ग़ज़ल दोस्तो, पेशे ख़िदमत है मेरी नयी ग़ज़ल, अर्ज़ किया है- करना तो चाहा अहदे जवानी में कुछ नया लेकिन मिला शराब न पानी में कुछ नया //१ کرنا تو چاہا عہد جوانی میں کچھ نیا لیکن ملا شراب نہ پانی میں کچھ نہ آیا//۱ इस आस में ही उम्र ये सारी गुज़र गई आएगा मोड़ मेरी कहानी में कुछ नया //२ اس آس میں ہی عمر یہ ساری گزر گئی آئے گا موڑ میری کہانی میں کچھ نیا//۲ हिजरत का सोज़, अजनबी शहरों की बेरुख़ी किसको मिला है नक़्ल मकानी में कुछ नया //३ ہجرت کا سوز، اجنبی شہروں کی بے رخی کس کو ملا ہے نقل مکانی میں کچھ نہیں یا//۳ इक फूल थी ये ज़िंदगी, खिल के बिखर गई होना भी क्या था गुलशने फ़ानी में कुछ नया //४ اک پھول تھی یہ زندگی، کھل کے بکھر گئی ہونا بھی کیا تھا گلشن فانی میں کچھ نیا//۴ मेरी सुख़नबरी के यूँ चर्चे नहीं हैं 'राज़' है पेंच मेरी तुर्रा बयानी में कुछ नया //५ میری سخن بری کے یوں چرچے نہیں ہیں راز ہے پنچ میری ترّہ بیانی میں کچھ نیا//۵ अहदे जवानी- युवावस्था हिजरत- विरह, जुदाई, वतन छोड़ना, परदेस में बसना, प्रवास, पलायन सोज़- जलन, दुख, वेदना नक़्ल मकानी- अपने आवासीय ठिकाने को बदलना, प्रवास, आप्रवासन, परदेश में बसना गुलशने फ़ानी- नश्वर उद्यान अर्थात दुन्या सुख़नबरी- शाइरी पेंच- घुमाव तुर्रा बयानी- वार्ता की अद्भुतता