Ghazal by Rahat Indori महान शायर और कवि राहत इंदौरी साहब को उनकी DEATH- ANNIVERSARY पर दिली खिराज़ -ए -अक़ीदत और विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं 💐पेश है उनकी एक खूबसूरत ग़ज़ल... 🥀🥀 🥀हाथ ख़ाली हैं तिरे शहर से जाते जाते जान होती तो मिरी जान लुटाते जाते 🥀अब तो हर हाथ का पत्थर हमें पहचानता है उम्र गुज़री है तिरे शहर में आते जाते 🥀अब के मायूस हुआ यारों को रुख़्सत कर के जा रहे थे तो कोई ज़ख़्म लगाते जाते 🥀रेंगने की भी इजाज़त नहीं हम को वर्ना हम जिधर जाते नए फूल खिलाते जाते 🥀मैं तो जलते हुए सहराओं का इक पत्थर था तुम तो दरिया थे मिरी प्यास बुझाते जाते 🥀मुझ को रोने का सलीक़ा भी नहीं है शायद लोग हँसते हैं मुझे देख के आते जाते 🥀हम से पहले भी मुसाफ़िर कई गुज़रे होंगे कम से कम राह के पत्थर तो हटाते जाते..!!🌹🌹 -राहत इंदौरी साहब 💐