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A personal blog by Pavan Kumar "Paavan"
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8:19 PM
Article Published by : PAVAN KUMAR SHARMA,' PAAVAN &MAAHIR
तुम आओ तो जरा बता देना मैं थोड़ा घर अपना सजा दूंगा बहुत काँटे चुभते हैं यूँ तो तन्हाई की इस राह पर मुझे तुम आओ तो जरा बता देना मैं कुछ फूल प्रेम के बिछा दूंगा बायीं तरफ से टूटा हुआ है सोफा जरा दायीं तरफ ही बैठना तुम मैं ☕चाय बना कर लाऊं तब तक दीवार पे अपनी तस्वीरें देखना तुम ऊब लगे तुम्हें तो,बेहिचक जता देना मैं कोई गीत तुम्हारे लिए गा दूंगा घर के हर कोने में रखी हैं यादें प्रतीक्षा में पथरा गई हैं अधूरी बातें उन्हें आहिस्ता-आहिस्ता छूना तुम छूना मेरी आँखों के आंसुओं को भी इंतज़ार में ठोस हुए हृदय को छूकर पुनः पत्थर से अहिल्या करना तुम असहज हो मन भीतर तो इशारे से बता देना मैं दो चेयर बालकनी में लगा दूंगा आ ही जाओ तो जरा शाम तक ठहरना तुम खाना अच्छा बना लेता हूँ अब चख कर जरूर देखना तुम मुझे देखना,घड़ी मत देखना तुम जान बूझ कर बिखराई है मैंने किताबें अपने हाथों से एक बार समेटना तुम जाने का हो समय जब अपना सर मेरे कांधे से बस सटा देना मैं यह कविता तुम्हें सुना दूंगा। तुम आओ तो जरा बता देना मैं थोड़ा घर अपना सजा दूंगा।पिछले एक दशक से सक्रिय रूप से लेखन कर रहे.. हेमन्त परिहार जी की एक खूबसूरत कविता.. तुम आओ तो जरा बता देना.. मैं थोड़ा घर अपना सजा दूंगा बहुत काँटे चुभते हैं यूँ तो तन्हाई की इस राह पर मुझे तुम आओ तो जरा बता देना मैं कुछ फूल प्रेम के बिछा दूंगा बायीं तरफ से टूटा हुआ है सोफा जरा दायीं तरफ ही बैठना तुम मैं ☕चाय बना कर लाऊं तब तक दीवार पे अपनी तस्वीरें देखना तुम ऊब लगे तुम्हें तो,बेहिचक जता देना मैं कोई गीत तुम्हारे लिए गा दूंगा घर के हर कोने में रखी हैं यादें प्रतीक्षा में पथरा गई हैं अधूरी बातें उन्हें आहिस्ता-आहिस्ता छूना तुम छूना मेरी आँखों के आंसुओं को भी इंतज़ार में ठोस हुए हृदय को छूकर पुनः पत्थर से अहिल्या करना तुम असहज हो मन भीतर तो इशारे से बता देना मैं दो चेयर बालकनी में लगा दूंगा
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