बुजुर्ग सिर्फ घर की छत नहीं होते,। वो होते है ,घर में ढाली गई नींव भी। उनकी आंखों में होते है सपने अपने बच्चों के लिए,जब वो जवान होते है, बनाते है अपने पेट को काट काट कर बचाए हुए पैसों से अपने बच्चों का घर, जहां रह सके, उनके नौनिहाल सुरक्षित, खपा देते है अपना पूरा जीवन, उन नन्ही कोंपलों को बड़ा करने में। भूल जाते है, अपनी खुशियां, दिखती है उन्हें तो सिर्फ बच्चों के, भविष्य की चिंता ,वो करते है और मेहनत और गंवा देते है अपनी पूरी जवानी, अपने बच्चों की खुशी के लिए, और हो जाते है जब लाचार, असहाय तब उन्हें जरूरत होती है बच्चों की, कि वो कुछ समय उनके साथ गुजारे, बैठे उनके पास, बाते करे , पर तब वो बच्चे जो बड़े हो जाते है, उनकी अपनी जिंदगी होती है, जहां नहीं होती उनके बुजुर्गों के लिए जगह वो कमाते है, खाते है, और भूल जाते है उन एहसासों को, त्याग, बलिदान को, जहां पूरा जीवन उन्होंने आराम से काटा, पर किसकी बदौलत, अपने बुजुर्गों की, पर उन औलादों का कहना हैं कि ये तो कर्तव्य था तुम्हारा,कोई अहसान नहीं तब टूटते है बुजुर्ग, उन्हें समझ आता है कि वो बोझ है अपने बच्चों पर, टूटते है उनके दिल, रो नहीं पाती उनकी आँखें पर दिल फफक फफक कर रोता हैं , बुजुर्गों को कोई दवा नहीं चाहिए उन्हें अनदेखा करना उन्हें तोड़ देता है उन्हें दवा की नहीं अपनेपन की चाहत होती है उन्हें बीमारी नहीं मारती, उपेक्षा मार देती है उनके बच्चों की उपेक्षा, उनका कमरा भरा होता है दवाइयों से पर उन्हें काटता है उनका कमरा, जहां अब कोई नहीं आता आती है तो सिर्फ दवा, या डॉक्टर नहीं आते उनके नौनिहाल जो बड़े हो चुके है कमा रहे पिता को कमी नहीं होने दे रहे दवाइयों की, पर उनकी असली दवा, अपनापन नहीं दे पाते। हर पल बुजुर्गों की नजर आशा, भरी निगाहों से देखा करती, की बच्चे आयेगे, मिलने बैठने, और वो अपना लरजता हाथ, रख देंगे उनके सर पर और, बोलेंगे हमेशा खुश रहो मेरे बच्चों, हमे कुछ नहीं चाहिए तुम खुश रहो, बस यही थोड़ा अपनापन चाहिए हमे, पर निगाहों में निराशा भर आती, जब कोई नहीं आता उनके कमरे में, आता है खाना, बेगानो की तरह कोई नहीं होता पूछने वाला खाया या नहीं, बस कर्तव्य निभाए जाते है तब तक वो बुजुर्ग हार चुके होते है, अपनी हिम्मत, और उनकी बुढ़ी आंखों में पानी भर आता, और वो खुद को समझाते है व्यस्त है, मेहनत कर रहे, कमा रहे उनके बच्चे उनके लिए, सब तो दे रहे, पर जानती है वो बूढ़ी आंखे की ये झूठी दिलासा वो अपने हारे हुए मन को दे रहे, टूटते है, खामोशी से और फिर एक दिन चुप हो जाते है उन्हें भावनात्मक सहारा नहीं मिलता और बच्चों की उपेक्षा उन्हें खामोश कर देती है, उनके अंदर टूट जाता है सब और वो कुछ नहीं कहते बस देखते रहते है अपनी जिंदगी को, डाल लेते है आदत , ऐसे ही अकेलेपन में जीने की।