ग़ज़ल ताज़ा ताज़ा लिखी एक और नयी ग़ज़ल जिसे आपकी मुहब्बतों के हवाले कर रहा हूँ. उम्मीद है आप इसे अपनी शफ़क़त से नवाजेंगे, अर्ज़ किया है- जो पिछले क़र्ज़ थे मुझपे, उन्हें भी भरना था पुराने शह्र के कूचों से तो गुज़रना था //१ جو پچھلے قرض تھے مجھپے, انہیں بھی بھرنا تھا پرانے شہر کے کوچوں سے تو گزرنا تھا //١ हमें ही हुस्न के चूल्हे में जल के मरना था तुम्हें तो चौबिसों घण्टे फ़क़त सँवरना था //२ ہمیں ہی حسن کے چولھے میں جل کے مرنا تھا تمہیں تو چوبسوں گھنٹے فقط سنورنا تھا //٢ हैं कितने आशना माँ बाप से अभी के तिफ़्ल पुराने दौर के बच्चों को सिर्फ़ डरना था //३ ہیں کتنے آشنا ماں باپ سے ابھی کے طفل پرانے دور کے بچوں کو صرف ڈرنا تھا //٣ भले ही आपने देखा था मुस्कुरा के हमें वफ़ा के ज़ख़्म थे, उनको तो बस उभरना था //४ بھلے ہی آپنے دیکھا تھا مسکرا کے ہمیں وفا کے زخم تھے، انکو تو بس ابھرنا تھا //٤ लगी थी भीड़ तो सोचा है कोई दुर्घटना गया क़रीब तो पाया सियासी धरना था //५ لگی تھی بھیڑ تو سوچا ہے کوئی درگھٹنا گیا قریب تو پایا سیاسی دھرنا تھا //٥ जिसे समझते थे तुम आब बूढ़ी आँखों का वो सच में दर्द भरे आँसुओं का झरना था //६ جسے سمجھتے تھے تم آب بوڑھی آنکھوں کا وہ سچ میں درد بھرے آنسوؤں کا جھرنا تھا //٦ निकाला क़ैदे कफ़स से तो उसने 'राज़' मुझे मगर उसे तो मेरे डैनों को कतरना था //७ نکالا قیدے قفس سے تو اسنے 'راز' مجھے مگر اسے تو میرے ڈینوں کو کترنا تھا //٧ Words and meanings कूचा- गली फ़क़त- सिर्फ़, केवल आशना- घुले मिले, परिचित, मित्रवत तिफ़्ल- बच्चा सियासी- राजनैतिक आब- पानी क़ैदे कफ़स- पिंजरे की क़ैद डैना- पँख