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PAVAN KUMAR SHARMA,' PAAVAN &MAAHIR
फ़िराक़ गोरखपुरी
Pavan Kumar Sharma
Fri 28 Aug, 08:43 (5 days ago)
to Pavan
फ़िराक़ गोरखपुरी..प्रमुख शायर..भारतीय ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित..
फ़िराक़ गोरखपुरी का परिचय
उपनाम :'फ़िराक़'
मूल नाम :रघुपति सहाय
जन्म :28 Aug 1896 | गोरखपुर, उत्तर प्रदेश
निधन :03 Mar 1982 | दिल्ली, भारत
बहुत पहले से उन क़दमों की आहट जान लेते हैं
तुझे ऐ ज़िंदगी हम --------- दूर से पहचान लेते हैं
फ़िराक़ गोरखपुरी एक युग निर्माता शायर और आलोचक थे। उनको अपनी विशिष्टता की बदौलत अपने ज़माने में जो प्रसिद्धि और लोकप्रियता मिली वो कम ही शायरों को नसीब होती है।
अगर फ़िराक़ न होते तो हमारी ग़ज़ल की सरज़मीन बेरौनक़ रहती,
फ़िराक़ के शे’र दिल को प्रभावित करने के इलावा सोचने को विवश भी करते हैं और उनकी यही विशेषता फ़िराक़ को दूसरे सभी शायरों से उत्कृष्ट करती है।
रघुपति सहाय फ़िराक़_गोरखपुरी आसमान-ए-उर्दू के उस जगमगाते सितारे का नाम है जिसकी चमक नए आने वाले शायरों की रहनुमाई रहती दुनिया तक करती रहेगी.
इस अलमस्त शायर ने क्लासिकल ग़ज़ल के हुस्न और नज़ाकत को बरक़रार रखते हुए उसकी नोक पलक संवार कर बड़ी नफ़ासत से उसे जदीदियत के सांचे में ढाला जिससे रिवायती ग़ज़ल में एक अनोखा लोच और बांकपन पैदा हो गया. उनके बनाए हुए इसी पैटर्न पर चलते हुए बशीर बद्र और उनके हम-अस्र दूसरे शायरों ने बहुत ख़ूबसूरत ग़ज़लें कही हैं.
फ़िराक़ साहब को उनके दीवान गुलेनग़मा पर 1960 में साहित्य_अकादमी_पुरस्कार और इसी किताब पर 1970 में ज्ञानपीठ_अवार्ड से नवाज़ा गया. उर्दू लिटरेचर की ख़िदमात के सिले में फ़िराक़ साहब को पद्मभूषण पुरुस्कार से सम्मानित किया गया.
उनकी रूमानियत से रची बसी फ़लसफ़ियाना अंदाज़ की शायरी की एक बानगी मुलाहिज़ा फ़रमाएं -
रात भी, नींद भी, कहानी भी
हाए क्या चीज़ है, जवानी भी
मौत का भी इलाज हो शायद
ज़िंदगी का कोई इलाज नहीं
वो चुप-चाप आँसू बहाने की रातें
वो इक शख़्स के याद आने की रातें
दीदार में यक-तरफ़ा दीदार नज़र आया
हर बार छुपा कोई, हर बार नज़र आया
किसी का यूं तो हुआ कौन उम्र भर, फिर भी
ये हुस्नो इश्क़ तो धोखा है सब मगर फिर भी
आई है कुछ न पूछ क़यामत कहाँ कहाँ
उफ़ ले गई है मुझ को मोहब्बत कहाँ कहाँ
बेताबी-ओ-सुकूँ की हुईं मंज़िलें तमाम
बहलाएँ तुझ से छुट के तबी'अत कहाँ कहाँ
फ़ुर्क़त हो या विसाल वही इज़्तिराब है
तेरा असर है ऐ ग़म-ए-फ़ुर्क़त कहाँ कहाँ
फ़र्क़ आ गया था दौर-ए-हयात-ओ-ममात में
आई है आज याद वो सूरत कहाँ कहा
जैसे फ़ना बक़ा में भी कोई कमी सी हो
मुझ को पड़ी है तेरी ज़रूरत कहाँ कहाँ..
होश-ओ-जुनूँ भी अब तो बस इक बात हैं 'फ़िराक़'
होती है उस नज़र की शरारत कहाँ कह
This entry was posted on October 4, 2009 at 12:14 pm, and is filed under
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