तुम आओ तो जरा बता देना⁣ मैं थोड़ा घर अपना सजा दूंगा⁣ बहुत काँटे चुभते हैं यूँ तो⁣ तन्हाई की इस राह पर मुझे⁣ तुम आओ तो जरा बता देना⁣ मैं कुछ फूल प्रेम के बिछा दूंगा⁣ ⁣ बायीं तरफ से टूटा हुआ है सोफा⁣ जरा दायीं तरफ ही बैठना तुम⁣ मैं ☕चाय बना कर लाऊं तब तक⁣ दीवार पे अपनी तस्वीरें देखना तुम⁣ ऊब लगे तुम्हें तो,बेहिचक जता देना⁣ मैं कोई गीत तुम्हारे लिए गा दूंगा⁣ ⁣ घर के हर कोने में रखी हैं यादें⁣ प्रतीक्षा में पथरा गई हैं अधूरी बातें⁣ उन्हें आहिस्ता-आहिस्ता छूना तुम⁣ छूना मेरी आँखों के आंसुओं को भी⁣ इंतज़ार में ठोस हुए हृदय को छूकर⁣ पुनः पत्थर से अहिल्या करना तुम⁣ असहज हो मन भीतर तो इशारे से बता देना⁣ मैं दो चेयर बालकनी में लगा दूंगा⁣ ⁣ आ ही जाओ तो जरा ⁣ शाम तक ठहरना तुम⁣ खाना अच्छा बना लेता हूँ अब⁣ चख कर जरूर देखना तुम⁣ मुझे देखना,घड़ी मत देखना तुम⁣ जान बूझ कर बिखराई है मैंने किताबें⁣ अपने हाथों से एक बार समेटना तुम⁣ जाने का हो समय जब⁣ अपना सर मेरे कांधे से बस सटा देना⁣ मैं यह कविता तुम्हें सुना दूंगा।⁣ तुम आओ तो जरा बता देना⁣ मैं थोड़ा घर अपना सजा दूंगा⁣।पिछले एक दशक से सक्रिय रूप से लेखन कर रहे.. हेमन्त परिहार जी की एक खूबसूरत कविता.. तुम आओ तो जरा बता देना⁣.. मैं थोड़ा घर अपना सजा दूंगा⁣ बहुत काँटे चुभते हैं यूँ तो⁣ तन्हाई की इस राह पर मुझे⁣ तुम आओ तो जरा बता देना⁣ मैं कुछ फूल प्रेम के बिछा दूंगा⁣ ⁣ बायीं तरफ से टूटा हुआ है सोफा⁣ जरा दायीं तरफ ही बैठना तुम⁣ मैं ☕चाय बना कर लाऊं तब तक⁣ दीवार पे अपनी तस्वीरें देखना तुम⁣ ऊब लगे तुम्हें तो,बेहिचक जता देना⁣ मैं कोई गीत तुम्हारे लिए गा दूंगा⁣ ⁣ घर के हर कोने में रखी हैं यादें⁣ प्रतीक्षा में पथरा गई हैं अधूरी बातें⁣ उन्हें आहिस्ता-आहिस्ता छूना तुम⁣ छूना मेरी आँखों के आंसुओं को भी⁣ इंतज़ार में ठोस हुए हृदय को छूकर⁣ पुनः पत्थर से अहिल्या करना तुम⁣ असहज हो मन भीतर तो इशारे से बता देना⁣ मैं दो चेयर बालकनी में लगा दूंगा⁣