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A personal blog by Pavan Kumar "Paavan"
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8:31 PM
Article Published by : PAVAN KUMAR SHARMA,' PAAVAN &MAAHIR
यहाँ 5-मुख्य-शिक्षाएँ हैं जो आपके जीवन को देखने का नजरिया बदल देंगी:- 1. बदलाव का विरोधाभास: "जब तक आप खुद को स्वीकार नहीं करते, आप बदल नहीं सकते" मेरे पास अक्सर ऐसे मरीज आते हैं जो अपने व्यक्तित्व या अपनी बीमारी से नफरत करते हैं। वे कहते हैं, "डॉक्टर साहब, मुझे यह OCD है, मुझे इससे नफरत है, इसे मेरे दिमाग से निकाल दीजिये।" या कोई मरीज अपने मोटापे या गुस्से को लेकर खुद को कोसता रहता है। मेरा अनुभव यह कहता है: आप जिससे लड़ते हैं, वह और मजबूत हो जाता है (What you resist, persists)। जब मैं SMS मेडिकल कॉलेज में पढ़ाता था, तो मैं अपने छात्रों को भी यही सिखाता था कि 'इलाज' लड़ाई नहीं है, 'इलाज' समझ है। जब आप खुद से नफरत करते हुए बदलाव लाने की कोशिश करते हैं—जैसे खुद को शीशे में देखकर कोसना कि "मैं कितना बुरा हूँ"—तो आपका दिमाग 'खतरे' (Threat) के मोड में चला जाता है। एक डरा हुआ दिमाग कभी नई चीजें नहीं सीख सकता, वह सिर्फ अपना बचाव (Defend) करता है। मेरी सलाह: मैंने देखा है कि असली बदलाव (Transformation) उसी क्षण शुरू होता है जब मरीज संघर्ष करना बंद कर देता है और कहता है, "ठीक है, मुझे अभी यह समस्या है। मैं इसे स्वीकार करता हूँ।" स्वीकार करने का मतलब हार मानना नहीं है। इसका मतलब है कि आप युद्ध के मैदान से बाहर आ गए हैं। उदाहरण के लिए, यदि आप एक दलदल में फंसे हैं, तो जितना आप हाथ-पैर मारेंगे (लड़ेंगे), उतना ही अंदर धंसते जाएंगे। बाहर निकलने का तरीका है—शांत हो जाना और धीरे से मदद स्वीकार करना। मैंने अपने डीप टीएमएस (Deep TMS) के मरीजों में भी देखा है कि जो मरीज अपनी स्थिति को स्वीकार कर लेते हैं और खुद को कोसना बंद कर देते हैं, उन पर इलाज का असर 20-30% बेहतर होता है। इसलिए, यदि आप बदलना चाहते हैं, तो पहले खुद से यह कहना शुरू करें: "मैं जैसा हूँ, ठीक हूँ। मैं पूर्ण नहीं हूँ, लेकिन मैं पर्याप्त हूँ।" इसी 'सेल्फ-एक्सेप्टेंस' की जमीन पर ही सुधार की फसल उग सकती है। 2. "मैं खुश तब होऊंगा जब..." की बीमारी (The "Happy When" Syndrome) जयपुर के समाज में, मैंने एक बहुत ही सामान्य मानसिक महामारी देखी है, जिसे मैं "भविष्य पर टालने वाली खुशी" कहता हूँ। लोग मेरे पास आते हैं और उनकी सोच कुछ ऐसी होती है: • "डॉक्टर साहब, जब मेरा बेटा सेटल हो जाएगा, तब मैं चैन की सांस लूँगा।" • "जब मेरा यह बिजनेस लोन चुक जाएगा, तब मैं खुश होऊंगा।" • "जब मेरा वजन 10 किलो कम हो जाएगा, तब मैं खुद को पसंद करूँगा।" इसे मैं "I will be happy when..." fallacy कहता हूँ। अपने 35 सालों में मैंने देखा है कि यह 'वह दिन' कभी नहीं आता। जैसे ही आप एक लक्ष्य हासिल करते हैं (जैसे बेटा सेटल हो गया), आपका दिमाग तुरंत एक नई शर्त रख देता है (अब पोता हो जाए तो खुशी मिलेगी)। हम अपनी खुशी को हमेशा एक 'वेटिंग रूम' में बिठा कर रखते हैं। एक बार मेरे पास एक बहुत बड़े व्यवसायी आए, जिन्होंने अपने जीवन में अपार संपत्ति अर्जित की थी। वे गंभीर डिप्रेशन में थे। उन्होंने मुझसे कहा, "डॉक्टर, मैंने पूरी जिंदगी सोचा कि जब मैं इतना करोड़ कमा लूँगा तो सुखी हो जाऊंगा। आज सब कुछ है, पर नींद नहीं है।" उनकी समस्या यह नहीं थी कि उनके पास कुछ कमी थी, समस्या यह थी कि उन्होंने कभी 'आज' में खुश रहने का अभ्यास ही नहीं किया था। मेरा अनुभव: खुशी कोई मंजिल (Destination) नहीं है जहाँ आप रिटायरमेंट के बाद या सब कुछ पा लेने के बाद पहुँचेंगे। खुशी एक नजरिया (Practice) है। अगर आप मेडिकल की पढ़ाई कर रहे छात्र की तरह तनाव में भी मुस्कुराना नहीं सीख सकते, तो डॉक्टर बनने के बाद भी आप तनाव में ही रहेंगे, बस तनाव का कारण बदल जाएगा। मैं अपने मरीजों को एक थेरेपी एक्सरसाइज देता हूँ: "आज आपके जीवन में क्या अच्छा है?" भविष्य की शर्तों को हटा दें। अगर आज आप सांस ले रहे हैं, आपके परिवार में कोई एक व्यक्ति भी आपसे प्यार करता है, या आज आपने अच्छी चाय पी है—तो खुश होने के लिए यह पर्याप्त है। जीवन 'तब' नहीं है, जीवन 'अब' है। 3. अपना डॉक्टर खुद बनें: आत्म-करुणा (Self-Compassion) बनाम आत्म-आलोचना मनोचिकित्सा में हम 'इनर क्रिटिक' (आंतरिक आलोचक) की बात करते हैं। वह आवाज जो आपके दिमाग में चलती रहती है—"तुमसे नहीं होगा," "तुमने फिर गलती कर दी," "तुम कमजोर हो।" मैंने देखा है कि हम खुद के प्रति जितने कठोर होते हैं, उतना हम अपने दुश्मन के प्रति भी नहीं होते। अगर आपका कोई दोस्त या बच्चा गलती करता है, तो आप उसे क्या कहते हैं? "कोई बात नहीं, अगली बार बेहतर करना।" लेकिन जब आप खुद गलती करते हैं, तो आप खुद से क्या कहते हैं? "मैं बेवकूफ हूँ, मेरा कुछ नहीं हो सकता।" यह दोहरा मापदंड क्यों? एक मनोचिकित्सक के रूप में, मैं आपको एक वैज्ञानिक तथ्य बताता हूँ: आत्म-आलोचना (Self-Criticism) हमारे दिमाग के उस हिस्से को सक्रिय करती है जो डर और तनाव पैदा करता है। यह आपको अनुशासित नहीं बनाता, यह आपको लकवाग्रस्त (Paralyzed) कर देता है। दूसरी ओर, आत्म-करुणा (Self-Compassion) ऑक्सीटोसिन रिलीज करती है, जो सुरक्षा और विश्वास का हार्मोन है। मेरी सलाह: खुद के साथ वैसे ही पेश आएँ जैसे मैं अपने मरीजों के साथ पेश आता हूँ—सहानुभूति के साथ, लेकिन दृढ़ता से। जब मैं अपने जूनियर डॉक्टर्स को ट्रेनिंग देता हूँ या SOPs (Standard Operating Procedures) बनाता हूँ, तो मैं हमेशा कहता हूँ कि गलती करना सीखने का हिस्सा है। अगर आप खुद को हर गलती पर डांटेंगे, तो आप कभी रिस्क नहीं लेंगे। खुद का 'इनर एलाई' (आंतरिक मित्र) बनें। जब आप गिरें, तो खुद को लात मारने के बजाय हाथ बढ़ाकर उठाएं। यह कमजोरी नहीं है, यह मानसिक शक्ति (Resilience) का सबसे बड़ा स्रोत है। मैंने अपने डिप्रेशन के मरीजों में देखा है कि जो मरीज खुद को माफ करना सीख जाते हैं, वे दवाइयों के साथ-साथ बहुत तेजी से रिकवर होते हैं। 4. "अच्छा" दिखने का बोझ बनाम "सच्चा" होने का सुकून हमारे भारतीय समाज में, और विशेषकर राजस्थान जैसे पारंपरिक परिवेश में, "लोग क्या कहेंगे" का बहुत दबाव है। बचपन से हमें सिखाया जाता है—अच्छे बनो, आज्ञाकारी बनो, किसी को नाराज मत करो। परिणामस्वरूप, हम अपनी पूरी जिंदगी एक मुखौटा (Mask) पहनकर जीते हैं। मैं ऐसे कई जोड़ों (Couples) को देखता हूँ जो समाज की नजर में 'परफेक्ट' हैं, लेकिन मेरे केबिन में बैठकर रोते हैं क्योंकि उनके बीच कोई वास्तविक जुड़ाव (Connection) नहीं है। वे सिर्फ भूमिकाएँ निभा रहे हैं—अच्छे पति की, अच्छी पत्नी की, अच्छे बेटे की। मेरा अनुभव यह है: "अच्छा" (Good) बनने की कोशिश आपको लोगों से दूर करती है, जबकि "सच्चा" (Authentic) होना आपको लोगों से जोड़ता है। जब आप हमेशा 'नाइस' बने रहते हैं, तो आप अपनी भावनाओं को दबाते हैं। मनोचिकित्सा में हम इसे 'दमित भावनाएं' (Repressed Emotions) कहते हैं। यह दबी हुई भावनाएं बाद में साइकोसोमेटिक बीमारियों (जैसे सिरदर्द, बदन दर्द, अनिद्रा) या अचानक होने वाले पैनिक अटैक के रूप में बाहर आती हैं। मेरी सलाह: अपने मुखौटे उतारें। इसका मतलब यह नहीं है कि आप असभ्य हो जाएं। इसका मतलब है कि आप अपनी भावनाओं का सम्मान करें। अगर आपको बुरा लगा है, तो सम्मानपूर्वक कहें कि आपको बुरा लगा है। अगर आप थके हुए हैं, तो 'सुपरमैन' बनने का नाटक न करें, मदद मांगें। मैंने अपने 35 सालों में पाया है कि कमजोरी (Vulnerability) दिखाना ताकत की निशानी है। जब एक मरीज मेरे सामने अपनी कमजोरी स्वीकार करता है, तभी उसका असली इलाज शुरू होता है। असली रिश्ते और असली मानसिक शांति तभी मिलती है जब आप लोगों को अपना 'असली' रूप दिखाते हैं, न कि वह रूप जो वे देखना चाहते हैं। 5. समर्पण बनाम हार मानना (Surrender vs. Resignation) यह सबसे गहरा आध्यात्मिक और मनोवैज्ञानिक सत्य है जो मैंने अपने जीवन में और चिकित्सा पद्धति में सीखा है। कई बार मरीज गंभीर मानसिक बीमारियों, पारिवारिक कलह या व्यापार में नुकसान के कारण पूरी तरह टूट जाते हैं। वे मुझसे पूछते हैं, "डॉक्टर साहब, क्या मैं हार मान लूँ?" मैं उन्हें समझाता हूँ कि हार मानने (Resignation) और समर्पण (Surrender) में जमीन आसमान का फर्क है। • हार मानना नकारात्मक है। इसमें आप कहते हैं, "अब कुछ नहीं हो सकता, मैं बेकार हूँ।" इसमें आप उम्मीद छोड़ देते हैं और निष्क्रिय हो जाते हैं। • समर्पण सकारात्मक है। इसमें आप कहते हैं, "मैंने अपनी तरफ से पूरी कोशिश की (दवा ली, थेरेपी की, मेहनत की), अब नतीजा मेरे हाथ में नहीं है, इसलिए मैं चिंता करना छोड़ता हूँ।" मेरे क्लिनिकल अनुभव में, जो मरीज यह जिद पकड़ कर बैठते हैं कि "मुझे आज ही ठीक होना है" या "मेरे बच्चे को मेरी बात माननी ही पड़ेगी", वे सबसे ज्यादा पीड़ित रहते हैं। यह 'कंट्रोल' (नियंत्रण) करने की इच्छा ही तनाव की जड़ है। जीवन अनिश्चित है। एक डॉक्टर के रूप में मैं दवा दे सकता हूँ, मैं डीप टीएमएस (Deep TMS) प्रोटोकॉल लगा सकता हूँ, लेकिन दिमाग कब रिस्पांस करेगा, यह कई जैविक कारकों पर निर्भर करता है। मेरी सलाह: जीवन के प्रवाह (Flow) के साथ बहना सीखें। समर्पण का मतलब है— प्रयास पूरी ताकत से करना, लेकिन परिणाम से आसक्ति (Attachment) न रखना। जब आप परिणाम को नियंत्रित करना छोड़ देते हैं, तो एक अजीब सी शांति आपके अंदर उतरती है। वही शांति (Relaxation) आपके दिमाग को ठीक होने (Heal) में मदद करती है। मैंने देखा है कि जिन मरीजों ने ईश्वर पर, डॉक्टर पर या समय पर भरोसा करके चिंता छोड़ दी, उनके ठीक होने की दर चमत्कारिक रूप से बढ़ गई। इसे हम 'प्लेसीबो' नहीं, बल्कि 'तनाव रहित उपचार' कहते हैं। निष्कर्ष: एक डॉक्टर का नुस्खा (Prescription) दोस्तों, 35 साल पहले जब मैंने सफेद कोट पहना था, तो मुझे लगता था कि दवाइयाँ (Pharmacology) ही सब कुछ ठीक कर सकती हैं। लेकिन आज, बालों में सफेदी आने के बाद, मैं जानता हूँ कि दवाइयाँ सिर्फ रसायन (Chemicals) बदल सकती हैं; जीवन को बदलने के लिए आपको अपनी सोच (Psychology) बदलनी होगी। मेरा यह 'प्रिस्क्रिप्शन' याद रखें: 1. खुद को गले लगाएं: आप 'अधूरे' (Unfinished) हैं, 'टूटे हुए' (Broken) नहीं। यह एक प्रक्रिया है। 2. आज में जिएं: खुशियों को कल पर न टालें। 3. खुद के मित्र बनें: अंदर की आवाज को डांटने वाली नहीं, समझाने वाली बनाएं। 4. सच्चे बनें: दुनिया को खुश करने के लिए खुद को न खोएं। 5. भरोसा रखें: अपना काम करें और बाकी उस पर छोड़ दें जो हमसे बड़ी शक्ति है।
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