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A personal blog by Pavan Kumar "Paavan"
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8:58 PM
Article Published by : PAVAN KUMAR SHARMA,' PAAVAN &MAAHIR
(no subject) Usko Bhi humse Mohabbat Ho zaroori to Nahin_Saba Akabaraabadi__ उसको भी हमसे मोहब्बत, हो जरूरी तो नहीं ! इश्क़ ही इश्क़ की की़मत हो जरूरी तो नहीं!! اس کو بھی ہم سے محبت ہو ضروری تو نہیں* عشق ہی عشق کی قیمت ہو ضروری تو نہیں** एक दिन आपकी बरहम निगाही देख चुके हैं! रोज एक ताजा़ क़यामत हो ज़रूरी तो नहीं!! ایک دن آپ کی برہم نگہی دیکھ چکے ہیں* روز ایک تازہ قیامت ہو ضروری تو نہیں** मेरी शमओं को हवाओं ने बुझाया होगा ! यह भी उनकी ही शरारत हो ज़रूरी तो नहीं!! میری شمعوں کو ہواؤں نے بجھایا ہوگا* یہ بھی ان کی ہی شرارت ہو ضروری تو نہیں** दोस्ती आपसे लाजि़म है मगर इसके लिए! सारी दुनिया से अदावत हो ज़रूरी तो नहीं!! دوستی آپ سے لازم ہے مگر اس کے لیے* ساری دنیا سے عداوت ہو ضروری تو نہیں** पुरसिश ए हाल को तुम आओगे उस वक्त मुझे! लब हिलाने की भी ताक़त हो ज़रूरी तो नहीं!! پرسش حال کو تم آؤ گے اس وقت مجھے* لب ہلانے کی بھی طاقت ہو ضروری تو نہیں** सैकड़ो दर हैं ज़माने में गदाई के लिए! आप ही का दर ए दौलत हो ज़रूरी तोनहीं!! سینکڑوں در ہیں زمانے میں گدائی کے لیے* آپ ہی کا در دولت ہو ضروری تو نہیں** बाहमी रब्त में रंजिश भी मज़ा देती है! बस मोहब्बत ही मोहब्बत हो ज़रूरी तो नहीं!! باہمی ربط میں رنجش بھی مزہ دیتی ہے* بس محبت ہی محبت ہو ضروری تو نہیں** **** बरहम निगाही__ग़ुस्से भरी नज़रें गदाई_मांगना बाहमी रब्त _आपसी मेल-जोल
8:54 PM
Article Published by : PAVAN KUMAR SHARMA,' PAAVAN &MAAHIR
Authenticity/Personality जीवन का सबसे बड़ा तनाव: 'वह बनने की कोशिश करना, जो आप वास्तव में नहीं हैं' नमस्कार साथियों, मनोचिकित्सा के अपने वर्षों के अनुभव में मैंने देखा है कि आज अधिकांश लोग तनाव, चिंता, अवसाद या किसी न किसी लत (Addiction) से जूझ रहे हैं। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि इस मानसिक और शारीरिक पीड़ा की असली जड़ कहाँ है? प्रसिद्ध चिकित्सक डॉ. गैबोर माटे के गहरे शोध और मनोविज्ञान के सिद्धांतों के आधार पर, आज मैं आपके साथ एक अत्यंत महत्वपूर्ण सत्य साझा कर रहा हूँ। इसे ध्यान से समझें और अपने जीवन का अवलोकन करें: 1. मुखौटा बनाम आपका वास्तविक स्वरूप (Authenticity vs. Personality) हम सभी मूल रूप से 'प्रामाणिक' (Authentic) ही पैदा होते हैं। लेकिन समाज, परिवार और परिवेश की अपेक्षाओं के चलते हम अपने ऊपर "हमेशा अच्छा दिखने" (Being nice all the time) और लोगों को खुश करने के मुखौटे चढ़ा लेते हैं। बचपन से ही हमें यह डर सिखा दिया जाता है कि यदि हम वही बने रहे जो हम वास्तव में हैं, तो लोग हमें अस्वीकार कर देंगे। मुक्ति (Liberation) कोई जादुई घटना नहीं है; मुक्ति तब मिलती है जब आपको यह अहसास होता है कि आपका 'कंडीशन्ड व्यक्तित्व' (Personality) आपका वास्तविक आत्म (True Self) नहीं है। 2. खुद पर आरोप मत लगाइए, 'दयालु जिज्ञासा' (Compassionate Curiosity) अपनाइए जब भी हम कोई पुरानी गलत आदत दोहराते हैं, तो हम खुद से कहते हैं— "मैं ऐसा क्यों हूँ? मैं क्यों नहीं बदल पा रहा?" यह कोई सवाल नहीं, बल्कि खुद पर लगाया गया एक 'आरोप' है, जो आपके आत्मसम्मान को चोट पहुँचाता है। इसकी जगह खुद से दयालु जिज्ञासा (Compassionate Curiosity) के साथ पूछिए: "क्या बात है जो मुझे ऐसा करने पर मजबूर कर रही है? इसके पीछे कौन सा अनसुलझा दर्द छिपा है?" जब आप खुद पर हमला करेंगे, तो मन बचाव (Defense) की मुद्रा में आ जाएगा; लेकिन जब आप आत्म-सहानुभूति रखेंगे, तभी सच्चाई सामने आएगी। 3. आदतें और मस्तिष्क की प्रोग्रामिंग (Habit Energies) अपनी भावनाओं को दबाना एक सीखी हुई आदत है, जो बचपन में आपके दिमाग के न्यूरोलॉजिकल सर्किट्स में बैठ गई थी। यह एक स्वचालित व्यवहार (Automatic behavior) है। जैसे जिम में पहले ही दिन 150 पाउंड वजन नहीं उठाया जा सकता, वैसे ही इन 'हैबिट एनर्जीज' को बदलने के लिए लगातार, धैर्यपूर्वक और बिना खुद को कोसे अभ्यास करने की आवश्यकता होती है। 4. लत (Addiction) और शारीरिक दर्द की असली वजह: बचपन का अनसुलझा दर्द लत (चाहे वह किसी पदार्थ की हो, काम की हो या किसी व्यवहार की) कोई नैतिक कमजोरी या केवल अनुवांशिक बीमारी नहीं है। यह असल में भावनात्मक दर्द, अकेलेपन, बेचैनी और खालीपन को 'सुन्न' (Numb) करने का एक असफल प्रयास है। शोध बताते हैं कि जिन लोगों ने बचपन में प्रतिकूल परिस्थितियों या आघात (Adverse Childhood Experiences / Trauma) का सामना किया होता है, वयस्क होने पर उनके शरीर में क्रोनिक दर्द और मानसिक बीमारियों की संभावना कई गुना बढ़ जाती है। वे केवल लत के शिकार नहीं हैं, बल्कि वे एक गहरे आघात से जूझ रहे व्यक्ति हैं जिसका शरीर उस दर्द पर प्रतिक्रिया दे रहा है। 5. आधुनिक जीवन में तनाव के 3 ट्रिगर और 4 बड़े 'अलगाव' (Alienations) तनाव मुख्य रूप से तीन चीजों से पैदा होता है: अनिश्चितता (Uncertainty) जानकारी का अभाव (Lack of Information) नियंत्रण खोने का अहसास (Loss of Control) जब यह तनाव बढ़ता है, तो इंसान चार तरह के अलगाव का शिकार होता है: 1. प्रकृति से अलगाव (Alienation from Nature): प्राकृतिक वातावरण से पूरी तरह कट जाना। 2. दूसरों से अलगाव (Alienation from Others): आत्मीयता, भरोसे और गहरे रिश्तों की कमी। 3. अपने काम से अलगाव (Alienation from Work): ऐसा काम करना जिसमें कोई आत्मिक अर्थ या रचनात्मकता न हो, जिसके कारण लोग बाहरी दिखावे और भौतिक वस्तुओं में झूठी खुशी तलाशने लगते हैं। 4. स्वयं से अलगाव (Alienation from Self): अपनी अंतरात्मा और अंतर्ज्ञान (Gut Feeling) को दबा देना। जब हम बचपन में अपनों का प्यार पाने के लिए अपनी भावनाओं को मार देते हैं, तो हम अपने ही सत्य से कट जाते हैं। 6. तनाव कैसे बीमारी बनता है? तनाव सिर्फ बाहरी घटना नहीं है। तनाव तीन चरणों में काम करता है: बाहरी घटना (Stressor) हमारा आंतरिक नजरिया (Processing Apparatus - हमारे अवचेतन विश्वास और व्याख्याएं) शारीरिक प्रतिक्रिया (Physiological Response - एड्रेनालाईन, कोर्टिसोल, तंत्रिका तंत्र और अंगों पर असर) जब हम दूसरों की स्वीकृति पाने के लिए लगातार अपनी प्रामाणिकता की बलि देते हैं, तो हम अपने शरीर को भारी तनाव में डालते हैं, जो आगे चलकर गंभीर बीमारियों का रूप ले लेता है। 7. बीमारी एक शिक्षक के रूप में और 'रिकवरी' का वास्तविक अर्थ बीमारी केवल एक विपत्ति नहीं है, बल्कि कई बार यह एक अलार्म की तरह आती है जो हमें यह सिखाती है कि हम कहाँ अपने वास्तविक स्वरूप से भटक गए थे। स्वास्थ्य लाभ के लिए 'Recovery' (पुनर्प्राप्ति) शब्द का प्रयोग होता है। रिकवर करने का अर्थ है— उसे दोबारा पाना जो कभी खोया ही नहीं था। आपका सच्चा, प्रामाणिक स्वरूप हमेशा आपके भीतर मौजूद है, बस उस पर जमी धूल और कंडीशनिंग को हटाना है। मुख्य संदेश: जीवन का सबसे बड़ा तनाव किसी और की अपेक्षाओं के अनुसार जीना है। लोगों को खुश करने के लिए अपनी अंतरात्मा की आवाज को मत दबाइए। अपनी कमियों को स्वीकार कीजिए, खुद के प्रति करुणामय बनिए और अपने वास्तविक स्वरूप में जीने का साहस जुटाइए।
8:48 PM
Article Published by : PAVAN KUMAR SHARMA,' PAAVAN &MAAHIR
फ़िराक़ गोरखपुरी
Pavan Kumar Sharma
8:45 PM
Article Published by : PAVAN KUMAR SHARMA,' PAAVAN &MAAHIR
Ghazal (Kateel Shifaai) It looks like this message is in Hindi तुम पूछो और मैं न बताऊँ ऐसे तो हालात नहीं एक जरा सा दिल टूटा है और तो कोई बात नहीं। किसको खबर थी साँवले बादल बिन बरसे उड़ जाते हैँ सावन आया लेकिन अपनी किस्मत में बरसात नहीं। टूट गया ये दिल तो फिर ये साँस के क्या मा'नी गूंज रही है क्यूँ शहनाई ज़ब कोई बारात नहीं। गाम के अंधियारे में तुझको अपना साथी क्यूँ समझूँ तू फिर भी तू है मेरा तो साया भी मेरे साथ नहीं। माना जीवन में औरत इक बार मोहब्बत करती है लेकिन मुझको ये तो बता दे क्या तू औरत जात नहीं। ख़त्म हुआ मेरा फ़साना अब ये आँसू पौंछ भी तो जिस में कोई तारा चमके आज की रात वो रात नहीं। मेरे गमगीँ होने पर अहबाब है यूँ हैरान " कतील " जैसे मैं पत्थर हूँ मेरे सीने में जज़्बात नहीं। अहबाब = मित्र, दोस्त। " कतील शिफाई "
8:38 PM
Article Published by : PAVAN KUMAR SHARMA,' PAAVAN &MAAHIR
जो स्त्री आक्रामक होती है वह आकर्षक नहीं होती है।अगर कोई स्त्री तुम्हारे पीछे पड़ जाए और प्रेम का निवेदन करने लगे तो तुम घबरा जाओगे तुम भागोगे। क्योंकि वह स्त्री पुरुष जैसा व्यवहार कर रही है, स्त्रैण नहीं है, स्त्री का स्त्रैण होना ही उसका माधुर्य है।वह सिर्फ प्रतीक्षा करती है। तुम्हें उकसाती है, लेकिन आक्रमण नहीं करती। वह तुम्हें बुलाती है, लेकिन चिल्लाती नहीं। उसका बुलाना भी बड़ा मौन है, वह तुम्हें सब तरफ से घेर लेती, लेकिन तुम्हें पता भी नहीं चलता। उसकी जंजीरें बहुत सूक्ष्म हैं, वे दिखाई भी नहीं पड़तीं, वह बड़े पतले धागों से, सूक्ष्म धागों से तुम्हें सब तरफ से बांध लेती है, लेकिन उसका बंधन कहीं दिखाई भी नहीं पड़ता। स्त्री अपने को नीचे रखती है, लोग गलत सोचते हैं कि पुरुषों ने स्त्रियों को दासी बना लिया। नहीं, स्त्री दासी बनने की कला है, मगर तुम्हें पता नहीं, उसकी कला बड़ी महत्वपूर्ण है। और लाओत्से उसी कला का उद्घाटन कर रहा है। कोई पुरुष किसी स्त्री को दासी नहीं बनाता। दुनियाँ के किसी भी कोने में जब भी कोई स्त्री किसी पुरुष के प्रेम में पड़ती है, तत्क्षण अपने को दासी बना लेती है, क्योंकि दासी होना ही गहरी मालकियत है। वह जीवन का राज समझती है। स्त्री अपने को नीचे रखती है, चरणों में रखती है। और तुमने देखा है कि जब भी कोई स्त्री अपने को तुम्हारे चरणों में रख देती है, तब अचानक तुम्हारे सिर पर ताज की तरह बैठ जाती है। रखती चरणों में है, पहुँच जाती है बहुत गहरे, बहुत ऊपर, तुम चौबीस घंटे उसी का चिंतन करने लगते हो। छोड़ देती है अपने को तुम्हारे चरणों में, तुम्हारी छाया बन जाती है। और तुम्हें पता भी नहीं चलता कि छाया तुम्हें चलाने लगती है, छाया के इशारे से तुम चलने लगते हो। स्त्री कभी यह भी नहीं कहती सीधा कि यह करो, लेकिन वह जो चाहती है करवा लेती है। वह कभी नहीं कहती कि यह ऐसा ही हो, लेकिन वह जैसा चाहती है वैसा करवा लेती है।लाओत्से यह कह रहा है कि उसकी शक्ति बड़ी है। और उसकी शक्ति क्या है? क्योंकि वह दासी है। शक्ति उसकी यह है कि वह छाया हो गई है। बड़े से बड़े शक्तिशाली पुरुष स्त्री के प्रेम में पड़ जाते हैं, और एकदम अशक्त हो जाते है, और अनजाने में ही बड़ी सहजता से उतर जाते हो उसके प्रेम में ! 💐❤💯🥰😘
8:33 PM
Article Published by : PAVAN KUMAR SHARMA,' PAAVAN &MAAHIR
Shakeel Badayuni( Ghazal) ला रहा है मय कोई शीशे में भर के सामने किस कदर पुर कैफ है मंजर नज़र के सामने। मैं तो इस आलम को क्या से क्या बना देता मगर किसी की चलती है हयात ए मुक्तसर के सामने। फिर न देना ता'ना ए नाकामी ए जौक ए नज़र हौसला है कुछ त आ जाओ नज़र के सामने। आह ये रूदाद ए हंगामा ए तरब ऐ गम गुसार जिक्र ए गुलशन जैसे इक बे बात ओ पर के सामने। हो चुका है जब खात्मा सारी उम्मीदों का तो फिर जा रहे ही क्यूँ ' शकील ' उस फ़ितनागर के सामने। पुर कैफ = भरपूर ता' ना ए नाकामी ए जौक ए नज़र = निंदा, असफलता रूदाद ए हंगामा ए तरब = किसी घटना पर हलचल पर प्रसन्नता फितना गर = उपद्रवी। शकील बदायूंनी
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