"अजी साहब ये तो मनहूस हैं। आपने इन्हें क्यों साइन कर लिया? गुरूदत्त की फिल्म का क्या हाल हुआ आपने देखा नहीं क्या? किसी और से अपनी फिल्म के गाने लिखा लीजिए। इनसे लिखाएंगे तो आपकी फिल्म फ्लॉप हो जाएगी। क्योंकि इनके तो सितारे ही खराब चल रहे हैं।" कुछ लोगों ने चेतन आनंद जी से कहा। ये तब का वाकया है जब चेतन आनंद हक़ीकत फिल्म बना रहे थे और हक़ीकत के गीत लिखने के लिए उन्होंने क़ैफ़ी आज़मी जी को साइन किया था। क़ैफ़ी आज़मी इससे पहले गुरूदत्त साहब की कागज़ के फूल फिल्म के गीत लिख चुके थे। और कागज़ के फूल फ्लॉप हो गई थी। उससे पहले भी क़ैफ़ी आज़मी ने जिन कुछ फिल्मों के गीत लिखे थे वो सब भी फ्लॉप रही थी। ऐसे में फिल्म इंडस्ट्री के कुछ लोगों ने क़ैफ़ी आज़मी को मनहूस कहना शुरू कर दिया था। वो लोग कहते थे कि क़ैफ़ी आज़मी लिखते तो बहुत अच्छा हैं। मगर चूंकि उनके सितारे खराब चल रहे हैं तो जिस फिल्म के लिए भी वो लिखते हैं वो फ्लॉप हो जाती है। क़ैफ़ी आज़मी मनहूस हैं। मगर जब चेतन आनंद साहब से उन लोगों ने क़ैफ़ी आज़मी जी के बारे में वो बात कही तो उन्होंने जवाब दिया,"मेरे सितारे भी खराब ही चल रहे हैं। मेरी भी पिछली कुछ फिल्में फ्लॉप ही गई हैं। तो हो सकता है कि दो खराब सितारों वाले लोग कुछ अच्छा काम कर जाएं। इसलिए मैं तो कैफ़ी आज़मी जी से ही हक़ीकत के गाने लिखाउंगा। फिल्म अगर फ्लॉप हो गई तो कोई बात नहीं।" इस तरह चेतन आनंद ने क़ैफ़ी आज़मी जी पर अपना भरोसा बनाए रखा। और क़फ़ी आज़मी जी ने भी उनका भरोसा कायम रखते हुए हक़ीकत फिल्म के लिए बड़े शानदार गीत लिखे। साथियों हक़ीकत फिल्म के गीत आपको भी पसंद होंगे। पसंद ना हों ये नामुमकिन है। "कर चले हम फ़िदा जानो तन साथियों। अब तुम्हारे हवाले वतन साथियों।" ये गाना सुनकर अपने आप ही हमारे देश की सेना और सेना के जवानों के प्रति मन में सम्मान का सागर तैरने लगता है। एक और गीत "हो के मजबूर मुझे उसने भुलाया होगा" मेरे ऑल टाइम फ़ेविरट गीतों में से एक है। क़ैफ़ी आज़मी साहब की लेखनी का मैं कायल हूं इस गीत की वजह से। युद्ध में फंसे एक सैनिक की मनोस्थिति को बहुत मार्मिक शब्दों में बयां किया है क़ैफ़ी आज़मी जी ने। एक और गीत है इस फिल्म का जो मुझे बहुत बहुत, बहुत जी ज़्यादा पसंद है। उस गीत के बोल हैं "मैं ये सोचकर उसके दर से उठा था। कि वो रोक लेगी, मना लेगी मुझको।" ये गीत जब भी सुनता हूं तो अपने अतीत में पहुंच जाता हूं मैं। मेरे अतीत की एक सिचुएशन पर ये गीत बहुत फिट बैठता है। खासतौर पर ये लाइन "मगर उसने रोका, ना उसने मनाया, ना दामन ही पकड़ा, ना पास बिठाया, ना आवाज़ ही दी, ना वापस बुलाया। मैं आहिस्ता आहिस्ता बढ़ता ही आया। यहां तक कि उससे जुदा हो गया मैं।" यहां मैं मदन मोहन जी को सैल्यूट करूंगा इतनी शानदार कंपोजिशन के लिए। और सैल्यूट करूंगा रफ़ी साहब को भी, जिन्होंने इतनी मार्मिकता से ये गीत गाया। बहुत शानदार कलाकार थे ये सब। सभी को नमन। और क़ैफ़ी आज़मी जी को भी नमन। शत शत नमन। आज क़ैफ़ी आज़मी जी का जन्मदिवस है। 14 जनवरी 1919 को उत्तर प्रदेश के आज़मगढ़ में क़ैफ़ी साहब का जन्म हुआ था। रियल नेम था इनका अतहर हुसैन रिज़वी। KaifiAzmi