Pavan Kumar Paavan Personal Blog Pavan Kumar Paavan Personal Blog Pavan Kumar Paavan Personal Blog
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दोस्तो, पेशे ख़िदमत है मेरी लिखी एक ग़ज़ल। पहली बार उर्दू रस्मुल ख़त के साथ पेश करने की कोशिश की है, اردو ٹائپنگ میں کچھ غلطیاں رہ گئی ہوں تو معاف کریں۔ गर नहीं है उज्र तो फिर प्यार क्यों करता नहीं और है तो, इश्क़ से इंकार क्यों करता नहीं //१ گر نہیں ہے اجر تو پھر پیار کیوں کرتا نہیں اور ہے تو، عشق سے انکار کیوں کرتا نہیں मुझसे करता है तवक़्क़ो ए वफ़ा पर तू बता अपनी हाँ का तू कभी इज़हार क्यों करता नहीं //२ مُجھسے کرتا ہے توققوئے وفا پر تو بتا اپنی ہاں کا تو کبھی اظہار کیوں کرتا نہیں कब से हूँ पहलू में तेरे मैं खड़ा बोसा तलब मेरी जानिब आरिज़ो रुख़सार क्यों करता नहीं //३ کب سے ہوں پہلو میں تیرے میں کھڑا بوسا طلب میری جانب آرزو رخسار کیوں کرتا نہیں वो इयादत को सही, मिलने तो आता था, मगर दर्दे दिल भी इन दिनों बीमार क्यों करता नहीं //४ وہ عیادت کو سہی، ملنے تو آتا تھا، مگر دردِ دل بھی ان دنوں بیمار کیوں کرتا نہیں लगने भी दे वस्ल की रातों में जिस्मों की गिरह अपने मू को और तू ख़मदार क्यों करता नहीं //५ لگنے بھی دے وصل کی راتوں میں جسموں کی گرہ اپنے مو کو اور تو خمدار کیوں کرتا نہیں 'राज़' क्यों करने लगी है इश्क़ से दुनिया गुरेज़ काम अच्छा है तो इज्ज़तदार क्यों करता नहीं //६ راز کیوں کرنے لگی ہے عشق سے دنیا گُریز کام اچّھا ہے تو عجزت دار کیوں کرتا نہیں raaj navadavi तवक़्क़ो ए वफ़ा- वफ़ा की उम्मीद/अपेक्षा बोसा तलब- चुम्बन का अभिलाषी जानिब- तरफ़ आरिज़-गाल रुख़सार- चेहरा, मुखमंडल इयादत- बीमार का हालचाल पूछना वस्ल- मिलना गिरह- गाँठ मू- बाल ख़मदार- पेंच से भरा गुरेज़- दूर हटना

आनंद (Enjoyment),संतुष्टि (Satisfaction),सार्थकता/अर्थ (Meaning)

जीवन और मानसिक स्वास्थ्य की दृष्टि से: अवकाश (Leisure) केवल विश्राम नहीं, एक वैज्ञानिक कला है आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में हम सभी ‘हसल कल्चर’ (अति-व्यस्तता) और कभी न खत्म होने वाली महत्वाकांक्षाओं के शिकार हैं। एक मनोचिकित्सक के रूप में अपने क्लीनिकल अनुभव में मैं अक्सर ऐसे लोगों को देखता हूँ जो दिन-रात काम करते हैं, मानसिक रूप से पूरी तरह थक जाते हैं, और फिर सोचते हैं कि कुछ दिन कहीं शांत बैठकर "कुछ न करना" (Doing Nothing) ही उनका इलाज है। लेकिन हकीकत यह है कि खाली बैठना या बिना सोचे-समझे वक्त काटना हमारे तनाव को कम करने के बजाय हमें और अधिक अशांत और अकेला बना देता है। आइए, इस पूरे दर्शन और विज्ञान को एक नए नजरिए से समझें। 1. क्या काम ही हमारी संस्कृति का आधार है? प्रसिद्ध जर्मन दार्शनिक जोसेफ पीपर (Josef Pieper) ने अपनी कालजयी रचना में कहा था कि "अवकाश ही संस्कृति का आधार है" (Leisure is the Basis of Culture)। परंतु आधुनिक समाज ने इसे उलट दिया है; आज 'काम' (Work) को ही संस्कृति और पहचान का आधार मान लिया गया है। हम दिन-रात काम करते हैं, और बीच में थोड़ा सा समय केवल इसलिए निकालते हैं ताकि दोबारा काम करने के लिए सांस ले सकें। जब हम काम नहीं कर रहे होते और जिसके लिए हमें कोई भुगतान नहीं मिल रहा होता, वास्तव में वही समय तय करता है कि हम भीतर से कौन हैं। इसलिए अवकाश को काम का अभाव (absence of work) समझना सबसे बड़ी भूल है; अवकाश अपने आप में एक स्वतंत्र और निपुण कौशल (skill) है। 2. खुशी के तीन घटक: सुख (Pleasure) बनाम सच्चा आनंद (Enjoyment) खुशी (Happiness) के तीन बुनियादी पोषक तत्व (Macronutrients) होते हैं: आनंद (Enjoyment) संतुष्टि (Satisfaction) सार्थकता/अर्थ (Meaning) अधिकांश लोग 'सुख' (Pleasure) और 'आनंद' (Enjoyment) के बीच के बुनियादी अंतर को नहीं समझ पाते: क्षणिक सुख (Pleasure): यह हमारे मस्तिष्क के आदिम लिम्बिक सिस्टम (Limbic System) की रासायनिक प्रतिक्रिया है। भोजन, सोशल मीडिया का डोपामाइन रश या नशा—ये केवल शारीरिक और पशुवत प्रवृत्तियां हैं। केवल सुख के पीछे भागने से जीवन में संतुष्टि नहीं, बल्कि लत और अवसाद आते हैं। सच्चा आनंद (Enjoyment): जब हम सुख को अपने चेतन मस्तिष्क यानी प्रीफ्रंटल कॉर्टेक्स (Prefrontal Cortex) में ले जाते हैं, तब वह सच्चा आनंद बनता है। इसके लिए दो चीजें अनिवार्य हैं: सचेतन स्मृति (Consciousness/Memory) और सामाजिक जुड़ाव (People/Social Connection)। जब कोई गतिविधि सचेत रूप से अपनों के साथ साझा की जाती है, तभी वह आत्मा को तृप्त करती है। 3. 'असीडिया' (Acedia) का जाल: मानसिक और आध्यात्मिक आलस्य दार्शनिक परंपरा में सात महापापों में एक शब्द आता है—'स्लॉथ' (Sloth), जिसे ग्रीक में असीडिया (Acedia) कहा गया है। यह केवल बिस्तर पर लेटे रहना नहीं है, बल्कि यह मानसिक और आध्यात्मिक सुस्ती है। आज के समय में फोन पर अंतहीन रील्स स्क्रॉल करना (Mindless Scrolling), टीवी पर शोज़ बिंज-वॉच करना या शराब के नशे में दिमाग को सुन्न करना—ये सभी असीडिया के लक्षण हैं। यह विश्राम नहीं है, बल्कि अपनी आत्मा और मस्तिष्क को कोमा में डालने जैसा है। न्यूरोसाइंस के अनुसार, यह आदत स्ट्रेस हार्मोन्स को बढ़ाती है और इंसान को भीतर से खाली कर देती है। 4. सच्चे अवकाश की वैज्ञानिक परिभाषा (True Leisure) सच्चा अवकाश निष्क्रिय (Passive) नहीं, बल्कि सक्रिय, चिंतनशील और सृजनात्मक (Contemplative & Generative) होता है: दाएँ गोलार्ध (Right Hemisphere) को जाग्रत करना: आधुनिक कार्यशैली हमारे मस्तिष्क के विश्लेषणात्मक और तार्किक बाएँ हिस्से को थका देती है। अवसाद और एंग्जायटी से मुक्ति के लिए दाएँ हिस्से को सक्रिय करना जरूरी है, जो रहस्य, अर्थ, सौंदर्य और भावनाओं का केंद्र है। प्रकृति के सान्निध्य में समय बिताना: गैजेट्स से दूर रहकर खुली हवा में टहलना, सूर्योदय देखना और प्रकृति के सौंदर्य को महसूस करना हमारे कॉग्निटिव फंक्शन और मूड को तुरंत स्थिर करता है। कला और संगीत का सृजन व आस्वादन: संगीत और कला केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि शक्तिशाली न्यूरोलॉजिकल उपचार हैं। यह अल्जाइमर और पार्किंसंस जैसी बीमारियों तक में मस्तिष्क की कार्यप्रणाली को सक्रिय करने में सक्षम हैं। गहन और सार्थक मानवीय रिश्ते: सतही गपशप के बजाय गहरे संवाद स्थापित करें। अपनों से दिल की बात साझा करना और सार्थक विषयों पर चर्चा करना मानसिक स्वास्थ्य के लिए संजीवनी है। आंतरिक संतुष्टि के लिए सीखना: कोई नई विद्या या गहरा दार्शनिक ग्रंथ इसलिए पढ़ना कि वह आपकी चेतना को समृद्ध करे, न कि इसलिए कि उससे धन या पद कमाना है। कहावत है कि "लोहा ही लोहे को धार देता है"—जब आप अपने खाली समय को कुशल और समृद्ध बनाते हैं, तो आपके कार्य की गुणवत्ता और एकाग्रता भी कई गुना बढ़ जाती है। 5. अवकाश को बेहतर बनाने के 3 अचूक वैज्ञानिक नियम (The 3 Leisure Protocols) यदि आप अपने विश्राम को वास्तविक ऊर्जा में बदलना चाहते हैं, तो इन तीन नियमों को अपने जीवन में लागू करें: 1. अवकाश को व्यवस्थित और संरचित करें (Structure Your Leisure): जैसे आप जिम जाने या बिजनेस मीटिंग के लिए समय तय करते हैं, वैसे ही अपने खाली समय की योजना बनाएं। प्राचीन परंपराओं में इसे 'पवित्र समय' (Holy Hour) कहा जाता था। तय करें कि इस निर्धारित समय में आप स्क्रीन से दूर रहकर कौन सी आध्यात्मिक, रचनात्मक या बौद्धिक गतिविधि करेंगे। 2. समय को व्यर्थ न गंवाएं (Don’t Waste It): अक्सर लोग ब्रेक मिलते ही पहले 15-20 मिनट सोशल मीडिया देखने या व्यर्थ की बातों में गंवा देते हैं। ऐसा न करें। जो तय किया है—चाहे वह कोई पुस्तक पढ़ना हो या टहलना—अलार्म बजते ही तुरंत उसी क्षण उस गतिविधि में डूब जाएं। 3. अवकाश के स्पष्ट लक्ष्य तय करें (Set Specific Leisure Goals): जैसे करियर में लक्ष्य होते हैं, वैसे ही मन और आत्मा के विकास के लक्ष्य बनाएं। उदाहरण के लिए—इस वर्ष किसी शास्त्रीय ग्रंथ का अध्ययन पूरा करना, ध्यान साधना की अवधि बढ़ाना, या किसी विशेष कला व संगीत की समझ विकसित करना। प्रगति की यही भावना स्थायी प्रसन्नता देती है। डॉ. तांबी का संदेश: हम केवल आर्थिक लाभ कमाने वाले 'होमो इकोनॉमिकस' (Homo Economicus) नहीं हैं; हम संवेदनशील और विवेकशील मनुष्य ('Homo Sapiens') हैं। यदि आपका खाली समय केवल थकावट मिटाने और सांस फूलने पर रुकने तक सीमित है, तो यह मानसिक रुग्णता का संकेत है। अपने अवकाश को एक कुशल एथलीट की तरह गंभीरता, अनुशासन और उद्देश्य के साथ जिएं। जब आपका खाली समय सार्थक होगा, तभी आपका मन शांत, मस्तिष्क स्वस्थ और जीवन आनंदमय होगा।

खुशी का विज्ञान(The Science of Happiness)

"खुशी का विज्ञान" (The Science of Happiness) मैं यह विश्वासपूर्वक कह सकता हूँ कि सच्चा आनंद, मानसिक संतुलन और खुशहाली कोई कोरी कल्पना या केवल भाग्य का खेल नहीं है। यह पूरी तरह से एक प्रामाणिक विज्ञान है, जिसे समझा, सीखा और अपने दैनिक जीवन में उतारा जा सकता है। यह वैज्ञानिक समझ और मेरे दशकों के चिकित्सकीय अनुभव का एक अत्यंत मूल्यवान संगम है, जो हमारे जीवन की दिशा बदल सकता है। एक साझा मिशन: 'प्रसन्नता के संदेशवाहक' बनें दुनिया भर के प्रमुख वैज्ञानिकों और विचारकों का मानना है कि खुशी से जुड़े इन वैज्ञानिक सिद्धांतों को केवल किताबों या शोध-पत्रों तक सीमित नहीं रहना चाहिए। हमें इसे एक जन-आंदोलन का रूप देना होगा। जब आप इन विचारों को सीखते हैं, तो आपकी जिम्मेदारी केवल स्वयं तक सीमित नहीं रहती—आपको अपने परिवार, मित्रों और समाज के लिए एक "हैप्पीनेस टीचर" बनना होगा ताकि हम सब मिलकर एक स्वस्थ समाज की नींव रख सकें। आज की सबसे बड़ी चुनौती: 'डिजिटल मायाजाल' और डोपामाइन की लत अगर हम गहराई से देखें, तो आज हममें से अधिकांश लोग 'द मैट्रिक्स' की काल्पनिक दुनिया की तरह लगातार मोबाइल स्क्रीन स्क्रॉल करते हुए एक आभासी जीवन जी रहे हैं। हमारा ध्यान, समय और मानसिक ऊर्जा केवल डिजिटल अल्गोरिदम के मुनाफे के लिए खींची जा रही है। सोशल मीडिया और स्क्रीन की यह निरंतर लत हमारे मस्तिष्क के डोपामाइन सिस्टम को उसी तरह प्रभावित करती है जैसे कोई गहरा नशा। इसका सीधा परिणाम मानसिक थकान (Brain Rot), भावनात्मक खोखलापन, एकाकीपन और अवसाद के रूप में सामने आ रहा है। वास्तविक जीवन की ओर वापसी और भारत का 'हैप्पीनेस इंडेक्स' इस चक्रव्यूह से बाहर निकलने की शुरुआत एक सचेत निर्णय से होती है—स्क्रीन के कृत्रिम रोमांच से खुद को अनप्लग (Unplug) करने का निर्णय। जब हम आभासी दुनिया से बाहर आते हैं, तभी हम अपनों से जुड़ पाते हैं और वास्तविक जीवन की सार्थकता को महसूस कर पाते हैं। हमारा उद्देश्य केवल दिन काटना नहीं, बल्कि एक सार्थक (Meaningful), सुखी (Happy) और निरंतर प्रगतिशील (Growth-oriented) जीवन जीना है। यदि हम सब मिलकर खुशी के इस विज्ञान को समझें और अपने निकटतम दायरे में फैलाएँ, तो हम निश्चित रूप से भारत के प्रसन्नता सूचकांक (Happiness Index of India) को एक नई ऊँचाई पर ले जा सकते हैं। मेरा आपसे विशेष आग्रह एवं आह्वान: 1. स्वयं के सुधार के लिए जुड़े रहें: अपने व्यक्तित्व के विकास, मानसिक स्वास्थ्य और आत्म-सुधार की नियमित और प्रामाणिक वैज्ञानिक खुराक पाने के लिए इस पेज को लाइक (Like), सब्सक्राइब (Subscribe) और फॉलो (Follow) अवश्य करें। 2. संबंधित ग्रुप्स में साझा करें: इस पोस्ट और जानकारी को अपने महत्वपूर्ण ग्रुप्स—चाहे वे परिवार, मित्र, सहकर्मी या सामाजिक मंच हों—में शेयर (Share) करें, ताकि हम अधिक से अधिक लोगों के जीवन में एक सकारात्मक और मूल्यवान बदलाव ला सकें।

Shakeel Badayuni( Ghazal)

Shakeel Badayuni( Ghazal) ला रहा है मय कोई शीशे में भर के सामने किस कदर पुर कैफ है मंजर नज़र के सामने। मैं तो इस आलम को क्या से क्या बना देता मगर किसी की चलती है हयात ए मुक्तसर के सामने। फिर न देना ता'ना ए नाकामी ए जौक ए नज़र हौसला है कुछ त आ जाओ नज़र के सामने। आह ये रूदाद ए हंगामा ए तरब ऐ गम गुसार जिक्र ए गुलशन जैसे इक बे बात ओ पर के सामने। हो चुका है जब खात्मा सारी उम्मीदों का तो फिर जा रहे ही क्यूँ ' शकील ' उस फ़ितनागर के सामने। पुर कैफ = भरपूर ता' ना ए नाकामी ए जौक ए नज़र = निंदा, असफलता रूदाद ए हंगामा ए तरब = किसी घटना पर हलचल पर प्रसन्नता फितना गर = उपद्रवी। " शकील बदायूंनी "

सहूलियत (कविता)

नहीं होती क्रांति कविता से न ही दूर होता है कदाचार न ही थमती है निरंकुशता सरकार की न ही कमी आती है किंचित्‌ भी विशेषाधिकारियों के विशेषाधिकार में और आम आदमी की आम दिक़्क़त में. कुछ भी नहीं होता जो चाहती है कविता पाठक बस धन्य करता है पढ़कर कविता को और कवि को भी. कविता का पाठक बस पाठक होता है नहीं उतरता वह किसी दिव्य लोक से हो सकता है वह भी विशेषाधिकारों से लैस निरंकुश सरकार का निरंकुश कारिंदा आम आदमी की दिक़्क़तों का जनक शोषण और लफंगई में मुब्तला भी हो सकता है पाठक. लेकिन कुछ भी होने से पहले ‘दुनियादार’ होता है पाठक कवि से ज़्यादा होशियार होता है पाठक और लग जाता है ‘धंधे’ में तुरंत धन्य करने के बाद कवि और कविता को. पता नहीं, जिस आदमी की लड़ाई लड़ती है कविता पढ़ना मयस्सर भी है उसे कविता उसके लिए तो ज़ंग लगा औज़ार है कविता. उसका कर्ज़ अदा नहीं करती कविता उसकी बेटी की शादी नहीं कराती कविता बच्चों की पढ़ाई का ख़र्च भी नहीं उठाती कविता बस क्रांति और आम आदमी की बात करती है कविता. कवि लिखता है फिर भी कविता कर लेता है क्रांति वह कविता में ही फिर रहता है मगन सफलता के नशे में क्रांति कर पाने की नहीं,कविता लिख पाने की. ख़ुश होता है लिखकर हर बार एक कविता और भी ख़ुश होता है पाकर सम्मान,पुरस्कार बढ़ जाती है हैसियत उसकी दुनिया में हो जाती है थोड़ी सहूलियत खड़े होने में‘विशिष्ट’लोगों की कतार में जिसके लिए दरअसल उसने लिखनी शुरू की थी कविता. ……………..

कार्डियक केयर में एक सफलता

कार्डियक केयर में एक सफलता दिल तो पागल है दिल दीवाना है। कार्डियक केयर में एक सफलता इसे चित्रित करें: हृदय उपचार जिसमें चीरों, तारों या अस्पताल में रहने की आवश्यकता नहीं होती है । एमआईटी की एक टीम ने एक पतला, लचीला पैच बनाया है जो पहनने योग्य पेसमेकर के रूप में काम करता है, शरीर के बाहर से दिल की धड़कन को ट्रैक पर रखने के लिए केंद्रित अल्ट्रासाउंड का उपयोग करता है । कोई सर्जरी की आवश्यकता नहीं है । पैच सीधे त्वचा के माध्यम से दालों को वितरित करता है । ध्वनि की शक्ति का दोहन डिवाइस हृदय की मांसपेशी तक पहुंचने के लिए छाती में सावधानीपूर्वक लक्षित अल्ट्रासाउंड तरंगों को भेजता है । रास्ते में कुछ भी नुकसान पहुंचाए बिना लहरें छाती की दीवार से गुजरती हैं । सिस्टम कुछ मुख्य नौकरियों को संभालता है: * धीमी हृदय गति वाले रोगियों के लिए गैर-इनवेसिव पेसिंग । * गहरी ऊतक इमेजिंग के माध्यम से हृदय गतिविधि की वास्तविक समय की निगरानी । * निरंतर संचालन के लिए बाहरी बिजली स्रोतों से कनेक्शन । लचीले डिजाइन के माध्यम से नवाचार पैच उन सामग्रियों से बनाया गया है जो त्वचा की तरह खिंचाव करते हैं । पुराने स्कूल के पेसमेकर नसों के माध्यम से चलने वाले लीड के साथ छाती के अंदर बैठते हैं । यह एक कागज-पतला है और शरीर की आकृति का पालन करने के लिए झुकता है । छोटे ट्रांसड्यूसर की एक पंक्ति ऊतक में ध्वनिक ऊर्जा को आग लगाती है, और पहनने वाला इसे बिना किसी असुविधा के घंटों तक रख सकता है । आपातकालीन चिकित्सा प्रतिक्रिया बदलना पैरामेडिक्स और रिकवरी रूम के कर्मचारी एक मरीज पर पैच को थप्पड़ मार सकते हैं, जिसकी हृदय गति बस गिर गई है और एक नस के माध्यम से अस्थायी पेसिंग तारों को फैलाने के बिना चीजें स्थिर हो जाती हैं । दिल की सर्जरी के बाद, या जब कोई स्थायी प्रत्यारोपण की प्रतीक्षा करता है, तो पैच पुलों को संक्रमण के जोखिम और ऊतक क्षति पर अंतराल और कटौती करता है । गैर-आक्रामक उपचार का भविष्य लाइन के नीचे, इस तरह एक पहनने योग्य बदल सकता है कि दुनिया भर में पुरानी हृदय स्थितियों का प्रबंधन कैसे किया जाता है । सर्जरी के लिए भी कमजोर मरीजों को अभी भी कार्डियक सपोर्ट मिलेगा। ध्वनिक ऊर्जा की ओर उपचार को धक्का देने से गंभीर चिकित्सा हार्डवेयर आपके पास एक शीट को छीलने और अपनी छाती पर छड़ी करने के करीब आता है ।

जीवन और मानसिक स्वास्थ्य [अवकाश Leisure]

जीवन और मानसिक स्वास्थ्य की दृष्टि से: अवकाश (Leisure) केवल विश्राम नहीं, एक वैज्ञानिक कला है आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में हम सभी ‘हसल कल्चर’ (अति-व्यस्तता) और कभी न खत्म होने वाली महत्वाकांक्षाओं के शिकार हैं। एक मनोचिकित्सक के रूप में अपने क्लीनिकल अनुभव में मैं अक्सर ऐसे लोगों को देखता हूँ जो दिन-रात काम करते हैं, मानसिक रूप से पूरी तरह थक जाते हैं, और फिर सोचते हैं कि कुछ दिन कहीं शांत बैठकर "कुछ न करना" (Doing Nothing) ही उनका इलाज है। लेकिन हकीकत यह है कि खाली बैठना या बिना सोचे-समझे वक्त काटना हमारे तनाव को कम करने के बजाय हमें और अधिक अशांत और अकेला बना देता है। आइए, इस पूरे दर्शन और विज्ञान को एक नए नजरिए से समझें। 1. क्या काम ही हमारी संस्कृति का आधार है? प्रसिद्ध जर्मन दार्शनिक जोसेफ पीपर (Josef Pieper) ने अपनी कालजयी रचना में कहा था कि "अवकाश ही संस्कृति का आधार है" (Leisure is the Basis of Culture)। परंतु आधुनिक समाज ने इसे उलट दिया है; आज 'काम' (Work) को ही संस्कृति और पहचान का आधार मान लिया गया है। हम दिन-रात काम करते हैं, और बीच में थोड़ा सा समय केवल इसलिए निकालते हैं ताकि दोबारा काम करने के लिए सांस ले सकें। जब हम काम नहीं कर रहे होते और जिसके लिए हमें कोई भुगतान नहीं मिल रहा होता, वास्तव में वही समय तय करता है कि हम भीतर से कौन हैं। इसलिए अवकाश को काम का अभाव (absence of work) समझना सबसे बड़ी भूल है; अवकाश अपने आप में एक स्वतंत्र और निपुण कौशल (skill) है। 2. खुशी के तीन घटक: सुख (Pleasure) बनाम सच्चा आनंद (Enjoyment) खुशी (Happiness) के तीन बुनियादी पोषक तत्व (Macronutrients) होते हैं: आनंद (Enjoyment) संतुष्टि (Satisfaction) सार्थकता/अर्थ (Meaning) अधिकांश लोग 'सुख' (Pleasure) और 'आनंद' (Enjoyment) के बीच के बुनियादी अंतर को नहीं समझ पाते: क्षणिक सुख (Pleasure): यह हमारे मस्तिष्क के आदिम लिम्बिक सिस्टम (Limbic System) की रासायनिक प्रतिक्रिया है। भोजन, सोशल मीडिया का डोपामाइन रश या नशा—ये केवल शारीरिक और पशुवत प्रवृत्तियां हैं। केवल सुख के पीछे भागने से जीवन में संतुष्टि नहीं, बल्कि लत और अवसाद आते हैं। सच्चा आनंद (Enjoyment): जब हम सुख को अपने चेतन मस्तिष्क यानी प्रीफ्रंटल कॉर्टेक्स (Prefrontal Cortex) में ले जाते हैं, तब वह सच्चा आनंद बनता है। इसके लिए दो चीजें अनिवार्य हैं: सचेतन स्मृति (Consciousness/Memory) और सामाजिक जुड़ाव (People/Social Connection)। जब कोई गतिविधि सचेत रूप से अपनों के साथ साझा की जाती है, तभी वह आत्मा को तृप्त करती है। 3. 'असीडिया' (Acedia) का जाल: मानसिक और आध्यात्मिक आलस्य दार्शनिक परंपरा में सात महापापों में एक शब्द आता है—'स्लॉथ' (Sloth), जिसे ग्रीक में असीडिया (Acedia) कहा गया है। यह केवल बिस्तर पर लेटे रहना नहीं है, बल्कि यह मानसिक और आध्यात्मिक सुस्ती है। आज के समय में फोन पर अंतहीन रील्स स्क्रॉल करना (Mindless Scrolling), टीवी पर शोज़ बिंज-वॉच करना या शराब के नशे में दिमाग को सुन्न करना—ये सभी असीडिया के लक्षण हैं। यह विश्राम नहीं है, बल्कि अपनी आत्मा और मस्तिष्क को कोमा में डालने जैसा है। न्यूरोसाइंस के अनुसार, यह आदत स्ट्रेस हार्मोन्स को बढ़ाती है और इंसान को भीतर से खाली कर देती है। 4. सच्चे अवकाश की वैज्ञानिक परिभाषा (True Leisure) सच्चा अवकाश निष्क्रिय (Passive) नहीं, बल्कि सक्रिय, चिंतनशील और सृजनात्मक (Contemplative & Generative) होता है: दाएँ गोलार्ध (Right Hemisphere) को जाग्रत करना: आधुनिक कार्यशैली हमारे मस्तिष्क के विश्लेषणात्मक और तार्किक बाएँ हिस्से को थका देती है। अवसाद और एंग्जायटी से मुक्ति के लिए दाएँ हिस्से को सक्रिय करना जरूरी है, जो रहस्य, अर्थ, सौंदर्य और भावनाओं का केंद्र है। प्रकृति के सान्निध्य में समय बिताना: गैजेट्स से दूर रहकर खुली हवा में टहलना, सूर्योदय देखना और प्रकृति के सौंदर्य को महसूस करना हमारे कॉग्निटिव फंक्शन और मूड को तुरंत स्थिर करता है। कला और संगीत का सृजन व आस्वादन: संगीत और कला केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि शक्तिशाली न्यूरोलॉजिकल उपचार हैं। यह अल्जाइमर और पार्किंसंस जैसी बीमारियों तक में मस्तिष्क की कार्यप्रणाली को सक्रिय करने में सक्षम हैं। गहन और सार्थक मानवीय रिश्ते: सतही गपशप के बजाय गहरे संवाद स्थापित करें। अपनों से दिल की बात साझा करना और सार्थक विषयों पर चर्चा करना मानसिक स्वास्थ्य के लिए संजीवनी है। आंतरिक संतुष्टि के लिए सीखना: कोई नई विद्या या गहरा दार्शनिक ग्रंथ इसलिए पढ़ना कि वह आपकी चेतना को समृद्ध करे, न कि इसलिए कि उससे धन या पद कमाना है। कहावत है कि "लोहा ही लोहे को धार देता है"—जब आप अपने खाली समय को कुशल और समृद्ध बनाते हैं, तो आपके कार्य की गुणवत्ता और एकाग्रता भी कई गुना बढ़ जाती है। 5. अवकाश को बेहतर बनाने के 3 अचूक वैज्ञानिक नियम (The 3 Leisure Protocols) यदि आप अपने विश्राम को वास्तविक ऊर्जा में बदलना चाहते हैं, तो इन तीन नियमों को अपने जीवन में लागू करें: 1. अवकाश को व्यवस्थित और संरचित करें (Structure Your Leisure): जैसे आप जिम जाने या बिजनेस मीटिंग के लिए समय तय करते हैं, वैसे ही अपने खाली समय की योजना बनाएं। प्राचीन परंपराओं में इसे 'पवित्र समय' (Holy Hour) कहा जाता था। तय करें कि इस निर्धारित समय में आप स्क्रीन से दूर रहकर कौन सी आध्यात्मिक, रचनात्मक या बौद्धिक गतिविधि करेंगे। 2. समय को व्यर्थ न गंवाएं (Don’t Waste It): अक्सर लोग ब्रेक मिलते ही पहले 15-20 मिनट सोशल मीडिया देखने या व्यर्थ की बातों में गंवा देते हैं। ऐसा न करें। जो तय किया है—चाहे वह कोई पुस्तक पढ़ना हो या टहलना—अलार्म बजते ही तुरंत उसी क्षण उस गतिविधि में डूब जाएं। 3. अवकाश के स्पष्ट लक्ष्य तय करें (Set Specific Leisure Goals): जैसे करियर में लक्ष्य होते हैं, वैसे ही मन और आत्मा के विकास के लक्ष्य बनाएं। उदाहरण के लिए—इस वर्ष किसी शास्त्रीय ग्रंथ का अध्ययन पूरा करना, ध्यान साधना की अवधि बढ़ाना, या किसी विशेष कला व संगीत की समझ विकसित करना। प्रगति की यही भावना स्थायी प्रसन्नता देती है। डॉ. तांबी का संदेश: हम केवल आर्थिक लाभ कमाने वाले 'होमो इकोनॉमिकस' (Homo Economicus) नहीं हैं; हम संवेदनशील और विवेकशील मनुष्य ('Homo Sapiens') हैं। यदि आपका खाली समय केवल थकावट मिटाने और सांस फूलने पर रुकने तक सीमित है, तो यह मानसिक रुग्णता का संकेत है। अपने अवकाश को एक कुशल एथलीट की तरह गंभीरता, अनुशासन और उद्देश्य के साथ जिएं। जब आपका खाली समय सार्थक होगा, तभी आपका मन शांत, मस्तिष्क स्वस्थ और जीवन आनंदमय होगा।

Mera क़स्बा जो छूट गया

क़स्बा जो छूट गया बहुत मोहक, बहुत काम्य था वह क़स्बा डेढ़ कोस दूर गाँव से पहला पड़ाव हर यात्रा का वहीं से मिलती थी बस ज़िले के सदर मुक़ाम की जहाँ था जंक्शन जाती थीं गाड़ियाँ वहीं से भरकर लोगों को दूर-दूर जाने किस दुनिया में. दिखने से पहले ही क़स्बे के सुनाई पड़ती थी पुक-पुक चक्की की और शुरू हो जाती थी थरथराहट नन्हें-से दिल के किसी कोने में. फिर दिखते थे बड़े-बड़े अक्षर सुघ‌ड़, सुडौल, रंगीन झोंपड़ों के पिछवाड़े रंगीन पुती, साफ़-सुथरी कच्ची दीवार पर डोंगरे का बालामृत, वैद्यनाथ का बालासर डाबर की कोई घुट्टी भी जुड़ गई थी बाद में मोटे-ताज़े ख़ुशहाल बच्चे के साथ. रंगों का दिखना ही था क़स्बे का पूर्वराग खींचता था एक लहर की तरह मन के आर-पार. फिर दिखती थी नई-नवेली सड़क तारकोल की चिकनी, दूर तक बहती छरहरी नदी-सी गुज़र जाती थी उस पर कभी कोई बस दुकानों के बीच से झलक दिखाकर पीछे छोड़कर भोंपू की काँपती आवाज़ और पेट्रोल की वह अनचीन्हीं रोमांचक गंध हवा में घुलती-तैरती आती थी नासाग्र तक उछल पड़ता था दिल ज़ोर से उस अनजानी दुनिया के लिए जो सर्राटे से निकलती बस की मंज़िल होगी. फिर दिखता दुकानों के ठीक पिछवाड़े, दूर तक फैले खेतों के बीच रावण का खड़ा और कुम्भकर्ण का लेटा पुतला टूटा-फूटा, प्लास्टर झड़ा सजेगा साल के सिर्फ़ एक दिन दशमी के मेले के लिए आयेगी ज़रूर उसमें कंपनी नौटंकी की बनारस वाली नाचेंगी, ‘खेला’ भी करेंगी, असली औरतें गाँव की तरह औरत-बने मर्द नहीं. और मौत के कुँएँ की दीवार पर नीचे से ऊपर, ऊपर से नीचे बेधड़क चलाती फटफटिया वह क़द्दावर लड़की भी और गोल-गोल घूमते खटोलों वाले झूले ऊँचाई से उतरते भीतर का कुछ रह जाता था ऊपर डर की लहर के साथ फिर आता था तहसील का अहाता बीच में कुआँ, बरगद का पेड़ और गोल-मटोल मोटी दीवारवाली छोटी सख़्त इमारत ख़जाने की भारी-भरकम ताला-लगे दरवाज़े के सामने सीधा खड़ा संतरी सावधान बंदूक में खुँसी संगीन के साथ हमेशा अटेंशन में गोल इमारत के मुस्तक़िल हिस्से-जैसा. बाद में बताया गया ख़ज़ाने की वसूली के लिए ही तहसील थी और था सारा ताम-झाम. कि सन्‌ बयालीस में इसी को लूटने आए थे आस-पास के गाँवों से ‘क्रांतिकारी’ नाम लेकर बताते थे कौन-कौन गया था डेढ़ कोस दूर हमारे गाँव से लेकिन चूक हो गई नहीं तोड़ा पुल पहले ही नाले का फिर मुख़बिर की ख़बर पर आ गई 'गारद' सदर मुक़ाम से और बच गया ख़ज़ाना और रह गया क़स्बा इतिहास में दर्ज होते-होते. फिर आता था बाज़ार सड़क से निकलती एक गली में जो आगे बनाती थी गलियों का संजाल क़िस्म-क़िस्म की दुकानों के लिए क़िस्म-क़िस्म की गलियाँ बड़ों को हमेशा होता था वहाँ कोई काम और नहीं तो ख़रीदारी सुरती-सुपारी की. मन न लगा कभी उसका बाज़ार में हमेशा वह चाहता आगे निकलकर बैठे पुल पर देखे बस को बिल्कुल पास से गुज़रते झन्नाटे से, हिलाते पुल को. पुल था उस चौड़े नाले पर जिसका एक दुबला-पतला सहायक जाता था उसके गाँव तक टेढ़ा-मेढ़ा, लम्बी दूरी तयकर. कितनी बार मन हुआ, चलें नाले के साथ अपने गाँव तक खेतों से, मेड़ों से, कुश-काश, ढाक-बबूल के जंगलों से सरपत और बेहया की झाड़ियों से पर कभी न हो सका इतना-सा साहस. आख़िर छूट गया गाँव, छूट गया क़स्बा. कहाँ खो गया वह बचपन का गाँव, बचपन का क़स्बा अब नहीं गुज़रता वह क़स्बे से गाँव जाते या गाँव से लौटते हुए मुँह छिपाकर निकल लेता है बायपास से शर्म लगती है बचपन के उस दोस्त से पहले-पहले प्यार से दुनिया खोलनेवाले द्वार से. कहाँ मालूम था दुनिया इतनी बड़ी, इतनी बेरहम है रँग देती है अपने ही रंग में छील-छीलकर सिखा देती है मीठे-मुलायम शब्दोंवाली कथनी और छल-कपट आडम्बरोंवाली करनी दो पाटों की दुधारी दुनियादारी. ...............

ग़ज़ल कहना सीखें-

आइए ग़ज़ल कहना सीखें- ------------------------------------- वज़्न/बह्र/रुक्न क्या है-२ पिछले पोस्ट में हमने जाना कि शब्दों का वज़्न या भार क्या होता है और किस तरह लघु/ हर्स्व/ लाम(उर्दू) को छोटा ध्वनि-भार गिनते हुए १ की संख्या से एवं गुरु/ दीर्घ/ ग़ाफ़ (उर्दू) को बड़ा ध्वनि-भार गिनते हुए २ की संख्या से इंगित करते हैं. सीखने के इच्छुक व्यक्तियों को पढ़ने के साथ साथ मश्क़ (अभ्यास) की सलाह दी जाती है. जिस तरह अंग्रेज़ी भाषा में शब्दों के syllables होते हैं, जो उनके उच्चारण और accent को निर्धारित करते हैं, उसी तरह हिन्दी/ उर्दू में भी शब्दों को syllables एवं accent के आधार पर तोड़कर उनके वज़्न या भार को आसानी से पता किया जा सकता है. उदहारण के तौर पे अंग्रेज़ी का एक शब्द psychology/ साइकोलॉजी लेते हैं. इसे अंग्रेज़ी में सपाट तौर पे साइकोलॉजी न बोलकर साइक’लजी बोलते हैं. यदि सपाट साइकोलॉजी पे भार गिनें तो भार होगा २१२२२ (सा-२, इ-१, को-२, लॉ-२, जी-२), मगर यदि syllables एवं accent को ध्यान में रखकर बोले जाने वाले शब्द साइ’क’लजी पे भार गिनें तो भार होगा २१११२/ या २११११ (यदि जी पर भी ध्वनि छोटी रखी जाए तो). ये उदहारण इस बात को समझने के लिए पर्याप्त है कि हमें हिंदी/उर्दू के शब्दों के भार को पता करने के लिए शब्दों की मात्रा के साथ साथ शब्दों के syllables एवं accent को भी ध्यान में रखना होगा, अर्थात ये देखना होगा कि किसी शब्द में कितनी अलग-अलग ध्वनियाँ हैं. जैसे एक शब्द है इम्तिहान, इसे खंडित करके यदि पढेंगे तो शब्द इस प्रकार होगा इम+ति+हा+न और इस प्रकार इसका भार होगा इम२+ति१+हा२+न१, यानी २१२१. अगर इसी शब्द को उर्दू क़ायदे के हिसाब से इम्तिहाँ बोलें तो भार होगा २१२ (इम+ति+हाँ). एक अन्य उदाहरण लेते हैं, कलम. इसे क+लम बोलते हैं, कल+म नहीं. यदि क+लम बोला जाए, जो कि सही है, तो भार होगा १२ (क१+लम२), और यदि कल+म बोला जाए, जो कि ग़लत है, तो भार होगा २१ (कल२+म१). तो आइए भार के हम कुछ और उदाहरण देखते हैं. दिवाली १२२ दीवाली २२२ ख़ामोश २२१ ख़मोश १२१ पटना २२ लंका २२ स्त्री २२ पूर्ण २१ पूर्णा २२ अर्ध २१ कल्पना २१२ दोस्ती २१२ मुलाक़ात १२२१ बरसात २२१ मुहब्बत १२२ मकान १२१ मकाँ १२ दूकान २२१ अत्याचारी २२२२ वैरागी २२२ दुश्मन २२ पूर्व २१ पूर्वा २२ पुरवाई २२२/२२१ गुलाम १२१ राजा २२ राज़ २१ रज़ा १२ सल्तनत २१२ इत्तिफ़ाक़ २१२१ ग़मनाक २२१ उज्जवल २१२ विध्वंस २२१ वंश २१ अंश २१ तृप्ति २१ इत्यदि

Hustle Culture (Savoring)

Hustle Culture (Savoring) जीवन को सच में कैसे जिएं: आनंद, अर्थ और 'सavoring' (रस लेने) का मनोविज्ञान डॉ. अनिल तांबी आज के भागदौड़ और 'हसल-कल्चर' (Hustle Culture) के दौर में हम सभी सफल होने की रेस में भाग रहे हैं। हमने करियर बना लिया, जिम्मेदारियां पूरी कर लीं, लेकिन इसके बावजूद भीतर एक खालीपन महसूस होता है। कई बार ऐसा लगता है जैसे हम केवल दिन काट रहे हैं, जीवन को गहराई से महसूस नहीं कर पा रहे। समस्या यह नहीं है कि आपके जीवन में खुशियों या उपलब्धियों की कमी है; असली समस्या यह है कि हम 'सavoring' (जीवन के अनुभवों का स्वाद या रस लेना) भूल चुके हैं। विज्ञान और न्यूरोसाइंस (Neuroscience) के अनुसार, जब तक आप अपने वर्तमान, अतीत और भविष्य के अनुभवों को गहराई से महसूस नहीं करते, तब तक सच्चा मानसिक संतोष और आनंद पाना असंभव है। 1. 'सavoring' (रस लेना) क्या है और यह क्यों जरूरी है? 'Savoring' का सीधा सा अर्थ है—किसी भी अनुभव (चाहे वह अच्छा हो, सामान्य हो या कठिन) में पूरी तरह उपस्थित होना, ठहरना और उसे गहराई से महसूस करना। न्यूरोलॉजिकल प्रभाव: जब आप किसी पल का रस लेते हैं—जैसे चाय की चुस्की लेना, अपनों के चेहरे को ध्यान से देखना या ठंडी हवा को महसूस करना—तो यह आपके मस्तिष्क के रिवॉर्ड सेंटर (Ventral Striatum) को सक्रिय करता है। इससे डोपामाइन और खुशी के केमिकल्स रिलीज होते हैं। अवसाद (Depression) से बचाव: अध्ययनों से पता चलता है कि जो लोग रोजमर्रा की छोटी-छोटी घटनाओं में पूरी तरह मौजूद रहते हैं, उनमें अवसाद और तनाव का स्तर काफी कम होता है। सकारात्मक स्मृतियाँ: जितना गहराई से आप वर्तमान का आनंद लेंगे, आपका मस्तिष्क (Hippocampus) उतनी ही मजबूत और सुखद यादें तैयार करेगा, जो भविष्य में आपको मानसिक शक्ति देंगी। 2. हम स्वाभाविक रूप से खुशियों का आनंद क्यों नहीं ले पाते? हमारा दिमाग लगभग 2,500,000 साल पुराने सर्वाइवल मैकेनिज्म (Survival Mechanism) पर काम करता है। हमारे पूर्वजों को जिंदा रहने के लिए हमेशा खतरों और नकारात्मक चीजों पर ध्यान देना पड़ता था। इसे मनोविज्ञान में Negativity Bias कहा जाता है। हमारा दिमाग हमेशा भविष्य की चिंता या आने वाली समस्याओं को खोजने में लगा रहता है। प्रकृति का उद्देश्य हमें केवल जीवित रखना था, खुश रखना नहीं। लेकिन मानव मस्तिष्क की सबसे बड़ी ताकत यह है कि हम अपनी चेतना (Prefrontal Cortex) का उपयोग करके इस नकारात्मक प्रवृत्ति को बदल सकते हैं और जागरूक होकर खुशियों का चयन कर सकते हैं। 3. जीवन का पूर्ण आनंद लेने के व्यावहारिक तरीके अपने जीवन की गुणवत्ता और मानसिक स्वास्थ्य को बेहतर बनाने के लिए आप इन वैज्ञानिक और व्यावहारिक तरीकों को अपना सकते हैं: A. तीनों काल खंडों (Time Zones) में जीवन को महसूस करें 1. अतीत का आनंद (Past): बीते दिनों की केवल बुरी यादों को न पकड़ें। अतीत की उन छोटी-छोटी खूबसूरत घटनाओं को याद करें जिन्होंने आपको खुशी दी थी। अपनी यादों को सकारात्मक दृष्टिकोण से एडिट करना सीखें। 2. वर्तमान में ठहराव (Present): आप जो भी कर रहे हैं, उसमें 100% मौजूद रहें। अगर आप बर्तन भी धो रहे हैं या टहल रहे हैं, तो केवल उसी क्रिया पर ध्यान केंद्रित करें। 3. भविष्य की उम्मीद (Future): आने वाले दिनों में किसी अच्छी घटना या छोटे-छोटे अवसरों की उत्सुकता से प्रतीक्षा करें। B. 'सavoring' के चार मुख्य कौशल शारीरिक अभिव्यक्ति (Behavioral Display): मुस्कुराने का प्रयास करें। यहाँ तक कि एक बनावटी मुस्कान भी आपके दिमाग को संदेश देती है कि आप सुरक्षित और खुश हैं। मन को ठहराना (Be Present): खुद से कहें, "इस वक्त मैं यह काम कर रहा हूँ और मैं इसका आनंद ले रहा हूँ।" खुशियों को साझा करना (Capitalizing): जब आपके साथ कुछ अच्छा हो, तो अपनों के साथ उसकी चर्चा करें और साथ मिलकर जश्न मनाएं। पॉजिटिव टाइम ट्रेवल: दिन के अंत में या शुरुआत में कुछ मिनट निकाल कर सुखद क्षणों को दोबारा अपने मन में दोहराएं। C. असफलताओं और कठिन समय का रस कैसे लें? जीवन में केवल सुख ही नहीं, असफलताएं और दुख भी आते हैं। कठिन समय को संभालने के लिए 'Failure Journal' की तकनीक अपनाएं: 1. जब भी कोई विफलता या दुखद घटना हो, उसे कागज पर लिखें और नीचे दो खाली लाइनें छोड़ दें। 2. एक महीने बाद: पहली खाली लाइन में लिखें कि उस बुरी घटना से आपने क्या सीखा। 3. दो महीने बाद: दूसरी खाली लाइन में लिखें कि उस घटना के कारण आपके जीवन में क्या नया और अच्छा बदलाव आया। यह अभ्यास कठिन से कठिन परिस्थितियों को भी अर्थ और मानसिक परिपक्वता प्रदान करता है। 4. जीवन के दो सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यदि आप जीवन में दिशाहीन महसूस कर रहे हैं, तो खुद से ये दो सवाल पूछें: 1. मैं जीवित क्यों हूँ? (मेरे जीवन का उद्देश्य क्या है?) 2. मैं किस चीज़ के लिए अपना जीवन समर्पित कर सकता हूँ? जब आप अपने उत्तर खोज लेते हैं, तो आपका जीवन केवल एक दिनचर्या नहीं रहता, बल्कि एक अर्थपूर्ण यात्रा बन जाता है। अपने वर्तमान पलों को जीना शुरू करें, हर पल का रस लें, और अपने मानसिक स्वास्थ्य को प्राथमिकता दें।

5 तरीके नये नये एक ।कलर डाप्लर अल्ट्रासोनोग्राफी टेस्ट (Ultrasound Test)

5 तरीके नये नये एक ।कलर डाप्लर अल्ट्रासोनोग्राफी टेस्ट(Ultrasound Test) -आजकल जितने भी रेडियोलॉजिकल टेस्ट हैं उनमे अल्ट्रासाउंड टेस्ट सबसे कॉमन टेस्ट में से एक है अल्ट्रासाउंड examination एक बहुत ही common test है और शायद ही कोई ऐसा व्यक्ति होगा जिसने इस टेस्ट का नाम ना सुना हो जब भी पेट में दर्द हो, लिवर या गॉलब्लेडर की परेशानी हो, या घर में नए मेहमान के आने की confirmation करनी हो तो डॉक्टर की सलाह होती है कि-“ए 5 तरीके नये नये एक ।कलर डाप्लर अल्ट्रासोनोग्राफी टेस्ट(Ultrasound Test) -आजकल जितने भी रेडियोलॉजिकल टेस्ट हैं उनमे अल्ट्रासाउंड टेस्ट सबसे कॉमन टेस्ट में से एक है अल्ट्रासाउंड examination एक बहुत ही common test है और शायद ही कोई ऐसा व्यक्ति होगा जिसने इस टेस्ट का नाम ना सुना हो जब भी पेट में दर्द हो, लिवर या गॉलब्लेडर की परेशानी हो, या घर में नए मेहमान के आने की confirmation करनी हो तो डॉक्टर की सलाह होती है कि-“एक अल्ट्रासाउंड करवा लीजिए।" आखिर यह Ultrasound क्या चीज़ है? क्या इसमें कोई सुई लगती है या कोई खतरनाक किरणें निकलती हैं? आइए इसे बिल्कुल सीधी भाषा में समझते हैं। मान लीजिए आप एक गहरे कुएं के पास खड़े हैं और नीचे चिल्लाते हैं—आपकी आवाज टकराकर वापस आती है, जिसे हम echo यानी गूंज कहते हैं। अल्ट्रासाउंड मशीन ठीक इसी सिद्धांत पर काम करती है। इसमें कोई हानिकारक X-ray रेडिएशन नहीं होता। इसमें एक छोटी सी डिवाइस होती है जिसे Probe कहते हैं। डॉक्टर त्वचा पर एक ठंडा सा Gel लगाते हैं और इस probe को ऊपर घुमाते हैं। यह मशीन इंसान के कान से न सुनी जा सकने वाली High-frequency Sound Waves (ध्वनि तरंगें) शरीर के अंदर भेजती है। ये तरंगें अंदरूनी अंगों से टकराकर जब वापस आती हैं, तो कंप्यूटर स्क्रीन पर आपके अंगों की एक साफ-सुथरी तस्वीर (Live Image) बना देती हैं। डॉक्टर इसे कब कराने की सलाह देते हैं? शरीर के अंदर किसी भी तरह की हलचल या दिक्कत को पकड़ने के लिए यह सबसे भरोसेमंद और शुरुआती साधन है: * Pregnancy (गर्भावस्था): पेट में पल रहे बच्चे की धड़कन देखने, उसकी ग्रोथ जांचने और सही पोजीशन का पता लगाने के लिए। आजकल तो ये टेस्ट इतना एडवांस हो गया है कि जब बच्चा माँ के पेट में रहता है यानी गर्भ में रहता है और अगर उस बच्चे के पेट के अंदर अगर कोई प्रॉब्लम है तो ये उसको भी दिखा देता है * Abdominal (पेट की समस्याएं): गॉलब्लेडर में पथरी (Gallstones), किडनी स्टोन (Kidney stones), या लिवर में फैट (Fatty liver) Appendicitis, पेशाब की थैली, Spleen देखने के लिए * Musculoskeletal System (जोड़ों और मांसपेशियों की जांच): मांसपेशियों का फटना, लिगामेंट में सूजन, या जोड़ों के आसपास पानी भर जाने पर। * Blood Vessels (नसें): अगर पैरों की नसों में थक्का हो जाना।

Personality Disorder

व्यक्तित्व (Personality) और पर्सनैलिटी डिसऑर्डर (Personality Disorder) को आसान भाषा में समझें डॉ. अनिल तांबी (वरिष्ठ मनोचिकित्सक) हमारे दैनिक जीवन में हम अक्सर सुनते हैं— "अरे, उस व्यक्ति की पर्सनैलिटी कितनी अच्छी है!" या "वह बहुत चिड़चिड़े स्वभाव का है।" लेकिन एक मनोचिकित्सक के रूप में, जब मैं 'पर्सनैलिटी' की बात करता हूँ, तो इसका मतलब केवल बाहरी दिखावा या बातचीत का तरीका नहीं होता। आज हम बहुत ही सरल भाषा और व्यावहारिक उदाहरणों के माध्यम से समझेंगे कि 'व्यक्तित्व' (Personality) क्या है, 'पर्सनैलिटी डिसऑर्डर' (Personality Disorder) क्या होता है, और हम खुद को व अपने आसपास के लोगों को कैसे बेहतर समझ सकते हैं। 1. व्यक्तित्व (Personality) क्या है? व्यक्तित्व हमारी "मनोवैज्ञानिक त्वचा" (Psychological Skin) की तरह है। जिस तरह हमारी शारीरिक त्वचा हमारे आंतरिक अंगों की रक्षा करती है और हमें बाहरी दुनिया से जोड़ती है, ठीक उसी तरह हमारी पर्सनैलिटी हमारे विचारों, भावनाओं और व्यवहार का वह संयोजन है जो हमें दूसरों से अलग बनाता है। सरल शब्दों में, पर्सनैलिटी में तीन मुख्य बातें शामिल होती हैं: 1. हम कैसे सोचते हैं (हमारे विचार और खुद व दूसरों के प्रति धारणाएं) 2. हम कैसे महसूस करते हैं (हमारी भावनाएं और मूड) 3. हम कैसा व्यवहार करते हैं (तनाव और परिस्थितियों में हमारी प्रतिक्रिया) उदाहरण: जब दो लोग सड़क पर अचानक लगने वाले लंबे ट्रैफिक जाम में फंसते हैं: व्यक्ति A (लचीला व्यक्तित्व): सोचता है— "अब फंस ही गए हैं तो थोड़ा संगीत सुन लेते हैं या किसी मित्र से बात कर लेते हैं।"व्यक्ति B (अत्यधिक तनावग्रस्त व्यक्तित्व): स्टीयरिंग व्हील पर हाथ मारता है, दूसरों पर चिल्लाता है और पूरे दिन का मूड खराब कर लेता है। 2. पर्सनैलिटी डिसऑर्डर (Personality Disorder) क्या है? हर व्यक्ति में कुछ कमियां या अनोखे स्वभाव होते हैं। लेकिन जब किसी व्यक्ति के सोचने, महसूस करने और व्यवहार करने का तरीका अत्यधिक कठोर (Rigid), अस्वास्थ्यकर और असामान्य हो जाए, तो इसे पर्सनैलिटी डिसऑर्डर कहा जाता है। जब व्यक्ति का स्वभाव ऐसा हो जाए कि: वह बदलती परिस्थितियों के अनुसार खुद को ढाल न पाए (Inflexible)। उसके रिश्तों में लगातार कड़वाहट और उथल-पुथल बनी रहे। वह अपने काम, पढ़ाई या सामाजिक जीवन में सामान्य रूप से कार्य न कर पाए। उसे खुद यह अहसास न हो कि समस्या उसके अपने व्यवहार में है, बल्कि वह हमेशा दूसरों को दोष दे। 3. आम जीवन के उदाहरणों से समझें पर्सनैलिटी डिसऑर्डर के प्रकार आम भाषा में समझने के लिए इन्हें तीन मुख्य श्रेणियों (Clusters) में देखा जा सकता है: क) अत्यधिक शक्की या अलग-थलग रहने वाला स्वभाव (Odd/Eccentric Pattern) पैरानॉयड पर्सनैलिटी (Paranoid): ऐसे व्यक्ति को बिना किसी ठोस वजह के हमेशा लगता है कि लोग उसके खिलाफ साजिश रच रहे हैं या उसे नुकसान पहुंचाना चाहते हैं। उदाहरण: एक सहकर्मी जो यह सोचकर परेशान रहता है कि चाय के ब्रेक में सहकर्मी उसी का मज़ाक उड़ा रहे थे, भले ही वे सामान्य बात कर रहे हों। ख) अत्यधिक भावनात्मक, ड्रामेटिक या आवेगपूर्ण स्वभाव (Dramatic/Emotional Pattern) बॉर्डरलाइन पर्सनैलिटी (Borderline Personality Disorder - BPD): इसमें व्यक्ति के मूड, आत्म-सम्मान और रिश्तों में तीव्र उथल-पुथल होती है। इन्हें अकेलेपन से बहुत डर लगता है। रिश्तों में ये या तो किसी को भगवान मान लेते हैं या तुरंत उसे अपना सबसे बड़ा दुश्मन। उदाहरण: छोटी-सी बात या देर से जवाब मिलने पर यह महसूस करना कि सामने वाला उन्हें छोड़ रहा है, अत्यधिक गुस्सा करना या खुद को नुकसान पहुँचाने की धमकी देना। नार्सिसिस्टिक पर्सनैलिटी (Narcissistic): इसमें व्यक्ति स्वयं को दूसरों से बहुत श्रेष्ठ समझता है, लगातार प्रशंसा की मांग करता है और दूसरों की भावनाओं के प्रति सहानुभूति (Empathy) की कमी रखता है। ग) अत्यधिक डर, चिंता या पूर्णता (Perfectionism) का स्वभाव (Anxious/Fearful Pattern) ऑब्सेसिव-कंपल्सिव पर्सनैलिटी डिसऑर्डर (OCPD): ऐसे लोग नियमों, व्यवस्था और पूर्णता (Perfection) को लेकर इतने कठोर होते हैं कि वे काम पूरा ही नहीं कर पाते और दूसरों को नियंत्रित करने की कोशिश करते हैं। (ध्यान दें: यह OCD बीमारी से अलग स्वभावगत कठोरता है)। डिपेंडेंट पर्सनैलिटी (Dependent): ऐसे व्यक्ति छोटे-छोटे फैसलों के लिए भी दूसरों पर निर्भर रहते हैं और अकेले रहने के डर से अनुचित बातें भी मान लेते हैं। 4. खुद को और दूसरों को समझने के लिए व्यावहारिक सुझाव 1. स्व-जागरूकता (Self-Awareness) विकसित करें: जब भी किसी स्थिति में तनाव बढ़े, तो रुककर सोचें: "क्या मेरी प्रतिक्रिया स्थिति के हिसाब से सही है, या यह मेरा पुराना व्यवहारिक ढर्रा है?" अपनी भावनाओं को पहचानना और उन पर विचार करना (Mentalizing) मानसिक स्थिरता की पहली सीढ़ी है। 2. दूसरों के प्रति दृष्टिकोण बदलें: यदि कोई व्यक्ति बार-बार अपने रिश्तों में उलझ रहा है या अत्यधिक प्रतिक्रिया दे रहा है, तो केवल यह कहकर उसे खारिज न करें कि वह "बुरा" या "ड्रामा करने वाला" है। कई बार यह उनके व्यक्तित्व की किसी गहरी असंतुलित ग्रंथि (Personality vulnerability) का परिणाम होता है। 3. काम और प्रेम (Love & Work) में संतुलन: एक स्वस्थ व्यक्तित्व वह है जो सार्थक संबंध (Love) बना सके और अपने जीवन में उत्पादक कार्य (Work) कर सके। यदि आपका स्वभाव इन दोनों चीजों में बाधा डाल रहा है, तो मदद मांगने में संकोच न करें। निष्कर्ष और संदेश पर्सनैलिटी डिसऑर्डर कोई 'चरित्र की कमी' या 'पाप' नहीं है। यह आनुवंशिक (Genetics) और बचपन के माहौल/अनुभवों के मेल से विकसित होने वाली एक मानसिक स्थिति है। अच्छी बात यह है कि सही साइकोथेरेपी (Psychotherapy), काउंसिलिंग और आत्म-जागरूकता के माध्यम से व्यक्ति अपने व्यवहारिक ढर्रे को बदल सकता है और एक संतुलित व खुशहाल जीवन जी सकता है। यदि आप या आपका कोई प्रियजन लगातार भावनात्मक या सामाजिक कठिनाइयों से जूझ रहा है, तो किसी विशेषज्ञ मनोचिकित्सक से परामर्श अवश्य लें।

ग़ज़ल(Ghazal goi)

ग़ज़ल की साधना कृपया ध्यान दें इस बार आपका टास्क थोड़ा अलग है. इस बार अपने टास्क को तीन भागों में पूरा करेंगे. 1. सबसे पहले दी गई ज़मीन में ग़ज़ल लिखने के लिए आप अपने क़ाफ़िया शब्दों का चुनाव करेंगे और उसे ग्रुप में मुझे भेजेंगे, 2. उसके बाद आप 6-7 सानी मिसरे लिखकर भेजेंगे, 3. और फिर अंत में, सभी सानी मिसरों के ऊला मिसरों को लिखकर अपनी ग़ज़ल मुकम्मल करेंगे और भेजेंगे. ऐसा शब्दों के सही चुनाव एवं उचित वाक्य विन्यास को ध्यान में रखकर किसी भी शेर को कहने की आदत को बढ़ावा देने के लिए किया जा रहा है; साथ में इस बात के महत्व को समझने के लिए भी कि किसी भी शेर में दो मिसरों के बीच के रब्त का अत्यधिक महत्त्व है, जिसे नज़रअंदाज नहीं किया जा सकता है. अभ्यास के लिए तरही मिसरा/ शेर अपना जो कुछ था मेरा ज़ीस्त में,सारा तुम हो मेरी तक़दीर का टूटा हुआ तारा तुम हो //1 ी तक़ती'अ- अपना जो कुछ/था मेरा ज़ीस्त में,सारा/तुम हो मेरी तक़दीर का टूटा/हुआ तारा/तुम हो //1 मापनी- 2122-1122-1122-22 रकान- फ़ाइलातुन-फ़इलातुन-फ़इलातुन-फ़ेलुन बह्र- बह्र-ए-रमल मुसम्मन मख़बून महज़ूफ़ क़ाफ़िया की तुक-'आरा' रदीफ़-'तुम हो' ग़ज़लغزل: 2122-1122-1122-22 दोस्तो, ये ग़ज़ल अब तक मेरी क्रमांकित ग़ज़लों में नहीं शामिल थी. आज मुझे इसी बह्र में का नया अभ्यास क्रमांक 67 देना था. जब अपने आर्काइव में ढूंढा तो मुझे राज़ की रोज़ाबेल कैथरीन के लिए लिखे दो अशआर लिखे मिले.आनन फानन में मैंने 5 और अशआर लिखकर यह ग़ज़ल पूरी कर दी. सोचा आप लोगों को पेश भी कर दूं . अर्ज़ किया है - अपना जो कुछ था मेरा ज़ीस्त में,सारा तुम हो मेरी तक़दीर का टूटा हुआ तारा तुम हो //1 सालों से ढूंढ रहा हूं जिसे मिलता ही नहीं जबकि बह्र-ए-वफ़ा का दोनों किनारा तुम हो //2 मेरी हस्ती का कोई और नहीं सय्यारा मेरे चर्ख़-ए-वफ़ा का चाँद-सितारा तुम हो //3 छोड़कर जाओ न इस हाल में तन्हा हमको बूढ़े मां-बाप के जीवन का सहारा तुम हो //4 किसलिए जाऊं मैं दिखलाने शिफ़ागर के पास मेरे हर ग़म का मुदावा मेरे यारा तुम हो //5 आग ने यूँ नहीं लिक्खी है कहानी मेरी मेरी हस्ती के तसव्वुर का शरारा तुम हो //6 तुम हरी सब्ज़ी नहीं हूं जिसे खाऊं हर रोज़ मेरे बाग़-ए-वफ़ा का आलू-बुख़ारा तुम हो //7 'राज़'वो भी नहीं मिलता जो कभी कहता था मेरे हर दुख,मेरे हर दर्द का चारा तुम हो //8 ग़ज़ल के कठिन शब्द एवं शब्दार्थ 1. ज़ीस्त — जीवन, ज़िंदगी 2. तक़दीर — भाग्य, नियति 3. बह्र — समुद्र, सागर 4. बह्र-ए-वफ़ा — वफ़ा का सागर / निष्ठा का समुद्र 5. हस्ती — अस्तित्व, वजूद 6. सय्यारा — ग्रह, आकाश में भ्रमण करने वाला खगोलीय पिंड 7. चर्ख़ — आकाश, आसमान; चक्र 8. चर्ख़-ए-वफ़ा — वफ़ा का आकाश / प्रेम एवं निष्ठा का संसार 9. तन्हा — अकेला, अकेले 10. शिफ़ागर — घाव भरने वाला, उपचारक, चिकित्सक 11. ग़म — दुःख, शोक 12. मुदावा — उपचार, इलाज, निवारण 13. यारा — प्रिय मित्र, प्यारा साथी, प्रेमी 14. तसव्वुर — कल्पना, विचार, चिंतन 15. शरारा — चिंगारी 16. बाग़ — बागीचा, उपवन 17. आलू-बुख़ारा — एक प्रकार का फल; अंग्रेज़ी में Plum कहा जाता है 18. चारा — उपाय, इलाज, समाधान 19. राज़ — रहस्य, भेद; यहाँ शायर का तख़ल्लुस भी है 🌹 संयुक्त पदों के भावार्थ 🔹 बह्र-ए-वफ़ा का दोनों किनारा — वफ़ा रूपी विशाल सागर के दोनों किनारे अर्थात वफ़ा की पूर्णता एवं उसका समग्र विस्तार। 🔹 मेरी हस्ती का सय्यारा — मेरे अस्तित्व के आकाश का ग्रह अथवा मेरे जीवन-जगत का महत्वपूर्ण केंद्र। 🔹 चर्ख़-ए-वफ़ा का चाँद-सितारा — प्रेम एवं निष्ठा के आकाश को प्रकाशित करने वाला प्रिय व्यक्ति। 🔹 हस्ती के तसव्वुर का शरारा — मेरे अस्तित्व की कल्पना अथवा चेतना को जन्म देने वाली चिंगारी। 🔹 हर ग़म का मुदावा — प्रत्येक दुःख का उपचार अथवा निवारण। 🔹बाग़-ए-वफ़ा का आलू बुख़ारा तुम हो — वफ़ा अथवा प्रेम और निष्ठा के बगीचा का खट्टा मीठा फल आलू बुख़ारा तुम हो ━━━━━━━━━━━━━━━━━━ इसी बह्र पर लिखे गये कुछ फ़िल्मी गीत/ग़ज़ल ***************************** रंग और नूर की बारात किसे पेश करूँ तेरी तस्वीर को सीने से लगा रक्खा है पकी मद भरी आँखों को कँवल कहते हैं दिल की आवाज भी सुन मेरे फ़साने पे न जा वो मेरी नींद मेरा चैन मुझे लौटा दो ऐ सनम जिसने तुझे चाँद सी सूरत दी है तेरी ज़ुल्फ़ों से जुदाई तो नहीं माँगी थी जब भी जी चाहे नई दुनिया बसा लेते हैं लोग कौन आया कि निगाहों में चमक जाग उठी कोई फरियाद तेरे दिल में छुपी हो जैसे ध्यान देने योग्य बातें- ----------------------- 1. सबसे ऊपर बह्र का नाम लिखें 2. उसके नीचे अरकान के नाम लिखें 3. उसके नीचे मापनी लिखें 4. फिर रदीफ़ और क़ाफ़िया लिखें 5. मतला एवं मक़ता समेत कुल 6 अशआर लिखें 6. अपने प्रत्येक शेर का क्रमांक //1, //2, //3... इस फॉर्मेट में लिखें 7. ग़ज़ल के नीचे अपना नाम लिखें 8. और अंत में, कठिन शब्दों के अर्थ लिखें 9. अंत में अपनी ग़ज़ल की तक़ती'अ करें 10. ख़्याल रहे कि विचार आपके अपने हों, किसी और के नहीं

उसको भी हमसे मोहब्बत, हो जरूरी तो नहीं !(Ghazal)

(no subject) Usko Bhi humse Mohabbat Ho zaroori to Nahin_Saba Akabaraabadi__ उसको भी हमसे मोहब्बत, हो जरूरी तो नहीं ! इश्क़ ही इश्क़ की की़मत हो जरूरी तो नहीं!! اس کو بھی ہم سے محبت ہو ضروری تو نہیں* عشق ہی عشق کی قیمت ہو ضروری تو نہیں** एक दिन आपकी बरहम निगाही देख चुके हैं! रोज एक ताजा़ क़यामत हो ज़रूरी तो नहीं!! ایک دن آپ کی برہم نگہی دیکھ چکے ہیں* روز ایک تازہ قیامت ہو ضروری تو نہیں** मेरी शमओं को हवाओं ने बुझाया होगा ! यह भी उनकी ही शरारत हो ज़रूरी तो नहीं!! میری شمعوں کو ہواؤں نے بجھایا ہوگا* یہ بھی ان کی ہی شرارت ہو ضروری تو نہیں** दोस्ती आपसे लाजि़म है मगर इसके लिए! सारी दुनिया से अदावत हो ज़रूरी तो नहीं!! دوستی آپ سے لازم ہے مگر اس کے لیے* ساری دنیا سے عداوت ہو ضروری تو نہیں** पुरसिश ए हाल को तुम आओगे उस वक्त मुझे! लब हिलाने की भी ताक़त हो ज़रूरी तो नहीं!! پرسش حال کو تم آؤ گے اس وقت مجھے* لب ہلانے کی بھی طاقت ہو ضروری تو نہیں** सैकड़ो दर हैं ज़माने में गदाई के लिए! आप ही का दर ए दौलत हो ज़रूरी तोनहीं!! سینکڑوں در ہیں زمانے میں گدائی کے لیے* آپ ہی کا در دولت ہو ضروری تو نہیں** बाहमी रब्त में रंजिश भी मज़ा देती है! बस मोहब्बत ही मोहब्बत हो ज़रूरी तो नहीं!! باہمی ربط میں رنجش بھی مزہ دیتی ہے* بس محبت ہی محبت ہو ضروری تو نہیں** **** बरहम निगाही__ग़ुस्से भरी नज़रें गदाई_मांगना बाहमी रब्त _आपसी मेल-जोल

Authenticity/Personality

Authenticity/Personality जीवन का सबसे बड़ा तनाव: 'वह बनने की कोशिश करना, जो आप वास्तव में नहीं हैं' नमस्कार साथियों, मनोचिकित्सा के अपने वर्षों के अनुभव में मैंने देखा है कि आज अधिकांश लोग तनाव, चिंता, अवसाद या किसी न किसी लत (Addiction) से जूझ रहे हैं। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि इस मानसिक और शारीरिक पीड़ा की असली जड़ कहाँ है? प्रसिद्ध चिकित्सक डॉ. गैबोर माटे के गहरे शोध और मनोविज्ञान के सिद्धांतों के आधार पर, आज मैं आपके साथ एक अत्यंत महत्वपूर्ण सत्य साझा कर रहा हूँ। इसे ध्यान से समझें और अपने जीवन का अवलोकन करें: 1. मुखौटा बनाम आपका वास्तविक स्वरूप (Authenticity vs. Personality) हम सभी मूल रूप से 'प्रामाणिक' (Authentic) ही पैदा होते हैं। लेकिन समाज, परिवार और परिवेश की अपेक्षाओं के चलते हम अपने ऊपर "हमेशा अच्छा दिखने" (Being nice all the time) और लोगों को खुश करने के मुखौटे चढ़ा लेते हैं। बचपन से ही हमें यह डर सिखा दिया जाता है कि यदि हम वही बने रहे जो हम वास्तव में हैं, तो लोग हमें अस्वीकार कर देंगे। मुक्ति (Liberation) कोई जादुई घटना नहीं है; मुक्ति तब मिलती है जब आपको यह अहसास होता है कि आपका 'कंडीशन्ड व्यक्तित्व' (Personality) आपका वास्तविक आत्म (True Self) नहीं है। 2. खुद पर आरोप मत लगाइए, 'दयालु जिज्ञासा' (Compassionate Curiosity) अपनाइए जब भी हम कोई पुरानी गलत आदत दोहराते हैं, तो हम खुद से कहते हैं— "मैं ऐसा क्यों हूँ? मैं क्यों नहीं बदल पा रहा?" यह कोई सवाल नहीं, बल्कि खुद पर लगाया गया एक 'आरोप' है, जो आपके आत्मसम्मान को चोट पहुँचाता है। इसकी जगह खुद से दयालु जिज्ञासा (Compassionate Curiosity) के साथ पूछिए: "क्या बात है जो मुझे ऐसा करने पर मजबूर कर रही है? इसके पीछे कौन सा अनसुलझा दर्द छिपा है?" जब आप खुद पर हमला करेंगे, तो मन बचाव (Defense) की मुद्रा में आ जाएगा; लेकिन जब आप आत्म-सहानुभूति रखेंगे, तभी सच्चाई सामने आएगी। 3. आदतें और मस्तिष्क की प्रोग्रामिंग (Habit Energies) अपनी भावनाओं को दबाना एक सीखी हुई आदत है, जो बचपन में आपके दिमाग के न्यूरोलॉजिकल सर्किट्स में बैठ गई थी। यह एक स्वचालित व्यवहार (Automatic behavior) है। जैसे जिम में पहले ही दिन 150 पाउंड वजन नहीं उठाया जा सकता, वैसे ही इन 'हैबिट एनर्जीज' को बदलने के लिए लगातार, धैर्यपूर्वक और बिना खुद को कोसे अभ्यास करने की आवश्यकता होती है। 4. लत (Addiction) और शारीरिक दर्द की असली वजह: बचपन का अनसुलझा दर्द लत (चाहे वह किसी पदार्थ की हो, काम की हो या किसी व्यवहार की) कोई नैतिक कमजोरी या केवल अनुवांशिक बीमारी नहीं है। यह असल में भावनात्मक दर्द, अकेलेपन, बेचैनी और खालीपन को 'सुन्न' (Numb) करने का एक असफल प्रयास है। शोध बताते हैं कि जिन लोगों ने बचपन में प्रतिकूल परिस्थितियों या आघात (Adverse Childhood Experiences / Trauma) का सामना किया होता है, वयस्क होने पर उनके शरीर में क्रोनिक दर्द और मानसिक बीमारियों की संभावना कई गुना बढ़ जाती है। वे केवल लत के शिकार नहीं हैं, बल्कि वे एक गहरे आघात से जूझ रहे व्यक्ति हैं जिसका शरीर उस दर्द पर प्रतिक्रिया दे रहा है। 5. आधुनिक जीवन में तनाव के 3 ट्रिगर और 4 बड़े 'अलगाव' (Alienations) तनाव मुख्य रूप से तीन चीजों से पैदा होता है: अनिश्चितता (Uncertainty) जानकारी का अभाव (Lack of Information) नियंत्रण खोने का अहसास (Loss of Control) जब यह तनाव बढ़ता है, तो इंसान चार तरह के अलगाव का शिकार होता है: 1. प्रकृति से अलगाव (Alienation from Nature): प्राकृतिक वातावरण से पूरी तरह कट जाना। 2. दूसरों से अलगाव (Alienation from Others): आत्मीयता, भरोसे और गहरे रिश्तों की कमी। 3. अपने काम से अलगाव (Alienation from Work): ऐसा काम करना जिसमें कोई आत्मिक अर्थ या रचनात्मकता न हो, जिसके कारण लोग बाहरी दिखावे और भौतिक वस्तुओं में झूठी खुशी तलाशने लगते हैं। 4. स्वयं से अलगाव (Alienation from Self): अपनी अंतरात्मा और अंतर्ज्ञान (Gut Feeling) को दबा देना। जब हम बचपन में अपनों का प्यार पाने के लिए अपनी भावनाओं को मार देते हैं, तो हम अपने ही सत्य से कट जाते हैं। 6. तनाव कैसे बीमारी बनता है? तनाव सिर्फ बाहरी घटना नहीं है। तनाव तीन चरणों में काम करता है: बाहरी घटना (Stressor) हमारा आंतरिक नजरिया (Processing Apparatus - हमारे अवचेतन विश्वास और व्याख्याएं) शारीरिक प्रतिक्रिया (Physiological Response - एड्रेनालाईन, कोर्टिसोल, तंत्रिका तंत्र और अंगों पर असर) जब हम दूसरों की स्वीकृति पाने के लिए लगातार अपनी प्रामाणिकता की बलि देते हैं, तो हम अपने शरीर को भारी तनाव में डालते हैं, जो आगे चलकर गंभीर बीमारियों का रूप ले लेता है। 7. बीमारी एक शिक्षक के रूप में और 'रिकवरी' का वास्तविक अर्थ बीमारी केवल एक विपत्ति नहीं है, बल्कि कई बार यह एक अलार्म की तरह आती है जो हमें यह सिखाती है कि हम कहाँ अपने वास्तविक स्वरूप से भटक गए थे। स्वास्थ्य लाभ के लिए 'Recovery' (पुनर्प्राप्ति) शब्द का प्रयोग होता है। रिकवर करने का अर्थ है— उसे दोबारा पाना जो कभी खोया ही नहीं था। आपका सच्चा, प्रामाणिक स्वरूप हमेशा आपके भीतर मौजूद है, बस उस पर जमी धूल और कंडीशनिंग को हटाना है। मुख्य संदेश: जीवन का सबसे बड़ा तनाव किसी और की अपेक्षाओं के अनुसार जीना है। लोगों को खुश करने के लिए अपनी अंतरात्मा की आवाज को मत दबाइए। अपनी कमियों को स्वीकार कीजिए, खुद के प्रति करुणामय बनिए और अपने वास्तविक स्वरूप में जीने का साहस जुटाइए।

रघुपति सहाय फ़िराक़_गोरखपुरी

फ़िराक़ गोरखपुरी Pavan Kumar Sharma Fri 28 Aug, 08:43 (5 days ago) to Pavan फ़िराक़ गोरखपुरी..प्रमुख शायर..भारतीय ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित.. फ़िराक़ गोरखपुरी का परिचय उपनाम :'फ़िराक़' मूल नाम :रघुपति सहाय जन्म :28 Aug 1896 | गोरखपुर, उत्तर प्रदेश निधन :03 Mar 1982 | दिल्ली, भारत बहुत पहले से उन क़दमों की आहट जान लेते हैं तुझे ऐ ज़िंदगी हम --------- दूर से पहचान लेते हैं फ़िराक़ गोरखपुरी एक युग निर्माता शायर और आलोचक थे। उनको अपनी विशिष्टता की बदौलत अपने ज़माने में जो प्रसिद्धि और लोकप्रियता मिली वो कम ही शायरों को नसीब होती है। अगर फ़िराक़ न होते तो हमारी ग़ज़ल की सरज़मीन बेरौनक़ रहती, फ़िराक़ के शे’र दिल को प्रभावित करने के इलावा सोचने को विवश भी करते हैं और उनकी यही विशेषता फ़िराक़ को दूसरे सभी शायरों से उत्कृष्ट करती है। रघुपति सहाय फ़िराक़_गोरखपुरी आसमान-ए-उर्दू के उस जगमगाते सितारे का नाम है जिसकी चमक नए आने वाले शायरों की रहनुमाई रहती दुनिया तक करती रहेगी. इस अलमस्त शायर ने क्लासिकल ग़ज़ल के हुस्न और नज़ाकत को बरक़रार रखते हुए उसकी नोक पलक संवार कर बड़ी नफ़ासत से उसे जदीदियत के सांचे में ढाला जिससे रिवायती ग़ज़ल में एक अनोखा लोच और बांकपन पैदा हो गया. उनके बनाए हुए इसी पैटर्न पर चलते हुए बशीर बद्र और उनके हम-अस्र दूसरे शायरों ने बहुत ख़ूबसूरत ग़ज़लें कही हैं. फ़िराक़ साहब को उनके दीवान गुलेनग़मा पर 1960 में साहित्य_अकादमी_पुरस्कार और इसी किताब पर 1970 में ज्ञानपीठ_अवार्ड से नवाज़ा गया. उर्दू लिटरेचर की ख़िदमात के सिले में फ़िराक़ साहब को पद्मभूषण पुरुस्कार से सम्मानित किया गया. उनकी रूमानियत से रची बसी फ़लसफ़ियाना अंदाज़ की शायरी की एक बानगी मुलाहिज़ा फ़रमाएं - रात भी, नींद भी, कहानी भी हाए क्या चीज़ है, जवानी भी मौत का भी इलाज हो शायद ज़िंदगी का कोई इलाज नहीं वो चुप-चाप आँसू बहाने की रातें वो इक शख़्स के याद आने की रातें दीदार में यक-तरफ़ा दीदार नज़र आया हर बार छुपा कोई, हर बार नज़र आया किसी का यूं तो हुआ कौन उम्र भर, फिर भी ये हुस्नो इश्क़ तो धोखा है सब मगर फिर भी आई है कुछ न पूछ क़यामत कहाँ कहाँ उफ़ ले गई है मुझ को मोहब्बत कहाँ कहाँ बेताबी-ओ-सुकूँ की हुईं मंज़िलें तमाम बहलाएँ तुझ से छुट के तबी'अत कहाँ कहाँ फ़ुर्क़त हो या विसाल वही इज़्तिराब है तेरा असर है ऐ ग़म-ए-फ़ुर्क़त कहाँ कहाँ फ़र्क़ आ गया था दौर-ए-हयात-ओ-ममात में आई है आज याद वो सूरत कहाँ कहा जैसे फ़ना बक़ा में भी कोई कमी सी हो मुझ को पड़ी है तेरी ज़रूरत कहाँ कहाँ.. होश-ओ-जुनूँ भी अब तो बस इक बात हैं 'फ़िराक़' होती है उस नज़र की शरारत कहाँ कह

Ghazal (Kateel Shifaai)

Ghazal (Kateel Shifaai) It looks like this message is in Hindi तुम पूछो और मैं न बताऊँ ऐसे तो हालात नहीं एक जरा सा दिल टूटा है और तो कोई बात नहीं। किसको खबर थी साँवले बादल बिन बरसे उड़ जाते हैँ सावन आया लेकिन अपनी किस्मत में बरसात नहीं। टूट गया ये दिल तो फिर ये साँस के क्या मा'नी गूंज रही है क्यूँ शहनाई ज़ब कोई बारात नहीं। गाम के अंधियारे में तुझको अपना साथी क्यूँ समझूँ तू फिर भी तू है मेरा तो साया भी मेरे साथ नहीं। माना जीवन में औरत इक बार मोहब्बत करती है लेकिन मुझको ये तो बता दे क्या तू औरत जात नहीं। ख़त्म हुआ मेरा फ़साना अब ये आँसू पौंछ भी तो जिस में कोई तारा चमके आज की रात वो रात नहीं। मेरे गमगीँ होने पर अहबाब है यूँ हैरान " कतील " जैसे मैं पत्थर हूँ मेरे सीने में जज़्बात नहीं। अहबाब = मित्र, दोस्त। " कतील शिफाई "

स्त्री का स्त्रैण होना ही उसका माधुर्य है(Aurat Ka Aashkaar)

जो स्त्री आक्रामक होती है वह आकर्षक नहीं होती है।अगर कोई स्‍‍त्री तुम्हारे पीछे पड़ जाए और प्रेम का निवेदन करने लगे तो तुम घबरा जाओगे तुम भागोगे। क्योंकि वह स्त्री पुरुष जैसा व्यवहार कर रही है, स्त्रैण नहीं है, स्त्री का स्त्रैण होना ही उसका माधुर्य है।वह सिर्फ प्रतीक्षा करती है। तुम्हें उकसाती है, लेकिन आक्रमण नहीं करती। वह तुम्हें बुलाती है, लेकिन चिल्लाती नहीं। उसका बुलाना भी बड़ा मौन है, वह तुम्हें सब तरफ से घेर लेती, लेकिन तुम्हें पता भी नहीं चलता। उसकी जंजीरें बहुत सूक्ष्म हैं, वे दिखाई भी नहीं पड़तीं, वह बड़े पतले धागों से, सूक्ष्म धागों से तुम्हें सब तरफ से बांध लेती है, लेकिन उसका बंधन कहीं दिखाई भी नहीं पड़ता। स्त्री अपने को नीचे रखती है, लोग गलत सोचते हैं कि पुरुषों ने स्त्रियों को दासी बना लिया। नहीं, स्त्री दासी बनने की कला है, मगर तुम्हें पता नहीं, उसकी कला बड़ी महत्वपूर्ण है। और लाओत्से उसी कला का उद्‍घाटन कर रहा है। कोई पुरुष किसी स्त्री को दासी नहीं बनाता। दुनियाँ के किसी भी कोने में जब भी कोई स्त्री किसी पुरुष के प्रेम में पड़ती है, तत्क्षण अपने को दासी बना लेती है, ‍क्योंकि दासी होना ही गहरी मालकियत है। वह जीवन का राज समझती है। स्त्री अपने को नीचे रखती है, चरणों में रखती है। और तुमने देखा है कि जब भी कोई स्त्री अपने को तुम्हारे चरणों में रख देती है, तब अचानक तुम्हारे सिर पर ताज की तरह बैठ जाती है। रखती चरणों में है, पहुँच जाती है बहुत गहरे, बहुत ऊपर, तुम चौबीस घंटे उसी का चिंतन करने लगते हो। छोड़ देती है अपने को तुम्हारे चरणों में, तुम्हारी छाया बन जाती है। और तुम्हें पता भी नहीं चलता कि छाया तुम्हें चलाने लगती है, छाया के इशारे से तुम चलने लगते हो। स्त्री कभी यह भी नहीं कहती सीधा कि यह करो, लेकिन वह जो चाहती है करवा लेती है। वह कभी नहीं कहती कि यह ऐसा ही हो, लेकिन वह जैसा चाहती है वैसा करवा लेती है।लाओत्से यह कह रहा है कि उसकी शक्ति बड़ी है। और उसकी शक्ति क्या है? क्योंकि वह दासी है। शक्ति उसकी यह है कि वह छाया हो गई है। बड़े से बड़े शक्तिशाली पुरुष स्त्री के प्रेम में पड़ जाते हैं, और एकदम अशक्त हो जाते है, और अनजाने में ही बड़ी सहजता से उतर जाते हो उसके प्रेम में ! 💐❤💯🥰😘

Shakeel Badayuni( Ghazal)

Shakeel Badayuni( Ghazal) ला रहा है मय कोई शीशे में भर के सामने किस कदर पुर कैफ है मंजर नज़र के सामने। मैं तो इस आलम को क्या से क्या बना देता मगर किसी की चलती है हयात ए मुक्तसर के सामने। फिर न देना ता'ना ए नाकामी ए जौक ए नज़र हौसला है कुछ त आ जाओ नज़र के सामने। आह ये रूदाद ए हंगामा ए तरब ऐ गम गुसार जिक्र ए गुलशन जैसे इक बे बात ओ पर के सामने। हो चुका है जब खात्मा सारी उम्मीदों का तो फिर जा रहे ही क्यूँ ' शकील ' उस फ़ितनागर के सामने। पुर कैफ = भरपूर ता' ना ए नाकामी ए जौक ए नज़र = निंदा, असफलता रूदाद ए हंगामा ए तरब = किसी घटना पर हलचल पर प्रसन्नता फितना गर = उपद्रवी। शकील बदायूंनी

Rasleela Nathdwara Style | Twin Eternals - Matter & Energy

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