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बस तेरे नाम की जरुरत है...(ghazal)

बस तेरे नाम की जरुरत है, हर सुबह शाम की ज़रूरत है! इश्क़ तो खूब कर लिया मैने, अब मुझे काम की ज़रूरत है! पास मेरे वो आके बैठे भी, ऐसी एक शाम की जरुरत है! जिसको पी कर के होश खो दूं मैं, ऐसे एक जाम की जरुरत है! देख बारात है दरवाजे पर, तुझको कय्याम की ज़रूरत है! मेरे दिल से कहो कि ना धड़के, इसको आराम की ज़रूरत है। Maahir

अफ़साना जब मेरा पढ़ना (ghazal)

अफ़साना जब मेरा पढ़ना उसमे एक इशारा पढ़ना بیٹھ کے اس کو تنہا پڑھنا آہستہ آہستہ پڑھنا बैठ के इसको तन्हा पढ़ना आहिस्ता आहिस्ता पढ़ना لکھا تو ہے خود کا قصہ اس میں اپنا حصہ پڑھنا लिख्खा तो है ख़ुद का क़िस्सा ‌ ‌ उसमे अपना हिस्सा पढ़ना پورا جب تم پڑھ جاؤ تو پھر اک دفعہ دوبارہ پڑھنا पूरा जब तुम पढ़ जाओ तो फिर एक दफ़ा दुबारा पढ़ना کیا کیا مچھپے ستم ہوئے تھے کیسا ہوا تماشہ پڑھنا क्या क्या मुझपे सितम हुए थे कैसे हुआ तमाशा पढ़ना تنہائی کی دھوپ میں سیکھا بیٹھ کے اپنا سایہ پڑھنا तन्हाई की धूप में सीखा बैठ के अपना साया पढ़ना جب بھی کتابِ دل پڑھنا ہو چہرے کا تم صفحہ پڑھنا जब भी किताबे दिल पढ़ना हो ‌चेहरे का तुम सफ़हा पढ़ना پڑھنا کتابِ ہستی جب بھی صفحہ ہمیشہ پچھلا پڑھنا पढ़ना किताबे हस्ती जब भी सफ़हा हमेशा पिछला पढ़ना سب سے مشکل ہوتا ہے کیوں چارہ گر کا نسخہ پڑھنا सबसे मुश्किल होता है क्यों चारागर का नुस्ख़ा पढ़ना۔ بتلانا کیسا لکھا ہے قصہ جب ہمارا پڑھنا बतलाना कैसा लिख्खा है क़िस्सा जब हमारा पढ़ना۔

आइए ग़ज़ल कहना सीखें

आइए ग़ज़ल कहना सीखें ग़ज़ल का शिल्प / तामीर पिछले पोस्ट में हमने संक्षेप में जाना कि ग़ज़ल क्या है. आइए अब हम ये समझने के की कोशिश करें कि ग़ज़ल की संरचना क्या होती है. 1. जैसे कोई दीवार ईंट से बनी होती है या कपड़ा धागों से, वैसे ही ग़ज़ल शेर से बनती है. 2. एक ग़ज़ल में कम से कम चार या पांच और अधिकतम 15 शेर या अशआर (शेर का बहुवचन) हो सकते हैं हालांकि किसी ग़ज़ल में शेर की अधिकतम संख्या की कोई स्थापित बंदिश नहीं है. 3. ग़ज़ल के पहले शेर को मतला और आख़री शेर को मक़ता या आख़िरी शेर कहते हैं. 4. किसी ग़ज़ल में शेर एक के बाद एक के क्रम से रखे जाते हैं, मगर इनके रखने के क्रम का कोई नियम नहीं है सिवाए ये कि ग़ज़ल के पहले शेर को मतला और आख़री शेर को मक़ता या आख़िरी शेर कहते हैं और इनका स्थान तदनुसार निश्चित है. मतला या मक़ता के बारे में हम आगे चर्चा करेंगे. 5. यह स्पष्ट है कि ग़ज़ल कहने की विधा को समझने के लिए हमें पहले शेर की संरचना को समझना होगा. 6. नीचे मिर्ज़ा ग़ालिब की एक ग़ज़ल के द्वारा ग़ज़ल के शिल्प को समझाने की कोशिश की गई है- आह को चाहिए इक उम्र असर होने तक कौन जीता है तिरी ज़ुल्फ़ के सर होने तक //१ - (मतला/ पहला शेर) आशिक़ी सब्र-तलब और तमन्ना बेताब दिल का क्या रंग करूँ ख़ून-ए-जिगर होने तक //२ - (दूसरा शेर) हम ने माना कि तग़ाफ़ुल न करोगे लेकिन ख़ाक हो जाएँगे हम तुम को ख़बर होने तक //३ - (तीसरा शेर) ग़म-ए-हस्ती का'असद'किस से हो जुज़ मर्ग इलाज शम्अ हर रंग में जलती है सहर होने तक //४ (मक़ता/ आख़िरी शेर) और इस तरह से ये एक सम्पूर्ण ग़ज़ल हुई. 7. ग़ज़ल के शिल्प को समझने के लिए शेर के अलावा हमें ग़ज़ल के इन अवयवों को अच्छी तरह समझना होगा a) मतला, b) मक़ता, c) क़ाफिया, d) रदीफ़, e) बह्र (scale), f) रुक्न

मुखौटा बनाम आपका वास्तविक स्वरूप (Authenticity vs. Personality)

जीवन का सबसे बड़ा तनाव: 'वह बनने की कोशिश करना, जो आप वास्तव में नहीं हैं' नमस्कार साथियों, प्रसिद्ध चिकित्सक डॉ. गैबोर माटे के गहरे शोध और मनोविज्ञान के सिद्धांतों के आधार पर, आज मैं आपके साथ एक अत्यंत महत्वपूर्ण सत्य साझा कर रहा हूँ। इसे ध्यान से समझें और अपने जीवन का अवलोकन करें: 1. मुखौटा बनाम आपका वास्तविक स्वरूप (Authenticity vs. Personality) हम सभी मूल रूप से 'प्रामाणिक' (Authentic) ही पैदा होते हैं। लेकिन समाज, परिवार और परिवेश की अपेक्षाओं के चलते हम अपने ऊपर "हमेशा अच्छा दिखने" (Being nice all the time) और लोगों को खुश करने के मुखौटे चढ़ा लेते हैं। बचपन से ही हमें यह डर सिखा दिया जाता है कि यदि हम वही बने रहे जो हम वास्तव में हैं, तो लोग हमें अस्वीकार कर देंगे। मुक्ति (Liberation) कोई जादुई घटना नहीं है; मुक्ति तब मिलती है जब आपको यह अहसास होता है कि आपका 'कंडीशन्ड व्यक्तित्व' (Personality) आपका वास्तविक आत्म (True Self) नहीं है। 2. खुद पर आरोप मत लगाइए, 'दयालु जिज्ञासा' (Compassionate Curiosity) अपनाइए जब भी हम कोई पुरानी गलत आदत दोहराते हैं, तो हम खुद से कहते हैं— "मैं ऐसा क्यों हूँ? मैं क्यों नहीं बदल पा रहा?" यह कोई सवाल नहीं, बल्कि खुद पर लगाया गया एक 'आरोप' है, जो आपके आत्मसम्मान को चोट पहुँचाता है। इसकी जगह खुद से दयालु जिज्ञासा (Compassionate Curiosity) के साथ पूछिए: "क्या बात है जो मुझे ऐसा करने पर मजबूर कर रही है? इसके पीछे कौन सा अनसुलझा दर्द छिपा है?" जब आप खुद पर हमला करेंगे, तो मन बचाव (Defense) की मुद्रा में आ जाएगा; लेकिन जब आप आत्म-सहानुभूति रखेंगे, तभी सच्चाई सामने आएगी। 3. आदतें और मस्तिष्क की प्रोग्रामिंग (Habit Energies) अपनी भावनाओं को दबाना एक सीखी हुई आदत है, जो बचपन में आपके दिमाग के न्यूरोलॉजिकल सर्किट्स में बैठ गई थी। यह एक स्वचालित व्यवहार (Automatic behavior) है। जैसे जिम में पहले ही दिन 150 पाउंड वजन नहीं उठाया जा सकता, वैसे ही इन 'हैबिट एनर्जीज' को बदलने के लिए लगातार, धैर्यपूर्वक और बिना खुद को कोसे अभ्यास करने की आवश्यकता होती है। 4. लत (Addiction) और शारीरिक दर्द की असली वजह: बचपन का अनसुलझा दर्द लत (चाहे वह किसी पदार्थ की हो, काम की हो या किसी व्यवहार की) कोई नैतिक कमजोरी या केवल अनुवांशिक बीमारी नहीं है। यह असल में भावनात्मक दर्द, अकेलेपन, बेचैनी और खालीपन को 'सुन्न' (Numb) करने का एक असफल प्रयास है। शोध बताते हैं कि जिन लोगों ने बचपन में प्रतिकूल परिस्थितियों या आघात (Adverse Childhood Experiences / Trauma) का सामना किया होता है, वयस्क होने पर उनके शरीर में क्रोनिक दर्द और मानसिक बीमारियों की संभावना कई गुना बढ़ जाती है। वे केवल लत के शिकार नहीं हैं, बल्कि वे एक गहरे आघात से जूझ रहे व्यक्ति हैं जिसका शरीर उस दर्द पर प्रतिक्रिया दे रहा है। 5. आधुनिक जीवन में तनाव के 3 ट्रिगर और 4 बड़े 'अलगाव' (Alienations) तनाव मुख्य रूप से तीन चीजों से पैदा होता है: अनिश्चितता (Uncertainty) जानकारी का अभाव (Lack of Information) नियंत्रण खोने का अहसास (Loss of Control) जब यह तनाव बढ़ता है, तो इंसान चार तरह के अलगाव का शिकार होता है: 1. प्रकृति से अलगाव (Alienation from Nature): प्राकृतिक वातावरण से पूरी तरह कट जाना। 2. दूसरों से अलगाव (Alienation from Others): आत्मीयता, भरोसे और गहरे रिश्तों की कमी। 3. अपने काम से अलगाव (Alienation from Work): ऐसा काम करना जिसमें कोई आत्मिक अर्थ या रचनात्मकता न हो, जिसके कारण लोग बाहरी दिखावे और भौतिक वस्तुओं में झूठी खुशी तलाशने लगते हैं। 4. स्वयं से अलगाव (Alienation from Self): अपनी अंतरात्मा और अंतर्ज्ञान (Gut Feeling) को दबा देना। जब हम बचपन में अपनों का प्यार पाने के लिए अपनी भावनाओं को मार देते हैं, तो हम अपने ही सत्य से कट जाते हैं। 6. तनाव कैसे बीमारी बनता है? तनाव सिर्फ बाहरी घटना नहीं है। तनाव तीन चरणों में काम करता है: बाहरी घटना (Stressor) हमारा आंतरिक नजरिया (Processing Apparatus - हमारे अवचेतन विश्वास और व्याख्याएं) शारीरिक प्रतिक्रिया (Physiological Response - एड्रेनालाईन, कोर्टिसोल, तंत्रिका तंत्र और अंगों पर असर) जब हम दूसरों की स्वीकृति पाने के लिए लगातार अपनी प्रामाणिकता की बलि देते हैं, तो हम अपने शरीर को भारी तनाव में डालते हैं, जो आगे चलकर गंभीर बीमारियों का रूप ले लेता है। 7. बीमारी एक शिक्षक के रूप में और 'रिकवरी' का वास्तविक अर्थ बीमारी केवल एक विपत्ति नहीं है, बल्कि कई बार यह एक अलार्म की तरह आती है जो हमें यह सिखाती है कि हम कहाँ अपने वास्तविक स्वरूप से भटक गए थे। स्वास्थ्य लाभ के लिए 'Recovery' (पुनर्प्राप्ति) शब्द का प्रयोग होता है। रिकवर करने का अर्थ है— उसे दोबारा पाना जो कभी खोया ही नहीं था। आपका सच्चा, प्रामाणिक स्वरूप हमेशा आपके भीतर मौजूद है, बस उस पर जमी धूल और कंडीशनिंग को हटाना है। मुख्य संदेश: जीवन का सबसे बड़ा तनाव किसी और की अपेक्षाओं के अनुसार जीना है। लोगों को खुश करने के लिए अपनी अंतरात्मा की आवाज को मत दबाइए। अपनी कमियों को स्वीकार कीजिए, खुद के प्रति करुणामय बनिए और अपने वास्तविक स्वरूप में जीने का साहस जुटाइए।

दिया कोई जलाते जाते(GHAZAL)

शहर-ए-उल्फ़त में दिया कोई जलाते जाते मेरे कूचे के अँधेरे भी मिटाते जाते یہ مرا عشق ہے کمزوری نہیں ہے جاناں سر جھکاتی ہوں __سر راہ جو آتے جاتے ये मिरा इश्क़ है ,,,कमज़ोरी नहीं है जानाँ सर झुकाती हूँ सर-ए-राह जो आते जाते یہ جو پلکوں پہ سجوئے ہوئے ہیں موتی ہم یہ تو دولت ہے ______اسےکیسے لٹاتے جاتے ये जो पलकों पे सजोये हुए हैं मोती हम ये तो दौलत है ,,,,,,,इसे कैसे लुटाते जाते آپ کو دل پہ مرے __راج اگر کرنا تھا وسوسے پہلے مرے دل کے مٹاتے جاتے आप को दिल पे मिरे राज अगर करना था वसवसे पहले मिरे दिल के ,,,,,मिटाते जाते زندہ رہنے کے لئے خواب ضروری ہے بہت سو ہمیں __خواب نیا کوئی دکھاتے جاتے ज़िंदा रहने के लिए ख़्वाब ज़रूरी है बहुत सो हमें ,,,,,,,ख़्वाब नया कोई दिखाते जाते بے قراری کی یہ منزل نہیں ہوتی جیوتیؔ دوریاں آپ اگر ___مجھ سے بڑھاتے جاتے बे-क़रारी की ये मंज़िल नहीं होती 'maahit' दूरियाँ आप अगर मुझ से बढ़ाते जाते

क़ाफ़िया = तुक की संरचनात्मक पाबंद (रदीफ़ = उस तुक के बाद आने वाली स्थिर पुनरावृत्ति)

क़ाफ़िया क्या है? قافیہ کیا ہے؟ इस अभ्यास में हम ग़ज़ल के अत्यंत महत्वपूर्ण अंग क़ाफ़िया को समझने की शुरुआत करेंगे। क़ाफ़िया केवल तुक मिलाने का नाम नहीं है, बल्कि यह ग़ज़ल की संरचना, संगीतात्मकता और अनुशासन का महत्वपूर्ण आधार है। पुस्तक में क़ाफ़िया को उस तुक या निर्धारित ध्वनि के रूप में समझाया गया है जो मतले के दोनों मिसरों में रदीफ़ से पहले तथा उसके बाद के प्रत्येक शेर के मिसरा-ए-सानी में रदीफ़ से पहले आती है। क़ाफ़ियों में शब्द अलग-अलग होते हैं, लेकिन उनकी तुक अथवा उच्चारण-साम्य बना रहता है। (अधिगम उद्देश्य) इस अभ्यास के अध्ययन के बाद विद्यार्थी... 🔹 क़ाफ़िया की मूल अवधारणा को समझ सकेंगे। 🔹 क़ाफ़िया और रदीफ़ के बीच का अंतर स्पष्ट कर सकेंगे। 🔹 मतले में क़ाफ़िये की भूमिका पहचान सकेंगे। 🔹 तुक और क़ाफ़िये के संबंध को समझ सकेंगे। 🔹 किसी ग़ज़ल में क़ाफ़िये की प्रारम्भिक पहचान कर सकेंगे। 1. क़ाफ़िया किसे कहते हैं? सरल शब्दों में: क़ाफ़िया वह तुक/ध्वनि-साम्य है जो ग़ज़ल के मतले के दोनों मिसरों में रदीफ़ से पहले तथा बाद के प्रत्येक शेर के मिसरा-ए-सानी में रदीफ़ से पहले आता है। उदाहरण: बार, प्यार, तार, झंकार, बेज़ार, हुंकार, पार, आज़ार, इन्कार, रुख़सार इन शब्दों में अंतिम “आर” ध्वनि समान है। अतः यहाँ क़ाफ़िया की मूल तुक “आर” है। 2. क़ाफ़िया और क़ाफ़िये के शब्द में अंतर यह बात विशेष रूप से समझने योग्य है। असर, सर, जिगर, ख़बर, सहर आदि क़ाफ़िये के शब्द हैं, लेकिन इन सबमें समान रहने वाली मूल तुक “अर” है। अर्थात्— अस + अर = असर स + अर = सर जिग + अर = जिगर ख़ब + अर = ख़बर सह + अर = सहर इसलिए कहा जा सकता है कि असर, सर, जिगर, ख़बर और सहर क़ाफ़िये के शब्द हैं, जबकि “अर” उनकी समान क़ाफ़ियाई तुक है। 3. क़ाफ़िया कहाँ आता है? एक सामान्य मुरद्दफ़ ग़ज़ल में व्यवस्था इस प्रकार समझें— मतला: मिसरा-ए-उला → क़ाफ़िया + रदीफ़ मिसरा-ए-सानी → क़ाफ़िया + रदीफ़ बाद के प्रत्येक शेर में: मिसरा-ए-उला → स्वतंत्र मिसरा-ए-सानी → क़ाफ़िया + रदीफ़ यानी क़ाफ़िया और रदीफ़ का संबंध ग़ज़ल की संरचना में बहुत निकट का है। क़ाफ़िया समाप्त होते ही रदीफ़ शुरू होता है और रदीफ़ के बाद मिसरा समाप्त हो जाता है। 4. एक उदाहरण से समझिए यार होता इंतिज़ार होता एतिबार होता पार होता गुज़ार होता बार होता मज़ार होता ख़्वार होता यहाँ “होता” रदीफ़ है और उसके पहले आने वाले यार, इंतिज़ार, एतिबार, पार, गुज़ार, बार, मज़ार, ख़्वार क़ाफ़िये के शब्द हैं। इन सभी में समान तुक “आर” है। 📌 केवल एक शेर देखकर क़ाफ़िया और रदीफ़ का निश्चित निर्धारण प्रायः संभव नहीं होता। मतला उपलब्ध हो या कम-से-कम दो अशआर उपलब्ध हों, तो पहचान अधिक निश्चित होती है। 📌 क़ाफ़िया की पहचान केवल आँख से नहीं, उच्चारण और तुक के आधार पर करनी चाहिए। 📌 क़ाफ़िया और रदीफ़ के बीच कोई अतिरिक्त शब्द नहीं आता। 📌 मतले में जो तुक निर्धारित हो जाती है, वही पूरी ग़ज़ल में निभानी होती है। (अपेक्षित अधिगम परिणाम) इस अभ्यास के अध्ययन के पश्चात विद्यार्थी... ✅ क़ाफ़िया और उसके शब्दों में अंतर समझ पाएँगे। ✅ रदीफ़ से पहले आने वाले क़ाफ़िये को पहचान पाएँगे। ✅ किसी उदाहरण में समान तुक की ध्वनि खोज पाएँगे। ✅ मतले द्वारा क़ाफ़िया निर्धारित होने की प्रक्रिया समझ पाएँगे। 📝 अभ्यास कार्य नीचे दिए गए प्रत्येक समूह में समान क़ाफ़ियाई तुक पहचानिए— १. असर, सर, जिगर, ख़बर, सहर २. यार, प्यार, इन्कार, मज़ार, ख़्वार ३. रात, बात, ज़ात ४. भर, असर, गुज़र, समर ५. मुहब्बत, रुख़्सत, इजाज़त, तुहमत कार्य: प्रत्येक समूह के सामने उसकी समान तुक लिखिए। 📌 आज का सूत्र “क़ाफ़िया केवल शब्द नहीं, शब्दों के भीतर छिपी हुई समान ध्वनि है।” क़ाफ़िया की पहचान एवं प्रकार قافیہ کی پہچان اور قسمیں पिछले अभ्यास में हमने क़ाफ़िया की मूल अवधारणा समझी। अब हम एक महत्वपूर्ण प्रश्न पर आते हैं: किसी शब्द में क़ाफ़िया बनने वाली तुक को पहचाना कैसे जाए? यहीं से क़ाफ़िया-विज्ञान की वास्तविक मश्क़ शुरू होती है। 🔹 शब्द के भीतर संभावित तुकों को पहचानना। 🔹 अर्थपूर्ण और निरर्थक तुकों में अंतर करना। 🔹 छोटी और बड़ी तुक के प्रभाव को समझना। 🔹 स्वर अक्षर और व्यंजन अक्षर क़ाफ़िये में अंतर करना। 🔹 मतले में तय तुक की पाबंदी समझना। 1. क़ाफ़िया की पहचान कैसे करें? क़ाफ़िया की पहचान का सबसे सरल आधार है: तुक + उच्चारण + निरंतरता उदाहरण के लिए “सिकंदर” शब्द को लें। इसमें संभावित तुकें हो सकती हैं— १. इकंदर २. अंदर ३. अर अब देखते हैं कि इनमें से कौन-सी तुक सार्थक क़ाफ़ियों का पर्याप्त संसार उपलब्ध करा सकती है। “इकंदर” के आधार पर बनने वाले शब्द लगभग निरर्थक हो जाते हैं। “अंदर” के आधार पर मिलते हैं— बंदर, अंदर, कलंदर, समंदर, चुकंदर आदि। और “अर” के आधार पर मिलते हैं— घर, सर, पर, फ़र, पत्थर, चक्कर, बिस्तर, कनस्तर, मुक़द्दर, समंदर, कलंदर, बंदर, शक्कर, घनचक्कर आदि। इससे एक महत्वपूर्ण बात सामने आती है: तुक जितनी छोटी होगी, संभावित क़ाफ़ियों की संख्या उतनी अधिक हो सकती है। 2. “मुसलमाँ” से क़ाफ़िया पहचानिए “मुसलमाँ” में कई संभावित तुकें खोजी जा सकती हैं। उदाहरणतः— मुसलमाँ = म + उसलमाँ मुसलमाँ = मुस + अलमाँ मुसलमाँ = मुसल + अमाँ मुसलमाँ = मुसलम + आँ लेकिन हर संभावित तुक क़ाफ़िये के लिए उपयोगी नहीं होती। किसी तुक को चुनते समय यह देखना आवश्यक है कि उसके आधार पर पर्याप्त और सार्थक क़ाफ़िये उपलब्ध हैं या नहीं। “अमाँ” के आधार पर: अमाँ, ज़माँ, कमाँ, समाँ, दमाँ जैसे सार्थक शब्द मिल सकते हैं। “आँ” की तुक पर तो और भी अनेक शब्द उपलब्ध हो जाते हैं। अर्थात केवल ध्वनि-साम्य पर्याप्त नहीं, सार्थक क़ाफ़ियों की उपलब्धता भी महत्वपूर्ण है। 3. क़ाफ़िये के दो प्रमुख प्रकार पुस्तक में तुकांतता के आधार पर क़ाफ़िये को दो प्रकारों में समझाया गया है— १. स्वर अक्षर क़ाफ़िया २. व्यंजन अक्षर क़ाफ़िया स्वर अक्षर क़ाफ़िया जिन क़ाफ़ियों में मुख्य तुक स्वर-ध्वनि के आधार पर बनती है, उन्हें स्वर अक्षर क़ाफ़िया कहा गया है। उदाहरण— आ की तुक: काना / दरिया / दवा / वफ़ा ई की तुक: ज़िंदगी / बेबसी ऊ की तुक: पहलू / आरज़ू / ख़ुद / कू ओ की तुक: पकड़ो / रो / खाओ ए की तुक: किनारे / बिछौने / घने / गहरे ऐ की तुक: है / तै / शै / मै अनुस्वार के साथ भी स्वर-आधारित क़ाफ़िये बन सकते हैं, जैसे— पासबाँ / गुमाँ / निशाँ / मकाँ तथा— मिलें / कहें / सुनें / रुकें व्यंजन अक्षर क़ाफ़िया जिन क़ाफ़ियों में व्यंजन-आधारित ध्वनि-साम्य होता है, उन्हें व्यंजन अक्षर क़ाफ़िया कहा गया है। उदाहरण— भर / असर / गुज़र / समर → अर दीवार / इंकार / दरकार / दुश्वार → आर मुहब्बत / रुख़्सत / इजाज़त / तुहमत → अत रात / बात / ज़ात → आत दुश्मन / चिलमन / बरतन / आँगन → अन शान / मान / जान / पान → आन ⚠ ध्यान देने योग्य बातें 📌 किसी शब्द में दिखाई देने वाली हर संभावित तुक क़ाफ़िया बनने योग्य नहीं होती। 📌 तुक के आधार पर पर्याप्त सार्थक क़ाफ़िये उपलब्ध होने चाहिए। 📌 केवल लिखित रूप देखकर निर्णय न लें; उच्चारण करके तुक पहचानें। 📌 मतले में जो तुक निर्धारित हो गई, वही पूरी ग़ज़ल में निभानी होगी। ✅ किसी शब्द में संभावित तुकों को खोज सकेंगे। ✅ सार्थक और निरर्थक क़ाफ़िया-सम्भावनाओं में अंतर कर सकेंगे। ✅ स्वर अक्षर और व्यंजन अक्षर क़ाफ़िये पहचान सकेंगे। ✅ क़ाफ़िया चुनते समय उसके विस्तार और उपलब्धता का ध्यान रख सकेंगे। निम्न शब्दों में कम-से-कम दो संभावित तुकें खोजिए और प्रत्येक तुक के आधार पर बनने वाले पाँच-पाँच सार्थक क़ाफ़िये लिखिए— १. सिकंदर २. मुसलमाँ ३. शरारत ४. समंदर ५. ज़िंदगी फिर प्रत्येक समूह को स्वर अक्षर क़ाफ़िया / व्यंजन अक्षर क़ाफ़िया के रूप में वर्गीकृत कीजिए। “क़ाफ़िया आँख से कम, कान से अधिक पहचाना जाता है।” क़ाफ़िया की पाबंदी, दोष एवं व्यावहारिक मश्क़ قافیہ کی پابندی، عیوب اور عملی مشق अब तक हमने जाना कि क़ाफ़िया क्या है और उसकी पहचान कैसे की जाती है। अब सबसे महत्वपूर्ण चरण है: क़ाफ़िया चुनने के बाद उसे पूरी ग़ज़ल में सही ढंग से निभाना। यहीं पर बहुत-से नए शाइर ग़लती करते हैं। 🔹 मतले में क़ाफ़िया निर्धारित करने की प्रक्रिया समझना। 🔹 पूरी ग़ज़ल में उसी तुक की पाबंदी करना सीखना। 🔹 क़ाफ़िया संबंधी सामान्य दोषों को पहचानना। 🔹 सही और ग़लत क़ाफ़िये की तुलना करना। 🔹 स्वयं क़ाफ़िया चुनकर उसका व्यावहारिक प्रयोग करना। 1. मतला क़ाफ़िये की सीमा तय करता है मतले में लिए गए क़ाफ़ियों की तुक केवल मतले तक सीमित नहीं रहती। मान लीजिए मतले में हमने— शरारत / तिजारत को क़ाफ़िया बनाया। इनकी समान तुक है: “आरत” अब पूरी ग़ज़ल में क़ाफ़िया इसी तुक पर रखना होगा— बसारत महारत जसारत इबारत इत्यादि। लेकिन यदि बाद के किसी शेर में— मुहब्बत आदत वहशत ले आएँ, तो यह ग़लत होगा, क्योंकि इनकी तुक “अत” है, “आरत” नहीं। 2. एक अत्यंत महत्वपूर्ण उदाहरण मान लीजिए मतले में क़ाफ़िया है— समंदर / सिकंदर इनकी समान तुक है: “अंदर” अतः आगे क़ाफ़िये हो सकते हैं— बंदर अंदर कलंदर चुकंदर लेकिन यदि बाद में हम— पत्थर चक्कर शक्कर ठोकर को क़ाफ़िया बना दें, तो यह दोषपूर्ण होगा, क्योंकि इनकी तुक “अर” है, जबकि मतले ने “अंदर” की पाबंदी निर्धारित की थी। हाँ, यदि मतले में समंदर / पत्थर लिया गया होता, तो समान तुक “अर” होती और फिर घर, बाहर, मुक़द्दर, अन्दर आदि क़ाफ़िये लिए जा सकते थे। 3. क़ाफ़िया के प्रमुख दोष इस अभ्यास के संदर्भ में क़ाफ़िये के प्रमुख दोषों को इस प्रकार समझें— 📌 मतले में निर्धारित तुक का बाद के अशआर में निर्वाह न करना। 📌 बड़ी तुक बाँधकर छोटी तुक के शब्दों को बाद में क़ाफ़िया बना लेना। 📌 ऐसे क़ाफ़िये चुनना जिनसे सार्थक शब्दों की पर्याप्त संख्या उपलब्ध न हो। 📌 केवल अक्षरों की समानता देखकर क़ाफ़िया मान लेना, जबकि उच्चारण की तुक अलग हो। 📌 एक ही ग़ज़ल में अलग-अलग तुकों को बिना किसी उचित आधार के मिला देना। 📌 केवल एक शेर देखकर क़ाफ़िया निश्चित मान लेना। इनमें से विशेष रूप से मतले की तुक का उल्लंघन ग़ज़ल की संरचना में गंभीर दोष उत्पन्न करता है। पुस्तक में शरारत/तिजारत के बाद मुहब्बत/आदत तथा समंदर/सिकंदर के बाद पत्थर/चक्कर को इसी प्रकार दोषपूर्ण उदाहरण के रूप में समझाया गया है। ━ 4. क़ाफ़िया चुनने की स्वर्णिम प्रक्रिया किसी ग़ज़ल के लिए क़ाफ़िया चुनते समय यह क्रम अपनाएँ— ① पहले मतला सोचें। ⬇ ② क़ाफ़िये के दो शब्द चुनें। ⬇ ③ दोनों में समान तुक खोजें। ⬇ ④ तुक को उच्चारण से जाँचें। ⬇ ⑤ उस तुक पर पर्याप्त सार्थक शब्द खोजें। ⬇ ⑥ पूरी ग़ज़ल में उसी तुक की पाबंदी करें। यही क़ाफ़िया-पैमाई की बुनियादी साधना है। 5. क़ाफ़िया और रदीफ़ का रिश्ता एक सुंदर ग़ज़ल में क़ाफ़िया और रदीफ़ एक-दूसरे के साथ मिलकर शेर की अभिव्यक्ति को दिशा देते हैं। पुस्तक में इसे बहुत सुंदर ढंग से समझाया गया है कि यदि क़ाफ़िया ग़ज़ल की जान है, तो रदीफ़ क़ाफ़िये का हुस्न है। एक ही क़ाफ़िया रखते हुए अलग-अलग रदीफ़ इस्तेमाल करने से बिल्कुल अलग भावभूमि वाली ग़ज़लें कही जा सकती हैं। उदाहरण के रूप में एक ही “अत” तुक पर अलग-अलग रदीफ़ के साथ अलग भाव व्यक्त किए जा सकते हैं। अर्थात— क़ाफ़िया = तुक की संरचनात्मक पाबंदी रदीफ़ = उस तुक के बाद आने वाली स्थिर पुनरावृत्ति ━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━ 📖 अध्ययन निर्देश ✔ प्रत्येक उदाहरण को पहले पढ़ें, फिर उच्चारण करें। ✔ क़ाफ़िया पहचानते समय केवल लिखावट पर निर्भर न रहें। ✔ मतले के क़ाफ़ियों की समान तुक को अलग करके लिखें। ✔ उसी तुक पर कम-से-कम 10 सार्थक क़ाफ़िये खोजें। ✔ ग़ज़ल लिखने से पहले क़ाफ़ियों की सूची तैयार करना अपनी आदत बनाएँ। ✔ किसी क़ाफ़िये पर संदेह हो तो उसे बोलकर जाँचें। ━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━ ⚠ ध्यान देने योग्य बातें 📌 क़ाफ़िया वह नहीं जो केवल अंत में मिलता-जुलता दिखाई दे; क़ाफ़िया वह है जिसकी तुक/ध्वनि का निर्वाह हो। 📌 मतले में बड़ी तुक बाँध दी तो पूरी ग़ज़ल में वही बड़ी तुक निभानी होगी। 📌 छोटी तुक प्रायः अधिक क़ाफ़िये उपलब्ध कराती है, लेकिन तुक का चयन अर्थपूर्ण और शिल्पसम्मत होना चाहिए। 📌 क़ाफ़िया चुनते समय केवल अधिक शब्द मिल जाने को ही सफलता न मानें; शब्दों की शुद्धता, अर्थवत्ता और प्रयोग-सामर्थ्य भी देखें। इस अभ्यास के अध्ययन के पश्चात विद्यार्थी... ✅ मतले से क़ाफ़िये की तुक निर्धारित कर सकेंगे। ✅ पूरी ग़ज़ल में क़ाफ़िये की पाबंदी रख सकेंगे। ✅ क़ाफ़िये की सामान्य त्रुटियों को पहचान सकेंगे। ✅ दोषपूर्ण और सही क़ाफ़िये में अंतर कर सकेंगे। ✅ अपनी ग़ज़ल के लिए व्यवस्थित क़ाफ़िया-सूची तैयार कर सकेंगे। अभ्यास–१ : सही या ग़लत? यदि मतले में क़ाफ़िया है— शरारत / तिजारत तो निम्न में से कौन-कौन से क़ाफ़िये उचित होंगे? 🔹 बसारत 🔹 महारत 🔹 इबारत 🔹 मुहब्बत 🔹 आदत 🔹 जसारत 🔹 वहशत 🔹 हक़ीक़त उचित क़ाफ़ियों को अलग कीजिए और कारण लिखिए। 📝 अभ्यास–२ : अपनी क़ाफ़िया-सूची बनाइए निम्न तुकों पर कम-से-कम 10-10 सार्थक क़ाफ़िये लिखिए— 🔹 अर 🔹 आर 🔹 अत 🔹 आन 🔹 अंदर फिर प्रत्येक समूह में से अपने पसंदीदा पाँच क़ाफ़ियों को चुनकर उनके साथ एक उपयुक्त रदीफ़ लगाइए। 📝 अभ्यास–३ : क़ाफ़िया-पैमाई एक काल्पनिक मतला बनाइए जिसमें दो क़ाफ़िये हों। फिर— ✔ समान तुक पहचानिए। ✔ उस तुक को अलग लिखिए। ✔ उसी तुक के कम-से-कम 15 क़ाफ़िये खोजिए। ✔ उनमें से 5 क़ाफ़ियों का प्रयोग करके पाँच मिसरे लिखिए। ✔ अंत में जाँचिए कि सभी क़ाफ़ियों में मतले वाली तुक का सही निर्वाह हो रहा है या नहीं। ग़ज़ल लिखने से पहले क़ाफ़िया तय करना केवल सुविधा नहीं, शिल्प-सजगता है। क़ाफ़िया जितना स्पष्ट होगा, शाइर के पास उतनी ही रचनात्मक स्वतंत्रता होगी। और यही कारण है कि ग़ज़ल की पाबंदियाँ वास्तव में उसकी रचनात्मक आज़ादी का रास्ता खोलती हैं। “मतले में क़ाफ़िया बाँधना आसान है, पूरी ग़ज़ल में उसे निभाना क़ाफ़िया-पैमाई है।”

Jaanishar Akhtar (Wo Shayar Benazir)

खि़राज एअकी़दत _उर्दू अदब की अज़ीम शायर*जांनिसार अख़्तर _ एक भी ख़्वाब ना हो जिन में वोह आंखें क्या हैं! एक न एक ख्वाब तो आंखों में बसाओ यारों!! (जां निसार अख़्तर) 20वीं सदी के महान उर्दू ग़ज़ल गो शायर फिल्मी नाग़मा निगार जाँनिसार अख़्तर (1914–1976) उर्दू अदब के अहम शायर, ग़ज़लगो और प्रगतिशील तहरीक से जुड़े साहित्यकार थे। उनका जन्म ग्वालियर में 18 फरवरी 1914 को हुआ। उनके वालिद मशहूर शायर मुज़्तर ख़ैराबादी थे। उन्होंने अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी से उर्दू में एम.ए. किया और अध्यापन के बाद मुंबई में फ़िल्मी दुनिया से जुड़े। उनकी शायरी में रूमानी एहसास, सामाजिक चेतना और ज़िंदगी की सच्चाइयों का ख़ूबसूरत मेल दिखाई देता है! लोग कहते हैं कि तू अब भी ख़फ़ा है मुझे से! तेरी आंखों ने तो कुछ और कहा है मुझ से!! ,(जांनिसार अख़्तर) शायरी और मजमूआ--ए-कलाम,जाँ निसार अख़्तर ने ग़ज़ल, नज़्म, गीत और दूसरी काव्य-विधाओं में अपनी पहचान बनाई। उनके प्रमुख (काव्य संग्रह) मजमूआ-ए-कलाम में ‘सिलसिले’, ‘नज़र-ए-बुताँ’, ‘जाविदाँ’, ‘घर आँगन’, ‘पिछले पहर’ और ‘ख़ाक-ए-दिल’ शामिल हैं। उनकी ज़बान सरल, रवाँ और असरदार थी, जिसमें हिंदी शब्दों का भी ख़ूबसूरत इस्तेमाल मिलता है। फ़िल्मी सफ़र---मुंबई में उन्होंने फ़िल्मों के लिए गीत लिखे और लगभग चार दशकों तक फ़िल्मी दुनिया से जुड़े रहे। ‘यास्मीन’, ‘सी.आई.डी.’, ‘नया अंदाज़’, ‘ब्लैक कैट’ और कई अन्य फ़िल्मों के गीतों ने उन्हें फ़िल्मी गीतकार के रूप में भी लोकप्रिय बनाया।जाँ निसार अख़्तर को फ़िल्मी दुनिया में एक नफ़ीस शायर और गीतकार के रूप में पहचान दिलाने वाले कुछ मशहूर गीत इस प्रकार हैं— "आँखों ही आँखों में इशारा हो गया" — फ़िल्म C.I.D. (1956) "ये दिल और उनकी निगाहों के साये" — फ़िल्म प्रेम पर्वत (1973) "आ जा रे ओ मेरे दिलबर आ जा" — फ़िल्म नूरी "ग़म की अँधेरी रात में" — फ़िल्म सुशीला "बे-मुरव्वत बेवफ़ा बेगाना-ए-दिल आप हैं" — फ़िल्म सुशीला "पिया पिया पिया मेरा जिया पुकारे" — फ़िल्म बाप रे बाप (1955) "गरीब जान के हमको न तुम मिटा देना" — फ़िल्म छूमंतर (1956) जाँ निसार अख़्तर के गीतों की सबसे बड़ी ख़ासियत यह थी कि उन्होंने फ़िल्मी गीतों में भी उर्दू शायरी की नफ़ासत, लफ़्ज़ों की मिठास और अदबी शान को बरक़रार रखा पुरस्कार और सम्मान---उनकी साहित्यिक सेवाओं के लिए उन्हे कई सम्मान मिले! ‘ख़ाक-ए-दिल’ पर उन्हें 1976 का साहित्य अकादेमी पुरस्कार (उर्दू) प्रदान किया गया। इसके अतिरिक्त उन्हें सोवियत लैंड नेहरू पुरस्कार और अन्य साहित्यिक सम्मानों से भी नवाज़ा गया। निधन जाँ निसार अख़्तर का निधन19 अगस्त 1976 में मुंबई में हुआ, लेकिन उनकी ग़ज़लों, नज़्मों और फ़िल्मी गीतों की ख़ुशबू आज भी उर्दू अदब और हिंदुस्तानी फ़िल्मी संगीत के चाहने वालों के दिलों में ज़िंदा है। जानिसार अख्तर जी ने अपनी शायरी और गीतों के ज़रिए मोहब्बत इंसानियत और खूबसूरत एहसासों को आवाज़ दी उन का फ़न और उनकी शायरी आने वाली नस्लों तक उर्दू अदब की रौशनी पहुँचाती रहेगी__ जान निसार अख़्तर का बेहतरीन कलाम आपके लिए_ ज़िंदगी यह तो नहीं तुझको संवारा ही ना हो! कुछ ना कुछ हमने तेरा क़र्ज़ उतारा ही ना हो!! दिल को छू जाती है यूं रात की आवाज़ अभी! चौंक उठता हूं कहीं तूने पुकारा ही ना हो!! कभी पलकों पर चमकती है जो अश्कों की लकीर! सोचता हूं तेरे आंचल का किनारा ही ना हो!! जिंदगी एक खलिश देके ना रह जा मुझको! दर्द वह दे जो किसी तरह गवारा ही ना हो!! शर्म आती है से इस शहर में हम हैं कि जहां ना मिले भी तो लाखों का गुजा़रा ही ना हो !! जरा सी बात पर हर रस्म तोड़ आया था! दिल ए तबाह ने भी क्य मिज़ाज पाया था!! मआफ़ कर ना सकी मेरी ज़िंदगी मुझको! वह एक लम्हा कि मैं तुझ से तंग आया था!! पता नहीं के मेरे बाद उन पर क्या गुज़री! मैं चंद ख़्वाब जमाने पर छोड़ आया था!!

Rasleela Nathdwara Style | Twin Eternals - Matter & Energy

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