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Swasti Sansthan
A personal blog by Pavan Kumar "Paavan"
A personal blog by Pavan Kumar "Paavan"
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9:36 PM
Article Published by : PAVAN KUMAR SHARMA,' PAAVAN &MAAHIR
For decades, HIV has been the virus that never leaves. It doesn't just infect your cells, it literally writes itself into your DNA and stays there. You can suppress it with medication, sure. Take your pills every day for the rest of your life and the virus stays quiet. But miss a dose? It comes roaring back. That's why this CRISPR breakthrough is so wild. Researchers at Temple University and the University of Nebraska Medical Center figured out how to use gene-editing technology like a precision scalpel, cutting the viral DNA right out of infected cells. In their lab experiments, they successfully removed HIV genetic material without destroying the healthy parts of the cell. The infected cells? They're just... clean now. No virus. Just normal immune cells doing their job. The science behind it is honestly incredible. CRISPR works by using guide molecules that search for specific DNA sequences, like HIV's genetic signature. Once it finds the target, enzymes act as molecular scissors and snip it out. The cell's natural repair mechanisms then patch up the gap. They've tested this in human cells in the lab and in animal models, and the results keep getting better. But here's the thing nobody's sugarcoating. Getting CRISPR to every single infected cell in a living human body? That's the monster challenge still ahead. HIV hides in reservoirs throughout your system, tucked away in places that are hard to reach. And then there's the safety concerns about off-target edits, where the scissors might cut something they shouldn't. This isn't hitting clinics next year or even in five years. But it proves something massive: erasing HIV from human DNA isn't science fiction anymore. Sources: Temple University Health System, University of Nebraska Medical Center, Nature Communications (2023), The Lancet HIV
9:32 PM
Article Published by : PAVAN KUMAR SHARMA,' PAAVAN &MAAHIR
चार्ल्स डार्विन : एक महान अन्वेषक : मानव की सोच का निर्माता वर्ष 1831 ईस्वी... इंग्लैंड... विक्टोरियन युग... यह वह समय था जब बाइबिल के अनुसार यह माना जाता था कि ईश्वर ने दुनिया की रचना 4004 ईसा पूर्व में की है। लोग बाइबिल की शिक्षाओं के अनुसार चलते थे। उन से अलग हटना 'पाप' माना जाता था। तब विज्ञान भी धर्म का सेवक था और उसे 'नेचुरल थियोलॉजी' कहा जाता था। इसके सबसे बड़े पैरोकार विलियम पेल्ली का तर्क था कि जिस प्रकार रास्ते में पड़ी एक घड़ी, घड़ी बनाने वाले चेतन और बुद्धिमान प्राणी का प्रमाण है, उसी प्रकार यह दुनिया और यहां के प्राणी ईश्वर का प्रमाण हैं। यह दुनिया ईश्वर का मैनीफेस्टेशन है - उसकी अभिव्यक्ति है, उसका स्वरूप है, उसकी रचना है। यहां के प्राणी ईश्वर द्वारा एक ही समय में आज के ही रूप में बनाए गए हैं, और तब से अब तक वह बदले नहीं हैं - समय के साथ जातियां बदलती नहीं हैं। इसी इंग्लैंड के एक कोने में 22 वर्षीय चार्ल्स रॉबर्ट डार्विन - जो पादरी बनने की तैयारी कर रहा था और बाइबल के अध्ययन में रत था - बाइबल पर आधारित जनमानस में व्यापक रूप से फैले हुए इन विश्वासों की नींव हिलाने वाला था। 12 फरवरी सन् 1809 को जन्मे चार्ल्स को श्र्यूसबरी स्कूल में लैटिन और यूनानी भाषाओं को पढ़ना बोझ लगता था। उन्हें प्रकृति को देखना अच्छा लगता था। उनके पिता डॉ रॉबर्ट डार्विन उन्हें अपने समान एक डॉक्टर बनाना चाहते थे। उन्होंने उनका प्रवेश एडिनबर्ग विश्वविद्यालय में कराया। लेकिन वहां एक बच्चे का ऑपरेशन होते हुए देख कर वह वहां से भाग आए क्योंकि तब निश्चेतकों का आविष्कार नहीं हुआ था। उन्होंने एक पादरी बनने के लिए कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय में प्रवेश लिया, किन्तु यहां भी उन की रुचि प्रकृति के अध्ययन में ही रही। कैम्ब्रिज में युवा चार्ल्स की भेंट प्रोफेसर जॉन स्टीवेन्स हेन्स्लो से हुई। हेन्सलो एक वनस्पति-शास्त्री और पादरी थे। डार्विन उनके साथ हर शाम टहलने जाते थे। लोग उन्हें 'The man who walks with Henslow' कहने लगे। हेन्सलो ने उनकी रुचियों को और विकसित किया। सन् 1831 में जब युवा चार्ल्स एक भू-वैज्ञानिक दौरे से वापस आए तो उन्हें अपनी मेज पर एक पत्र मिला। यह उनको दुनिया का चक्कर लगाने जा रहे एक समुद्री जहाज - एच एम एस बीगल - पर एक प्रकृति-शास्त्री के रूप में यात्रा करने का निमंत्रण था। इसके कप्तान रॉबर्ट फिट्ज़रॉय थे। कैप्टन फिट्ज़रॉय शाही खून वाले और बेहद धार्मिक व्यक्ति थे। डार्विन को इस यात्रा का अपना खर्च स्वयं वहन करना था। प्रारम्भ में उनके पिता ने उन्हें इस यात्रा के लिए मना किया किन्तु फिर चार्ल्स के मामा - जोसिया वेजवुड - के समझाने पर वे इसके लिए मान गए। अपनी इस यात्रा में डार्विन अपने साथ जो सामान ले गए थे, उसमें एक किताब थी - चार्ल्स लॉयल की - 'द प्रिंसिपल्स ऑफ़ जियोलॉजी'। यह किताब उन्हें प्रोफेसर हेन्स्लो ने दी थी। इस किताब में चार्ल्स लॉयल का विचार था कि पृथ्वी की आयु बाइबल में बताई गई लगभग 6000 वर्ष की आयु से बहुत अधिक है। इसका निर्माण किसी एक घटना में अचानक नहीं हुआ था बल्कि वह लाखों-करोड़ों वर्षों में धीरे-धीरे होने वाले बदलावों से बनी है। यह लंबे समय का विचार डार्विन के मन में एक बीज की तरह बैठ गया। उन्होंने सोचा कि यदि पृथ्वी इतनी धीरे-धीरे बदल सकती है तो क्या इस पर रहने वाली जीव-जातियां भी इसी प्रकार धीरे-धीरे नहीं बदल सकती हैं? 27 दिसम्बर, 1831 में प्लाईमाउथ, इंग्लैंड से जहाज का लंगर उठाया गया। जब जहाज दक्षिण अमेरिका के तटों पर पहुंचा तो डार्विन ने दुनिया को लॉयल की निगाहों से देखा। उन्होंने देखा कि सतह से 45 फीट ऊपर पहाड़ की चट्टानों में सीपियों की एक लंबी सफेद पट्टी है। बाइबल में वर्णित नूह की बाढ़ इतनी ऊंचाई पर चट्टानों के बीच में दबी हुई सीपियों की इस पट्टी की कहानी को नहीं समझा सकती थी। डार्विन ने सोचा कि यह कार्य समुद्र तल के ऊपर उठने से ही हुआ होगा, और यदि यह इस कारण हुआ है तो इसमें लाखों साल लगे होंगे। दुनिया 6000 साल पुरानी नहीं हो सकती थी। फरवरी, 1832 में बीगल ने जब ब्राजील के तट को छुआ तो डार्विन के लिए यह किसी दूसरी दुनिया में कदम रखने जैसा था। इंग्लैंड के धुंधले स्लेटी आसमान और शान्त वातावरण के विपरीत ब्राजील के अमेजॉन के वर्षावन आश्चर्यों से भरा तूफान थे। डार्विन ने अपनी डायरी में लिखा - "दिमाग पेंडुलम की तरह झूल रहा है!" यहां आंखों को चौंधियाने वाले चमकीले फूल थे, यहां कानों में गूंजता कीड़ों का तेज शोर था। यहां जीवन इतना घना, विविध और प्रचुर था कि डार्विन को ईश्वर की महानता और उसकी कारीगरी पर और भी गहरा विश्वास होने लगा। उस समय फैली हुई धार्मिक मान्यताओं से प्रेरित उनके मन को लगा कि ऐसी जटिल सुन्दरता एक महान कलाकार ही बना सकता है। जहाज दक्षिण की ओर बढ़ा और अर्जेंटीना के पम्पास और पैटागोनिया के वीरान तटों पर पहुंचा। यहां जंगल नहीं थे। यहां मीलों दूर तक फैले हुए घास के सूखे मैदान थे। यहां डार्विन ने कीचड़ से कुछ विशाल हड्डियों का बाहर निकाला। ये हड्डियां आज मिलने वाले आम जानवरों की नहीं थीं। स्थानीय लोग इन्हें 'दिग्गजों की हड्डियां' कहते थे, जो उनकी मान्यता के अनुसार नूह की बाढ़ में डूब गए थे। लेकिन जब डार्विन ने उन्हें जोड़ा तो उन्हें कुछ बातें दिखाई पड़ीं। एक कंकाल 'मैगाथीलियम' का था, जो एक विशालकाय जमीनी स्लॉथ जैसा था, लेकिन आकार में हाथी जितना बड़ा था। दूसरा कंकाल 'ग्लिप्टोडॉन' का था, जो आज के आर्माडिलो जैसा था और आकार में एक कार के बराबर था। यहां डार्विन के मन में प्रश्न आए कि यदि ईश्वर ने हर प्रजाति को पूर्ण बनाया था तो उसने इन शानदार दिग्गजों को विलुप्त क्यों होने दिया? क्या ईश्वर अपनी ही रचनाओं से ऊब गया था? उस समय के विश्वास कहते थे कि जीव-जातियां कभी विलुप्त नहीं होती हैं, लेकिन डार्विन जानते थे कि इतने विशालकाय जीव छिप नहीं सकते हैं। इसका अर्थ था कि विलुप्ति एक सच था। और यदि प्रजातियां नष्ट हो सकती हैं तो इसका अर्थ है कि सृष्टि स्थिर नहीं है। इस खोज ने एक नए विचार को जन्म दिया - Law of Succession of types - अर्थात् एक ही जमीन पर पुराने और नए जन्तुओं के बीच एक सम्बन्ध होता है। तो क्या यह सम्भव है कि आज के छोटे आर्माडिलो उन प्राचीन ग्लिप्टोडॉन्स के परपोते हों? क्या समय के साथ वे बदल गए हैं? यह विचार बाइबल के 'After its own kind' के नियम के विरुद्ध था। यह रहस्य तब और गहराया जब डार्विन ने रिया पक्षी का अध्ययन किया। यह शुतुरमुर्ग जैसा एक बड़ा पक्षी होता है। डार्विन को पता चला कि दक्षिण में एक छोटी रिया चिड़िया भी मिलती है। वह महीनों तक उसे ढूंढ़ते रहे और फिर एक दिन उन्हें उसकी कुछ हड्डियां और पंख मिले। डार्विन के मन में एक स्वाभाविक प्रश्न आया कि अगर उत्तर में बड़ी रिया रहती है और दक्षिण में छोटी, और बीच की रियो निग्रो नदी उन्हें अलग करती है, तो ईश्वर को इतने कम अंतर पर दो प्रकार के रिया पक्षी बनाने की क्या आवश्यकता थी? कहीं ऐसा तो नहीं कि नदी द्वारा किए गए इस अलगाव से उत्पन्न विभिन्न परिस्थितियों ने एक ही प्रकार की रिया पक्षी को दो प्रकार में बदल दिया हो? अपनी आगे की यात्रा में डार्विन ने एण्डीज के ऊंचे पर्वत देखे। वहां उन्होंने समुद्री जीवों के जीवाश्म पाए। समुद्री जीवों के जीवाश्म पर्वतों की ऊंचाइयों पर कैसे पहुंचे? यह एक गम्भीर प्रश्न था। इसका एक ही तरीका हो सकता था कि समुद्र की तली ऊपर उठी और पहाड़ बन गई। ईश्वर ने ऐसा क्यों किया होगा? अपनी इस यात्रा में डार्विन ने प्रकृति की विविधता, उसकी रचनात्मकता और उसकी क्रूरता को बहुत करीब से देखा। लेकिन वह केवल जीव-जातियों, पत्थरों एवं प्राकृतिक वातावरण के विषय में नहीं सोच रहे थे, वे मानवीय पीड़ा, अन्याय, अत्याचार और अस्तित्व के लिए संघर्ष के विषय में भी देख और सोच रहे थे। इसके उदाहरण उनकी इस यात्रा में मिलते हैं। मानवीय संघर्ष के इन अनुभवों ने उनके विचारों को आकार देने में मदद की। अस्तित्व का यह संघर्ष और इससे जुड़ी हुई अन्य बातें तब और स्पष्ट हुईं जब वे टियरा डेल फ्यूगो पहुंचे। यहां उनका सामना 'असभ्य' आदिवासियों से हुआ। जहाज पर जेमी बटन नाम का एक आदिवासी था जिसे कैप्टन फिट्ज़रॉय अपनी पिछली यात्रा में वहां से ले गए थे। उन्होंने उसे इंग्लैंड में रख कर सूट-बूट पहना कर 'सभ्य' बनाया था। लेकिन अपने कबीले में पहुंचते ही जेमी बटन ने अपना सूट-बूट उतार फेंका और वापस अपने कबीले के रंग-ढंग में रंग गया। तब डार्विन ने अपनी डायरी में लिखा - "एक 'सभ्य' अंग्रेज और नग्न आदिवासी के बीच का अन्तर केवल परिस्थितियों का है - उसके खून का नहीं!" यह 'विक्टोरियन सोच' के मुंह पर तमाचा था, जहां यह कहा जाता था कि ईश्वर ने इंसान को अलग-अलग जातियों के रूप में बनाया है। सितंबर, 1835 आ चुका था और बीगल जहाज अब उस जगह पहुंच रहा था, जिसका नाम डार्विन के साथ इतिहास में सदैव के लिए जुड़ जाने वाला था। यह जगह थी - दक्षिण अमेरिका के तट से दूर, प्रशान्त महासागर में गालापागोस द्वीप-समूह। इस द्वीप-समूह के अन्तर्गत थोड़ी-थोड़ी दूरी पर बिखरे हुए अनेक द्वीप थे। पहली नजर में डार्विन को यह स्थान 'नरक का बगीचा' लगा। यहां चारों ओर काला लावा था, जमीन से धुंआ निकल रहा था और हवा में गंधक की बदबू थी। यहां जानवर काले और खुरदुरे थे। यहां काले समुद्री इग्वाना - जिन्हें डार्विन ने 'समुद्र के शैतान' कहा - समुद्र में तैरते थे और चट्टानों पर चिपके रहते थे। लेकिन यहां मासूमियत भी थी। पक्षी इतने निडर थे कि वह डार्विन की बंदूक की नली पर आ कर बैठ जाते थे। उन्होंने अभी तक मनुष्य को शत्रु के रूप में नहीं पहचाना था। ऐसे वातावरण में डार्विन को उनकी उस पहेली का सुराग मिला जिसे वह सुलझाने की कोशिश कर रहे थे। यहां डार्विन की भेंट उन द्वीपों के उपराज्यपाल निकोलस लॉसेन से हुई। लॉसेन ने उन्हें बताया कि वह केवल कछुए की पीठ का खोल देख कर यह बता सकते हैं कि वह किस द्वीप से है। लॉसेन ने उन्हें बताया कि जो द्वीप नम, हरे-भरे और घास एवं अन्य वनस्पति वाले थे, वहां कछुओं का कवच गोल गुम्बद जैसा था, लेकिन जो द्वीप सूखे थे - जहां कछुओं को गर्दन उठा कर ऊपर कैक्टस के फूलों को खाना पड़ता था - वहां उनके कवच आगे से ऊपर उठे हुए काठी की शक्ल के थे, जिनसे वह अपनी गर्दन को ऊपर उठा सकते थे। डार्विन ने इससे यह निष्कर्ष निकाला कि यह अनुकूलन था। अपनी परिस्थितियों के अनुसार जीव-जातियां विभिन्न रूपों में ढल गई थीं। डार्विन ने सोचा कि क्या ईश्वर ने वास्तव में 50 मील की दूरी पर स्थित हर छोटे द्वीप के लिए अलग-अलग कछुए बनाए हैं? वह ऐसा क्यों करेगा? या फिर यहां पर एक ही कछुए की प्रजाति आई और अलग-अलग द्वीपों की जरूरतों के अनुसार अलग-अलग रूपों में ढल गई? यही पैटर्न उन्हें मॉकिंग बर्ड्स में दिखाई पड़ा। हर द्वीप की मॉकिंग बर्ड में दूसरे से थोड़ा अंतर था। यहां डार्विन को वह छोटी काली चिड़ियां मिलीं जिन्होंने उनके अध्ययन को एक नई दिशा दी। ये चिड़ियां थीं - फिंचेज। वहां उन्हें विभिन्न द्वीपों पर फिंच चिड़ियों की 13 अलग-अलग प्रजातियां मिलीं। इन की चोंचों में अंतर था। जहां खाने के लिए बीज अधिक थे, वहां उन्हें पकड़ने के लिए मोटी और मजबूत चोंच वाली फिंच थीं। जहां कीड़े अधिक मिलते थे, वहां उन्हें पकड़ने के लिए पतली और नोकीली चोंच वाली फिंच थीं, और जहां उन्हें कैक्टस के फूलों का रस पीना पड़ता था, वहां उनकी चोंच लंबी और मुड़ी हुई होकर उसके लिए अनुकूलित थी। यहां यह महत्वपूर्ण प्रश्न डार्विन के सामने आया कि क्या ईश्वर ने हर अलग-अलग द्वीप के लिए एक खास तरह की फिंच बनाई थी? डार्विन ने देखा कि इस द्वीप-समूह में इग्वाना आदि जन्तु दक्षिण अमेरिका की मुख्य भूमि के जन्तुओं से मिलते-जुलते तो हैं लेकिन वह कुछ अलग भी हैं। इसके अतिरिक्त हर द्वीप का अपना एक अलग संसार है। क्या ऐसा हो सकता था कि दक्षिण अमेरिका से ये जन्तु, या एक ही जाति की फिंच चिड़िया उड़ कर वहां पहुंची हो और उसके विभिन्न सदस्य विभिन्न परिस्थितियों में रह कर विभिन्न प्रकार से विकसित हो गए हों? अपनी यात्रा शुरू होने के लगभग 5 साल बाद - 2 अक्टूबर, 1936 में - डार्विन का जहाज फालमाउथ, इंग्लैंड के तट पर आ कर लगा। अब डार्विन 22 साल के नौसिखिया लड़के नहीं थे। अब वह एक अनुभवी प्रकृति-शास्त्री थे जिन के भेजे हुए नमूनों, नोट्स और पत्रों ने लंदन में धूम मचा रखी थी। इस यात्रा के बाद अब उनके पास एक बहुत महत्वपूर्ण सवाल था कि क्या जातियां समय के साथ बदलती हैं, और यदि हां, तो कैसे? क्रमशः - आगे की कहानी आगे की कड़ियों में आने वाली यह कहानी जहां डार्विन के अपने निष्कर्षों पर पहुंचने को दिखाती है, वहीं यह मानव की सोच बदलने की कहानी को भी दिखाती है। यह डार्विन की थ्योरी के खाली स्थानों, और फिर नवीन खोजों के आलोक में उन खाली स्थानों को भरने की कहानी, को भी दिखाती है। यह सत्य कहानी रुचि रखने वाले पाठकों के लिए एक बहुत रोचक कहानी होने जा रही है। यह सत्य की राह पर चलने वाले एक इंसान को धार्मिक रूढ़िवाद और परम्परावादी मानसिकता के हाथों मिलने वाले तीव्र विरोध और अपमान की कहानी को भी दिखाती है। यह मानव के साहस, धैर्य, परिश्रम तथ्यात्मकता और तर्कशीलता के साथ-साथ सत्य की राह में उसके मस्तिष्क पर पड़ने वाले तनावों को भी दिखाती है। कृपया इस श्रृंखला के अंत तक मेरे साथ बने रहें।
9:28 PM
Article Published by : PAVAN KUMAR SHARMA,' PAAVAN &MAAHIR
ग़ज़ल ताज़ा ताज़ा लिखी एक और नयी ग़ज़ल जिसे आपकी मुहब्बतों के हवाले कर रहा हूँ. उम्मीद है आप इसे अपनी शफ़क़त से नवाजेंगे, अर्ज़ किया है- जो पिछले क़र्ज़ थे मुझपे, उन्हें भी भरना था पुराने शह्र के कूचों से तो गुज़रना था //१ جو پچھلے قرض تھے مجھپے, انہیں بھی بھرنا تھا پرانے شہر کے کوچوں سے تو گزرنا تھا //١ हमें ही हुस्न के चूल्हे में जल के मरना था तुम्हें तो चौबिसों घण्टे फ़क़त सँवरना था //२ ہمیں ہی حسن کے چولھے میں جل کے مرنا تھا تمہیں تو چوبسوں گھنٹے فقط سنورنا تھا //٢ हैं कितने आशना माँ बाप से अभी के तिफ़्ल पुराने दौर के बच्चों को सिर्फ़ डरना था //३ ہیں کتنے آشنا ماں باپ سے ابھی کے طفل پرانے دور کے بچوں کو صرف ڈرنا تھا //٣ भले ही आपने देखा था मुस्कुरा के हमें वफ़ा के ज़ख़्म थे, उनको तो बस उभरना था //४ بھلے ہی آپنے دیکھا تھا مسکرا کے ہمیں وفا کے زخم تھے، انکو تو بس ابھرنا تھا //٤ लगी थी भीड़ तो सोचा है कोई दुर्घटना गया क़रीब तो पाया सियासी धरना था //५ لگی تھی بھیڑ تو سوچا ہے کوئی درگھٹنا گیا قریب تو پایا سیاسی دھرنا تھا //٥ जिसे समझते थे तुम आब बूढ़ी आँखों का वो सच में दर्द भरे आँसुओं का झरना था //६ جسے سمجھتے تھے تم آب بوڑھی آنکھوں کا وہ سچ میں درد بھرے آنسوؤں کا جھرنا تھا //٦ निकाला क़ैदे कफ़स से तो उसने 'राज़' मुझे मगर उसे तो मेरे डैनों को कतरना था //७ نکالا قیدے قفس سے تو اسنے 'راز' مجھے مگر اسے تو میرے ڈینوں کو کترنا تھا //٧ Words and meanings कूचा- गली फ़क़त- सिर्फ़, केवल आशना- घुले मिले, परिचित, मित्रवत तिफ़्ल- बच्चा सियासी- राजनैतिक आब- पानी क़ैदे कफ़स- पिंजरे की क़ैद डैना- पँख
9:24 PM
Article Published by : PAVAN KUMAR SHARMA,' PAAVAN &MAAHIR
अनासक्त स्वधर्म पालन क्रमशः श्लोक ११ यज्ञों से तुम करो प्रसन्न देव को देव करेंगे तुमको उन्नत । एक दूसरे को उन्नत कर सबका होगा कल्याण परम ॥११/अध्याय ३ ॥ स्वधर्म और देवताओं की सम्बन्ध श्रंखला : निष्काम भाव से स्वधर्म पालन के रूप में किये कर्म लोक-संग्रह का कारण बनते हैं । इस प्रकार देवताओं के रूप में न केवल प्रकृति के अंश पाँच महत् तत्व अपितु शरीर की सभी इन्द्रियों में भी देवताओं का वास सनातन हिंदू परंपरा को मान्य है और उन्हीं दैवी शक्तियों की उन्नति की बात श्लोक में कही गई है ॥ कर्मक्षेत्रे-रणक्षेत्रे : श्रीकृष्ण गीता से
9:22 PM
Article Published by : PAVAN KUMAR SHARMA,' PAAVAN &MAAHIR
गीता : ३/१० सहयज्ञाः प्रजाः सृष्ट्वा पुरोवाच प्रजापतिः । अनेन प्रसविष्यध्वमेष वोऽस्त्विष्टकामधुक्॥ तथा कर्म न करने से तू पाप को भी प्राप्त होगा; क्योंकि— प्रजापति ब्रह्मा ने कल्प के आदि में यज्ञसहित प्रजाओं को रचकर उनसे कहा कि तुमलोग इस यज्ञ के द्वारा वृद्धि को प्राप्त होओ और यह यज्ञ तुमलोगों को इच्छित भोग प्रदान करने वाला हो। अनासक्त स्वधर्म पालन का वर्णन (श्लोक १०-१३) सभी प्रजा की रचना के ही साथ यज्ञ को भी भी रचा सृष्टिकर्ता ब्रह्मा ने और कहा इससे तुम करो वृद्धि निज पाओगे तुम इच्छित फल इस यज्ञ से ॥ ॥१०/अध्याय ३ ॥ पुरा उवाच: सृष्टि की रचना के समय ही ब्रह्मा ने यज्ञ की भी रचना की और मनुष्यों से कहा । यज्ञ : श्रीमद्भगवद्गीता में यज्ञ शब्द शास्त्र-विहित सम्पूर्ण विहित क्रियाओं का भी वाचक है । वर्ण , आश्रम , धर्म, जाति,स्वभाव , देश , काल आदि के अनुसार प्राप्त कर्तव्य कर्म , यज्ञों के अंतर्गत आते हैं । श्लोक ९ और १० का ज्ञानेश्वरी का भावार्थ: तुम्हें स्वधर्म को ही ‘नित्य यज्ञ’ समझना चाहिए ।इसीलिए जो व्यक्ति स्वधर्मानुसार कर्मों का आचरण करता है उसके द्वारा उन कर्मों के आचरण ही में अनवरत यज्ञकर्म होते रहते हैं । इसी लिए ऐसे कर्म करने वाले व्यक्तियों को संसार के बंधन बाँध ही नहीं सकते । श्रीकृष्ण गीता से
9:19 PM
Article Published by : PAVAN KUMAR SHARMA,' PAAVAN &MAAHIR
आपका बच्चा सिर्फ 'सब्जेक्ट' पढ़ रहा है या 'तनाव' झेलना भी सीख रहा है? आज मैं आपसे एक ऐसी बात करने आया हूँ जो शायद आपकी कोचिंग क्लासेस या किताबों में नहीं मिलेगी। आज हमारे जयपुर और पूरे देश में 'प्रतियोगी परीक्षाओं' (IIT, NEET, UPSC) का माहौल एक 'प्रेशर कुकर' जैसा हो गया है। हर घर में एक छात्र है जो दिन-रात एक कर रहा है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि इतने होनहार बच्चे, इतनी मेहनत के बाद भी ऐन वक्त पर क्यों बिखर जाते हैं? जवाब है— मस्तिष्क का पुराना सॉफ्टवेयर। 🧠 एग्जाम में दिमाग 'फ्रीज' क्यों हो जाता है? (विज्ञान की भाषा में) हमारे मस्तिष्क का एक हिस्सा है जिसे हम 'एमिग्डाला' (Amygdala) कहते हैं। हजारों साल पहले यह हिस्सा हमें जंगल में शेर से बचाने के काम आता था। आज शेर तो नहीं है, लेकिन परीक्षा का डर, 'लोग क्या कहेंगे' का डर और 'फेल होने' का डर हमारे दिमाग के लिए उस 'शेर' जैसा ही है। जब छात्र तनाव में होता है, तो उसका दिमाग 'सर्वाइवल मोड' में चला जाता है। ऐसे में सोचने-समझने वाला हिस्सा (Prefrontal Cortex) काम करना बंद कर देता है। नतीजा? आता हुआ सवाल भी गलत हो जाता है और बच्चा 'ब्लैक आउट' महसूस करता है। इसीलिए, हमने विवेकानंद डीप TMS और मनोवैज्ञानिक सेवा केंद्र में एक अनूठी ट्रेनिंग शुरू की है, जिसका आधार है प्रसिद्ध पुस्तक 'बुद्धास ब्रेन' (Buddha’s Brain)। 🧘♂️ क्या है 'बुद्धास ब्रेन' ट्रेनिंग? (दिमाग को रिवायर करना) हम सिर्फ यह नहीं कहते कि "टेंशन मत लो," हम छात्र के दिमाग को Part by Part (हिस्से दर हिस्सा) प्रशिक्षित करते हैं। हम न्यूरोसाइंस और बुद्ध की प्राचीन शांति को एक साथ लाए हैं। अगले 6 महीनों में हम छात्र के मस्तिष्क को 24 सत्रों (Sessions) में इस तरह तैयार करते हैं: 1. नकारात्मकता को बाहर निकालना (Negative Bias Training) दिमाग बुरी खबरों को जल्दी पकड़ता है। हम छात्रों को सिखाते हैं कि कैसे पढ़ाई की छोटी-छोटी जीत (Small wins) को मस्तिष्क में दर्ज करें ताकि आत्मविश्वास पत्थर जैसा मजबूत हो जाए। 2. फोकस और माइंडफुलनेस (Concentration) आजकल 'डिस्ट्रैक्शन' बहुत है। हम सिखाते हैं कि कैसे वर्तमान क्षण (Present Moment) में रहकर 100% एकाग्रता के साथ पढ़ा जाए, ताकि 10 घंटे की पढ़ाई 4 घंटे में पूरी हो सके। 3. तनाव में भी शांति (The Calm System) हम छात्रों को ऐसी तकनीक सिखाते हैं (जैसे 4-4-8 ब्रीदिंग और पैरासिम्पैथेटिक नर्वस सिस्टम को सक्रिय करना), जिससे परीक्षा हॉल में दिल की धड़कन तेज होने पर भी दिमाग बर्फ जैसा ठंडा रहे। 4. प्रेरणा और 'फ्लो स्टेट' (Peak Performance) ज्यादातर छात्र 'बोझ' मानकर पढ़ते हैं। हम सिखाते हैं कि पढ़ाई को 'आनंद' और 'फ्लो' में कैसे बदलें, ताकि वे बिना थके अपनी सर्वश्रेष्ठ परफॉरमेंस दे सकें। अभिभावकों (Parents) के लिए मेरी एक सलाह प्यारे माता-पिता, आपका बच्चा एक मशीन नहीं है। उसे आपकी उम्मीदों के बोझ से ज्यादा आपके भरोसे की जरूरत है। अक्सर अनजाने में हम बच्चों से कहते हैं, "बेटा, बस ये दो साल मेहनत कर लो, फिर ऐश है।" यह वाक्य बच्चे के मन में एक अदृश्य तनाव पैदा करता है। हमें उन्हें सिर्फ 'मेधावी' (Intelligent) नहीं, बल्कि 'मानसिक रूप से लचीला' (Resilient) बनाना है। अगर उसका मन शांत है, तो वह किसी भी परीक्षा को पार कर लेगा। लेकिन अगर मन अशांत है, तो सारी सुख-सुविधाएं और कोचिंग बेकार हैं। अत्याधुनिक Deep TMS (Transcranial Magnetic Stimulation) तकनीक का उपयोग भी करते हैं। यह एक ऐसी वैज्ञानिक पद्धति है जो बिना किसी दवा के, मस्तिष्क के उन हिस्सों को सक्रिय करती है जो एकाग्रता, मूड और याददाश्त के लिए जिम्मेदार हैं। परीक्षा बिना किसी 'मानसिक घाव' के हर विद्यार्थी जब परीक्षा केंद्र से बाहर निकले, तो उसके चेहरे पर थकान या हार का डर नहीं, बल्कि एक 'बुद्ध' जैसी शांति और विजेता वाली मुस्कान हो। प्रिय छात्रों, याद रखना, "लहरों को रोका नहीं जा सकता, लेकिन उन पर तैरना सीखा जा सकता है।" (You can't stop the waves, but you can learn to surf). यदि आप या आपका बच्चा परीक्षा के तनाव, नींद की कमी, याददाश्त की समस्या या घबराहट से जूझ रहा है, तो 6 महीने के सफर में हम आपके दिमाग को सफलता के लिए 'प्रोग्राम' करें।
9:14 PM
Article Published by : PAVAN KUMAR SHARMA,' PAAVAN &MAAHIR
1988 में कोलंबिया विश्वविद्यालय में एक लैब बेंच पर िंडा बक अकेले बैठे,आनुवंशिक अनुक्रमों को घूरते हुए जिसने व्यवहार करने से इनकार कर दिया । दशकों से, गंध की मानवीय भावना जीव विज्ञान की महान शर्मिंदगी में से एक थी । वैज्ञानिकों ने दृष्टि को समझा। वे सुन समझ गए। वे समझा सकते हैं कि कैसे आंख प्रकाश को रंग में अलग करती है, कैसे कान संगीत में कंपन का अनुवाद करता है । लेकिन गंध? कोई भी यह नहीं समझा सकता था कि नाक ने मस्तिष्क को खिलने वाले गुलाब और गीले कुत्ते के बीच का अंतर कैसे बताया । प्रमुख सिद्धांत साफ और किफायती था । अधिकांश विशेषज्ञों का मानना था कि नाक में केवल कुछ प्रकार के रिसेप्टर्स होते हैं, और मस्तिष्क ने उन संकेतों को विभिन्न संयोजनों में मिलाया । यह साफ था। कुशल। धन योग्य।और बहुत गलत होने की संभावना है । लिंडा बक को उस मॉडल की पुष्टि करनी थी । यदि वह विफल हो जाती है, तो काम के वर्षों—और भविष्य के वित्त पोषण—वाष्पित हो जाएंगे । अनुदान समितियां मृत सिरों को पुरस्कृत नहीं करती हैं । युवा वैज्ञानिकों को चुपचाप "अनुत्पादक" प्रश्नों को छोड़ने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है । आम सहमति विज्ञान को स्थिर रखती है । सहकर्मी समीक्षा वृद्धिशील प्रगति का पक्षधर है । आप जो पहले से ज्ञात है उस पर निर्माण करते हैं । आप विशाल छिपे हुए सिस्टम के लिए शिकार नहीं करते हैं जहां एक छोटे से उम्मीद की जाती है । यह नियम तब तक काम करता है—जब तक कि कोई तर्क में दरार न देख ले । उस रात देर से, लिंडा ने इसे महसूस किया: एक कैरियर का ठंडा डर कहीं नहीं जा रहा है । कैफीन और थकावट से उसके हाथ थोड़े कांप गए । महीनों के काम ने कुछ भी नहीं बनाया था जो स्वीकृत मॉडल के अनुकूल हो । इसलिए उसने पेशेवर रूप से कुछ खतरनाक किया । उसने एक छोटे से जवाब की तलाश बंद कर दी । वह एक परिवार की तलाश करने लगी । मुट्ठी भर गंध जीन की खोज करने के बजाय, उसने एक पूरे नेटवर्क की खोज की—छोटे बदलावों के साथ सैकड़ों संबंधित आनुवंशिक ब्लूप्रिंट । यह थकाऊ काम था । प्लास्टिक ट्रे धोने के दिन । डीएनए के अंतहीन तार पढ़ने की रातें। कोई सफलता नहीं । बस धैर्य! वह चूहों के साथ शुरू हुआ । जीव विज्ञान सिखाता है कि प्रकृति कुशल है । जब दस करेंगे तो यह एक हजार उपकरण नहीं बनाता है । लिंडा को जो कुछ भी सिखाया गया था, उसने कहा कि यह खोज विफल हो जाएगी । लेकिन फिर उसे एक जीन मिला। फिर दूसरा। फिर दस। फिर पचास। वह सूर्योदय के माध्यम से प्रयोगशाला में रही, ट्रैकिंग पैटर्न जो मौजूद नहीं होना चाहिए । संख्या चढ़ाई रखा.उसने जो खुलासा किया वह आश्चर्यजनक था: नाक कुछ सेंसर का उपयोग नहीं करता है । यह एक सेना का उपयोग करता है । लगभग एक हजार अलग जीन - एक अलग गंध रिसेप्टर के लिए प्रत्येक कोडिंग । पूरे शरीर में सबसे बड़ा जीन परिवार, एक ही अर्थ के लिए समर्पित । प्रत्येक न्यूरॉन सिर्फ एक रिसेप्टर व्यक्त करता है । मस्तिष्क संकेतों के विशाल संयोजनों से अर्थ को इकट्ठा करता है । गंध सरल नहीं थी । यह मनुष्यों के पास सबसे जटिल संवेदी प्रणालियों में से एक था । 1991 में, लिंडा बक और उनके सहयोगी रिचर्ड एक्सल ने प्रकृति में अपने निष्कर्ष प्रकाशित किए । मैदान शांत हो गया । पुराना साफ सिद्धांत रातोंरात ढह गया । उन्होंने मानव चेहरे में एम्बेडेड एक छिपे हुए नक्शे का खुलासा किया था—एक सुरुचिपूर्ण प्रणाली जिसे किसी ने कल्पना करने की हिम्मत नहीं की थी । 2004 में, उनकी खोज को फिजियोलॉजी या मेडिसिन में नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया था । नोबेल समिति ने न केवल एक तकनीकी सफलता, बल्कि एक दार्शनिक को मान्यता दी: मानव धारणा सादगी की तुलना में काफी समृद्ध है । लिंडा बक सर्वसम्मति का पालन करके सफल नहीं हुई । वह यह देखकर सफल हुई कि सर्वसम्मति ने समझ बनाना बंद कर दिया—और वैसे भी देखने का साहस रखने के लिए । विज्ञान न केवल उत्तरों के माध्यम से आगे बढ़ता है, बल्कि एक प्रश्न पूछने की इच्छा के माध्यम से हर कोई सोचता है कि पहले से ही तय है । पानी का वह ठंडा गिलास बेंच पर अछूता बैठ गया । और गंध की मानवीय भावना को आखिरकार समझा गया । और अगर गंध शेष न रहे या कम भी होती लगे तो न्यूरो जेनरेटिव डिक्लाइन के लक्षण हैं। अल्झाइमर्स / पार्किसन्स की संभावनाएं प्रबल हैं ।
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