृदय गतिविधि की वास्तविक समय की निगरानी । * निरंतर संचालन के लिए बाहरी बिजली स्रोतों से कनेक्शन । लचीले डिजाइन के माध्यम से नवाचार पैच उन सामग्रियों से बनाया गया है जो त्वचा की तरह खिंचाव करते हैं । पुराने स्कूल के पेसमेकर नसों के माध्यम से चलने वाले लीड के साथ छाती के अंदर बैठते हैं । यह एक कागज-पतला है और शरीर की आकृति का पालन करने के लिए झुकता है । छोटे ट्रांसड्यूसर की एक पंक्ति ऊतक में ध्वनिक ऊर्जा को आग लगाती है, और पहनने वाला इसे बिना किसी असुविधा के घंटों तक रख सकता है । आपातकालीन चिकित्सा प्रतिक्रिया बदलना पैरामेडिक्स और रिकवरी रूम के कर्मचारी एक मरीज पर पैच को थप्पड़ मार सकते हैं, जिसकी हृदय गति बस गिर गई है और एक नस के माध्यम से अस्थायी पेसिंग तारों को फैलाने के बिना चीजें स्थिर हो जाती हैं । दिल की सर्जरी के बाद, या जब कोई स्थायी प्रत्यारोपण की प्रतीक्षा करता है, तो पैच पुलों को संक्रमण के जोखिम और ऊतक क्षति पर अंतराल और कटौती करता है । गैर-आक्रामक उपचार का भविष्य लाइन के नीचे, इस तरह एक पहनने योग्य बदल सकता है कि दुनिया भर में पुरानी हृदय स्थितियों का प्रबंधन कैसे किया जाता है । सर्जरी के लिए भी कमजोर मरीजों को अभी भी कार्डियक सपोर्ट मिलेगा। ध्वनिक ऊर्जा की ओर उपचार को धक्का देने से गंभीर चिकित्सा हार्डवेयर आपके पास एक शीट को छीलने और अपनी छाती पर छड़ी करने के करीब आता है ।

जीवन और मानसिक स्वास्थ्य [अवकाश Leisure]

जीवन और मानसिक स्वास्थ्य की दृष्टि से: अवकाश (Leisure) केवल विश्राम नहीं, एक वैज्ञानिक कला है आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में हम सभी ‘हसल कल्चर’ (अति-व्यस्तता) और कभी न खत्म होने वाली महत्वाकांक्षाओं के शिकार हैं। एक मनोचिकित्सक के रूप में अपने क्लीनिकल अनुभव में मैं अक्सर ऐसे लोगों को देखता हूँ जो दिन-रात काम करते हैं, मानसिक रूप से पूरी तरह थक जाते हैं, और फिर सोचते हैं कि कुछ दिन कहीं शांत बैठकर "कुछ न करना" (Doing Nothing) ही उनका इलाज है। लेकिन हकीकत यह है कि खाली बैठना या बिना सोचे-समझे वक्त काटना हमारे तनाव को कम करने के बजाय हमें और अधिक अशांत और अकेला बना देता है। आइए, इस पूरे दर्शन और विज्ञान को एक नए नजरिए से समझें। 1. क्या काम ही हमारी संस्कृति का आधार है? प्रसिद्ध जर्मन दार्शनिक जोसेफ पीपर (Josef Pieper) ने अपनी कालजयी रचना में कहा था कि "अवकाश ही संस्कृति का आधार है" (Leisure is the Basis of Culture)। परंतु आधुनिक समाज ने इसे उलट दिया है; आज 'काम' (Work) को ही संस्कृति और पहचान का आधार मान लिया गया है। हम दिन-रात काम करते हैं, और बीच में थोड़ा सा समय केवल इसलिए निकालते हैं ताकि दोबारा काम करने के लिए सांस ले सकें। जब हम काम नहीं कर रहे होते और जिसके लिए हमें कोई भुगतान नहीं मिल रहा होता, वास्तव में वही समय तय करता है कि हम भीतर से कौन हैं। इसलिए अवकाश को काम का अभाव (absence of work) समझना सबसे बड़ी भूल है; अवकाश अपने आप में एक स्वतंत्र और निपुण कौशल (skill) है। 2. खुशी के तीन घटक: सुख (Pleasure) बनाम सच्चा आनंद (Enjoyment) खुशी (Happiness) के तीन बुनियादी पोषक तत्व (Macronutrients) होते हैं: आनंद (Enjoyment) संतुष्टि (Satisfaction) सार्थकता/अर्थ (Meaning) अधिकांश लोग 'सुख' (Pleasure) और 'आनंद' (Enjoyment) के बीच के बुनियादी अंतर को नहीं समझ पाते: क्षणिक सुख (Pleasure): यह हमारे मस्तिष्क के आदिम लिम्बिक सिस्टम (Limbic System) की रासायनिक प्रतिक्रिया है। भोजन, सोशल मीडिया का डोपामाइन रश या नशा—ये केवल शारीरिक और पशुवत प्रवृत्तियां हैं। केवल सुख के पीछे भागने से जीवन में संतुष्टि नहीं, बल्कि लत और अवसाद आते हैं। सच्चा आनंद (Enjoyment): जब हम सुख को अपने चेतन मस्तिष्क यानी प्रीफ्रंटल कॉर्टेक्स (Prefrontal Cortex) में ले जाते हैं, तब वह सच्चा आनंद बनता है। इसके लिए दो चीजें अनिवार्य हैं: सचेतन स्मृति (Consciousness/Memory) और सामाजिक जुड़ाव (People/Social Connection)। जब कोई गतिविधि सचेत रूप से अपनों के साथ साझा की जाती है, तभी वह आत्मा को तृप्त करती है। 3. 'असीडिया' (Acedia) का जाल: मानसिक और आध्यात्मिक आलस्य दार्शनिक परंपरा में सात महापापों में एक शब्द आता है—'स्लॉथ' (Sloth), जिसे ग्रीक में असीडिया (Acedia) कहा गया है। यह केवल बिस्तर पर लेटे रहना नहीं है, बल्कि यह मानसिक और आध्यात्मिक सुस्ती है। आज के समय में फोन पर अंतहीन रील्स स्क्रॉल करना (Mindless Scrolling), टीवी पर शोज़ बिंज-वॉच करना या शराब के नशे में दिमाग को सुन्न करना—ये सभी असीडिया के लक्षण हैं। यह विश्राम नहीं है, बल्कि अपनी आत्मा और मस्तिष्क को कोमा में डालने जैसा है। न्यूरोसाइंस के अनुसार, यह आदत स्ट्रेस हार्मोन्स को बढ़ाती है और इंसान को भीतर से खाली कर देती है। 4. सच्चे अवकाश की वैज्ञानिक परिभाषा (True Leisure) सच्चा अवकाश निष्क्रिय (Passive) नहीं, बल्कि सक्रिय, चिंतनशील और सृजनात्मक (Contemplative & Generative) होता है: दाएँ गोलार्ध (Right Hemisphere) को जाग्रत करना: आधुनिक कार्यशैली हमारे मस्तिष्क के विश्लेषणात्मक और तार्किक बाएँ हिस्से को थका देती है। अवसाद और एंग्जायटी से मुक्ति के लिए दाएँ हिस्से को सक्रिय करना जरूरी है, जो रहस्य, अर्थ, सौंदर्य और भावनाओं का केंद्र है। प्रकृति के सान्निध्य में समय बिताना: गैजेट्स से दूर रहकर खुली हवा में टहलना, सूर्योदय देखना और प्रकृति के सौंदर्य को महसूस करना हमारे कॉग्निटिव फंक्शन और मूड को तुरंत स्थिर करता है। कला और संगीत का सृजन व आस्वादन: संगीत और कला केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि शक्तिशाली न्यूरोलॉजिकल उपचार हैं। यह अल्जाइमर और पार्किंसंस जैसी बीमारियों तक में मस्तिष्क की कार्यप्रणाली को सक्रिय करने में सक्षम हैं। गहन और सार्थक मानवीय रिश्ते: सतही गपशप के बजाय गहरे संवाद स्थापित करें। अपनों से दिल की बात साझा करना और सार्थक विषयों पर चर्चा करना मानसिक स्वास्थ्य के लिए संजीवनी है। आंतरिक संतुष्टि के लिए सीखना: कोई नई विद्या या गहरा दार्शनिक ग्रंथ इसलिए पढ़ना कि वह आपकी चेतना को समृद्ध करे, न कि इसलिए कि उससे धन या पद कमाना है। कहावत है कि "लोहा ही लोहे को धार देता है"—जब आप अपने खाली समय को कुशल और समृद्ध बनाते हैं, तो आपके कार्य की गुणवत्ता और एकाग्रता भी कई गुना बढ़ जाती है। 5. अवकाश को बेहतर बनाने के 3 अचूक वैज्ञानिक नियम (The 3 Leisure Protocols) यदि आप अपने विश्राम को वास्तविक ऊर्जा में बदलना चाहते हैं, तो इन तीन नियमों को अपने जीवन में लागू करें: 1. अवकाश को व्यवस्थित और संरचित करें (Structure Your Leisure): जैसे आप जिम जाने या बिजनेस मीटिंग के लिए समय तय करते हैं, वैसे ही अपने खाली समय की योजना बनाएं। प्राचीन परंपराओं में इसे 'पवित्र समय' (Holy Hour) कहा जाता था। तय करें कि इस निर्धारित समय में आप स्क्रीन से दूर रहकर कौन सी आध्यात्मिक, रचनात्मक या बौद्धिक गतिविधि करेंगे। 2. समय को व्यर्थ न गंवाएं (Don’t Waste It): अक्सर लोग ब्रेक मिलते ही पहले 15-20 मिनट सोशल मीडिया देखने या व्यर्थ की बातों में गंवा देते हैं। ऐसा न करें। जो तय किया है—चाहे वह कोई पुस्तक पढ़ना हो या टहलना—अलार्म बजते ही तुरंत उसी क्षण उस गतिविधि में डूब जाएं। 3. अवकाश के स्पष्ट लक्ष्य तय करें (Set Specific Leisure Goals): जैसे करियर में लक्ष्य होते हैं, वैसे ही मन और आत्मा के विकास के लक्ष्य बनाएं। उदाहरण के लिए—इस वर्ष किसी शास्त्रीय ग्रंथ का अध्ययन पूरा करना, ध्यान साधना की अवधि बढ़ाना, या किसी विशेष कला व संगीत की समझ विकसित करना। प्रगति की यही भावना स्थायी प्रसन्नता देती है। डॉ. तांबी का संदेश: हम केवल आर्थिक लाभ कमाने वाले 'होमो इकोनॉमिकस' (Homo Economicus) नहीं हैं; हम संवेदनशील और विवेकशील मनुष्य ('Homo Sapiens') हैं। यदि आपका खाली समय केवल थकावट मिटाने और सांस फूलने पर रुकने तक सीमित है, तो यह मानसिक रुग्णता का संकेत है। अपने अवकाश को एक कुशल एथलीट की तरह गंभीरता, अनुशासन और उद्देश्य के साथ जिएं। जब आपका खाली समय सार्थक होगा, तभी आपका मन शांत, मस्तिष्क स्वस्थ और जीवन आनंदमय होगा।

Mera क़स्बा जो छूट गया

क़स्बा जो छूट गया बहुत मोहक, बहुत काम्य था वह क़स्बा डेढ़ कोस दूर गाँव से पहला पड़ाव हर यात्रा का वहीं से मिलती थी बस ज़िले के सदर मुक़ाम की जहाँ था जंक्शन जाती थीं गाड़ियाँ वहीं से भरकर लोगों को दूर-दूर जाने किस दुनिया में. दिखने से पहले ही क़स्बे के सुनाई पड़ती थी पुक-पुक चक्की की और शुरू हो जाती थी थरथराहट नन्हें-से दिल के किसी कोने में. फिर दिखते थे बड़े-बड़े अक्षर सुघ‌ड़, सुडौल, रंगीन झोंपड़ों के पिछवाड़े रंगीन पुती, साफ़-सुथरी कच्ची दीवार पर डोंगरे का बालामृत, वैद्यनाथ का बालासर डाबर की कोई घुट्टी भी जुड़ गई थी बाद में मोटे-ताज़े ख़ुशहाल बच्चे के साथ. रंगों का दिखना ही था क़स्बे का पूर्वराग खींचता था एक लहर की तरह मन के आर-पार. फिर दिखती थी नई-नवेली सड़क तारकोल की चिकनी, दूर तक बहती छरहरी नदी-सी गुज़र जाती थी उस पर कभी कोई बस दुकानों के बीच से झलक दिखाकर पीछे छोड़कर भोंपू की काँपती आवाज़ और पेट्रोल की वह अनचीन्हीं रोमांचक गंध हवा में घुलती-तैरती आती थी नासाग्र तक उछल पड़ता था दिल ज़ोर से उस अनजानी दुनिया के लिए जो सर्राटे से निकलती बस की मंज़िल होगी. फिर दिखता दुकानों के ठीक पिछवाड़े, दूर तक फैले खेतों के बीच रावण का खड़ा और कुम्भकर्ण का लेटा पुतला टूटा-फूटा, प्लास्टर झड़ा सजेगा साल के सिर्फ़ एक दिन दशमी के मेले के लिए आयेगी ज़रूर उसमें कंपनी नौटंकी की बनारस वाली नाचेंगी, ‘खेला’ भी करेंगी, असली औरतें गाँव की तरह औरत-बने मर्द नहीं. और मौत के कुँएँ की दीवार पर नीचे से ऊपर, ऊपर से नीचे बेधड़क चलाती फटफटिया वह क़द्दावर लड़की भी और गोल-गोल घूमते खटोलों वाले झूले ऊँचाई से उतरते भीतर का कुछ रह जाता था ऊपर डर की लहर के साथ फिर आता था तहसील का अहाता बीच में कुआँ, बरगद का पेड़ और गोल-मटोल मोटी दीवारवाली छोटी सख़्त इमारत ख़जाने की भारी-भरकम ताला-लगे दरवाज़े के सामने सीधा खड़ा संतरी सावधान बंदूक में खुँसी संगीन के साथ हमेशा अटेंशन में गोल इमारत के मुस्तक़िल हिस्से-जैसा. बाद में बताया गया ख़ज़ाने की वसूली के लिए ही तहसील थी और था सारा ताम-झाम. कि सन्‌ बयालीस में इसी को लूटने आए थे आस-पास के गाँवों से ‘क्रांतिकारी’ नाम लेकर बताते थे कौन-कौन गया था डेढ़ कोस दूर हमारे गाँव से लेकिन चूक हो गई नहीं तोड़ा पुल पहले ही नाले का फिर मुख़बिर की ख़बर पर आ गई 'गारद' सदर मुक़ाम से और बच गया ख़ज़ाना और रह गया क़स्बा इतिहास में दर्ज होते-होते. फिर आता था बाज़ार सड़क से निकलती एक गली में जो आगे बनाती थी गलियों का संजाल क़िस्म-क़िस्म की दुकानों के लिए क़िस्म-क़िस्म की गलियाँ बड़ों को हमेशा होता था वहाँ कोई काम और नहीं तो ख़रीदारी सुरती-सुपारी की. मन न लगा कभी उसका बाज़ार में हमेशा वह चाहता आगे निकलकर बैठे पुल पर देखे बस को बिल्कुल पास से गुज़रते झन्नाटे से, हिलाते पुल को. पुल था उस चौड़े नाले पर जिसका एक दुबला-पतला सहायक जाता था उसके गाँव तक टेढ़ा-मेढ़ा, लम्बी दूरी तयकर. कितनी बार मन हुआ, चलें नाले के साथ अपने गाँव तक खेतों से, मेड़ों से, कुश-काश, ढाक-बबूल के जंगलों से सरपत और बेहया की झाड़ियों से पर कभी न हो सका इतना-सा साहस. आख़िर छूट गया गाँव, छूट गया क़स्बा. कहाँ खो गया वह बचपन का गाँव, बचपन का क़स्बा अब नहीं गुज़रता वह क़स्बे से गाँव जाते या गाँव से लौटते हुए मुँह छिपाकर निकल लेता है बायपास से शर्म लगती है बचपन के उस दोस्त से पहले-पहले प्यार से दुनिया खोलनेवाले द्वार से. कहाँ मालूम था दुनिया इतनी बड़ी, इतनी बेरहम है रँग देती है अपने ही रंग में छील-छीलकर सिखा देती है मीठे-मुलायम शब्दोंवाली कथनी और छल-कपट आडम्बरोंवाली करनी दो पाटों की दुधारी दुनियादारी. ...............

ग़ज़ल कहना सीखें-

आइए ग़ज़ल कहना सीखें- ------------------------------------- वज़्न/बह्र/रुक्न क्या है-२ पिछले पोस्ट में हमने जाना कि शब्दों का वज़्न या भार क्या होता है और किस तरह लघु/ हर्स्व/ लाम(उर्दू) को छोटा ध्वनि-भार गिनते हुए १ की संख्या से एवं गुरु/ दीर्घ/ ग़ाफ़ (उर्दू) को बड़ा ध्वनि-भार गिनते हुए २ की संख्या से इंगित करते हैं. सीखने के इच्छुक व्यक्तियों को पढ़ने के साथ साथ मश्क़ (अभ्यास) की सलाह दी जाती है. जिस तरह अंग्रेज़ी भाषा में शब्दों के syllables होते हैं, जो उनके उच्चारण और accent को निर्धारित करते हैं, उसी तरह हिन्दी/ उर्दू में भी शब्दों को syllables एवं accent के आधार पर तोड़कर उनके वज़्न या भार को आसानी से पता किया जा सकता है. उदहारण के तौर पे अंग्रेज़ी का एक शब्द psychology/ साइकोलॉजी लेते हैं. इसे अंग्रेज़ी में सपाट तौर पे साइकोलॉजी न बोलकर साइक’लजी बोलते हैं. यदि सपाट साइकोलॉजी पे भार गिनें तो भार होगा २१२२२ (सा-२, इ-१, को-२, लॉ-२, जी-२), मगर यदि syllables एवं accent को ध्यान में रखकर बोले जाने वाले शब्द साइ’क’लजी पे भार गिनें तो भार होगा २१११२/ या २११११ (यदि जी पर भी ध्वनि छोटी रखी जाए तो). ये उदहारण इस बात को समझने के लिए पर्याप्त है कि हमें हिंदी/उर्दू के शब्दों के भार को पता करने के लिए शब्दों की मात्रा के साथ साथ शब्दों के syllables एवं accent को भी ध्यान में रखना होगा, अर्थात ये देखना होगा कि किसी शब्द में कितनी अलग-अलग ध्वनियाँ हैं. जैसे एक शब्द है इम्तिहान, इसे खंडित करके यदि पढेंगे तो शब्द इस प्रकार होगा इम+ति+हा+न और इस प्रकार इसका भार होगा इम२+ति१+हा२+न१, यानी २१२१. अगर इसी शब्द को उर्दू क़ायदे के हिसाब से इम्तिहाँ बोलें तो भार होगा २१२ (इम+ति+हाँ). एक अन्य उदाहरण लेते हैं, कलम. इसे क+लम बोलते हैं, कल+म नहीं. यदि क+लम बोला जाए, जो कि सही है, तो भार होगा १२ (क१+लम२), और यदि कल+म बोला जाए, जो कि ग़लत है, तो भार होगा २१ (कल२+म१). तो आइए भार के हम कुछ और उदाहरण देखते हैं. दिवाली १२२ दीवाली २२२ ख़ामोश २२१ ख़मोश १२१ पटना २२ लंका २२ स्त्री २२ पूर्ण २१ पूर्णा २२ अर्ध २१ कल्पना २१२ दोस्ती २१२ मुलाक़ात १२२१ बरसात २२१ मुहब्बत १२२ मकान १२१ मकाँ १२ दूकान २२१ अत्याचारी २२२२ वैरागी २२२ दुश्मन २२ पूर्व २१ पूर्वा २२ पुरवाई २२२/२२१ गुलाम १२१ राजा २२ राज़ २१ रज़ा १२ सल्तनत २१२ इत्तिफ़ाक़ २१२१ ग़मनाक २२१ उज्जवल २१२ विध्वंस २२१ वंश २१ अंश २१ तृप्ति २१ इत्यदि

Rasleela Nathdwara Style | Twin Eternals - Matter & Energy

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