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A personal blog by Pavan Kumar "Paavan"
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8:40 PM
Article Published by : PAVAN KUMAR SHARMA,' PAAVAN &MAAHIR
खि़राज एअकी़दत _उर्दू अदब की अज़ीम शायर*जांनिसार अख़्तर _ एक भी ख़्वाब ना हो जिन में वोह आंखें क्या हैं! एक न एक ख्वाब तो आंखों में बसाओ यारों!! (जां निसार अख़्तर) 20वीं सदी के महान उर्दू ग़ज़ल गो शायर फिल्मी नाग़मा निगार जाँनिसार अख़्तर (1914–1976) उर्दू अदब के अहम शायर, ग़ज़लगो और प्रगतिशील तहरीक से जुड़े साहित्यकार थे। उनका जन्म ग्वालियर में 18 फरवरी 1914 को हुआ। उनके वालिद मशहूर शायर मुज़्तर ख़ैराबादी थे। उन्होंने अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी से उर्दू में एम.ए. किया और अध्यापन के बाद मुंबई में फ़िल्मी दुनिया से जुड़े। उनकी शायरी में रूमानी एहसास, सामाजिक चेतना और ज़िंदगी की सच्चाइयों का ख़ूबसूरत मेल दिखाई देता है! लोग कहते हैं कि तू अब भी ख़फ़ा है मुझे से! तेरी आंखों ने तो कुछ और कहा है मुझ से!! ,(जांनिसार अख़्तर) शायरी और मजमूआ--ए-कलाम,जाँ निसार अख़्तर ने ग़ज़ल, नज़्म, गीत और दूसरी काव्य-विधाओं में अपनी पहचान बनाई। उनके प्रमुख (काव्य संग्रह) मजमूआ-ए-कलाम में ‘सिलसिले’, ‘नज़र-ए-बुताँ’, ‘जाविदाँ’, ‘घर आँगन’, ‘पिछले पहर’ और ‘ख़ाक-ए-दिल’ शामिल हैं। उनकी ज़बान सरल, रवाँ और असरदार थी, जिसमें हिंदी शब्दों का भी ख़ूबसूरत इस्तेमाल मिलता है। फ़िल्मी सफ़र---मुंबई में उन्होंने फ़िल्मों के लिए गीत लिखे और लगभग चार दशकों तक फ़िल्मी दुनिया से जुड़े रहे। ‘यास्मीन’, ‘सी.आई.डी.’, ‘नया अंदाज़’, ‘ब्लैक कैट’ और कई अन्य फ़िल्मों के गीतों ने उन्हें फ़िल्मी गीतकार के रूप में भी लोकप्रिय बनाया।जाँ निसार अख़्तर को फ़िल्मी दुनिया में एक नफ़ीस शायर और गीतकार के रूप में पहचान दिलाने वाले कुछ मशहूर गीत इस प्रकार हैं— "आँखों ही आँखों में इशारा हो गया" — फ़िल्म C.I.D. (1956) "ये दिल और उनकी निगाहों के साये" — फ़िल्म प्रेम पर्वत (1973) "आ जा रे ओ मेरे दिलबर आ जा" — फ़िल्म नूरी "ग़म की अँधेरी रात में" — फ़िल्म सुशीला "बे-मुरव्वत बेवफ़ा बेगाना-ए-दिल आप हैं" — फ़िल्म सुशीला "पिया पिया पिया मेरा जिया पुकारे" — फ़िल्म बाप रे बाप (1955) "गरीब जान के हमको न तुम मिटा देना" — फ़िल्म छूमंतर (1956) जाँ निसार अख़्तर के गीतों की सबसे बड़ी ख़ासियत यह थी कि उन्होंने फ़िल्मी गीतों में भी उर्दू शायरी की नफ़ासत, लफ़्ज़ों की मिठास और अदबी शान को बरक़रार रखा पुरस्कार और सम्मान---उनकी साहित्यिक सेवाओं के लिए उन्हे कई सम्मान मिले! ‘ख़ाक-ए-दिल’ पर उन्हें 1976 का साहित्य अकादेमी पुरस्कार (उर्दू) प्रदान किया गया। इसके अतिरिक्त उन्हें सोवियत लैंड नेहरू पुरस्कार और अन्य साहित्यिक सम्मानों से भी नवाज़ा गया। निधन जाँ निसार अख़्तर का निधन19 अगस्त 1976 में मुंबई में हुआ, लेकिन उनकी ग़ज़लों, नज़्मों और फ़िल्मी गीतों की ख़ुशबू आज भी उर्दू अदब और हिंदुस्तानी फ़िल्मी संगीत के चाहने वालों के दिलों में ज़िंदा है। जानिसार अख्तर जी ने अपनी शायरी और गीतों के ज़रिए मोहब्बत इंसानियत और खूबसूरत एहसासों को आवाज़ दी उन का फ़न और उनकी शायरी आने वाली नस्लों तक उर्दू अदब की रौशनी पहुँचाती रहेगी__ जान निसार अख़्तर का बेहतरीन कलाम आपके लिए_ ज़िंदगी यह तो नहीं तुझको संवारा ही ना हो! कुछ ना कुछ हमने तेरा क़र्ज़ उतारा ही ना हो!! दिल को छू जाती है यूं रात की आवाज़ अभी! चौंक उठता हूं कहीं तूने पुकारा ही ना हो!! कभी पलकों पर चमकती है जो अश्कों की लकीर! सोचता हूं तेरे आंचल का किनारा ही ना हो!! जिंदगी एक खलिश देके ना रह जा मुझको! दर्द वह दे जो किसी तरह गवारा ही ना हो!! शर्म आती है से इस शहर में हम हैं कि जहां ना मिले भी तो लाखों का गुजा़रा ही ना हो !! जरा सी बात पर हर रस्म तोड़ आया था! दिल ए तबाह ने भी क्य मिज़ाज पाया था!! मआफ़ कर ना सकी मेरी ज़िंदगी मुझको! वह एक लम्हा कि मैं तुझ से तंग आया था!! पता नहीं के मेरे बाद उन पर क्या गुज़री! मैं चंद ख़्वाब जमाने पर छोड़ आया था!!
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