Aurat Ka Aashkar पुरूष इसलिए श्रेष्ठ है... अगर औरत पुरुष को संतुष्ट न करती हो तब, भी घर गृहस्थी चलती रहती है।जबकि पुरूष, के नपुंसक होने या संबंध बनाने में असमर्थता के चलते कोई स्त्री रूकी हो तो एकाध उदाहरण, आप बताएं..।अगर दूसरी तीसरी औरत से नाजायज रिश्ता. बन जाए तो वह पहली की हत्या नहीं करता, (कुछ अपवादो को छोड़कर।)जबकि औरते 75% मामलो में प्रेमी संग मिलकर पति की हत्या कर दे रहीं हैंवह भी अत्यंत क्रूरतापूर्ण तरीको से..। पुरूष नगदी लाता है तो लगभग वह परिवार की होती है,मुख्यतः पत्नी को ही देता है..। अगर स्त्री कमाए तो पति जूठे टुकड़ो पर पलने वाला होता है..। औरत की कमाई पर पलता है ,हालांकि मजदूर वर्ग के शराबियों पर यह लागू नही..। आईएएस बनी औरत को उस पोस्ट से नीचे वाला खुद की बेइज्जती लगती है।औरत से कम कमाई भी चपरासी सा व्यवहार पाता है..। जबकि पुरूष कमाए तो केवल घर के कामो पर ही औरत आसमान सिर पर ले लेती है..। 1. वैवाहिक जीवन और शारीरिक संतुष्टि ​यह सच है कि कई मामलों में अगर आपसी शारीरिक संबंध कमजोर भी हों, तो भी परिवार के अन्य दायित्वों (जैसे बच्चों की परवरिश या सामाजिक दबाव) के कारण रिश्ते चलते रहते हैं। हालांकि, यह स्थिति केवल एकतरफा नहीं है: ​पुरुषों का समर्पण: इतिहास और वर्तमान में ऐसे अनगिनत उदाहरण हैं जहाँ पुरुषों ने अपनी जीवनसाथी की गंभीर बीमारी, असमर्थता या किसी अन्य कमी के बावजूद पूरी वफादारी और प्रेम के साथ जीवन बिताया है। ​स्त्रियों का त्याग: भारतीय समाज में ऐसे भी बहुत से उदाहरण हैं जहाँ महिलाओं ने पति की शारीरिक या मानसिक अक्षमता के बाद भी पूरी उम्र उनके साथ बिताई है, उनका ख्याल रखा है और परिवार को बिखरने नहीं दिया। सामाजिक लोकलाज या गहरे भावनात्मक लगाव के कारण स्त्रियाँ भी ऐसे रिश्तों को निभाती हैं। ​2. अपराध और मानवीय स्वभाव ​जब बात रिश्तों में धोखे या अपराध (जैसे जीवनसाथी की हत्या) की आती है, तो इसे किसी एक जेंडर (लिंग) के चश्मे से देखना पूरी तरह सटीक नहीं होगा: ​अपराध का संबंध किसी लिंग (स्त्री या पुरुष) से नहीं, बल्कि मानवीय प्रवृत्ति, मानसिक विकृति और व्यक्तिगत परिस्थितियों से होता है। ​मीडिया में जब भी इस तरह की क्रूर घटनाएं सामने आती हैं (चाहे वह पुरुष द्वारा की गई हो या महिला द्वारा), वे पूरे समाज को झकझोर देती हैं। कानूनी और सामाजिक आंकड़े बताते हैं कि घरेलू हिंसा या रिश्तों में गंभीर अपराधों के पीछे दोनों ही पक्षों के अलग-अलग मामले होते हैं। किसी भी पक्ष द्वारा किया गया ऐसा कृत्य पूरी तरह निंदनीय और अपवाद ही माना जाता है। ​3. आर्थिक भूमिका और सामाजिक नजरिया ​आर्थिक योगदान को लेकर समाज में तेजी से बदलाव आ रहा है, लेकिन पुरानी रूढ़ियाँ अभी भी कहीं-कहीं हावी हैं: ​पुरुष की कमाई: परंपरागत रूप से पुरुष को 'अन्नदाता' माना गया है, और अधिकांश पुरुष आज भी अपनी पूरी कमाई परिवार और बच्चों के भविष्य पर ही खर्च करते हैं। ​महिला की कमाई और समाज की सोच: जब कोई महिला अधिक कमाने लगती है या ऊंचे पद (जैसे IAS) पर पहुंचती है, तो कई बार समाज का पुराना ढांचा उस बदलाव को आसानी से स्वीकार नहीं कर पाता। पुरुष के मन में हीन भावना आना या महिला के व्यवहार में बदलाव आना—यह दोनों ही बातें पूरी तरह से व्यक्तिगत परिपक्वता (Maturity) पर निर्भर करती हैं, न कि उनके जेंडर पर। ऐसे कई उदाहरण भी हैं जहाँ उच्च पदों पर बैठी महिलाओं के पतियों ने उन्हें आगे बढ़ने में पूरा सहयोग दिया और वे बेहद सफल वैवाहिक जीवन जी रहे हैं। ​4. घरेलू श्रम की अहमियत ​यह धारणा कि "स्त्री केवल घर का काम करती है," धीरे-धीरे बदल रही है। अर्थशास्त्र और समाजशास्त्र अब मानते हैं कि घर की देखभाल करना, बच्चों की परवरिश करना और परिवार को संभालना एक अदृश्य लेकिन बेहद महत्वपूर्ण आर्थिक और भावनात्मक योगदान है। अगर घर का प्रबंधन सही न हो, तो बाहर जाकर पैसे कमाना भी मुश्किल हो जाता है। ​निष्कर्ष: कोई भी रिश्ता इस बात से 'श्रेष्ठ' नहीं बनता कि कौन कितना कमाता है या कौन अधिक त्याग करता है। रिश्ता तब चलता है जब दोनों पक्ष एक-दूसरे की कमियों को स्वीकार करते हुए, आपसी सम्मान और समझदारी के साथ आगे बढ़ते हैं। समाज में हर तरह के अच्छे और बुरे उदाहरण मौजूद हैं, लेकिन एक स्वस्थ समाज का निर्माण आपसी तालमेल से ही संभव है।