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A personal blog by Pavan Kumar "Paavan"
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9:10 PM
Article Published by : PAVAN KUMAR SHARMA,' PAAVAN &MAAHIR
अर्जुन के दूसरे प्रश्न का उत्तर (श्लोक ५६-५७) : दु:ख में उद्विग्न होता वह नहीं , सुखों की कामना करता नहीं । राग , भय और क्रोध से उन्मुक्त रहता , ऐसा मुनि स्थितप्रज्ञ कहलाता तभी ॥५६/अध्याय २॥ अर्जुन का स्थितप्रज्ञ के सम्बन्ध में दूसरा प्रश्न था स्थितधी: किम् प्रभाषेत : स्थिर-बुद्धि वाला साधक कैसे बोलता है ।इसका उत्तर श्लोक ५६-५७ में दिया गया है । कर्मक्षेत्रे-रणक्षेत्रे : श्रीकृष्ण गीता से गीता : २/५६ दु:खेष्वनुद्विग्नमना: सुखेषु विगतस्पृह: । वीतरागभयक्रोध: स्थितधीर्मुनिरुच्यते ॥ तथा— दु:खों की प्राप्ति होने पर जिसके मन में उद्वेग नहीं होता, सुखों की प्राप्ति में जो सर्वथा नि:स्पृह है तथा जिसके राग, भय और क्रोध नष्ट हो गये हैं, ऐसा मुनि स्थिरबुद्धि कहा जाता है। अर्जुन के दूसरे प्रश्न का उत्तर (श्लोक ५६-५७) : दु:ख में उद्विग्न होता वह नहीं , सुखों की कामना करता नहीं । राग , भय और क्रोध से उन्मुक्त रहता , ऐसा मुनि स्थितप्रज्ञ कहलाता तभी ॥५६/अध्याय २॥ अर्जुन का स्थितप्रज्ञ के सम्बन्ध में दूसरा प्रश्न था स्थितधी: किम् प्रभाषेत : स्थिर-बुद्धि वाला साधक कैसे बोलता है ।इसका उत्तर श्लोक ५६-५७ में दिया गया है । कर्मक्षेत्रे-रणक्षेत्रे : श्रीकृष्ण गीता से
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