आइए ग़ज़ल कहना सीखें ग़ज़ल का शिल्प / तामीर पिछले पोस्ट में हमने संक्षेप में जाना कि ग़ज़ल क्या है. आइए अब हम ये समझने के की कोशिश करें कि ग़ज़ल की संरचना क्या होती है. 1. जैसे कोई दीवार ईंट से बनी होती है या कपड़ा धागों से, वैसे ही ग़ज़ल शेर से बनती है. 2. एक ग़ज़ल में कम से कम चार या पांच और अधिकतम 15 शेर या अशआर (शेर का बहुवचन) हो सकते हैं हालांकि किसी ग़ज़ल में शेर की अधिकतम संख्या की कोई स्थापित बंदिश नहीं है. 3. ग़ज़ल के पहले शेर को मतला और आख़री शेर को मक़ता या आख़िरी शेर कहते हैं. 4. किसी ग़ज़ल में शेर एक के बाद एक के क्रम से रखे जाते हैं, मगर इनके रखने के क्रम का कोई नियम नहीं है सिवाए ये कि ग़ज़ल के पहले शेर को मतला और आख़री शेर को मक़ता या आख़िरी शेर कहते हैं और इनका स्थान तदनुसार निश्चित है. मतला या मक़ता के बारे में हम आगे चर्चा करेंगे. 5. यह स्पष्ट है कि ग़ज़ल कहने की विधा को समझने के लिए हमें पहले शेर की संरचना को समझना होगा. 6. नीचे मिर्ज़ा ग़ालिब की एक ग़ज़ल के द्वारा ग़ज़ल के शिल्प को समझाने की कोशिश की गई है- आह को चाहिए इक उम्र असर होने तक कौन जीता है तिरी ज़ुल्फ़ के सर होने तक //१ - (मतला/ पहला शेर) आशिक़ी सब्र-तलब और तमन्ना बेताब दिल का क्या रंग करूँ ख़ून-ए-जिगर होने तक //२ - (दूसरा शेर) हम ने माना कि तग़ाफ़ुल न करोगे लेकिन ख़ाक हो जाएँगे हम तुम को ख़बर होने तक //३ - (तीसरा शेर) ग़म-ए-हस्ती का'असद'किस से हो जुज़ मर्ग इलाज शम्अ हर रंग में जलती है सहर होने तक //४ (मक़ता/ आख़िरी शेर) और इस तरह से ये एक सम्पूर्ण ग़ज़ल हुई. 7. ग़ज़ल के शिल्प को समझने के लिए शेर के अलावा हमें ग़ज़ल के इन अवयवों को अच्छी तरह समझना होगा a) मतला, b) मक़ता, c) क़ाफिया, d) रदीफ़, e) बह्र (scale), f) रुक्न