ये उन दिनों की बात है जब ए और बी साइड कैसेट और टेप रिकॉर्डर का दौर था। संगीत मौसिकी , दिल को सुकून और दूसरी दुनिया में ले जाने वाला सबसे सुलभ जरिया था. खाली वक़्त और ख़ास तौर पर गर्मियों की छुट्टी में , मैं इसी मौसिकी में खुद को डुबो देता. अलग अलग संगीत के ज़ायके में ,सबसे बड़ा हिस्सा, ग़ज़ल को होता। जगजीत सिंह और गुलाम अली, सीने के बाए ओर , मुस्तक़िल ठहरे रहते. इस बार भी गर्मी की छुट्टी आयी और मैं १२वी के इम्तेहान की थकन उतार रहा था. एक बोझिल सी शाम , एक ग़ज़ल शौक़ीन परिचित के घर गया तो नक्काशीदार आवाज़ में एक ग़ज़ल चल रही थी. ' अब के बिछड़े तो तो शायद कभी ख्वाबो में मिले। ..जिस तरह सूखे हुए फूल किताबो में मिले। १२वी के कुछ बेहद करीबी दोस्त, अपनी ज़िन्दगी और मुस्तकबिल बनाने , मेरा साथ और शहर छोड़ दिल्ली और रूस जा रहे थे. उनसे दूर होने का दर्द, उस ग़ज़ल के शेर, और वो तराश वाली आवाज़ , उस दिन, दिल में बैठ गयी. परिचित ने बताया ये मेहदी हसन साब है. ग़ज़ल के बादशाह, १२वी तक मैंने जगजीत सिंह और गुलाम अली साब को खूब सुना था लेकिन मेहदी हसन साब का सिर्फ नाम सुना था, ग़ज़ल नहीं। उस पूरी शाम उस ग़ज़ल के हर शेर पर मेहदी हसन साब की लयकारी, हरकत और लहराती आवाज़, दिल की भीतरी दीवारों पर, आंसू की लकीरे बनाती रही. अगले दिन कैसेट की दूकान में मेहदी हसन साब की ग़ज़ल का कैसेट खोजा तो बमुश्किल एक दूकान पर ख्वाहिश पूरी हुई । छोटे शहरों की बुनियादी तकलीफे , उनके अपने मसाइल , कई बार ऐसे हो जाते है कि बहुत महीन हुनर की अनजाने में अनदेखी हो जाती है.