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Ghazal-147

ग़ज़ल- मेरी ग़ज़लों में मिलती है, माटी की बू-बास ज़रा, कल की झलक सहित है इनमें,वर्तमान-इतिहास ज़रा। मर्म भाव का जो जानेगा वो ही इन्हें समझ सकता, समझो इनको,आ जाएगा,जीवन में,उल्लास ज़रा। जीवन के वो सूत्र मिलेंगे,जो अब तक कहते आए, ऋषि,मुनि,जैन,बौद्ध,कबीर,मार्क्स और रैदास ज़रा। कितने चढ़े मुलम्मे इन पर,जन-जीवन ढँग से देखो, आमआदमी की पीड़ा का तब होगा अहसास ज़रा। आज सत्य के संवाहक ख़तरे में ख़ुद को डाल रहे, ऐसे लोगों के कामों से दिखती हमको आस ज़रा। मीठा बोलें,सज धज के,जो दोषी हैं,लेकिन देखो, देवतुल्य प्रचारित करते उनको,चमचे ख़ास ज़रा। राष्ट्र,धर्म,सभ्यता,आदि के मीठे सपने दिखला कर, वो कहते झेलो चुप रह कर,उनका है जो त्रास जरा। वो कहते हैं सत्य वही है जो वो कहते अपने मुख से, गर्मी को भी कहना सीखो अब मादक मधुमास ज़रा।

Ghazal-146

ग़ज़ल- मुसलसल ज़िन्दगी बल खा रही है, जहां पे रीझ के इतरा रही है। मुसलसल=लगातार, सतत, वही दुनिया में इक जल्वानुमा है, मगर दुनिया तो धोखा खा रही है। वही=यहाँ ईश्वर के लिए प्रयुक्त हुआ है,जल्वानुमा=दृष्टिगोचर होना, दिखना नज़र जो आ रही हर शय अलग कुछ, अना हमको यहाँ भरमा रही है। शय=वस्तु,अना=अहंकार अना देखो तो कितनी नासमझ है, इबादत से जो ये टकरा रही है। वो जीते ज़िन्दगी लम्हों की लेकिन, बक़ा की मुझको तो चिंता रही है। लम्हा=क्षण,बक़ा=शाश्वतता कमी अपनी भी कुछ तुमको मिलेगी, कली कोई अगर मुरझा रही है। जो ख़ुद की फ़िक्र ही उनको है,तो हो, मेरी सब के लिए चिंता रही है। तुम्हारे दिल में,बेेशक़,घर करेगी, ग़ज़ल जो दिल से दिल की आ रही है।

Sanatan Dharma

*धर्म क्या है ? - धर्म किसे कहते हैं ??* धर्म एक संस्कृत शब्द है। धर्म का अर्थ बहुत व्यापक है। जो धारण करने योग्य है, वही धर्म कहलाता है।जैसे हम किसी नियम को, व्रत को धारण करते हैं इत्यादि। इस अनुसार धर्म का अर्थ है कि जो सबको धारण किए हुए है अर्थात धारयति- इति धर्म:!। अर्थात जो सबको संभाले हुए है वे धर्म ।धर्म के बिना यह सारा संसार सारी सृष्टी चल ही नही सकती जैसे पृथ्वी समस्त प्राणियों को धारण किए हुए है यह पृथ्वी का धर्म / व्रत है। हर वस्तु का धर्म गुण होता है जैसे पानी का धर्म शीतलता। अग्नि का धर्म जलना और प्रकाश करना। पशु पक्षियों का धर्म निश्चित है लेकिन मनुष्य धर्म गुण अपनाने में स्वतंत्र है। तभी वे मनुष्य से अमनुषय भी बन जाता है।धर्म वे नियम या कर्म है जिस पर चलना पुण्य और जिन पर न चलना पाप कहलाता है। हर व्यक्ति पूर्व जन्म के संस्कारों से या जन्म के बाद शिक्षा से धर्म और अधर्म के गुण प्राप्त करता है। अगर वे जीवन में मनुष्यता के गुण लेकर चलता है तो उसे धार्मिक व्यक्ति कह सकते हैं। ईशवर ने जो हर मनुष्य के हृदय में मनुष्यता के गुण दिये है उन गुणों पर चलने और अपनाने से ही व्यक्ति को धार्मिक कहा जा सकता है। वास्तव में धर्म आत्म उन्नती व आत्म कल्याण का एक मात्र पवित्र मार्ग है. उससे हट कर सभी क्रिया कलाप डकोसले पाखण्ड है या सम्प्रदाय कहलाते है धर्म नहीं। जिसका कोई लाभ नहीं। मनुष्य के क्या गुण है ? उसके लिए क्या धारण करने योग्य है ? जिससे वे आपना लोक व परलोक सुधार सकता है और मनुष्य कहला सकता है ? वे हैं धैर्य रखना दया करना क्षमा करना सत्यता मन और कर्मो में क्रोद्ध न करना चोरी न करना इन्द्रियों पर कंट्रोल करना शरिरक मानसिक स्वच्छता ज्ञान बढ़ाना यह सब धर्म है धर्म के नियम है जो इन को धारण करने से वे धार्मिक कहलाता है।* बाहरी चिन्ह मनुष्य को धार्मिक नहीं बनाते अपितु आत्मिक व मानसिक गुण व्यक्ति को धार्मिक बनाते है। तिलक,टीका,भगवा,टोपी, भस्म, पगड़ी लगा लेने से कोई धर्मात्मा या धार्मिक नहीं बनता। धर्म सभी काल में सभी स्थान पर सभी व्यक्तियों के लिए एक ही है क्योंकि धर्म के नियम सत्य तर्क विज्ञान और अटल सृष्टि नियमों पर आधारित होते है । धर्म का कोई नाम नही होता जहाँ नाम है वे धर्म नही सम्प्रदाय है। धर्म की परिभाषा इस प्रकार भी कि गई है जो पक्ष पात रहित न्याय सत्य का ग्रहण, असत्य का सर्वथा परित्याग रूप आचार व्यवहार हैं उसी का नाम धर्म और उससे विपरीत का अधर्म हैं।जो ईश्वर आज्ञा के विरुद्ध नहीं हैं और आत्मा की आवाज को सुन कर कार्य करना उसको ही धर्म मानना चाहिए। जो व्यवहार स्वयं को प्रिय नही वे दुसरो से भी न करना धर्म है। इन बातों को जो व्यक्ति मत संघ संस्था नहीं मानती वे सभी मज़हब या सम्प्रदाय कहलाते है जिनके अपने अलग अलग नियम अलग अलग शिक्षाएँ व सिद्धांत है। किसी विशेष स्थान पर जाना और माथे टेकना इबादत या नाम रटना धर्म नही। महार्षि मनु ने धर्म के दस लक्ष्मण बताऐ हैं जिन को अपना कर ही मनुष्य धार्मिक कहला सकता है. जो कि इस प्रकार है :- धर्ति: क्षमा दमोऽस्तेयं शौचम् इन्द्रियनिग्रह धी विद्या सत्यमक्रोधो दशकं धर्मलक्षणम्। 1.धृति-सुख,दुःख ,हानि,लाभ,मान,अपमान मे धैर्य रखना 2.क्षमा- शरीर मे सामर्थ्य होने पर भी बुराई का प्रतिकार न करना या बदला न लेना क्षमा है। 3.दम-मन मे अच्छी बातो का चिंतन करना बुरी बातों को दबाना हटाना 4.अस्तेय-बिना दूसरे की आज्ञा के कोई वस्तु न लेना चोरी न करना 5.शौच-शरीर की आत्मिक और शारीरिक शुद्धि रखना 6-इन्द्रियनिग्रह हाथ,पांव,आंख,मुख,नाक आदिको अच्छे कार्यो मे लगाना।इन्द्रियों को संयम में रखना। 7.धी-बुद्धि बढाने हेतू प्रयत्न करना 8.विद्या-ईश्वर द्वारा बनाये गए प्रत्येक पदार्थ का ज्ञान प्राप्त करना तथा उनसे उपयोग लेना 9.सत्य-जो हम जानते है उसको वैसा ही अपने द्वारा कहना मानना सत्य कहलाता है।हमेशा सत्य ही बोलना। 10.अक्रोध-इच्छा से उत्पन्न क्रोध का त्याग करना ही अक्रोध है। महर्षि पतंजलि ने अनुशासन को धर्म कहा जो योग द्वारा प्रप्त किया जा सकता है। महर्षि पतंजलि ने योग को 'चित्त की वृत्तियों के निरोध' (योगः चित्तवृत्तिनिरोधः) के रूप में परिभाषित किया है। उन्होंने 'योगसूत्र' नाम से योगसूत्रों का एक संकलन किया है, जिसमें उन्होंने पूर्ण कल्याण तथा शारीरिक, मानसिक और आत्मिक शुद्धि के लिए आठ अंगों वाले योग का एक मार्ग विस्तार से बताया है। अष्टांग योग (आठ अंगों वाला योग), यह आठ आयामों वाला मार्ग है। योग के ये आठ अंग हैं:- १) यम, २) नियम, ३) आसन, ४) प्राणायाम, ५) प्रत्याहार, ६) धारणा ७) ध्यान ८) समाधि यम:- 1. अहिंसा – शब्दों से, विचारों से और कर्मों से किसी को हानि नहीं पहुँचाना 2. सत्य – विचारों में सत्यता, परम-सत्य में स्थित रहना 3. अस्तेय – चोर-प्रवृति का न होना 4. ब्रह्मचर्य – दो अर्थ हैं: * चेतना को ब्रह्म के ज्ञान में स्थिर करना * सभी इन्द्रिय-जनित सुखों में संयम बरतना 5. अपरिग्रह – आवश्यकता से अधिक संचय नहीं करना 2. नियम:- 1. शौच – शरीर और मन की शुद्धि 2. संतोष – अपनी स्थिति में सदा सन्तुष्ट रहना 3. तप – स्वयं से अनुशाषित रहना 4. स्वाध्याय – आत्मचिंतन करना 5. ईश्वर-प्रणिधान – इश्वर के प्रति पूर्ण समर्पण, पूर्ण श्रद्धा यह पांच यम और पाँच नियम ही धर्म की यात्रा का आरम्भ है। धर्म मूल रूप में संस्कृत शब्द है। इंग्लिश की किताबों में धर्म का अर्थ परिभाषा के रूप में नही मिलता। इंग्लिश में Man का अर्थ भी नही है।धर्म को इंग्लिश में विश्वास / belief अर्थात अलग अलग विश्वासों को धर्म कहा है,वहाँ एक व स्पष्ट परिभाषा नही मिलती । man के लिये इंग्लिश में अर्थ human लिखा और human मतलब शरिरक ढाँचा। जबकि उनके अनुसार बन्दर वग़ैरा भी human कहलाएँगे। जबकि वैदिक ग्रंथों में मानव को “मनुर्भव “ कहा गया है अर्थात जिसमें मनुष्यता के गुण हो वही मनुष्य कहलाने लायक है। मानव कि परिभाषा “जो प्राणी विचार करके उचित और अनुचित को सोच विचार कर कार्य करता है वे मनुष्य कहलाता है “ जो इसके वपरित कार्य करेगा वे आमनुष्य कहलायेगा। जिस समाज में हम रह रहे हैं वे धर्म की बुनियाद पर ही चल रहा है और जो गिरावट देख रहे हैं वे धर्म पर न चलने वाले सम्प्रदायों के कारण हुई जिन्होंने अपने अपने नियम व सिद्धांत गढ़ लिए और मनुष्य जाति को गुटों में बाँट दिया ।धर्म और सम्प्रदाय को एक मानने से ही कुछ लोग धर्म को गाली या रोग कह देते है। महर्षी दयानन्द सरस्वती के अनुसार *मनुष्य किसे कहते हैं!* मनुष्य उसी को कहना जो मननशील होकर अपनी आत्मा के समान अन्यों के सुख – दुख और हानि – लाभ को समझे । अन्यायकारी बलवान से न डरे और धर्मात्मा निर्बल से भी डरता रहे । इतना ही नहीं किन्तु अपने सर्व सामर्थ्य से धर्मात्माओं – कि चाहे वे महाअनाथ , निर्बल क्यों न हों – उनकी रक्षा , उन्नति , प्रियाचरण और अधर्मी चाहे चक्रवर्ती महाबलवान और गुणवान भी हो तथापि उसका नाश , अवनति और अप्रियाचरण सदा किया करे अर्थात जहां तक हो सके वहां तक अन्यायकारियों के बल की हानि और न्यायकारियों के बल की उन्नति सर्वदा किया करें । इस काम में चाहे कितना ही दारुण दुख प्राप्त हो , चाहे प्राण भी भले ही जावें परन्तु इस मनुष्यरुप धर्म से पृथक कभी न होवे । महर्षी दयानन्द सरस्वती

Kavita

जब कभी मन मे व्यथा हो आँसूओं का संग जुदा हो बात मन की कह सको ना तब मुझे तुम याद करना। मुझसे तुम संवाद करना व्यक्त सब जज्बात करना मै सुनूँगा सब धीर रखकर और मार्ग भी प्रशस्त करूँगा। जानता हूँ बहुत कठिन यह गैर से निज जज्बात कहना पीर जब नासूर बनने लगे बेहतर होता उपचार करना। है यही बस वश मे अपने दीप बन जलूँ, तम मिटाऊँ खुद की खातिर जी चुका अब किसी के काम आऊँ।

You and I (English Poem)

You and I Wanderer I, wanderer you, This has been the story for ages. Moment by moment, grain by grain, The world’s ways are charming stages. We meet by coincidences, And through them, we part here. In the making of these chances, Our own conduct must steer. Since we gained life, We have become somewhat aware. Understood a bit about the world, And our minds became somewhat clear. At the time of making decisions, Personal interest deepens in the mind. When thought of everyone’s welfare, We often found ourselves in a bind. From the world's deeds, it seems, Self-interest outweighs altruism. Maintaining balance here, Is our solemn responsibility, our prism. When we meet by chance, We stay together for some time. Share and listen to a few words, And then move on to new climbs. Some things we like, Some things we resent. From whatever experiences we gather, Life’s maturity is what we augment. Some grievances occur, Some laughter and teasing fill our days. From these colorful emotions, The tapestry of life is set ablaze. Everyone has their own experiences, friends, Which seem unique and profound. Some express these in songs, Some endure silently, sound. You and I, our life, Must be lived with compromises and grace. If there are a hundred ways to fall, There is a narrow staircase to embrace. There are many excuses to fight, From which the world suffers a lot. If we see everyone like ourselves, Then life’s battles are better fought. When personal interest grows too much, Nature restores balance true. Even from the darkness of thoughts, It lights up life’s flame anew.

अमर शहीद मंगल पाण्डे

19 जुलाई / जन्मदिवस अमर शहीद मंगल पाण्डे अंग्रेजी शासन के विरुद्ध चले लम्बे संग्राम का बिगुल बजाने वाले पहले क्रान्तिवीर मंगल पांडे का जन्म 19 जुलाई 1827 ग्राम नगवा (बलिया, उत्तर प्रदेश) में हुआ था। युवावस्था में ही वे सेना में भर्ती हो गये थे। उन दिनों सैनिक छावनियों में गुलामी के विरुद्ध आग सुलग रही थी। अंग्रेज जानते थे कि हिन्दू गाय को पवित्र मानते हैं, जबकि मुसलमान सूअर से घृणा करते हैं। फिर भी वे सैनिकों को जो कारतूस देते थे, उनमें गाय और सूअर की चर्बी मिली होती थी। इन्हें सैनिक अपने मुँह से खोलते थे। ऐसा बहुत समय से चल रहा था; पर सैनिकों को इनका सच मालूम नहीं था। मंगल पांडे उस समय बैरकपुर में 34 वीं हिन्दुस्तानी बटालियन में तैनात थे। वहाँ पानी पिलाने वाले एक हिन्दू ने इसकी जानकारी सैनिकों को दी। इससे सैनिकों में आक्रोश फैल गया। मंगल पांडे से रहा नहीं गया। 29 मार्च, 1857 को उन्होंने विद्रोह कर दिया। एक भारतीय हवलदार मेजर ने जाकर सार्जेण्ट मेजर ह्यूसन को यह सब बताया। इस पर मेजर घोड़े पर बैठकर छावनी की ओर चल दिया। वहां मंगल पांडे सैनिकों से कह रहे थे कि अंग्रेज हमारे धर्म को भ्रष्ट कर रहे हैं। हमें उसकी नौकरी छोड़ देनी चाहिए। मैंने प्रतिज्ञा की है कि जो भी अंग्रेज मेरे सामने आयेगा, मैं उसे मार दूँगा। सार्जेण्ट मेजर ह्यूसन ने सैनिकों को मंगल पांडे को पकड़ने को कहा; पर तब तक मंगल पांडे की गोली ने उसका सीना छलनी कर दिया। उसकी लाश घोड़े से नीचे आ गिरी। गोली की आवाज सुनकर एक अंग्रेज लेफ्टिनेण्ट वहाँ आ पहुँचा। मंगल पांडे ने उस पर भी गोली चलाई; पर वह बचकर घोड़े से कूद गया। इस पर मंगल पांडे उस पर झपट पड़े और तलवार से उसका काम तमाम कर दिया। लेफ्टिनेण्ट की सहायता के लिए एक अन्य सार्जेण्ट मेजर आया; पर वह भी मंगल पांडे के हाथों मारा गया। तब तक चारों ओर शोर मच गया। 34 वीं पल्टन के कर्नल हीलट ने भारतीय सैनिकों को मंगल पांडे को पकड़ने का आदेश दिया; पर वे इसके लिए तैयार नहीं हुए। इस पर अंग्रेज सैनिकों को बुलाया गया। अब मंगल पांडे चारों ओर से घिर गये। वे समझ गये कि अब बचना असम्भव है। अतः उन्होंने अपनी बन्दूक से स्वयं को ही गोली मार ली; पर उससे वे मरे नहीं, अपितु घायल होकर गिर पड़े। इस पर अंग्रेज सैनिकों ने उन्हें पकड़ लिया। अब मंगल पांडे पर सैनिक न्यायालय में मुकदमा चलाया गया। उन्होंने कहा, ‘‘मैं अंग्रेजों को अपने देश का भाग्यविधाता नहीं मानता। देश को आजाद कराना यदि अपराध है, तो मैं हर दण्ड भुगतने को तैयार हूँ।’’ न्यायाधीश ने उन्हें फाँसी की सजा दी और इसके लिए 18 अप्रैल का दिन निर्धारित किया; पर अंग्रेजों ने देश भर में विद्रोह फैलने के डर से घायल अवस्था में ही 8 अप्रैल, 1857 को उन्हें फाँसी दे दी। बैरकपुर छावनी में कोई उन्हं फाँसी देने को तैयार नहीं हुआ। अतः कोलकाता से चार जल्लाद जबरन बुलाने पड़े। मंगल पांडे ने क्रान्ति की जो मशाल जलाई, उसने आगे चलकर 1857 के व्यापक स्वाधीनता संग्राम का रूप लिया। यद्यपि भारत 1947 में स्वतन्त्र हुआ; पर उस प्रथम क्रान्तिकारी मंगल पांडे के बलिदान को सदा श्रद्धापूर्वक स्मरण किया जाता है।

Ghazal-145

ग़ज़ल- बोलते थे और कुछ वो मानते थे और कुछ. लोग समझें इस से पहले वो किए हैं और कुछ। वक़्त पर करता नहीं है,वक़्त की परवाह जो, पेच उसका वक़्त भी कसता रहा है और कुछ। बिस्मिलों की बात कैसे हाकिमों तक जाएगी? जो बयां वो दे रहे हैं हलफ़िया,है और कुछ। बिस्मिल=घायल,हल्फिया बयान=शपथ लेकर दिया गया बयान दलबदल करके वो अबतक,राज-सुख पाते रहे, लोग बस कहते रहे,उनकी सज़ा है और कुछ। उनके दल के मुजरिमों को,पारसा समझा गया, क्या सियासत में बताने को बचा है और कुछ? पारसा=पवित्र वो ज़ियादा जोर देकर बात को समझा रहे, लग रहा मुझको इसी से,माज़रा है और कुछ। सीख दे-दे कर चुकी पैगम्बरों की इक क़तार, आदमी फिर भी यहाँ करता रहा है और कुछ। धर्मग्रंथों,रीतियों के नाम पर वो ठग रहे, ज़िन्दगी जीने का उनका फ़लसफ़ा है और कुछ। फ़लसफ़ा=दर्शन,फिलोसफी आमजन के हक़ की ख़ातिर जो निज़ामत से लड़ा, दोस्तो वो ज़िन्दगी को जी सका है और कुछ। निजामत= व्यवस्था

Rasleela Nathdwara Style | Twin Eternals - Matter & Energy

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