चार्ल्स डार्विन : एक महान अन्वेषक : मानव की सोच का निर्माता वर्ष 1831 ईस्वी... इंग्लैंड... विक्टोरियन युग... यह वह समय था जब बाइबिल के अनुसार यह माना जाता था कि ईश्वर ने दुनिया की रचना 4004 ईसा पूर्व में की है। लोग बाइबिल की शिक्षाओं के अनुसार चलते थे। उन से अलग हटना 'पाप' माना जाता था। तब विज्ञान भी धर्म का सेवक था और उसे 'नेचुरल थियोलॉजी' कहा जाता था। इसके सबसे बड़े पैरोकार विलियम पेल्ली का तर्क था कि जिस प्रकार रास्ते में पड़ी एक घड़ी, घड़ी बनाने वाले चेतन और बुद्धिमान प्राणी का प्रमाण है, उसी प्रकार यह दुनिया और यहां के प्राणी ईश्वर का प्रमाण हैं। यह दुनिया ईश्वर का मैनीफेस्टेशन है - उसकी अभिव्यक्ति है, उसका स्वरूप है, उसकी रचना है। यहां के प्राणी ईश्वर द्वारा एक ही समय में आज के ही रूप में बनाए गए हैं, और तब से अब तक वह बदले नहीं हैं - समय के साथ जातियां बदलती नहीं हैं। इसी इंग्लैंड के एक कोने में 22 वर्षीय चार्ल्स रॉबर्ट डार्विन - जो पादरी बनने की तैयारी कर रहा था और बाइबल के अध्ययन में रत था - बाइबल पर आधारित जनमानस में व्यापक रूप से फैले हुए इन विश्वासों की नींव हिलाने वाला था। 12 फरवरी सन् 1809 को जन्मे चार्ल्स को श्र्यूसबरी स्कूल में लैटिन और यूनानी भाषाओं को पढ़ना बोझ लगता था। उन्हें प्रकृति को देखना अच्छा लगता था। उनके पिता डॉ रॉबर्ट डार्विन उन्हें अपने समान एक डॉक्टर बनाना चाहते थे। उन्होंने उनका प्रवेश एडिनबर्ग विश्वविद्यालय में कराया। लेकिन वहां एक बच्चे का ऑपरेशन होते हुए देख कर वह वहां से भाग आए क्योंकि तब निश्चेतकों का आविष्कार नहीं हुआ था। उन्होंने एक पादरी बनने के लिए कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय में प्रवेश लिया, किन्तु यहां भी उन की रुचि प्रकृति के अध्ययन में ही रही। कैम्ब्रिज में युवा चार्ल्स की भेंट प्रोफेसर जॉन स्टीवेन्स हेन्स्लो से हुई। हेन्सलो एक वनस्पति-शास्त्री और पादरी थे। डार्विन उनके साथ हर शाम टहलने जाते थे। लोग उन्हें 'The man who walks with Henslow' कहने लगे। हेन्सलो ने उनकी रुचियों को और विकसित किया। सन् 1831 में जब युवा चार्ल्स एक भू-वैज्ञानिक दौरे से वापस आए तो उन्हें अपनी मेज पर एक पत्र मिला। यह उनको दुनिया का चक्कर लगाने जा रहे एक समुद्री जहाज - एच एम एस बीगल - पर एक प्रकृति-शास्त्री के रूप में यात्रा करने का निमंत्रण था। इसके कप्तान रॉबर्ट फिट्ज़रॉय थे। कैप्टन फिट्ज़रॉय शाही खून वाले और बेहद धार्मिक व्यक्ति थे। डार्विन को इस यात्रा का अपना खर्च स्वयं वहन करना था। प्रारम्भ में उनके पिता ने उन्हें इस यात्रा के लिए मना किया किन्तु फिर चार्ल्स के मामा - जोसिया वेजवुड - के समझाने पर वे इसके लिए मान गए। अपनी इस यात्रा में डार्विन अपने साथ जो सामान ले गए थे, उसमें एक किताब थी - चार्ल्स लॉयल की - 'द प्रिंसिपल्स ऑफ़ जियोलॉजी'। यह किताब उन्हें प्रोफेसर हेन्स्लो ने दी थी। इस किताब में चार्ल्स लॉयल का विचार था कि पृथ्वी की आयु बाइबल में बताई गई लगभग 6000 वर्ष की आयु से बहुत अधिक है। इसका निर्माण किसी एक घटना में अचानक नहीं हुआ था बल्कि वह लाखों-करोड़ों वर्षों में धीरे-धीरे होने वाले बदलावों से बनी है। यह लंबे समय का विचार डार्विन के मन में एक बीज की तरह बैठ गया। उन्होंने सोचा कि यदि पृथ्वी इतनी धीरे-धीरे बदल सकती है तो क्या इस पर रहने वाली जीव-जातियां भी इसी प्रकार धीरे-धीरे नहीं बदल सकती हैं? 27 दिसम्बर, 1831 में प्लाईमाउथ, इंग्लैंड से जहाज का लंगर उठाया गया। जब जहाज दक्षिण अमेरिका के तटों पर पहुंचा तो डार्विन ने दुनिया को लॉयल की निगाहों से देखा। उन्होंने देखा कि सतह से 45 फीट ऊपर पहाड़ की चट्टानों में सीपियों की एक लंबी सफेद पट्टी है। बाइबल में वर्णित नूह की बाढ़ इतनी ऊंचाई पर चट्टानों के बीच में दबी हुई सीपियों की इस पट्टी की कहानी को नहीं समझा सकती थी। डार्विन ने सोचा कि यह कार्य समुद्र तल के ऊपर उठने से ही हुआ होगा, और यदि यह इस कारण हुआ है तो इसमें लाखों साल लगे होंगे। दुनिया 6000 साल पुरानी नहीं हो सकती थी। फरवरी, 1832 में बीगल ने जब ब्राजील के तट को छुआ तो डार्विन के लिए यह किसी दूसरी दुनिया में कदम रखने जैसा था। इंग्लैंड के धुंधले स्लेटी आसमान और शान्त वातावरण के विपरीत ब्राजील के अमेजॉन के वर्षावन आश्चर्यों से भरा तूफान थे। डार्विन ने अपनी डायरी में लिखा - "दिमाग पेंडुलम की तरह झूल रहा है!" यहां आंखों को चौंधियाने वाले चमकीले फूल थे, यहां कानों में गूंजता कीड़ों का तेज शोर था। यहां जीवन इतना घना, विविध और प्रचुर था कि डार्विन को ईश्वर की महानता और उसकी कारीगरी पर और भी गहरा विश्वास होने लगा। उस समय फैली हुई धार्मिक मान्यताओं से प्रेरित उनके मन को लगा कि ऐसी जटिल सुन्दरता एक महान कलाकार ही बना सकता है। जहाज दक्षिण की ओर बढ़ा और अर्जेंटीना के पम्पास और पैटागोनिया के वीरान तटों पर पहुंचा। यहां जंगल नहीं थे। यहां मीलों दूर तक फैले हुए घास के सूखे मैदान थे। यहां डार्विन ने कीचड़ से कुछ विशाल हड्डियों का बाहर निकाला। ये हड्डियां आज मिलने वाले आम जानवरों की नहीं थीं। स्थानीय लोग इन्हें 'दिग्गजों की हड्डियां' कहते थे, जो उनकी मान्यता के अनुसार नूह की बाढ़ में डूब गए थे। लेकिन जब डार्विन ने उन्हें जोड़ा तो उन्हें कुछ बातें दिखाई पड़ीं। एक कंकाल 'मैगाथीलियम' का था, जो एक विशालकाय जमीनी स्लॉथ जैसा था, लेकिन आकार में हाथी जितना बड़ा था। दूसरा कंकाल 'ग्लिप्टोडॉन' का था, जो आज के आर्माडिलो जैसा था और आकार में एक कार के बराबर था। यहां डार्विन के मन में प्रश्न आए कि यदि ईश्वर ने हर प्रजाति को पूर्ण बनाया था तो उसने इन शानदार दिग्गजों को विलुप्त क्यों होने दिया? क्या ईश्वर अपनी ही रचनाओं से ऊब गया था? उस समय के विश्वास कहते थे कि जीव-जातियां कभी विलुप्त नहीं होती हैं, लेकिन डार्विन जानते थे कि इतने विशालकाय जीव छिप नहीं सकते हैं। इसका अर्थ था कि विलुप्ति एक सच था। और यदि प्रजातियां नष्ट हो सकती हैं तो इसका अर्थ है कि सृष्टि स्थिर नहीं है। इस खोज ने एक नए विचार को जन्म दिया - Law of Succession of types - अर्थात् एक ही जमीन पर पुराने और नए जन्तुओं के बीच एक सम्बन्ध होता है। तो क्या यह सम्भव है कि आज के छोटे आर्माडिलो उन प्राचीन ग्लिप्टोडॉन्स के परपोते हों? क्या समय के साथ वे बदल गए हैं? यह विचार बाइबल के 'After its own kind' के नियम के विरुद्ध था। यह रहस्य तब और गहराया जब डार्विन ने रिया पक्षी का अध्ययन किया। यह शुतुरमुर्ग जैसा एक बड़ा पक्षी होता है। डार्विन को पता चला कि दक्षिण में एक छोटी रिया चिड़िया भी मिलती है। वह महीनों तक उसे ढूंढ़ते रहे और फिर एक दिन उन्हें उसकी कुछ हड्डियां और पंख मिले। डार्विन के मन में एक स्वाभाविक प्रश्न आया कि अगर उत्तर में बड़ी रिया रहती है और दक्षिण में छोटी, और बीच की रियो निग्रो नदी उन्हें अलग करती है, तो ईश्वर को इतने कम अंतर पर दो प्रकार के रिया पक्षी बनाने की क्या आवश्यकता थी? कहीं ऐसा तो नहीं कि नदी द्वारा किए गए इस अलगाव से उत्पन्न विभिन्न परिस्थितियों ने एक ही प्रकार की रिया पक्षी को दो प्रकार में बदल दिया हो? अपनी आगे की यात्रा में डार्विन ने एण्डीज के ऊंचे पर्वत देखे। वहां उन्होंने समुद्री जीवों के जीवाश्म पाए। समुद्री जीवों के जीवाश्म पर्वतों की ऊंचाइयों पर कैसे पहुंचे? यह एक गम्भीर प्रश्न था। इसका एक ही तरीका हो सकता था कि समुद्र की तली ऊपर उठी और पहाड़ बन गई‌। ईश्वर ने ऐसा क्यों किया होगा? अपनी इस यात्रा में डार्विन ने प्रकृति की विविधता, उसकी रचनात्मकता और उसकी क्रूरता को बहुत करीब से देखा। लेकिन वह केवल जीव-जातियों, पत्थरों एवं प्राकृतिक वातावरण के विषय में नहीं सोच रहे थे, वे मानवीय पीड़ा, अन्याय, अत्याचार और अस्तित्व के लिए संघर्ष के विषय में भी देख और सोच रहे थे। इसके उदाहरण उनकी इस यात्रा में मिलते हैं। मानवीय संघर्ष के इन अनुभवों ने उनके विचारों को आकार देने में मदद की। अस्तित्व का यह संघर्ष और इससे जुड़ी हुई अन्य बातें तब और स्पष्ट हुईं जब वे टियरा डेल फ्यूगो पहुंचे। यहां उनका सामना 'असभ्य' आदिवासियों से हुआ। जहाज पर जेमी बटन नाम का एक आदिवासी था जिसे कैप्टन फिट्ज़रॉय अपनी पिछली यात्रा में वहां से ले गए थे। उन्होंने उसे इंग्लैंड में रख कर सूट-बूट पहना कर 'सभ्य' बनाया था। लेकिन अपने कबीले में पहुंचते ही जेमी बटन ने अपना सूट-बूट उतार फेंका और वापस अपने कबीले के रंग-ढंग में रंग गया। तब डार्विन ने अपनी डायरी में लिखा - "एक 'सभ्य' अंग्रेज और नग्न आदिवासी के बीच का अन्तर केवल परिस्थितियों का है - उसके खून का नहीं!" यह 'विक्टोरियन सोच' के मुंह पर तमाचा था, जहां यह कहा जाता था कि ईश्वर ने इंसान को अलग-अलग जातियों के रूप में बनाया है। सितंबर, 1835 आ चुका था और बीगल जहाज अब उस जगह पहुंच रहा था, जिसका नाम डार्विन के साथ इतिहास में सदैव के लिए जुड़ जाने वाला था। यह जगह थी - दक्षिण अमेरिका के तट से दूर, प्रशान्त महासागर में गालापागोस द्वीप-समूह। इस द्वीप-समूह के अन्तर्गत थोड़ी-थोड़ी दूरी पर बिखरे हुए अनेक द्वीप थे। पहली नजर में डार्विन को यह स्थान 'नरक का बगीचा' लगा। यहां चारों ओर काला लावा था, जमीन से धुंआ निकल रहा था और हवा में गंधक की बदबू थी। यहां जानवर काले और खुरदुरे थे। यहां काले समुद्री इग्वाना - जिन्हें डार्विन ने 'समुद्र के शैतान' कहा - समुद्र में तैरते थे और चट्टानों पर चिपके रहते थे। लेकिन यहां मासूमियत भी थी। पक्षी इतने निडर थे कि वह डार्विन की बंदूक की नली पर आ कर बैठ जाते थे। उन्होंने अभी तक मनुष्य को शत्रु के रूप में नहीं पहचाना था। ऐसे वातावरण में डार्विन को उनकी उस पहेली का सुराग मिला जिसे वह सुलझाने की कोशिश कर रहे थे। यहां डार्विन की भेंट उन द्वीपों के उपराज्यपाल निकोलस लॉसेन से हुई। लॉसेन ने उन्हें बताया कि वह केवल कछुए की पीठ का खोल देख कर यह बता सकते हैं कि वह किस द्वीप से है। लॉसेन ने उन्हें बताया कि जो द्वीप नम, हरे-भरे और घास एवं अन्य वनस्पति वाले थे, वहां कछुओं का कवच गोल गुम्बद जैसा था, लेकिन जो द्वीप सूखे थे - जहां कछुओं को गर्दन उठा कर ऊपर कैक्टस के फूलों को खाना पड़ता था - वहां उनके कवच आगे से ऊपर उठे हुए काठी की शक्ल के थे, जिनसे वह अपनी गर्दन को ऊपर उठा सकते थे। डार्विन ने इससे यह निष्कर्ष निकाला कि यह अनुकूलन था। अपनी परिस्थितियों के अनुसार जीव-जातियां विभिन्न रूपों में ढल गई थीं। डार्विन ने सोचा कि क्या ईश्वर ने वास्तव में 50 मील की दूरी पर स्थित हर छोटे द्वीप के लिए अलग-अलग कछुए बनाए हैं? वह ऐसा क्यों करेगा? या फिर यहां पर एक ही कछुए की प्रजाति आई और अलग-अलग द्वीपों की जरूरतों के अनुसार अलग-अलग रूपों में ढल गई? यही पैटर्न उन्हें मॉकिंग बर्ड्स में दिखाई पड़ा। हर द्वीप की मॉकिंग बर्ड में दूसरे से थोड़ा अंतर था। यहां डार्विन को वह छोटी काली चिड़ियां मिलीं जिन्होंने उनके अध्ययन को एक नई दिशा दी। ये चिड़ियां थीं - फिंचेज। वहां उन्हें विभिन्न द्वीपों पर फिंच चिड़ियों की 13 अलग-अलग प्रजातियां मिलीं। इन की चोंचों में अंतर था। जहां खाने के लिए बीज अधिक थे, वहां उन्हें पकड़ने के लिए मोटी और मजबूत चोंच वाली फिंच थीं। जहां कीड़े अधिक मिलते थे, वहां उन्हें पकड़ने के लिए पतली और नोकीली चोंच वाली फिंच थीं, और जहां उन्हें कैक्टस के फूलों का रस पीना पड़ता था, वहां उनकी चोंच लंबी और मुड़ी हुई होकर उसके लिए अनुकूलित थी। यहां यह महत्वपूर्ण प्रश्न डार्विन के सामने आया कि क्या ईश्वर ने हर अलग-अलग द्वीप के लिए एक खास तरह की फिंच बनाई थी? डार्विन ने देखा कि इस द्वीप-समूह में इग्वाना आदि जन्तु दक्षिण अमेरिका की मुख्य भूमि के जन्तुओं से मिलते-जुलते तो हैं लेकिन वह कुछ अलग भी हैं। इसके अतिरिक्त हर द्वीप का अपना एक अलग संसार है। क्या ऐसा हो सकता था कि दक्षिण अमेरिका से ये जन्तु, या एक ही जाति की फिंच चिड़िया उड़ कर वहां पहुंची हो और उसके विभिन्न सदस्य विभिन्न परिस्थितियों में रह कर विभिन्न प्रकार से विकसित हो गए हों? अपनी यात्रा शुरू होने के लगभग 5 साल बाद - 2 अक्टूबर, 1936 में - डार्विन का जहाज फालमाउथ, इंग्लैंड के तट पर आ कर लगा। अब डार्विन 22 साल के नौसिखिया लड़के नहीं थे। अब वह एक अनुभवी प्रकृति-शास्त्री थे जिन के भेजे हुए नमूनों, नोट्स और पत्रों ने लंदन में धूम मचा रखी थी। इस यात्रा के बाद अब उनके पास एक बहुत महत्वपूर्ण सवाल था कि क्या जातियां समय के साथ बदलती हैं, और यदि हां, तो कैसे? क्रमशः - आगे की कहानी आगे की कड़ियों में आने वाली यह कहानी जहां डार्विन के अपने निष्कर्षों पर पहुंचने को दिखाती है, वहीं यह मानव की सोच बदलने की कहानी को भी दिखाती है। यह डार्विन की थ्योरी के खाली स्थानों, और फिर नवीन खोजों के आलोक में उन खाली स्थानों को भरने की कहानी, को भी दिखाती है। यह सत्य कहानी रुचि रखने वाले पाठकों के लिए एक बहुत रोचक कहानी होने जा रही है। यह सत्य की राह पर चलने वाले एक इंसान को धार्मिक रूढ़िवाद और परम्परावादी मानसिकता के हाथों मिलने वाले तीव्र विरोध और अपमान की कहानी को भी दिखाती है। यह मानव के साहस, धैर्य, परिश्रम तथ्यात्मकता और तर्कशीलता के साथ-साथ सत्य की राह में उसके मस्तिष्क पर पड़ने वाले तनावों को भी दिखाती है। कृपया इस श्रृंखला के अंत तक मेरे साथ बने रहें।