skip to main |
skip to sidebar
RSS Feeds
A personal blog by Pavan Kumar "Paavan"
A personal blog by Pavan Kumar "Paavan"
![]() |
![]() |
9:22 PM
Article Published by : PAVAN KUMAR SHARMA,' PAAVAN &MAAHIR
गीता : ३/१० सहयज्ञाः प्रजाः सृष्ट्वा पुरोवाच प्रजापतिः । अनेन प्रसविष्यध्वमेष वोऽस्त्विष्टकामधुक्॥ तथा कर्म न करने से तू पाप को भी प्राप्त होगा; क्योंकि— प्रजापति ब्रह्मा ने कल्प के आदि में यज्ञसहित प्रजाओं को रचकर उनसे कहा कि तुमलोग इस यज्ञ के द्वारा वृद्धि को प्राप्त होओ और यह यज्ञ तुमलोगों को इच्छित भोग प्रदान करने वाला हो। अनासक्त स्वधर्म पालन का वर्णन (श्लोक १०-१३) सभी प्रजा की रचना के ही साथ यज्ञ को भी भी रचा सृष्टिकर्ता ब्रह्मा ने और कहा इससे तुम करो वृद्धि निज पाओगे तुम इच्छित फल इस यज्ञ से ॥ ॥१०/अध्याय ३ ॥ पुरा उवाच: सृष्टि की रचना के समय ही ब्रह्मा ने यज्ञ की भी रचना की और मनुष्यों से कहा । यज्ञ : श्रीमद्भगवद्गीता में यज्ञ शब्द शास्त्र-विहित सम्पूर्ण विहित क्रियाओं का भी वाचक है । वर्ण , आश्रम , धर्म, जाति,स्वभाव , देश , काल आदि के अनुसार प्राप्त कर्तव्य कर्म , यज्ञों के अंतर्गत आते हैं । श्लोक ९ और १० का ज्ञानेश्वरी का भावार्थ: तुम्हें स्वधर्म को ही ‘नित्य यज्ञ’ समझना चाहिए ।इसीलिए जो व्यक्ति स्वधर्मानुसार कर्मों का आचरण करता है उसके द्वारा उन कर्मों के आचरण ही में अनवरत यज्ञकर्म होते रहते हैं । इसी लिए ऐसे कर्म करने वाले व्यक्तियों को संसार के बंधन बाँध ही नहीं सकते । श्रीकृष्ण गीता से
![]() |
Post a Comment