मीर तक़ी 'मीर' के समकालीन। अग्रणी शायर जिन्होंने भारतीय संस्कृति और त्योहारों पर नज्में लिखीं। होली, दीवाली, श्रीकृष्ण पर नज़्मों के लिए मशहूर... नज़ीर अकबराबादी का परिचय उपनाम :'नज़ीर' मूल नाम :शेख़ वली मुहम्मद जन्म :दिल्ली निधन :16 Aug 1830 | आगरा, उत्तर प्रदेश तख़ल्लुस नज़ीर और शायर बेनज़ीर, बेनज़ीर इसलिए कि उन जैसा शायर तो दूर रहा, उनकी श्रेणी का शायर न उनसे पहले कोई था न उनके बाद कोई पैदा हुआ। नज़ीर अकबराबादी उर्दू शायरी की एक अनोखी आवाज़ हैं जिनकी शायरी इस क़दर अजीब और हैरान करनेवाली थी कि उनके ज़माने की काव्य चेतना ने उनको शायर मानने से ही इनकार कर दिया था। नज़ीर से पहले उर्दू शायरी ग़ज़ल के गिर्द घूमती थी। नज़ीर की निगाह में गहराई और चिंतन में वज़न की जो कमी नज़र आती है उसकी भरपाई उनकी व्यापक दृष्टि, ख़ुलूस, विविधता, यथार्थवाद, सादगी और सार्वजनिक दृष्टिकोण से हो जाती है और यही बातें उनको उर्दू का एक अनोखा शायर बनाती हैं! मशहूर शायर Nazeer Akbarabadi की Death Anniversary के मौक़े पर बतौर नज़राना, पेश है उनकी एक मक़बूल ग़ज़ल की बेहतरीन पंक्तियां...! दूर से आए थे साक़ी सुन के मय-ख़ाने को हम बस तरसते ही चले अफ़्सोस पैमाने को हम मय भी है मीना भी है साग़र भी है साक़ी नहीं दिल में आता है लगा दें आग मय-ख़ाने को हम क्यूँ नहीं लेता हमारी तू ख़बर ऐ बे-ख़बर क्या तिरे आशिक़ हुए थे दर्द-ओ-ग़म खाने को हम हम को फँसना था क़फ़स में क्या गिला सय्याद का बस तरसते ही रहे हैं आब और दाने को हम ताक़-ए-अबरू में सनम के क्या ख़ुदाई रह गई अब तो पूजेंगे उसी काफ़िर के बुत-ख़ाने को हम बाग़ में लगता नहीं सहरा से घबराता है दिल अब कहाँ ले जा के बैठें ऐसे दीवाने को हम क्या हुई तक़्सीर हम से तू बता दे ऐ 'नज़ीर' ताकि शादी-मर्ग समझें ऐसे मर जाने को हम