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A personal blog by Pavan Kumar "Paavan"
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8:43 PM
Article Published by : PAVAN KUMAR SHARMA,' PAAVAN &MAAHIR
क्या आपके साथ कभी ऐसा हुआ है कि आप पूरे 8 घंटे की नींद लेते हैं, दिनभर कोई भारी शारीरिक काम भी नहीं करते, फिर भी शाम होते-होते अंदर से एक गहरी थकावट महसूस होने लगती है? ऐसा लगता है जैसे मन और शरीर का बैटरी परसेंट एकदम 'ज़ीरो' हो गया है। अक्सर जब लोग मेरे पास आते हैं, तो उनका यही सवाल होता है — "डॉक्टर साहब, मैं तो दिनभर कुर्सी पर बैठा रहता हूँ, फिर भी इतनी थकावट और चिड़चिड़ापन क्यों महसूस होता है?" हममें से ज्यादातर लोग जब थकावट महसूस करते हैं, तो सोचते हैं कि शायद शारीरिक कमजोरी है, थोड़ा आराम कर लेंगे या किसी छुट्टी पर चले जाएँगे तो सब ठीक हो जाएगा। कुछ लोग एक दिन स्पा चले जाते हैं या कैफे में बैठकर कॉफी पी लेते हैं और सोचते हैं कि यह (Self-Care)' हो गया। लेकिन दो दिन बाद वही पुरानी थकावट, वही खालीपन फिर लौट आता है। ऐसा क्यों होता है? क्योंकि जिसे हम थकावट समझ रहे हैं, वह सिर्फ शरीर की नहीं, बल्कि हमारे इमोशनल (भावनात्मक), मेंटल (मानसिक) और रिलेशनल (संबंधों) स्तर पर हुआ 'ड्रेन (Depletion)' है। आज मैं आपसे इसी विषय पर विस्तार से बात करने आया हूँ कि आखिर हमारे अंदर की ऊर्जा (Energy) कहाँ-कहाँ से लीक हो रही है और सच्चा सेल्फ-केयर क्या होता है। 1. सिर्फ शारीरिक आराम ही काफी क्यों नहीं है? (Understanding Energy Tanks) हमारे शरीर के भीतर दो मुख्य प्रणालियाँ काम करती हैं: सिम्पेथेटिक नर्वस सिस्टम (Sympathetic Nervous System): यह हमारा 'एक्शन' या 'फाइट एंड फ्लाइट' मोड है। जब आप काम करते हैं, तनाव में होते हैं या किसी चुनौती का सामना करते हैं, तो यह सक्रिय हो जाता है। पैरासिम्पेथेटिक नर्वस सिस्टम (Parasympathetic Nervous System): यह हमारा 'रेस्ट एंड डाइजेस्ट' मोड है। यह शरीर और दिमाग को शांत करता है, हील (heal) करता है और नई ऊर्जा भरता है। समस्या तब शुरू होती है जब हम लगातार तनाव, भागदौड़ या अनसुलझी चिंताओं के कारण हर समय 'सिम्पेथेटिक मोड' में ही रहते हैं। शुरुआती दौर में एडेनालिन (Adrenaline) के कारण हमें लगता है कि हम बहुत एक्टिव हैं, लेकिन अंदर ही अंदर हमारी ऊर्जा का टैंक खाली होता रहता है। और जब टैंक पूरी तरह खाली हो जाता है, तो हमारा दिमाग 'फ्रीज मोड' में चला जाता है — हम प्रोक्रैस्टिनेट (काम टालना) करने लगते हैं, ज्यादा खाने लगते हैं या खुद को दुनिया से अलग-थलग कर लेते हैं। 2. हमारी ऊर्जा कहाँ-कहाँ खर्च हो रही है? (Where Is Your Energy Leaking?) आइए गहराई से समझें कि हमारी दिनचर्या में ऐसी कौन सी चीजें हैं जो हमसे बिना बताए हमारी ऊर्जा खींच लेती हैं: क) शारीरिक स्तर पर (Physical Depletion) मल्टीटास्किंग (Multitasking): एक ही समय में चार काम करने की आदत दिमाग पर भारी दबाव डालती है। बिखरा हुआ माहौल (Cluttered Space): यदि आपका कमरा या वर्क-टेबल बिखरी हुई और गंदी है, तो आपका दिमाग लगातार उस अव्यवस्था को प्रोसेस करता रहता है, जिससे अनजाने में थकावट होती है। कम पानी पीना और लगातार अंदर बंद रहना: दिनभर धूप और ताजी हवा से दूर रहना तथा पानी कम पीना शरीर को सुस्त बना देता है। दीर्घकालिक बीमारी या दर्द (Chronic Pain): यदि शरीर में कहीं हल्का दर्द या कोई इंफेक्शन लगातार बना हुआ है, तो शरीर उसे ठीक करने में अपनी भारी ऊर्जा खर्च करता रहता है। ख) भावनात्मक स्तर पर (Emotional Depletion) — सबसे बड़ा चोर! अधिकांश लोगों की ऊर्जा का 70% हिस्सा उनके भावनाओं के स्तर पर खर्च होता है: भावनाओं को दबाना (Suppressing Emotions): जब आप गुस्सा, डर, दुख या निराशा को खुलकर व्यक्त नहीं करते और अंदर ही अंदर दबाते हैं, तो यह वैसा ही है जैसे किसी गेंद को पानी के अंदर जोर से दबाकर रखना। उसमें बहुत ज्यादा ताकत लगती है! बीती बातों और पुरानी चोटों (Past Trauma) को मन में समेटे रखना: जब हम पुरानी दर्दनाक यादों या किसी के प्रति कड़वाहट (Resentment) को मन में बैठाए रखते हैं, तो हमारा शरीर लगातार 'कोर्टिसोल' (स्ट्रेस हार्मोन) बनाता रहता है, जो हमें मानसिक रूप से निचोड़ देता है। सहानुभूति की थकावट (Compassion Fatigue): यदि आप हमेशा किसी दुखी या बीमार प्रियजन को संभाल रहे हैं और उनकी तकलीफ को खुद महसूस कर रहे हैं, तो आप भावनात्मक रूप से खाली हो सकते हैं। हर समय नकारात्मक सोच (Negative Self-Talk): बात-बात पर शिकायत करना, खुद की आलोचना करना या हर स्थिति में बुरा सोचना हमारे दिमाग को डोपामाइन और सेरोटोनिन जैसे 'हैप्पी केमिकल्स' से वंचित कर देता है। ग) बौद्धिक/मानसिक स्तर पर (Intellectual Depletion) ओवरथिंकिंग और ऑब्सेशन (Overthinking): रात को सोते समय पुरानी गलतियों, किसी से हुई बहस या भविष्य की चिंताओं को दिमाग में बार-बार दोहराना (Replaying scenes)। गहन विचार और फैसले लेना: क्या आप जानते हैं कि हमारा दिमाग हमारी कुल कैलोरी का लगभग एक-तिहाई हिस्सा सिर्फ सोचने और निर्णय लेने में खर्च करता है? लगातार पढ़ाई, गहरी रिसर्च या जटिल फैसले लेने के बाद बहुत थकावट होना पूरी तरह स्वाभाविक है। घ) संबंधों के स्तर पर (Relational Depletion) दूसरों को खुश करने की आदत (People Pleasing): सबको खुश रखने के चक्कर में 'हाँ' कहना, अपनी सीमाएँ (Boundaries) न तय कर पाना और हर समय नकाब पहनकर जीना अत्यंत थकाऊ होता है। बनावटी बनकर रहना (Masking): आप अंदर से कुछ और महसूस कर रहे हैं, लेकिन लोक-लाज या शर्म के कारण बाहर से मुस्कुराने का नाटक कर रहे हैं — यह स्थिति दिमाग को बहुत थकाती है। अकेलापन या लगातार झगड़े: घर में बच्चों या जीवनसाथी के साथ लगातार होने वाले मतभेद और संवादहीनता हमारी मानसिक शांति को खत्म कर देती है। 3. 'डिफ़ॉल्ट सेटिंग्स' और बचपन के प्रभाव बचपन के माहौल या पुरानी परिस्थितियों के कारण कई लोगों के दिमाग में कुछ 'डिफ़ॉल्ट सेटिंग्स' (Default Settings) बन जाती हैं। जैसे: 1. शर्म और असुरक्षा (Chronic Shame): यह सोचना कि "मैं तो किसी काम का नहीं हूँ" या "लोग मेरे बारे में क्या सोचेंगे?" 2. परफेक्शनिज़्म (Perfectionism): हर काम 100% परफेक्ट होना चाहिए, वरना खुद को कोसना। 3. नियंत्रण करने की चाह (Control Freak): हर चीज़ और हर व्यक्ति को अपने हिसाब से चलाने की कोशिश करना। ये डिफ़ॉल्ट सेटिंग्स 24 घंटे बैकग्राउंड में एक 'हैवी ऐप' की तरह चलती रहती हैं, जो आपकी अंदरूनी बैटरी को बहुत तेज़ी से ड्रैन (drain) करती हैं। 4. तो फिर असली 'सेल्प-केयर' क्या है? (What is True Self-Care?) अब सवाल यह उठता है कि इस इमोशनल और मेंटल थकावट से बाहर कैसे निकलें? केवल एक दिन छुट्टी मना लेना या स्पा चले जाना इसका पक्का इलाज नहीं है। सच्चा सेल्फ-केयर इन चीज़ों से बनता है: 1. स्वयं के प्रति जागरूकता (Self-Awareness): सबसे पहले यह पहचानें कि आपकी ऊर्जा कहाँ खर्च हो रही है। क्या यह किसी रिश्ते का तनाव है? क्या आप अपनी भावनाएँ दबा रहे हैं? या फिर आप बहुत ज्यादा सोच रहे हैं? 2. अपनी भावनाओं को स्वीकार करें: अगर आपको गुस्सा, डर या दुख महसूस हो रहा है, तो उसे दबाने के बजाय स्वीकार करें। रोना आए तो रो लीजिए, किसी भरोसेमंद व्यक्ति से अपनी बात साझा कीजिए। 3. अपनी सीमाएँ तय करें (Set Boundaries): हर जगह 'हाँ' बोलना बंद कीजिए। जहाँ आपकी मानसिक शांति प्रभावित हो रही हो, वहाँ शालीनता से 'ना' कहना सीखें। 4. 'ओवरथिंकिंग' पर ब्रेक लगाएँ: जब दिमाग एक ही बात को बार-बार दोहराने लगे, तो खुद से कहें — "क्या अभी इस बात को सोचने से कोई समाधान निकलेगा?" अगर नहीं, तो अपना ध्यान किसी शारीरिक गतिविधि (सैर, संगीत, योग) में लगाएँ। 5. सहानुभूति रखें, लेकिन अपनी रीचार्जिंग भी करें: यदि आप किसी अपनों की देखभाल कर रहे हैं, तो याद रखें कि आप खाली कप से किसी दूसरे का कप नहीं भर सकते। पहले खुद को रीचार्ज करें।
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