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A personal blog by Pavan Kumar "Paavan"
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8:15 PM
Article Published by : PAVAN KUMAR SHARMA,' PAAVAN &MAAHIR
उर्दू शायरी का सफरनामा-III हमारा सफ़र अब काफ़ी आगे बढ़ गया है परन्तु अब भी काफ़ी बाकी है। सच ही कहा है कि- मुझसे पहले कितने शायर आये और आकर चले गये। कुछ नग्मे गा कर लौट गये कुछ गीत सुनाकर चले गये।। और यह सिलसिला चलता ही रहा है, चलता ही रहेगा पर थोड़ा सा ठहर लेना हर सफ़र में लाज़मी होता है सो यहां पर भी है। आइए कुछ और बात करें। आप जानना चाहेंगे न कि गज़ल क्या है? और इसकी इज़ाद कहाँ पर हुई। जी हां हम आपको यह जरूर बतायेंगे। गज़ल शब्द अरबी भाषा से लिया गया है लेकिन गज़ल कहने और सुनने का ज्यादा प्रचलन ईरान, फ़ारस में रहा। फ़ारसी किताबों में गज़ल को ‘सुखन अज़ज़नान’ बताया गया है जिसका सही मतलब निकलता है औरतों की बात करना या औरतों के बारे में लिखना। गज़ल का मुख़्य विषय होता है औरतों की नाज़ोनज़ाकत और हुस्न का शेरों से बखान और उनसे इश्क़ का दम भरना। गज़ल का इश्क़ आशिक़ और माशूक़ का इश्क़ है, वह और कोई तरह की मुहब्बत पर नहीं लिखी जा सकती। हिन्दी में यदि कविता से गज़ल की तुलना करें तो गज़ल वह कविता है जिसमें प्रेमी-प्रमिकाओं के भावों को प्रदर्शित किया गया हो। लेकिन हर किसी प्रकार की प्रेम कविता गज़ल नहीं कहीं जा सकती। गज़ल का अपना अलग व्याकरण है। अपनी एक खास जबान-अदबी1 और लबो-लहज़ा2 है। इसका विषय एक सीमित लेकिन खास विषय है। बाद में गज़ल में तसव्वुफ और फ़लसफ़ा भी विषय स्वरूप शामिल कर लिये गये। ऐसा होने पर गज़लगो शायर दो शाखाओं में बंट गये। एक तो वो जो खुदाई इश्क़ पर गज़लें कहते और दूसरे वो जो दुनियावी या मज़ाज़ी इश्क़ पर गज़लें कहते। इस बात का जिक्र हम इस क़िताब की शुरूआत में कर चुके हैं कि ‘इश्क़े-हक़ीक़ी’ और ‘इश्क़े-मज़ाज़ी’ में क्या फ़र्क है। हम यह भी देख चुके हैं कि इश्क़े-मज़ाजी में भी फिर दो अलग तरीके के शायर हुए। एक वो जो हक़ीक़त के इश्क़ का जिक्र करते थे जिसके तजुर्बात से वो गुज़र चुके थे ओर दूसरे वो जो केवल कल्पना के धरातल पर गज़लगोई करते थे। 1. ज़बान अदबी- भाषा का व्याकरण, शिष्टाचार; 2. लबो लहजा- अदायगी का तरीका। इश्क़ को दो अलग अलग तरीकों से इन मज़ाज़ी शायरों ने शेरों गज़लों में बांधा। कुछ शायरों ने इश्क़ को बहुत ऊँचा दर्जा दिया और माना कि मुहब्बत खुदा है। उनका इश्क़ ता-उम्र किसी एक का दम भरता रहा और ‘पाक इश्क़’ कहलाया। दूसरे शायरों ने मुहब्बत को विषयों तथा कामनाओं का गुलाम बना दिया और निचले स्तर पर ला छोड़ा। इस प्रकार का इश्क़ ‘बाज़ारी इश्क़’ कहलाया। वास्तव में पाक इश्क़िया शायरी का कलाम उर्दू भाषा में बहुत ही कम पाया जाता है। इसका कारण यह रहा कि उस समय जब उर्दू शायरी का जन्म हुआ यहां के समाज में तमाशाबीनी और बादाख़्वारी एक रोग की तरह फैली हुई थी। एय्याशी के इस दौर में पाक इश्क़ के ज़ज़्बे की कोई कद्रोकीमत नहीं थी। अब तक हमने कई शायरों के बाज़ारी इश्किया कलाम देख लिये हैं। इंशा को देखा, जुरअत को देखा, जलील को देखा, रंगीन को देखा। इन सबके कलाम का माशूक़ शोख, बेअदब, बेवफ़ा, बे-मुरव्वत, बेरहम, बदज़बान, संगदिल, ज़ालिम, हरज़ाई, और कातिल होता है। ऐसे हबीब1 का तसव्वुर उर्दू शायरी में वैश्याओं की वज़ह से आया। सभी शायरों को हक़ीकत की मोहब्बत तो नसीब होती न थी। वे वैश्याओं से इश्क़ फरमा लिया करते थे। तवाइफें2 महफ़िलें सजाती थीं और उनमें आने वाले रईसों, जागीरदारों नावाबों आदि से मोहब्बत का नाटक करती थीं। ये नाटक तब तक चलता था जब तक आशिक़ की जेबों में पैसा रहता था। पैसा हज़म खेल ख़तम। फिर यह खेल दूसरे से खेला जाता। एक साथ कईयों के साथ खेला जाता। इस कारण से माशूक़ बाज़ारी हो गया और इश्क़ भी भौंडा और बाज़ारी हो गया। इन तवाईफों में जो शायराना नाज़ो-अन्दाज़ होता था वो अस्ल के इश्क़ में भला कहाँ से आये। सभी शरीफ़ जादियाँ तो गैरत के मारे पर्दे में रहती थीं, सो उनसे दीदबाजी3 कैसे हो, बार बार मुलाक़ातें कैसे हों, हिज्र और वस्ल की बात कैसे हो? इसलिए उस समय रईस तवाइफें रखा करते थे। यहां तक कि अपने बच्चों को तवाइफ़ों के यहां बाकायदा तौर-तरीके सीखने के लिये भेजा करते थे। तवाइफ़ों के यहां पहुँच आसान थी और उनकी नाज़ो-अदा ही को इश्क़ समझ लेते थे। जो ज्यादा दौलत लुटाता था तवाइफ़ें उसी की मुहब्बत का दम भरतीं, दूसरे आशिकों को धता बता दी जाती। सरे बज़्म उनको उठवा दिया जाता और अगर वह ज्यादा अड़े तो पिटवा दिया जाता। ऐसा आशिक! माशूक़ के हरज़ाई होने का, बेवफ़ा होने का, ज़ालिम होने का शिकवा न करे तो क्या करे। जो शायर खुद ऐसे आशिक न होते थे वे भी पैसों के खातिर इन जैसे आशिकों के मज़मून पर सुखन फहमी करते थे, गज़लगोई करते थे। इस तरह से उर्दू शेरो-शायरी का सफ़र आगे बढ़ता रहा। शायरी में दाखिली रंग से ज्यादा खारजी रंग आता गया जो ज़नाब नासिख़ के समय लखनऊ में परवान पर पहुंचा। 1. हबीब- माशूका; 2. तवाइफ- वैश्या; 3. दीदबाजी - आँखें लड़ाना। देहली के शायरों को ऐतिहासिक कारणों से कष्टों से दो-चार होना पड़ा और उनकी शायरी में दर्द/टीस का समावेश हुआ जो उनको लख़नवी शायरों से जुदा करता था। देहली वाले शायरों ने ज़्यादातर पाक इश्किया, तसव्वुफ1 और फ़लसफ़े की शायरी की जिसे ‘दाखिली शायरी’ के नाम से जाना जाता है और लखनऊ वालों ने ज्यादातर ‘बाज़ारी इश्क़िया’ शायरी की जो ‘खारजी शायरी’ के नाम से जानी जाती है। यह दो अलग अलग स्कूलों की शायरी के नामों से भी जानी जाती है, ‘लख़नवी स्कूल’ और ‘देहलवी स्कूल’। रामपुर और टांडा के नवाबों के यहां और हैदराबाद के निज़ामों के यहां इन दोनों तरीकों की शायरी का मिलान हुआ और एक नई तर्ज़ की शायरी का जन्म हुआ जिसके पहुंचे हुए फ़नकार2 थे ‘अमीर’ मीनाई और ‘दाग’ देहलवी साहब। ये शायरी गालिबाना तसव्वुफ और फ़लसफ़ा भी रखती थी तो नासिखाना रंगो-रवायत भी। लेकिन यह मान लिया गया कि गहराई के बिना सिर्फ़ ख़ारजी शायरी को आला दर्ज़े की शायरी नहीं कहा जा सकता। इसी कारण से मिर्ज़ा ग़ालिब और आतिश जिन्हें अपनी जिन्दगी में वो शुहरत न मिली को बाद में शायरे आज़म कुबूल किया जाने लगा और ‘जुरअत’, ‘इंशा’ तथा ‘नासिख’ जिनकी तूती बोला करती थी उनको हल्के दर्ज़े का शायर माना जाने लगा। इस बात का असर आगे आने वाले शायरों के कलाम पर पड़ा जो हम देखेंगे। हमने नज़ीर अकबराबादी को भी पढ़ा और देखा कि वे गज़ल-गो शायर न थे। उन्होंने इश्क़िया शायरी को अपने शेरों ओर नज़्मों से बरतरफ3 रखा। उनकी नज़्मों को दाद तो बहुत मिली पर उस समय के उर्दू सुखन फहमों ने उन्हें शायर मानने से इन्कार कर दिया था। उनका कोई शर्गिद न रहा और उनकी नज्में उनका तौर तरीका उन्हीं के साथ दफ़्न कर दिया गया। वह ज़माना गजलों का ज़माना था, ख़ारजी रंग का ज़माना था। तब गज़ल का वह पतन नहीं हुआ था जो मुगलिया सल्तनत की समाप्ति के बाद हुआ। 1857 के ग़दर के बाद मुसलमानों की शोचनीय हालत ने हाली और आज़ाद जैसे शायरों को सोचने के लिये मज़बूर किया। मुसलमान अपने पतन को दर किनार कर के भी इश्क़िया शायरी और गज़ल ग़ोई में मशगूल थे। यह बात सर सैयद अहमद खान जैसे विचारक और ‘हाली’ तथा ‘आज़ाद’ जैसे चिन्तकों को नागवार गुज़रीं। उन्हें गज़ल से ही नफ़रत हो गई और उन्होंने कौम को ललकारती नज़्में कहनी शुरू कर दीं। वे इश्क़ से नफ़रत करने लगे, जिसने कौम की रगों में विलासिता और कायरता भर दी थी। उनकी ये नज़्में गज़ल को कल्पना के आकाश से उतार कर हक़ीक़त की ज़मीन पर ले आई। गज़ल अपने ख़ारजी, रवायती, फ़हाशी4, और बनावटी उसूलों को छोड़कर आज़ादी की सांसें लेने लगी। 4. तसव्वुफ- खुदा का ध्यान; 2. फ़नकार- ज्ञान रखने वाला, हुनरवान; 3. बरतरफ- जुदा, अलग; 4. फ़हाशी- अश्लीलता। हालांकि अब भी कई गज़ल-गो शायरों ने इस बदलाव को मंजूर करने से मना कर दिया और लकीर के फकीर बन गये लेकिन दाग जैसे रंगीन गज़ल उस्ताद के चन्द शार्गिदों ने नज़्मों की और उनके कारण से आये गज़ल में बदलाव दोनों की न सिर्फ़ हिमायत की बल्कि खुद गज़ल गोई छोड़कर नज़्में कहने लगे। इनमें अज़ीम नाम थे सर इकबाल, ‘सीमाब’ अकबराबादी और ‘जोश’ मलसियानी। इन शायरों को बड़े साहस से काम लेना पड़ा क्योंकि उस समय भी उर्दू जबान के 60 फ़ीसदी शायर हज़रत दाग़, ‘अमीर’ मीनाई और ‘जलाल’ के रंगों में रंगे थे। फिर नज़्म के साथ कुछ और नाम जुड़े जो दम खम वाले सुखन-फहम थे। इनमें मुख्य थे ‘सफ़ी’ लख़नवी, ‘साकिब’ लख़नवी, ‘आरजू’ लख़नवी, यास यागाना ‘चंगेजी’, ‘फानी’ बदायूनी, ‘असगर’ गौण्डवी, ‘हसरत’ मोहानी और ‘ज़िगर’ मुरादाबादी। इन्होंने गजलें भी लिखीं और नज़्में भी लेकिन उनके विषय बदल गये और इश्क़, आशिक, माशूक़ उनका हुस्न, सितम, नाज़ो-अदा, आहोज़ारी से ऊपर उठकर गज़ल ने नये आयाम प्राप्त कर लिये। वतन के लिए सरफ़रोशी, कौम की इज़्ज़त-अस्मत, दीन दुखियों के जीवन का दर्द आदि इसके विषयों में शामिल हो गये। शायरी अब रियाज़1 का विषय न रही, केवल उन लोगों की अमानत हो गई जो शायराना मिज़ाज़ और दिलो-दिमाग लेकर पैदा हुए थे। कुदरत और हक़ीक़त के जज़्बे अब रवायात की जगह लेने लगे। ‘मीर’ जिन्हें ‘खुदाये-सुखन’ की पदवी अता फरमाई गई है ने इश्क़िया शायरी तब की जब उनका खुद का इश्क़ नाकामयाब रहा और इससे उनकी पाक इश्क़िया शायरी में जो सोज़ो-गुदाज़2 और असर पैदा हुआ वह आज तक भुलाया न जा सका। इसीके चलते ज़ौक़ जैसे उस्तादे-शहंशाह तक को कहना पड़ा कि‒ न हुआ पर न हुआ, मीर का अन्दाज़ नसीब। ज़ौक़ यारों ने बहुत जोर गज़ल में मारा।। केवल लफ़्फ़ाजी से शेर या गज़ल में यह सोज़ो-गुदाज़, यह असर नहीं आता अन्यथा मीर को यह नहीं कहना पड़ता कि- हमको शायर न कहो मीर कि साहब हमने। दर्दे-ग़म कितने किये जमा तो दीवान बने।। जब तक दिल में कोई बात का दर्द नहीं हो या कोई जज्बा न हो तब तक शेर दमदार बन ही नहीं सकते। उर्दू के ज़्यादातर शायरों ने बिना जज्बात, बे-मुरव्वत3 शायरी में शिरकत4 कर अपना नाम कमाने के लिये या फिर पैसे के लिये पेशेवर शायरी की थी। उनके शेरों में और गज़लों में वोह दम जो होना चाहिए नज़र नहीं आता। यह बात उन्नीसवीं शताब्दी के दूसरे 10 वर्षों के शायरों पर लागू नहीं होती और उनमें से जिसे भी शोहरत मिली अपने दम पर और काम के बल पर मिली। अब हम इन नये युग के शायरों की शायरी का सफ़र तय करेगें और उसका लुत्फ उठायेंगे। 1. रियाज- अभ्यास; 2. सोज़ो गुदाज़- मर्म को छू सकने की क्षमता; 3. बे मुरव्वत- लगाव न रखने वाला; 4. शिरकत- भाग लेना, शामिल होना। यहां पर भी देहलवी शायर और लख़नवी शायर दोनों की अलग अलग ज़मातें कायम रहीं। लख़नवी स्कूल के शोहरत-मंद शायर थे, ‘साकिब’ लख़नवी, ‘आरजू’ लख़नवी, ‘रियाज़’ ख़ैराबादी, ‘ज़लील’ मानेकपुरी, ‘दिल’ शाहजहानपुरी, ‘हफ़ीज़’ ज़ौनपुरी, ‘नातिक’ लख़नवी और ‘असर’ लख़नवी जबकि देहलवी स्कूल के नामी गिरामी शायर थे ‘शाद’ अज़ीमाबादी, ‘हसरत’ मोहानी, ‘फ़ानी’ बदायूनी, ‘यास’ यागाना चंगेजी, ‘आसी’ गाज़ीपुरी, ‘असगर’ गौण्डवी और ‘ज़िगर’ मुरादाबादी। हम इन सभी शायरों और उनके कलामों पर एक एक नज़र डालेंगे। देहलवी और लख़नवी शायरी की सबसे अच्छी तुलना तभी की जा सकती है जब एक शायर एक स्कूल से लिया जावे और दूसरा दूसरी स्कूल से। आगे का सफ़र हमें इसी प्रकार तय करना है। नई लख़नवी स्कूल वास्तव में ‘नज़्म’ तबातबाई से शुरू हुई जो सन् 1850 में जन्मे और जिनका इंतकाल 1933 में हो गया। उनकी शायरी खारजी रंग में ही रंगी थी लेकिन उन्होंने अंग्रेजी की कविताओं का उर्दू तर्जुमा1 बहुत ही कुदरती तरीके से कर नाम कमाया। ये ‘दाग’ के रंग में कलाम लिखते थे, बानगी देखिये‒ अदाये सादगी में कंघी चोटी ने खलल2 डाला। शिकन3 माथे पै, अबरू4 में गिरह5, गेसू में बल डाला।। कहने सुनने से जरा पास आके बैठ गये। निगाह फेर के त्यौरी चढ़ा के बैठ गये।। निगाहे यास6 मेरी काम कर गई अपना। रूलाके उठे थे वोह मुस्कराके बैठ गये।। इसके बाद ‘सफ़ी’ लख़नवी का नाम लूंगा जो 1862 में लखनऊ में जन्मे और जिनका 1950 में इंतकाल हुआ। इनकी कौमी नज़्मों ने काफी शुहरत पाई और मुसलमान इन्हें कौम की आवाज मानने लगे। सफ़ी साहब गज़लों को आकाश की कल्पना से उतारकर यर्थाथ के धरातल पर लाये। इनके चन्द चुने हुये शेर पेशे खिदमत है‒ निकले है तीन नाम मिरे तिफ़्ले-इश्क7 के। नूरे-निगाह8, लख़्ते-ज़िगर9, यादगारे-दिल।। कैसी कैसी सूरतें ख्वाबे-परीशां10 हो गईं। सामने आँखों के आईं और पिन्हा हो गईं।। 1. तर्जुमा- अनुवाद; 2. ख़लल- व्यवधान; 3. शिकन- सलवट; 4. अबरू- भवें; 5. गिरह- गाँठ; 6. यास- मायूसी, निराशा; 7. तिफ़्ले इश्क- बचपन का इश्क; 8. नूरे निगाह- आँखों की रोशनी; 9. लख़्ते जिगर- दिल का टुकड़ा; 10. ख्वाबे परीशां- बुरा सपना। इन्सान मुसीबत में हिम्मत न अगर हारे। आसानों में वह आसाँ है मुश्किल से जो मुश्किल।। दुनिया की तरक्की है इस राज़ से वाबस्ता1। इंसान के कब्जे में सब कुछ है अगर दिल है।। जो चीज नहीं बस की फिर उसकी शिकायत क्या। जो कुछ नज़र आता है अच्छा नज़र आता है।। * 1. वाबस्ता - जुड़ी हुई। मुंशी नौबतराय ‘नज़र’ लख़नवी नयी उम्र के लख़नवी शायरों में जो नाम पहले पहल शुहरत की बुलंदी पर आया वो था जनाब नौबतराय ‘नज़र’ साहब का। वे 1766 में पैदा हुए और 1823 में खुदा को प्यारे हुये। खुद का कोई पुत्र न था सो नवासे को गोद लिया पर खुदा ने उसे भी छीन लिया। उसी मौत पर उन्होंने फरमाया कि‒ थमो थमो कि इस उजड़े मकां का था ये चराग। बहार पर था इसी नौनिहाल से ये बाग।। न होगा मुझे अब हासिल कभी जहाँ में फराग1। तमाम उम्र दिल नातवां है और यह दाग।। फुगाने-बुलबुले-जाँ2 दिल के पार होती है। ‘नज़र’ के बाग से रूख़सत3 बहार होती है।। नज़र ने फिर इस सदमें से उबरने के लिये पड़ौसी के एक बच्चे को अपने साथ रखा पर जब वह भी छत से गिर कर मर गया तो नज़र का इंतकाल हो गया। जाते जाते उन्होंने जो शेर कहा वह उनके जीवनकाल की व्यथा को साकार करता है। ऐ इनकलाबे-आलम4 तू भी गवाह रहना। काटी है उम्र हमने पहलू बदल बदल कर।। नज़र के कलाम में दर्द के साथ जो सादगी थी उससे उसका असर, उसका सोजो-गुदाज़ और बढ़ जाता था। उनकी शायरी का एक भी शेर ज़लील या हकीर5 विचारों से भरा नहीं है। उनके कहे चन्द शेर पेशे-खिदमत हैं‒ फ़ना होने में सोजे-शम्अ6 की मिन्नत-कशी7 कैसी। जले जो आग में अपनी उसे परवाना कहते हैं।। 1. फराग- अमन चैन, मुक्ति; 2. फुगाने बुलबुले जाँ- आत्मी रूपी बुलबुल की आवाज़, माशूक के रोने की आवाज; 3. रूखसत- विदा; 4. इन्कलाबे आलम- संसार की उलट-पलट; 5. हकीर- नीच, ओछा; 6. सोजे शमअ- शमा की तपिश (ज्वाला); 7. मिन्नत कशी- प्रार्थना करना। दिल की हालत नहीं बदलने की। अब ये दुनिया नहीं संभलने की।। तबाही दिल की देखी है जो हमने अपनी आँखों से। हो अब कैसी ही बस्ती हम उसे वीराना कहते हैं।। कोई मुझसा मुस्तहके-रहमो-गम-ख़्वारी1 नहीं। सौ मरज़ है और बज़ाहिर कोई बीमारी नहीं।। इश्क़ की नाकामियों ने इस कदर खींचा है तूल। मेरे गमख़्वारों को अब चाराये-गमख़्वारी2 नहीं।। खिजां अन्जाम3 है सबकी बहारें, चन्द रोजा की। बहुत रोता हूं सूरत को देखकर गुल-हाये-खन्दा4 की।। वोह एक तुम कि सरापा बहारो-नाज़िशे-गुल5। वोह एक मैं कि नहीं सूरत आशनाये-बहार6।। जमीं पै लाल-ओ-गुल बन के आशकार7 हुआ। छुपा न खाक में जब हुस्न खुदनुमाए-बहार8।। वोह शम्अ नहीं कि हो इक रात के मेहमाँ। जलते हैं तो बुझते नहीं हम वक्ते-सहर भी।। कफ़स से छूटकर पहुंचे न हम दीवारे-गुलशन तक। रसाई9 आशियां तक किस तरह बे-बालो-पर होगी।। फ़कत इक सांस बाकी है मरीज़े-हिज्र के तन में। यह कांटा भी निकल जाये तो राहत से बसर होगी।। दिल था तो हो रहा था अहसासे-जिन्दगी भी। जिन्दा हूँ कि अब मुर्दा मुझको ख़बर नहीं है।। मरने पर ज़िस्मे-ख़ाकी10 क्या साथ रूह का दे। राहे-अदम में गाफ़िल ! गर्दे-सफ़र नहीं है।। 1. मुस्तहके रहमो गमख़्वारी- गम बाँटने और रहम पाने का हकदार; 2. चाराए गमख़्वारी- गमों के इलाज; 3. खिजाँ अन्जाम- पतझड़ का अन्त; 4. गुल हाये खन्दा- मुरझाया फूल; 5. बहारो नाज़िशे गुल- ऐसी बहार जिस पर फूल भी घमण्ड करे; 6. आशनाये बहार-बहार की सूरत से परिचित; 7. आशकार- प्रकट, पैदा; 8. खुदनुमाए बहार- खुद बहार बन कर प्रकट हुआ; 9. रसाई- पहुँच; 10. जिस्मे ख़ाकी- माटी से बना शरीर; । सोजाँ ग़मे-जाविद1 से दिल भी है जिगर भी। इक आह का शोला कि इधर भी है उधार भी।। वोह अंजुमने-नाज है और रंगे-तगाफुल। याँ है मरहला-ए-आह2 भी अन्दोहे-असर3 भी।। अभी मरना बहुत दुश्वार है ग़म की कशाकश से। अदा हो जायेगा ये फर्ज़ भी फुर्सत अगर होगी।। मुआफ-ए-हमनशीं ! गर आह कोई लब पै आ जाये। तबीयत रफ़्ता-रफ़्ता खूगरे-दर्दे-ज़िगर4 होगी।। * 1. गमे जाविद- स्थायी गम; 2. मरहल ए आह- आह की मंजिल; 3. अन्दोहे असर- रंजीदा, रंज से प्रभावित; 4. खूगरे दर्दे ज़िगर- दिल के दर्द को सहने का आदी (अभ्यास)।
8:12 PM
Article Published by : PAVAN KUMAR SHARMA,' PAAVAN &MAAHIR
ख़्वाजा अल्ताफ़ हुसैन ‘हाली’ ख़्वाजा अल्ताफ़ हुसैन ‘हाली’ पानीपत में पैदा हुऐ थे। वे शेफ़्ता के शर्गिद थे और मिर्ज़ा ग़ालिब के भी। पहले हाली भी इश्क़िया शायरी करते थे और गज़लें कहते थे पर बाद में सर सैयद अहमद से परिचय होने पर कौमी नज्में लिखने लगे। वे सदाचारी और धार्मिक थे और हिन्दोस्ताँ में अपनी कौम की दुर्दशा के कारण परेशान रहते थे। ग़दर के बाद हुई मुसलमानों की खाना खराबी ने उन्हें और भी परेशान किया। लाहौर आने के बाद उनका एक-एक पल मुसलमानों को जाग्रत करने में खर्च होने लगा। उनकी नज्मों का दीवान ‘मुस्सदसे हाली’ के नाम से छपा लेकिन उनका एक गजलों का भी दीवान छपा था और इसमें लिखी उनकी गजलें इस लिहाज से दूसरी गजलों से अलग थीं कि उनमें हर शेर के तार आपस में जुड़े होते थे। सर सैयद अहमद की सुहबत ने हाली को पूरा बदल दिया। कौम की तरफ़दारी ने उन्हें एक कौमी शायर बना कर रख दिया। वे शायर से ज्यादा वाइज और नासेह नज़र आने लगे। दिल उनका मर गया और वे मौलवी बन गये। लाहौर के सरकारी बुक डिपो में रहकर वे मगरिब के तरफ़दार भी बन गये। इसीलिए उन्होंने फरमाया कि- हाली ! अब आओ परैवी-ए-मगरबी1 करें। बस इक्तदाये2 ‘मुसहफ़ी’ और ‘मीर’ कर चुके।। उनका ‘दीवाने-हाली’ गजलों, रूबाईयों और मर्सियों का संग्रह है। पहले जिस ‘हाली’ ने इश्क़ की प्रशंसा में कहा था कि- इश्क़ सुनते थे जिसे हम, वोह यही है शायद। खुदबखुद दिल में इक शख़्स समाया जाता है।। उसी ‘हाली’ ने फिर इश्क़ के लिये फ़र्माया कि- ऐ इश्क़ तूने अक्सर कौमों को खा के छोड़ा। जिस घर से सर उठाया उसको बिठा के छोड़ा।। 1. पैरवी ए मगरबी- अनुसरण, पश्चिमी दुनिया की वकालत, तरफदारी; 2. इक़्तदा- तरफदारी, प्रसंशा। अबरार तुझसे तरसा, अहरार तुझसे लरज़ा। जो ज़द पै तेरी आया उसको गिरा के छोड़ा।। रावों के राज छीने, शाहों ताज छीने। गर्दन-कशों1 को अक्सर, नीचे दिखा के छोड़ा।। क्या मुगनियों2 की दौलत, क्या जाहिदों3 का तकवा4। जो गंज तूने ताका उसको लुटा के छोड़ा।। जिस रह-गुजर5 पै बैठा तू गौलेराह6 बनकर। सनआँ7 से रास्तरौ8 को रस्ता भुला के छोड़ा।। वे इश्क़ से नफ़रत करते थे और मानते थे कि इश्क़ किसी का भी बना बनाया घर उजाड़ सकता है। ऐ इश्क़ ! दिल को रक्ख़ा, दुनिया का और न दीं का। घर ही बिगाड़ डाला, तूने बना बनाया।। वे ये भी मानने लगे कि यह जो कमबख़्त दिल है सीने में, वही सारे गमों की जड़ है। नसीहत बेअसर है गर न हो दर्द। ये गुर नासेह9 को बतलाना पड़ेगा।। बहुत याँ ठोकरें खाई हैं हमने। बस अब दुनिया को ठुकराना पड़ेगा।। बशर10 पहलू में दिल रखता है जब तक। उसे दुनिया का ग़म खाना पड़ेगा।। उनके शेरों में तसव्वुफ भी बहुत मिलता है चन्द नमूने पेश हैं‒ उनके जाते ही ये क्या हो गई घर की सूरत। न दीवार की सूरत है न दर की सूरत।। किससे पैमाने वफ़ा बांध रही है बुलबुल। कल न पहचान सकेगी गुलेतर की सूरत।। (गुल की खूबसूरती इतनी अस्थाई होती है कि एक दिन ही में वह इतना मुरझा जाता है कि पहचान ही में नहीं आता है। तो बुलबुल का उससे वफ़ादारी का वायदा लेना कैसे सफ़ल होगा।) 1. गर्दन कशों- अकड़ी हुई गर्दन (घमंडी); 2. मुगनियों- धनिकों; 3. जाहिदों- न पीने वालों; 4. तकवा- परहेज़गारी, खुदा का डर; 5. रहगुजर- राह, रास्ता; 6. गौलेराह- रास्ता बताने वाला; 7. सनआँ- कारीगरी; 8. रास्तरौ- सीधे रास्ते पर चलने वाला; 9. नासेह- नसीहत देने वाला; 10. बशर- इंसान। देखिये शेख ! मुसव्विर1 से खिंचे या न खिंचे। सूरत और आपसे बे-ऐब-बशर2 की सूरत।। वाइजों ! आतिशे-दोज़ख3 से जहां को तुमने। वह डराया कि खुद बन गये डर की सूरत।। अपनी जेबों से रहें सारे नमाज़ी हुशयार। इक बुजुर्ग आते हैं मस्ज़िद में खिज़र4 की सूरत।। (दुनिया में दीन वालों ने आदमी को दोज़ख की आग से इतना डराया कि वह स्वयं एक डर की सूरत बन गये और लोग उनसे कन्नी काटने लगे। है कोई ऐसा जो एक ऐसी सूरत बना दे जिसमें कोई ऐब न हो। आजकल तो मस्जिद में कोई बुजुर्ग दीनदार की सूरत भी बना कर आता है तो नमाजियों को अपनी जेब के कट जाने की दहशत हो जाती है।) काफ़िले गुज़रे वहां क्यों कर कि सलामत वाइज। हो जहां रहजन और रहनुमा एक ही शख़्स।। (जहाँ के रहनुमा (मार्ग दर्शक) ही रहजन (मार्ग में लूटने वाले) बन गये हों वहां से काफ़िले कैसे सकुशल गुज़र सकते हैं।) हाजियों हमको है घरवाले से काम। घर के महराबो-सुतूँ5 से क्या गरज़।। (हाजियों तुम शौक से काबे के मेहराब और खंभों को सज़दा करते रहो, मुझे तो इस घर के मालिक खुदा की तालाश है।) इक सम्भलते हम नजर आते नहीं। वर्ना गिर-गिरकर गये लाखों सम्भल।। कब तक आखिर ठहर सकता है वह घर। आ गया बुनियाद में जिसकी खलल।। (बाकी सब तो गिरे लेकिन फिर सम्भल गये एक हम ही नहीं सम्भल पाये क्योंकि हमारी तो जड़ ही हिल गई है। वो घर कब तक ठहरेगा जिसकी नींव हिल गई हो।) कम से कम वाज6 में इतना तो असर हो वाइज। बोल कव्वाल के जो दिल में असर करते हैं।। जुहदो-ताअत7 का सहारा नहीं जबसे जाहिद। याद अल्लाह को हम आठ पहर करते हैं।। 1. मुसव्वर- चित्रकार; 2. बे ऐब बशर- बिना बुराई वाले इन्सान; 3. आतिशे दोजख- नर्क की आग; 4. खिज़र- दीनदार इंसान, मौलवी; 5. महराबो सुतूँ- महराब और खंबे; 6. वाज- प्रवचन; 7. जुहदो-ताअत- विरक्ति (त्याग) और उपासना। (वाइज तेरी सीख में इतना असर तो हो जितना किसी कव्वाल के बोलो में होता है। यहां तो हाल यह है कि नेकचलनी और बंदगी को भूल गये हैं और आठों पहर खुदा-खुदा करते रहते हैं।) ऐब ये है कि करो ऐब हुनर दिखलाओ। वर्ना याँ ऐब तो सब फर्दोबशर1 करते हैं।। इक यहाँ जीने से बेज़ार हमीं हैं या-रब। या इसी तरह से सब उम्र बसर करते हैं।। (ऐब तो सभी इंसान करते हैं। अस्ल में ऐब तो यह है कि करो और यह दिखाओ कि यह ऐब नहीं हुनर है। इस संसार में हम ही जीने से बेज़ार हुए हैं या सभी ऐसा ही दोग़ला जीवन जीते हैं।) हो फरिश्ता भी तो नहीं इन्सान, दर्द थोड़ा बहुत न हो जिसमें। (जो गुनाहों से पाक और साफ़ हो वह इंसान फ़रिश्ता है लेकिन जिसके दिल में दूसरों का दर्द नहीं वह अगर फ़रिश्ता हो तो भी इंसान नहीं हो सकता।) जानवर, आदमी, फ़रिश्ता खुदा। आदमी की है सैकड़ों किस्में।। (आदमी कई प्रकार के होते हैं। वह जो केवल खाना, पीना और सोना जानते हैं, तो जानवर हैं। जिसे अपने आदमी होने के फर्जों का अहसास होता है वह आदमी कहलाता है। जो गुनाहों से पाक और साफ़ हो वह आदमी फ़रिश्ता या देवता समान है। और जो रूहानियत के आखिरी दर्ज़े पर पहुंच गया हो वह आदमी खुदा के समान है।) हाली ने ‘रहीम’ और ‘कबीर’ ही के समान दोहों की भी रचना की है जिसमें दुनियादारी का तजुर्बा भरा हुआ था। उनके ये चन्द दोहे भी मैं यहां पेश करूंगा जो मसनवी के रूप में लिखे हैं। बढ़ाओ न आपस में मिल्लत2 ज़ियादा। मुबादा3 कि हो जाय नफ़रत ज़ियादा।। तकल्लुफ़ अलामत4 है बेगानगी की। न डालो तकल्लुफ़ की आदत ज़ियादा।। करो दोस्तों पहले आप अपनी इज्जत। जो चाहो करें लोग इज़्ज़त ज़ियादा।। करो इल्म से इक्तासाबे-शराफ़त5। नजाबत6 से है ये शराफ़त ज़ियादा।। 1. फर्दोबशर- हर आदमी; 2. मिल्लत- मेल मिलाप; 3. मुबादा- ऐसा न हो कि; 4. अलामत- निशानी; 5. इक्तासाबे शराफ़त- मेहनत से नेकी कमाओ; 6. नजाबत- कुलीनता। फ़राग़त1 से दुनिया में दमभर न बैठो। अगर चाहते हो फ़राग़त ज़ियादा।। मुसीबत का इक इक से अहवाल2 कहना। मुसीबत से है ये मुसीबत ज़ियादा।। फिर औरों की तकते फिरोगे सख़ावत3। बढ़ाओ न हद से सख़ावत ज़ियादा।। कहीं दोस्त तुमसे न हो जाये बदज़न। जताओ न अपनी मुहब्बत ज़ियादा।। जो चाहो फ़कीरी में इज़्ज़त से रहना। न रक्खो अमीरों से मिल्लत ज़ियादा।। है उल्फ़त भी वहशत भी दुनिया से लाज़िम। पै उल्फ़त ज़ियादा न वहशत ज़ियादा। फ़रिश्ते से बेहतर है, इंसान बनना। मगर इसमें पड़ती है मेहनत ज़ियादा।। इनके अलावा भी कई शेर हाली साहब ने अपने तजुर्बात से लिखे जिनमें नसीहतें दी गई हैं‒ कबक4 और कुमरी5 में है झगड़ा कि चमन किसका है। कल बता देगी खिजां6 कि यह चमन किसका है।। दोस्त गर भाई न हो, दोस्त है तो भी लेकिन। भाई गर दोस्त नहीं तो नहीं कुछ भी भाई।। जो कहिये तो झूंठी, जो सुनिये तो सच्ची। खुशामद भी हमने अज़ब चीज पाई।। 1. फ़राग़त- आराम, फुर्सत, मुक्ति; 2. अहवाल- वर्णन करना; 3. सख़ावत- दान वीरता; 4. कबक- चकोर; 5. कुमरी- फाख्ता; 6. खिजां- पतझड़।
9:48 PM
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नवाब मिर्ज़ा खां ‘दाग’ देहलवी नवाब मिर्ज़ा खां ‘दाग’ का जन्म दिल्ली में हुआ और इसी वास्ते उन्होंने अपना तख़ल्लुस ‘देहलवी’ रखा। दाग के पिता शमशुद्दीन खां साहब जो लुहारू रियासत के नवाब के बड़े भाई थे की मौत तब हो गई जब दाग छः वर्ष के थे। इनकी माता ने फिर बहादुरशाह ‘ज़फर’ बादशाह के बेटे मिर्ज़ा मुहम्मद सफलतान उर्फ फख़रू से निकाह कर लिया और बेगम शौकत महल के नाम से जाने जानी लगी। मां के साथ मिर्ज़ा दाग ने भी लालकिले में रहना आंरभ कर दिया और अच्छी से अच्छी तालीम प्राप्त की। 10 वर्ष के होते ही वह शेरो शायरी करने लगे लेकिन 1857 की गदर ने इनके दिन फेर दिये और देहली छोड़ कर इन्हें रामपुर जाना पड़ा। ये पहले रामपुर के नवाब के बेटे कल्ब अली खां के मुसाहिब रखे गये और बाद में उनके नवाब बनने पर अस्तबल और फराश खाने के दरोगा मुकर्रर हुए। दाग रामपुर को आरामपुर कहा करते थे और नवाब की मेहरबानियों के बारे में उन्होंने कहा कि- रईसे-मुस्तफा-आबाद1 के नौकर हुए जब से। बताएं दाग क्या, आराम किस कदर पाया।। 1886 में एक बार फिर उनकी किस्मत ने पलटा खाया और दो वर्ष के समय में दसियों जगह की ठोकरें खाईं। 1888 में वे निज़ाम हैदराबाद के उस्ताद बने और 450 रुपये मासिक तनख़्वाह मिली जिसमें पिछला 2 वर्ष का समय भी शामिल था। फिर 550 रुपये का इज़ाफ़ा मिला और वोह भी हैदराबाद पहुंचने की तारीख से। कुल 80-81 हजार रुपये मिले और तनखा हो गई 1000 रुपये मासिक। इस पर खुश होकर दाग ने फरमाया कि‒ हो गया मेरा इज़ाफ़ा2 आज दूने से सिवा। यह करम अल्लाह का है, यह इनायत शाह की।। इस इज़ाफ़े की कहो ऐ दाग ! यह तारीख तुम। इब्तदा से अपनी साढ़े पान सौ नकदी बढ़ी।। 1. रइसे मुस्तफा आबाद- पाक जगहँ पर रहने वाले रईस; 2. इज़ाफ़ा- बढ़ोतरी। लेकिन दाग देहलवी बड़े खुशकिस्मत शायर थे। ज़ौक़ शहंशाहे-हिन्दोस्तां के उस्ताद थे, पाते थे सिर्फ 30 रु. माहवार। गालिब को तो यह भी नसीब नहीं हुआ। मिर्ज़ा दाग खुश मिज़ाज और नफ़ीस इंसान थे, हर किसी से मज़ाक कर लेते थे। वे आशिक मिज़ाज और एय्याश तो थे लेकिन बादाख़्वार नहीं थे। वे अपने साथ वाले शायरों से कभी नहीं उलझे बल्कि उन्होंने हमेशा उनकी कद्र की। उन्होंने इस्लाह के लिये बाकायदा एक दफ़्तर खोला जिसमें उनके शार्गिद और मुंशी काम करते थे। इससे रोजाना तकरीबन 15-20 गजलें इस्लाह की जाती थीं। निज़ाम हैदराबाद की गजलें मिर्ज़ा साहब खुद देखते थे और जल्द इस्लाह कर वापस भेजे देते थे। ‘अमीर’ मीनाई साहब कीे बहुत कद्र करते थे, जबकि वे इनके मुकाबले-बाज समझे जाते हैं। इनके शर्गिदों में खास नामचीन है अल्लामा इकबाल, ‘बेखुद’ देहलवी, ‘अहसन’ माहरवी, ‘नूह’ नारवी, ‘सीमाब’ अकबराबादी और ‘जिगर’ मुरादाबादी। अपने लिये दाग का कहना था कि‒ ‘‘जिसे दाग कहते हैं दोस्तों! इसी रूसियाह1 का नाम है।’’ रामपुर में दाग की हैसियत उनके दुश्मनों के मुताबिक वह नहीं थी जो उनके शार्गिद बयान करते थे। शुरू में वे वहां महज 50 रुपये माहवार पर अस्तबल के दरोगा बनाए गये थे। और उनके एक रकीब ने उनकी इस समय की हैसियत पर यह शेर भी कहा कि- आया दिल्ली से एक नया मुश्क़ी2। आते ही अस्तबल में दाग हुआ।। दाग ने चार दीवान लिखे ‘गुलजारे दाग’, ‘आफताबे दाग’, ‘महताबे दाग’ और ‘यादगारे-दाग’। उनके ये चारों दीवान बाज़ारी इश्क़ के कलाम से भरे पड़े हैं। दाग का माशूक बाज़ारी माशूक है और उनका इश्क़ हविस से अटा होता है। इस बात के हक में उनके चंद शेर पेश हैं - इलाही क्यूं नहीं उठती कयामत माज़रा3 क्या है। हमारे सामने पहलू में वो दुश्मन के बैठे हैं।। खुमार-आलूदा4 आंखें बल जबीं5 पर दर्द है सर में। रहे तुम रात भर बेचैन किस कम्बख्त के घर में।। आपकी ही बज़्म6 मुहब्बत की अदालत ठहरी। रोज दो चार के इज़हार हुआ करते हैं।। घर से निकले न कभी पूछ न ले वोह जब तक। जमा दस बीस खरीददार हुए हैं कि नहीं।। 1. रूसियाह-कलमुंहा, कमबख़्त, गुनहगार; 2. मुश्क़ी- घोड़ा; 3. माज़रा- मामला, हाल; 4. खुमार आलूदा- नशीली; 5. जबीं- ललाट; 6. बज़्म- महफिल। न केवल उनका माशूक बाज़ारी था बल्कि आशिक भी हरज़ाई होता था। इलाही अशिकी में हम बड़ी तकदीर वाले हैं। सुने हैं खुशगुलू क्या क्या चुने हैं खूबरू क्या क्या।। हाय वह दिन कि मय्यसर1 थी हमें रात नई। रोज़ माशूक़ नया रोज़ मुलाकात नई।। दाग़ ने देखे हजारों हैं हसीं। आपने किस शख़्स से दावा किया।। दाग़ की शायरी इस तरह के शेरों से भरी पड़ी है इसलिए शायद उन्हें लोग एय्याशाना शायर कहते हैं। जब कभी तसव्वुफ इसमें शामिल हुआ उनका अन्दाज़े-बयाँ ऐसा रहा कि वो बात आ ही नहीं पाई जो गालिब में थी, आतिश में थी। बानगी देखिए‒ पिन्दे-वाइज2 सुनते सुनते कान अपने भर गये। क्या इबादत को हमीं है सब फरिश्ते मर गये। यह तसव्वुफ नहीं बग़ावते तसव्वुफ है परन्तु दाग़ का कलाम पूरा का पूरा उनकी तबीयत के कुदरती रंग में डूबा हुआ था। दाग़ एक खास अंदाज के मालिक थे जैसे ग़ालिब का एक खास अंदाज था। उनकी शायरी मौज़-शौक़ की शायरी है। फिर भी कभी कभी कहीं न कहीं तसव्वुफ और पाक़ीज़गी आ ही जाती है। चन्द नमूने पेशे खिदमत हैं- अशिकी से मिलेगा ऐ ज़ाहिद। बंदगी से नहीं खुदा मिलता।। तकलीद3 से जाहिद की हासिल हमें क्या होता। इंसाँ न मालिक बनता, बन्दा न खुदा होता।। न बदले आदमी जन्नत से भी बेतुल-हज़न4 अपना। कि अपना घर है अपना, और है अपना वतन अपना।। यह काम नहीं आसाँ इन्सान को, मुश्किल है। दुनिया में भला होना, दुनिया का भला करना।। फ़लक5 देता है जिनको ऐश उनको ग़म भी होते हैं। जहां बजते हैं नक्कारे वहां मातम भी होते हैं।। 1. मय्यसर- हासिल, उपलब्ध; 2. पिन्दे वाइज- वाइज की सीख; 3. तकलीद- नकल, अनुसरण; 4. बेतुल हजन- ग़म कदा, परेशानी वाला घर; 5. फ़लक- आसमान, किस्मत। दिल दे तो इस मिज़ाज़ का परवर-दिगार1 दे। जो रंज की घड़ी भी खुशी से गुज़ार दे।। न इतराइये, देर लगती है क्या ? ज़माने को करवट बदलते हुए।। क्या गज़ब है कि नहीं इंसान को इंसान की कद्र। हर फ़रिश्ते को यह हसरत है कि वो इंसाँ होता।। गुज़र गये हैं जो दिन फिर न आयेंगे हरगिज़। कि एक चाल फ़लक हर बरस नहीं चलता।। कहा गुंचे से मुरझाकर यह गुल ने। हमेशा कब रहा जोबन, किसी का।। वे उर्दू में फ़ारसी के कठिन शब्दों को मिलाने के सख़्त खिलाफ थे। इसलिए फर्माते थे- कहते हैं उसे ज़बाने-उर्दू, जिसमें न रंग हो फारसी का। और अपनी इस जुबाँ पर उनको निहायत ही नाज़ भी था। उर्दू है जिसका नाम हमीं जानते हैं दाग़। सारे जहां में धूम हमारी जबाँ की है।। मिर्ज़ा दाग़ के कुछ यादगार अशआर पेशे-खिदमत हैं- दुश्मन के आगे सर न झुकेगा किसी तरह। ये आस्मां जमीं से मिलाया न जाएगा।। ऐ दाग़ ! तुमको रिज़्क3 की ख़्वाहिश है चखऱ्4 से। इतना ये ग़म खिलायेगा, खाया न जाएगा।। न रोना है तरीके का न हंसना है सलीक़े का। परेशानी में कोई काम जी से हो नहीं सकता।। तेरी उल्फ़त की चिंगारी ने ज़ालिम इक जहाँ फूँका। इधार चमकी उधर सुलगी यहाँ फूँका वहाँ फूँका।। क्या कहूँ तेरे तगाफुल ने, हया ने, क्या किया। इस अदा ने क्या किया, उस अदा ने क्या किया।। दुनिया में मज़ा इश्क़ से बेहतर नहीं होता। यह ज़ायका4 वो है कि मयस्सर नहीं होता।। 1. परवर दिगार- खुदा, पालनहार; 2. रिज्क- भोजन, जीविका; 3. चर्ख- आसमान; 4. ज़ायका- स्वाद। बेदाद1 तेरी देख के ये हाल हुआ है। आशिक़ कोई दुनिया में किसी पर नहीं होता।। गज़ब किया तेरे वादे का एतबार2 किया। तमाम रात कयामत का इंतज़ार किया।। ज़िबह3 करते ही मुझे कातिल ने धाोये अपने हाथ। और खूं-आलूदा4 खंजर गैर के घर रख दिया।। शाम से ही लौटना है, मुझको अंगारों पै आज। इसलिए मैंने अलग तह करके बिस्तर रख दिया।। ले लिया हाथों में मुझको देखकर बे-अख़्तियार5। आज इनका पासबां6 मेरा निगहबां7 हो गया।। ईमान कुछ वजू तो नहीं है जो टूट जाए। ऐ शेख ! क्या हुआ जो मैं तौबा शिकन हुआ।। मेरे ही दम से जिन्दा है आज़ार8 इश्क़ का। मैं मर गया अगर तो यह आज़ार मर गया।। शौक़ है ऐसा कि तेरी राह में मरकर भी चलूं। ज़ौफ़ है ऐसा कि नहीं जान से जाया जाता।। तौबा के बाद भी खाली-खाली कोई सागर नहीं देखा जाता। मुख़्तसर9 ये है कि अब दाग का हाल बन्दापरवर नहीं देखा जाता।। तुम्हारे खत में एक नया सलाम किस का था । न था रक़ीब तो आखिर वो नाम किसका था ।। वोह कत्ल करके मुझे हर किसी से पूछते हैं। ये काम किसने किया, ये काम किस का था ।। ‘‘वफ़ा करेंगे, निबाहेगें बात मानेगें’’। तुम्हें भी याद है कुछ, यह कलाम किसका था ।। इधर देख लेना उधर देख लेना। कनखियों से उसको मगर देख लेना।। कहीं ऐसे बिगड़े संवरते भी देखे हैं। न आएंगे वो राह पर देख लेना।। 1. बेदाद- जुल्मो सितम; 2. एतबार- यकीन; 3. जिबह- कत्ल; 4. खूं आलूदा- खून से भरा; 5. बेअख़्तियार- बेसाख़्ता, खुद ब खुद; 6. पासबाँ- रक्षा करने वाला; 7. निगहबाँ- चौकीदार; 8. आज़ार- रोग; 9. मुख़्तसर- संक्षेप में। अपनी तस्वीर वोह खिंचवायें यह मुमकिन ही नहीं। जिसने आईने में भी अक़्स न ड़ाला अपना।। ख़ाक किस किस की खुदा जाने हुई दामनगीर1। तुमने चलते हुए दामन न संभाला अपना।। हंसी आती है अपने रोने पर। और रोना है जग हंसाई का।। खुशबू वही, वही है नज़ाकत, वही है रंग। माशूक क्या है फूल है तू भी गुलाब का।। रोज़ा रखें, नमाज़ पढ़ें हज़ अदा करें। अल्लाह ये सवाब2 भी है किस अज़ाब3 का।। मैं जब सवाल करूं तो कहते हैं चुप रहो। क्या बात है ! जवाब नहीं, इस जवाब का।। तुम्हारा दिल मेरे दिल के बराबर हो नहीं सकता। वो शीशा हो नहीं सकता, ये पत्थर हो नहीं सकता।। जफाएँ4 दाग़ पर करते हैं वोह यह भी समझते हैं। कि ऐसा आदमी मुझको मयस्सर5 हो नहीं सकता।। आंसू गिरा जो आंख से तकदीर ने कहा। मिलते हैं देख ख़ाक में यूं आबरू पसंद।। मेरे दिल को देखकर मेरी वफ़ा को देखकर। बन्दापरवर मुंसिफी6 करना, खुदा को देखकर।। दिलरूबा है शर्म भी, शोखी भी दिल किस किसको को दूं।। इस अदा को देखकर या, उस अदा को देखकर।। भवें तनती है खंजर हाथ में है तनके बैठे हैं। किसी से आज बिगड़ी है जो वह यूं बन के बैठे हैं।। ये उठना बैठना महफ़िल में उनका रंग लाएगा। कयामत बन के उठ्ठेंगे भभूका7 बन के बैठे हैं।। 1. दामनगीर- दामन से चिपकना; 2. सवाब-पुण्य; 3. अज़ाब- पाप की सज़ा, कष्ट, कठिनाई; 4. जफाएँ- सितम, जुल्म; 5. मयस्सर- हासिल, उपलब्ध; 6. मुंसिफी- न्याय; 7. भभूका- क्रोध से आग बबूला होकर। मैंने मरकर हिज्र में पाई शफ़ा1। ऐसे अच्छे का वो मातम क्या करे।। एक सागर पर है अपनी जिंदगी। रफ़्ता-रफ़्ता2 इससे भी कम क्या करे।। साफ़ कब इम्तिहान लेते हैं। वोह तो दम देके जान लेते हैं।। अपने बिस्मिल3 का सर है जानू4 पर। किस मोहब्बत से जान लेते हैं।। इन सब अशआरों में दाग़ की तबीयत साफ़ झलकती है और कोई भी सुखन फहम इनको पढ़कर यह कहेगा कि यह वही दाग है जिसने अपने लिये कहा था कि‒ यह क्या कहा कि दाग़ को पहचानते नहीं। वोह एक ही तो शख़्स है तुम जानते नहीं।। और अपने दिल के बारे में कहा था कि- कब किसी दर की जिबीं-साईं5 की। शेख़ साहब नमाज़ क्या जाने।। जिनको अपनी ख़बर नहीं अब तक। वोह मेरे दिल का राज़ क्या जाने।। जो गुज़रते हैं दाग पर सदमे। आप बंदा-नवाज़6 क्या जाने।। क्या लिखूँ, कितना लिखूँ, जितना लिखूँ उतना ही कम। हज़रते दाग़ के कलाम में, मैं क्या कहूं कितना है दम।। यह मेरी तरफ से सलाम है मिर्ज़ा दाग़ और उनकी शायरी को। फिर भी रूख़सत लेने से पहले चंद बूंदे इस आबे-हयात की और भी पी लूं तो सही‒ पड़ा फ़लक को अभी दिलजलों से काम नहीं। अगर न आग लगा दूँ तो दाग़ नाम नहीं।। उड़ गई यूँ वफ़ा जमाने से। कभी गोया किसी में थी ही नहीं।। 1. शफा- आरोग्य; 2. रफ़्ता-रफ़्ता- धीरे-धीरे; 3. बिस्मिल- घायल, आशिक; 4. जानू- रान्, जाँघ; 5. जिबी साईं- सिर को नवाना; 6. बंदा नवाज- परवाह करने वाले। दिल लगी दिल्लगी नहीं नासेह1। तेरे दिल को अभी लगी ही नहीं।। नहीं जानते इश्क़ का अंजाम क्या है। वो मरना मेरा दिल्लगी2 जानते हैं।। समझता है तो दाग़ को रिंद ज़ाहिद। मगर रिंद उसको वली जानते हैं।। मेरे मरने की ख़बर सुनकर कहा। ‘‘वाकई कुछ भी नहीं इंसान में’’।। जिसने दिल खोया उसी को कुछ मिला। फ़ायदा देखा इसी नुकसान में।। कुछ न पूछो जो मयख़ाने से सदा आती है। कभी मस्ज़िद से जो हम पढ़कर नमाज़ आते हैं।। सब लोग जिधर हैं उधर देख रहे हैं। हम तो बस देखने वालों की नज़र देख रहे हैं।। खत ग़ैर का पढ़ते थे जो टोका तो वह बोले। अख़बार का पर्चा है ख़बर देख रहे हैं।। बात करते हैं खुशी की भी तो एक रंज के साथ। वो हंसाते भी हैं ऐसा कि रूला देते हैं।। मैने जो मांगा कभी दूर से दिल डर-डर कर। उसने धमका के कहा ‘‘पास तो आ देते हैं’’।। * 1. नासेह- नसीहत देने वाला; 2. दिल्लगी- हँसी उड़ना।
9:37 PM
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मुंशी अमीर अहमद ‘अमीर’ मीनाई मुंशी अमीर अहमद ‘अमीर’ नवाब नसीरूद्दीन के समय लखनऊ में पैदा हुए। इन्होंने नवाब मुजफ़्फ़र अली खां ‘असीर’ की शर्गिदी में शायरी की और बाद में इनके कारण ‘असीर’ का भी नाम चमका। यह रामपुर के नवाब के यहां मुलाजिम रहे। लख़नवी शायरों में ‘अमीर’ मीनाई साहब का दर्जा आतिश और नासिख के बाद आता है। मिर्ज़ा दाग इनके समकालीन थे। इन्होंने गजलें, कसीदे और मसनवी सभी लिखे। यह कभी असीर के अन्दाज में लिखते तो कभी दाग और दर्द के अंदाज में। व्यवहार से हरदिल अजीज और गैरतमंद1 इंसान थे। सबकी इज्जत का पूरा ख्याल करते थे। मिर्ज़ा दाग जो उसी समय जलवा-अफरोज़2 थे की गजलों को उन्होंने खूब इज्जत दी और सराहा। उनका एक दीवान ‘मिरातुलगैब’ और दूसरा ‘जौहरे-इन्तखाब’ था जो असीर तथा दर्द के रंग में कहे गये हैं। तीसरा दीवान ‘सनम खानये इश्क़’ अपने मुकाबले बाज मिर्ज़ा दाग के रंग में कहा गया। उनके खारजी रंग में लिखे चन्द अशआर पेश खिदमत हैं: आया न एक बार अयादत3 को वोह मसीह। सौ बार मैं फरेब4 से बीमार हो चुका।। जब आस्ताने-यार5 पै हाजिर हुए हैं हम। दरबां से ये सुना है कि दरबार हो चुका।। पछता रहे हैं खून मेरा करके क्यों हूजूर। अब इसपै खाक डालिये जो कुछ हुआ हुआ।। यह ज़ोफ-से-सुबह6 हूं कि नक्शे-कदम7 मेरा। पड़ता तो है जमीन पै लेकिन मिटा हुआ।। बोसा तलब किया तो कहने लगा वह बुत। कुदरत खुदा की तुमको भी यह हौसला हुआ।। 1. गैरतमंद- इज्जत आबरू वाले; 2. जलवा अफरोज- शोभित, विद्यमान; 3. अयादत- बीमार का हाल पूछने; 4. फरेब- धोखा, झूट; 5. आस्ताने यार- यार की चौखट; 6. जोफसे सुबह- इतना कमजोर; 7. नक्शे कदम- कदम का निशान। चमकी ये किस गरीब की सहरा में बर्केआह1। रहजन2 से डर के रहरवे-मंजिल3 लिपट गया।। लैला तो महमिले-दिले-मजनूं4 में थी मकीं5। दीवाना था जो देख के महमिल लिपट गया।। वो मस्त हूं नसीब मुझे तब कफ़न हुआ। जब रहन6 मयफरोश7 के धर पैरहन8 हुआ।। वाइज का था ख़्याल तो फ़स्ले-खिजां9 तलक। लो आ गई बहार, मैं तौबा-शिकन10 हुआ।। हया तो उसको बिठाये हजार पर्दों में, मगर जो बैठने दे शौक़ख़ुदनुमाई11 का। सम्भल के देखो अगर देखते हो आईना, फ़िसल ना जाय कहीं पांव ख़ुदनुमाई का।। अब चंद शेर तसव्वुफ के पेशे-खिदमत हैं- शेख काबे से गया उस तक, बिरहमन दैर से। एक थी दोनों की मंजिल, फ़र्क था कुछ राह का।। कुछ न समझे हो कि बूझे हो, वह क्या चीज है। नाम तुमने सुन लिया है, जाहिदों अल्लाह का।। है किश्वरे-अदम12 में खुदा जाने सैर क्या। आया न फिरके मंजिलेहस्ती13 से जो गया।। पीरी में आई मौत, जवानी गुज़र गई। जागा तमाम शब मैं, दमे-सुबह सो गया।। मातम किया किसी ने मेरा न तो क्या हुआ। अब्र14 आके खाके-गोर15 पै हर साल रो गया।। कहां का काबा है, दैर कैसा? बताओ कूचे का उसके रास्ता। मैं पूछता हूं पता कहीं का, निशां देते हो तुम कहीं का।। काज़ी बरहना-सर16 है, तो जख़्मी है मुहतसिब17। शायद कि पी गये हैं बहुत बादाख़्वार18 आज।। 1. बर्के आह- आह की बिजली; 2. रहजन- लुटेरे; 3. रहरवे मंजिल- साथ चलने वाला; 4. महमिले दिले मजनूं- मजनूं के दिल का हौदा; 5. मकीं- रहना; 6. रहन- गिरवी; 7. मयफ़रोश- मदिरा बेचने वाला; 8. पैरहन- पहनावा; 9. फस्ले खिजाँ- पतझड़ का मौसम; 10. तौबा शिकन- तौबा तोड़ने वाला; 11. ख़ुदनुमाई- अपनी नुमाईश; 12. किश्वरे अदम- अदम के मुल्क, परलोक; 13. मंजिले हस्ती- अपने अस्तित्व; 14. अब्र- बादल; 15. खाके गोर- कब्र की मिट्टी; 16. बरहना सर- बिना टोपी के, नंगे सिर; 17. मुहतसिब- शराब बन्दी का हाकिम; 18. बादाख़्वार- पीने वाले। मर्तबा पेशे-खुदा होता है उतना ही बुलंद। जिस कदर मिलता है इंसान सें इसां झुककर।। है यह ईमां कि चला चाहते हैं जेरे-जमीं1। चलते हैं मौसमे-पीरी2 में जो इंसा झुककर।। तौबा सौ बार मैं कर लूंगा कुछ इंकार नहीं। मैकशी से तो जरा हो मुझे फुर्सत वाइज।। कांपता खैफ़ से मस्तों का है रूआं-रूआं। कुछ जबां से नहीं तौबा की जरूरत वाइज।। तू जो रिन्दों3 की हक़ीक़त नहीं समझा न समझ। रिन्द समझते है तेरी खूब हक़ीक़त वाइज।। जामे-मय देख के जामे4 से हुआ तू बाहर। पीले दो घूंट तो क्या हो तेरी सूरत वाइज।। देख मयखाने में घनघोर घटा छाई है। सर पै मस्तों के है, अल्लाह की रहमत5 वाइज।। ऐसे पढ़ने से तो अच्छा था कि जाहिल रहता। न हया तुझमें है बाकी न मुरव्वत6 वाइज।। अब एक गज़ल मुलाहिज़ा7 फरमाईये जो एक जुदा ही रंग की है :- ऐ इन्कलाबे-दहर8 मिटाता है क्यों मुझे। नक्शे हजार मिट गये तब बना हूं मैं।। नामे वो बारी-बारी उश्शाक9 के पढ़ेंगे। उजलत10 में कुछ न होगा नम्बर लगे हुए हैं।। मैं जानता हूं बुलबुल है जो तेरी हक़ीक़त। इकमुश्ते-इस्तख्वां11 है दो पर लगे हुए हैं।। है हुक्मे-यार कोई मेरी तरफ़ न देखे। ये इश्तहार12 अब तो घर-घर लगे हुए हैं।। मुझ बेनवा-गदा13 को पूछे ‘अमीर’ वो क्या ? शाहों के उस गली में बिस्तर लगे हुए हैं।। 1. जेरे जमीं- जमीन के नीचे; 2. मौसमे पीरी- बुढ़ापे का समय; 3. रिन्दों- पी के मस्त रहने वालों; 4. जामे- अपने आपे (कपड़ों); 5. रहमत- दया; 6. मुरव्वत- प्रेम, सामंजस्य; 7. मुलाहिजा- देखिये/सुनिये; 8. इन्कलाबे दहर- संसार की क्रान्ति; 9. उश्शाक- आशिकों; 10. उजलत- जल्दबाजी; 11. इकमुश्ते इस्तख्वां- एक मुट्ठी हड्डियाँ; 12. इश्तहार- विज्ञापन; 13. बेनवा गदा- गरीब भिखारी। और अंत में उनके लिखे कुछ यादगार अशआर आप की नज़र करता हूँ- काज़ी भी अब तो आये हैं बज़्मेशराब में। साकी हजार शुक्र खुदा की जनाब में।। हाजत1 नहीं तो दौलते-दुनियां से काम क्या। फंसता है तिशना-दाम2 फ़रेबे-शराब3 में।। दिल साफ हो तो कशमकशे-दहर4 क्या करे। शोला है कब धुएं की तरह पेचोताब5 में।। परवा नहीं है हमको अगर हैं कफ़स में बंद। सैयाद, सैर बाग की करते हैं ख़्वाब में।। दुनिया से हाथ धोके कूए-यार में। जाइज6 नहीं कि तवाफ़े-हरम7 बेवज़ू8 करें।। दीवानगी का सिलसिला ताअत9 में भी न जाय। पहले पढ़ें नमाज तो पीछे वजू करें।। जाहिद तेरे फरिश्तों को यह दिन नहीं नसीब। जन्नत से दूर आये जो हम आरजू करें।। मैं उल्फत के वोह हुस्न के जोश में। न मैं होश में हूं न वो होश में।। न उठो अभी बज़्म से मयकशों। हमें भी तो आ लेने दो होश में।। यह वजह है जो आरिजेजानां10 पै है नकाब। करती है जिल्द खूब हिफ़ाज़त किताब की।। देखो तो इत्तहाद11 जरा हुस्नोइश्क़ का। बुलबुल के आंसुओं में है खुशबू गुलाब की।। तुम चौदहवीं का चांद हो तो अपने वास्ते। क्या फ़ायदा किसी को किसी के कमाल से।। इन दिनों दुख़्तरे-रिज़12 का नहीं मिलता है पता। कहीं काजी के तो घर जा के नहीं बैठ गई।। 1. हाजत- ज़रूरत, आवश्यकता; 2. तिशना दाम- तृष्णा के चक्कर; 3. फरेबे शराब- शराब के धोखे; 4. कश्मकशे दहर- दुनिया की कश्मकश; 5. पेचोताब- चक्कर; 6. जाइज- सही; 7. तवाफे हरम- काबे की परिक्रमा; 8. बेवजू-बिना वजू; 9. ताअत- पूजा, उपासना; 10. आरिजेजानां- माशूक के गालों; 11. इत्तहाद- एका, एकता; 12. दुख़्तरे-रिज़- अंगूर की बेटी। लिया जो ख़्वाब में बोसा तो यार जाग उठा। तमाम उम्र का हम एतबार खो बैठे।। बलाएं लेते ही वोह और हो गया वहशी1। हम अपने हाथों से अपना शिकार खो बैठे।। ये कज़ा है कि अदा आपकी सुभान अल्लाह। सफ2 उलटती है जो मस्जिद में जनाब आते हैं।। हजारों खार, लाखों फूल, उस गुलशन में हैं लेकिन। न तुम सा नाजनीं कोई न हमसा नातवां कोई।। भारी बहुत है लाऊंगा रोजे-ज़जा3 में रिन्द। रखवा के सर पै शेख के गठरी गुनाह की।। वाइज किताबेवाज़ लिए है तो क्या हुआ ? बोतल शराब की भी तो पिन्हा4 बगल में है।। समझा यह मैं जो निकले शाखों से गुल चमन में। सूफी निकल के बैठे हैं ख़िलवत5 से अन्जुमन6 में।। * 1. वहशी- दीवाना, पागल, जंगली; 2. सफ- कतार, पंक्ति; 3. रोज़े जज़ा- इंसाफ के दिवस; 4. पिन्हा- छिपी हुई; 5. ख़िलवत- अकेलापन, तन्हाई; 6. अन्जुमन- महफिल।
9:33 PM
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मिर्जा अबुज़फर, बहादुरशाह ‘ज़फर’ बहादुरशाह ज़फर न केवल हिन्दोस्ताँ के आखिरी बादशाह थे बल्कि वे बादशाहों और नवाबों में सबसे बेहतर और आखिरी शायर भी थे। वे बड़े नेक इन्सान थे और हिन्दू मुसलमां को एक नजर देखते थे। पैदा तो दिल्ली में हुए परन्तु शायरी में खारजी रंग जियादह था। वे ‘नासिख’, ‘इंशा’ और ‘जुरअत’ के लख़नवी तथा खारजी रंग के शौकीन थे परन्तु उन्हें खारजी रंग का कोई अच्छा उस्ताद न मिला। अतः उनकी शायरी में न तो देहलवी शायरी का सोज़ोगुदाज़1 आ पाया और ना ही लख़नवी शायरी की रूमानियत2। काफी समय तक शाह नसीर से इस्लाह लेते रहे और बाद में ज़ौक़ की शागिर्दी भी की। ज़ौक़ और ज़फर दोनों ही एक समय शाह ‘नसीर’ के शागिर्द थे अतः ज़ौक़ ज़फर के मन को अच्छी तरह से समझते थे। अक्सर तो ज़फर के लिये ज़ौक़ खुद ही गज़लें लिख दिया करते थे। ज़फर को अपनी शायरी पर खूब नाज था और वे कहते थे कि‒ ज़र्फे-सुखन3 का अपने ‘ज़फर’ बादशाह है। उसके सुखन से याँ न किसी का सुखन लगा।। परन्तु वास्तव में शाह नसीर की शर्गिदी के कारण उनकी शायरी ज्यादातर अटपटे काफियों में बंधी होती थी। मिसाल के तौर पर चंद शेर पेश हैं‒ कहूं क्या रंग उस गुल का अहा-हाहा, अहा-हाहा। हुआ रंगी चमन सारा अहा-हाहा, अहा-हाहा।। तूँ आ इस दम कि ऐ वक्ते-सहर गुलबदन ! ठंडा। ज़मीं ठंडी, हवा ठंडी, मकाँ ठंडा, चमन ठंडा।। दाग कब दिल को ऐ निगार4 ! लगा। इश्क़ के घर पै इश्तहार लगा।। 1. सोजो गुदाज- दर्द और पीड़ा का अहसास; 2. रूमानियत- इश्क मोहब्बत का अन्दाज; 3. जर्फे सुखन- शेरो शायरी की काबिलियत; 4. निगार- बुत, माशूका, सुन्दरी। फ़लक ने तेरे सर का अम्मामा1 मजनूं। जुनूं को लगाकर उछाला बिगाड़ा।। खुदा ने जब ज़माले-बुताँ2 बनाया था। नज़र को तीर भवों को कमां बनाया था। एक दो साग़र से क्या होता है, हम तो खुम3 के खुम। बैठकर साक़ी के सब ज़ानू-ब-ज़ानू4 पी गये।। यूं है तबीयत अपनी हविस पर लगी हुई। मकड़ी की जैसे ताक मगस5 पर लगी हुई।। आज़ाद कब करे सैयाद हमें देखिये। रहती है आँख बाबे-कफ़स6 पर लगी हुई।। ज़फर की शायरी का माशूक न केवल बाज़ारी है बल्कि बादाख़्वार भी है। उनके कलाम में खारजी रंग के सभी दोष पाये जाते हैं। पर उसके गुण ज्यादातर दिखाई नहीं देते। इसमें वस्ल के गिले-शिकवे, हिज्र के सदमे, बोसे-बाजी आदि की भरमार है। इसमें मुआमलात बंदी और अमरद परस्ती के अशआर की भी भरमार है। लेकिन बाज शेरों में तसव्वुफ और फ़लसफ़ा भी जल्वा अफरोज़ है। नमूने के चंद शेर पेशे-खिदमत हैं। गर फिक्र में हो, रहे-राह7 के तोशे8 की करो फिक्र। ऐ गाफिलों ! नजदीक है रोज़े-सफ़र9 आया।। न देखा वह कहीं जलना जो देखा खानये-दिल में। बहुत मस्जिद में सर मारा बहुत सा ढूँढ़ा बुतखाना।। उम्रे-दराज माँग कर लाए थे चार दिन। दो आरजू में कट गये दो इन्तजार में।। इतना था बदनसीब ज़फर दफ़्न के लिए। दो गज जमीं भी ना मिली कूए-यार10 में।। न थी हाल की जब हमें अपनी खबर। रहे देखते औरों के एबो-हुनर।। पड़ी अपनी बुराईयों पर जो नज़र। तो निगाह में कोई बुरा न रहा।। 1. अम्मामा- टोपी; 2. ज़माले बुताँ- प्रेयसी का सौन्दर्य; 3. खुम- मदिरा रखने का पात्र; 4. ज़ानू ब ज़ानू- बराबर बैठकर; 5. मगस- शहद की मक्खी; 6. बाबे कफ़स- कैद का द्वार; 7. रहे राह- मौत का सफर; 8. तोशे- सफर का सामान; 9. रोजे सफ़र- मौत का दिन; 10. कूए यार- यार के कूचे (अपना वतन)। ज़फर आदमी उसको न जानियेगा। वोह हो कैसा ही साहबे-फ़हमो-ज़का1।। जिसे ऐश में यादे खुदा न रही। जिसे तैश में खौफ़े खुदा न रहे।। न हो जिसमें अदब, और हो किताबों से लदा फिरता। ज़फर उस आदमी को हम तसव्वुर2 बैल करते हैं।। ऊपर लिखे तसव्वुफ के चन्द शेर भी ज़फर को शायरी की बुलंदी पर ले जाने के लिए काफी हैं लेकिन खारजी अन्दाज के कुछ और शेर भी काबिले-तारीफ हैं। चन्द नमूने पेशे-खिदमत हैं‒ किसी ने उस को समझाया तो होता। कोई यां तक उसे लाया तो होता।। मजा रखता है जख़्मे-खंजरे-इश्क़3। कभी ए बुलहविस4 खाया तो होता।। न भेजा लिख के तूने एक परचा। हमारे दिल को परचाया5 तो होता।। जो कुछ होता सो होता तूने तकदीर। वहां तक मुझको पहुंचाया तो होता।। चारागर6 भर ना सके मेरे ज़िगर के नासूर। एक गर बन्द किया दूसरा रोज़न7 निकला।। सोजिशे-दागे-अमल8 से पहले भेजा जल गया। बाद उसके दिल जला और फिर कलेजा जल गया।। उफ् मेरे मजमूने-सोजे-दिल9 में भी क्या आग है। खत जो कासिद उसको मैंने लिखके भेजा जल गया।। मेरी आंख बंद थी जब तलक वोह नज़र में नूरे-जमाल था। खुली आंख तो न खबर रही कि वोह ख्वाब था कि ख़्याल था।। मेरे दिल में था कि कहूंगा मैं जो यह दिलपै रंजो-मलाल10 है। वोह जब आ गया मेरे सामने न तो रंज था न मलाल था।। 1. साहबे फ़हमो जका- समझदार और जहीन; 2. तसव्वुर- कल्पना, तुलना; 3. जख्मे खंजरे इश्क- प्रेम के खंजर का जख़्म; 4.बुलहविस- कामेच्छा रखने वाला; 5. परचाया- फुसलाया; 6. चारागर- हकीम, इलाज करने वाला; 7. रोजन- छेद; 8. सोजिशे दागे अमल- मानसिक कुढ़न के आचरण की खराबी; 9. मजमूने सोजे दिल- दिल की जलन से लिखा लेख; 10. रंजो-मलाल- दुःख और पछतावा। यह आस्मां गुलाम है किस महज़माल1 का। पहने फिरे है कान में बाला हिलाल2 का।। दे दिया दिल और नहीं याद यह किसको दिया। इश्क़ को खो दे खुदा जिसने जहां से खो दिया।। ख्वाह3 वह दागे-जुनूं हो ख़्वाह कोई अश्के-खूं4। हमने सर आँखों पर रखा, इश्क़ तूने जो दिया।। हमने कहके अपना हाले-दिल दिया सबको रूला। हर तरफ रूमाल पर रूमाल तर होने लगा।। कूचये-जाना में जाना ही पड़ेगा हो सो हो। क्या करूं बेताब दिल फिर ऐ ज़फर! होने लगा।। और अब इसी खारजी रंग में रंगी एक बेहतरीन गज़ल पेश है- बात करनी मुझे मुश्किल कभी ऐसी तो न थी। जैसी अब है तेरी महफ़िल कभी ऐसी तो न थी।। ले गया छीन के कौन आज तेरा सब्रोकरार। बेकरारी तुझे ऐ दिल कभी ऐसी तो न थी।। चश्मे-कातिल5 मेरी दुश्मन थी हमेशा लेकिन। जैसी अब हो गई कातिल कभी ऐसी तो न थी।। उनकी आँखों ने खुदा जाने किया क्या जादू। कि तबीयत मेरी माइल6 कभी ऐसी तो न थी।। क्या सबब7 तू जो बिगड़ता है ज़फर से हरबार। खू8 तेरी हूरे-शिमाइल9 कभी ऐसी तो न थी।। ज़फर का सफ़र बीस वर्षों की नाम मात्र की बादशाही तथा सन् 1857 की गदर के बाद रंगून की कैद तक पहुंचा। जिस अंग्रेज ने उन्हें कैद किया वह भी सुखन फहम था। ज़फर की दुखती रग को छेड़ते हुए उसने एक शेर कहा‒ दमदमे10 में दम नहीं अब खैर मांगो जान की। ए ज़फर बस हो चुकी शमशीर11 हिन्दुस्तान की।। 1. महज़माल- चाँद सी सुन्दर; 2. हिलाल- चाँद; 3. ख्वाह - चाहे; 4. अश्के खूं- खून के आँसू; 5. चश्मे कातिल- कत्ल कर देने वाली आंखें; 6. माइल- ढीली, खराब; 7. सबब- कारण; 8. खू- आदत; 9. हूरे शिमाइल- अप्सरा जैसा; 10. दमदमा- युद्ध के समय बना मोरचा; 11. शमशीर- तलवार। इस शेर का ज़फर ने फिलबदी जवाब दिया और करारा जवाब दिया कि- हिन्दयों में बू रहेगी जब तलक ईमान की। तख्ते-लंदन पर चलेगी त़ेग1 हिन्दुस्तान की।। ज़फर का केवल यह शेर भी उनकी सुखन फहमी की बलंदी को सिद्ध करने के लिये काफी है। और उनकी इन्सानियत तो काबिले-तारीफ हमेशा से ही रही थी। इसीलिए तो उन्होंने फरमाया था कि‒ उसको इन्सां मत समझ हो सरकशी2 जिसमें ज़फर। ख़ाकसारी3 के लिए है, ख़ाक से इंसान बना।। * 1. तेग- कृपाण; 2. सरकशी- घमंड; 3. खाकसारी- आजिज़ी (नम्रता)।
9:16 PM
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मिर्ज़ा असदुल्लाह खाँ ‘ग़ालिब’ मिर्ज़ा असदुल्लाखाँ ‘ग़ालिब’ का नाम लेना ही शायरी की कला को सलाम करने जैसा है। उनके ख़ुद ही के शेर को उनकी शोहरत के लिए काम में लाना चाहूँगा। हैं और भी दुनिया में सुख़नवर बहुत अच्छे। कहते हैं कि ग़ालिब का है अन्दाज़े-बयाँ और।। उस्तादे-शहंशाह न बन पाने की टीस जो उनके मन में रही और जौक़ की बराबरी करने व अपने को उनसे बेहतर सिद्ध करने की होड़ के कारण से गालिब ने फ़ारसी छोड़ कर उर्दू में जो कलाम लिखा वह रोज़ दर रोज़ फ़लक़े-शायरी1 में उनको बुलंदी की और ले जाता रहा। हाल में जो प्रतिष्ठा तथा अहमियत ग़ालिब को मिली है वो किसी भी शायर, यहाँ तक कि आबरू-ए-सुखन ‘मीर-तकी-मीर’ को भी नहीं मिली। यह सही कहा गया है कि- ये मसाइले- तसव्वुफ2, ये तेरा बयान ग़ालिब। तुझे हम ‘वली’ समझते जो ना बादाख़्वार3 होता।। गालिब आगरे में पैदा हुए तथा पले बढ़े। शायरी भी उन्होंने वहीं पर शुरू की। वे फ़ारसी में आला दर्जे की शायरी करते थे और उर्दू में शायरी करना हेटी समझते थे। अगर कभी कुछ उर्दू में कह भी दिया तो वह इतना फ़ारसी से भरा होता था कि अच्छे से अच्छा सुख़न-फहम भी बग़लें झाँकने लगता था। उनकी न समझी जा सकने वाली शायरी के कारण ही किसी ने यह कह दिया कि‒ कलामे-मीर समझे और ज़बाने-मीरज़ा समझे। मगर इनका कहा यह आप समझे या खुदा समझे।। 1. फलके शायरी-आसमाने शायरी; 2. मसाइले तसव्वुफ- इश्वरीय ज्ञान, दर्शन का ज़िक्र; 3. बादाख़्वार- शराबी। एक बार क़ादिर अली ‘रामपुरी’ साहब ने इनके कलाम का मज़ाक उड़ाते हुए एक मनगढंत शेर पढ़ा और उसका मायना बताने के लिए इनको कहा। वह शेर था‒ पहले तो रोग़ने-गुल1 भैंस के अण्डे से निकाल। फिर दवा जितनी है कुल भैंस के अण्डे से निकाल।। शेर बिल्कुल बेमायनी था और गालिब समझ गये कि उनके कलाम का मज़ाक उड़ाने के लिए कहा गया था परन्तु जवाब में उनका फर्माना था कि - गर ख़ामुशी से फ़ायदा अख़फ़ाए-हाल2 है। खुश हूँ कि मेरी बात समझनी मुहाल3 है।। न सताइश4 की तमन्ना न सिले5 की परवा। न सही गर मेरे अशआर में मानी न सही।। आसान कहने की करते हैं फ़रमाइश। गोयम6 मुश्किल वगर नगोयम7 मुश्किल।। ग़ालिब दरअसल उस समय शायरी करते रहे जब लखनऊ ‘नासिख’ के ख़ारजी रंग में सरोबार था तो देहली शाह नसीर की शायरी का दम भरती थी। गालिब की शायरी में न तो खारजी रंग था और न ही वह आसान होती थी। उसमें फ़लसफा होता था और फ़ारसी होती थी। ‘गालिब’ को बहुत बाद में और पुरज़ोर तरीके से नवाज़ा गया। उनके दीवान में से छपते समय उन्होंने ख़ुद ने दो तिहाई मुश्किल और गूढ़ शेर निकाल दिये इसलिए उनका उर्दू का कलाम बहुत छोटा है। लेकिन इतने में भी जो बुलन्द अशआर उन्होंने लिखे हैं उनकी गिनती कम नहीं। गालिब के पिता मिर्ज़ा अब्दुल्लाबेग़ ने अवध में आसिफुद्दौला की और हैदराबाद में निज़ाम की मुलाज़िमत की और फिर अलवर में राजा बख़्तावर सिंह की फौज में रहे। उनके चचा आगरे में मराठों के सूबेदार रहे। मिर्ज़ा ग़ालिब उन्हीं के पास पले और बढ़े। जब आगरे पर अँग्रेज़ क़ाबिज8 हुए तो ग़ालिब के चचा को लाख रुपये की ज़ागीर और एक हज़ार रुपये मासिक वेतन दिया गया। परन्तु उनकी मौत पर जागीर और वेतन दोनों वापस ले लिये गये और मिर्ज़ा को केवल पेन्शन मिलने लगी। उस समय मिर्ज़ा की उम्र सिर्फ आठ बरस की थी। थोड़े वर्ष आगरे में बिताए पर फिर वहाँ रहना उनको नागवार लगा अतः दिल्ली आकर बस गये। आगरे से कूच करते वक्त अपनी मनोदशा तथा आगरे के माहौल के बारे में उन्होंने फर्माया था कि- 1. रोगने गुल- फूलों का तेल; 2. अख़फाए हाल- स्थिति छिपाना; 3. मुहाल- मुश्किल; 4. सताइश- सराहना; 5. सिला- बदला; 6. गोयम- बोले तो; 7. नगोयम- न बोले तो; 8. काबिज-कब्जा करना। आगरे के शोलारूख़1 हैं आग रे। भाग रे ग़ालिब यहाँ से भाग रे।। मिर्ज़ा बड़े खुशमिज़ाज इन्सान थे और किसी भी विषय पर शायरी कर सकते थे। एक महिफ़ल में उन्होंने सुपारी पर 13 शेर की एक नज़्म फिलबदी2 पढ़ दी थी। जौक़ की शायरी की दिल्ली में बहुत प्रतिष्ठा थी। लोग यह मानते थे कि वे शायरों के सरताज थे और इसीलिए शहंशाह बहादुरशाह ’जफ़र’ जो खुद भी एक शायर थे ने उन्हें अपना उस्ताद बनाया है। ग़ालिब को हमेशा उनसे रश्क़ रहा और इस बात का अफ़सोस कि वे शहंशाह के उस्ताद न बन सके। शहंशाह के हरम में उनकी बेगम ज़ीनतमहल ग़ालिब की तरफ़दार थीं। उन्होंने अपने बेटे ‘जवांबख़्त’ की शादी का सेहरा गालिब से लिखवाया तो गालिब ने अपने नायाब सेहरे के अन्त में एक मक़्ता लिखा कि- हम सुख़न फ़हम हैं, ग़ालिब के तरफ़दार नहीं। देखें इस सेहरे से कह दे कोई बेहतर सेहरा।। ये सेहरा जब बादशाह के सामने पेश हुआ तो वह इस मक़्ते में की गई चोट को समझ गये और जौक़ को भी सेहरा लिखने को कहा। जौक़ ने फिलबदी सेहरा लिखा और दोनों सेहरे मजलिस3 में पढ़े गये। जौक़ बादशाह के चहेते थे और सेहरा भी ग़ालिब के मुकाबिले कहा गया था इसलिए उनके सेहरे को ख़ूब दाद मिली। अब गालिब बड़े परेशान हुए और बादशाह की नाराज़गी से डरे भी। इसलिए उन्होंने जल्दी से एक ‘क़िता’ माफी माँगते हुए लिखा जिसमें यह अशआर थे कि‒ आज़ादरौ4 हूँ और मेरा मसलक5 है सुलहकुल6। हरगिज़ कभी किसी से अदावत7 नहीं मुझे।। उस्तादेशह से हो मुझे पुरख़ाश8 का ख़याल। यह ताब, यह मज़ाल, यह ताकत नहीं मुझे।। ग़ालिब जैसा शायर यह सब कहने को मजबूर हुआ क्योंकि उनको जो पेंशन मिलती थी वह नाकाफ़ी थी और बादशाह के रहमो-करम पर बहुत कुछ निर्भर करता था। बादशाह के यहाँ से थोड़ा बहुत सीग़ा बन्धा था और वह भी समय पर नहीं मिलता था। इसलिए बादशाह से गुज़ारिश करनी पड़ती थी कि- 1. शोलारूख- दमकते चेहरे वाला; 2. फ़िलबदी- तत्काल; 3. मजलिस- महफिल; 4. आजादरौ- आजाद ख़्याल; 5. मसलक- तरीका; 6. सुलहकुल- सबसे मेल रखना; 7. अदावत- दुश्मनी; 8. पुरख़ाश- जलन, ईर्ष्या। क्यों न दरकार हो मुझे पोशिश1। जिस्म रखता हूँ है अगरचे नाज़ार2।। कुछ खरीदा नहीं है अबके साल। कुछ बनाया नहीं है अबकी बार।। रात को आग और दिन को धूप। भाड़ में जाएं ऐसे लैलोनहार3।। आग तापे कहाँ तलक इंसान। धूप खाये कहाँ तलक जाँदार।। आप का बन्दा और फिरूं नंगा। आपका नौकर, खाँऊ उधार। तुम सलामत रहो हज़ार बरस। हर बरस के हों दिन पचास हज़ार।। लेकिन इसी मुफ़लिसी ने ग़ालिब की शायरी में फ़लसफ़ा और दर्द दोनों भर दिये। कबीर के दोहों ही के सामन गालिब के शेरों के मायने भी गूढ़ होते थे, बानगी देखिये- ढाँपा कफ़न ने दाग़े-अयूबे-बरहनगी4। मैं वरना हर लिबास में नंगे वजूद था।। (मेरे अवगुणों की नग्नता को मौत ने ढक दिया वर्ना मैं तो पूरा बदनाम हो चुका था।) इश्क़ से तबीयत ने ज़ीस्त का मजा पाया। दर्द की दवा पाई, दर्द बेदवा पाया।। (प्रेम से ही ज़िन्दगी में मजा है। बग़ैर प्रेम के ये जिंदगी दुश्कर है। इश्क़ इस जिंदगी के दर्द की दवा है मगर इश्क़ खुद एक लाइलाज बीमारी है।) मेरी तामीर5 में मुज़मिर6 है इक सूरत ख़राबी की। हैवला7 बर्क़े-ख़िरमन8 का है ख़ूने-गर्म दहकाँ9 का।। (मेरे अस्तित्व निर्माण में खराबी है, शरीर बिजली सा चमकदार है और खून मेहनत कश किसान की तरह गर्म है।) बस कि दुश्वार है हर काम का आसाँ होना। आदमी को भी मयस्सर10 नहीं इन्साँ होना।। 1. पोशिश- पहनावा, पोशाक; 2. नाज़ार- दुर्बल, कमजोर; 3. लैलो नहार- रात और दिन; 4. दाग़े अयूबे बरहनगी- ऐब के दाग तथा नंगा पन; 5. तामीर- निर्माण; 6. मुज़मिर- शरीक, शामिल; 7. हैवला- शरीर 8. बर्के खिरमन- खलिहान की आग; 9. खूने गर्म दहकाँ- किसान के गर्म खून; 10. मयस्सर- उपलब्ध। (इस दुनिया में कोई भी काम आसान नहीं। हर आदमी इंसान है पर इंसानियत हर एक को मयस्सर नहीं।) दोस्त ग़मख़्वारी1 में मेरी सई2 फरमाएँगे क्या ? जख़्म के भरने तलक नाखून न बढ़ आएंगे क्या ? ये कहाँ की दोस्ती है कि बने हैं दोस्त नासेह3। कोई चारा-साज़4 होता, कोई ग़मगुसार5 होता।। (दोस्त भी उपदेश देने वाले बन गये हैं उनमें से कोई भी दुख का इलाज नहीं करता और ग़म को दूर नहीं करता।) हविस को है निशातेकार6 क्या क्या ? न हो मरना तो जीने का मज़ा क्या ? (तृष्णाओं के कारण मनुष्य को काम करने की उमंग और जल्दी मची रहती है। इस जल्दी का मुख्य कारण मौत की अनिश्चितता है। मौत अगर नहीं होती तो हर चाह और उमंग जाती रहती।) फ़रोगे7 शोला-ए-ख़स8 यक-नफ़स9 है। हविस को पासे-नामूसे10 वफ़ा क्या।। (कामुक इंसान के इश्क़ में गहराई नहीं होती। घास की आग का भड़कना सिर्फ कुछ समय के लिये होता है। हवस को इज्जत का खयाल नहीं होता।) सीने का दाग है, वोह नाला कि लब तक न गया। ख़ाक-का-रिज़्क11 है वोह क़तरा कि दरिया न हुआ।। (जो नाला लबों से कहा न गया वो दिल का दाग बन गया, जो कतरा दरिया में न मिला वह मिट्टी में दफ़न हो गया और जो कोशिश पूरी न हुई वोह बेकार हो गई।) क़तरे में दजला12 दिखाई न दे और ज़ुज़13 में कुल। खेल बच्चों का हुआ, दीदए-बीना14 न हुआ।। (कतरे में दरिया न दिखे और अंश में कुल तो ये बचपना है या आँख का कुसूर है। अर्थात संसार के हर ज़र्रे में खुदा न दिखे तो ये देखने वाले की आँख का ही कुसूर है।) जमा करते हो क्यों रक़ीबों को, इक तमाशा हुआ गिला न हुआ। (मैं जब शिकायत करता हूँ तो दुश्मनों को क्यूं बुलाते हो। ये कोई तमाशा नहीं है कि सब इसे देखें और मज़ा लें।) 1. गमख़्वारी- हम दर्दी; 2. सई- मदद का प्रयास; 3. नासेह- नसीहत देने वाले; 4. चारा साज- ईलाज करने वाला, दर्द बाँटने वाला; 5. गमगुसार- गम को बाँटने वाला; 6. निशातेकार - काम करने की उमंगें; 7. फरोग- चमक, प्रकाश; 8. शोला ए ख़स- घास की आग; 9. यक नफ़स- एक सांस जितनी; 10. पासे नामूसे- इज़्ज़त का खयाल; 11. ख़ाक का रिज़्क- बेकार जाने वाला; 12. दज़ला- नदी; 13. जुज़ - टुकड़ा, अंश; 14. दीद ए बीना- देखने वाली आँख। न था कुछ तो ख़ुदा था, कुछ न होता तो ख़ुदा होता। डुबोया मुझको होने ने, न होता मैं तो क्या होता।। (दुनिया में आने से पहले मैं खुदा का अंश था। यहाँ अगर न आता तो उसी का इक अंश रहता। मेरे इंसान के रूप में पैदा होने से ही मेरा पतन हुआ है।) इन सब अशआर से जाहिर है कि गालिब का फ़लसफा कितना गहरा था और यह बात एकदम साफ़ हो जाती है। जब गालिब की शायरी ने बुलंदी को छुआ तो लोग बाग उनके शेरों पर तज़मीने भी करने लगे। पर शेर का शिकार करना कोई आसान काम नहीं होता। तज़मीन में किसी के कहे गये शेर पर हम-वज़न तीन और मिसरे कहने पड़ते हैं। ऐसे ही एक अच्छे ख़मसे (तज़मीन) का एक नमूना पेश है। गालिब का शेर था कि :- गालिबे-ख़स्ता1 के बग़ैर कौन से काम बन्द हैं ? रोइये ज़ार ज़ार क्या कीजिए हाय-हाय क्यों ? इस शेर पर सबा ‘अकबराबादी’ ने एक बहुत ही उम्दा तज़मीन की कि- बज़्मे-ख़वास2 बन्द हैं, बज़्मे-अवाम3 बन्द हैं ? किसके सलाम बन्द हैं, किसके पयाम बन्द हैं ?? मैकदे बन्द हैं न कुछ साग़रो-जाम4 बन्द हैं। ग़ालिबे ख़स्ता के बगैर कौन से काम बंद हैं ? और देखिये कि कैसे किसी की तज़मीन ने गालिब के एक दूसरे बेहतरीन शेर के पुर्ज़े उड़ा दिये। ग़ालिब का शेर है - वोह आएं घर में हमारे खुदा की कुदरत है। कभी हम उनको कभी अपने घर को देखते हैं।। (उनका हमारे घर पर आना इक फ़व की बात है पर मेरा घर उनके वज़ूद के सामने ख़ाक समान है।) इतने गहरे फ़लसफे वाले शेर की मज़ाकिया तज़मीन कुछ इस तरह की गई कि- सुना है जब से कि चोरी की उनको आदत है। हमें हिफ़ाज़ते-सामां5 की सख़्त दिक़्क़त है।। निगाह-दाश्त6 की हर वक्त किसको फुर्सत है। वोह आए घर पै हमारे खुदा की कुदरत है। 1. गालिबे खस्ता- गरीब गालिब; 2. बज़्मे ख़वास- खास लोगों की महफिलें; 3. बज़्मे अवाम- आम लोगों की महफिलें; 4. सागरो जाम-शराब और प्याले; 5. हिफाजते सामां- सामान की सुरक्षा; 6. निगाहदास्त-निगाह रखने। इस तज़मीन ने शेर की आत्मा को ही नेस्तानाबूद1 कर दिया है, फिर भी उसका एक नया मतलब निकालकर मज़ाक में लपेट दिया है। यह बात नहीं है कि ग़ालिब केवल फलसफाना शायरी ही करते थे। इश्क़िया शायरी का उनका कलाम भी उतना ही बुलंद है। पाक इश्क़ पर उनके कई अशआर क़ाबिले तारीफ़ हैं, चन्द अशआर पेश करता हूं- तुझसे बेजा है मुझे अपनी तबाही का गिला। इसमें कुछ शाइब-ए-ख़ूबिये-तक़दीर2 भी था।। (तुझसे मेरी बर्बादी का शिकवा करना ठीक नहीं, क्योंकि इसमें मेरी क़िस्मत का ही ज्यादा हाथ था।) आईना देखके अपना सा मुंह लेके रह गये । साहब को दिल न देने पै कितना ग़रूर था।। यानि माशूक इतना ख़ूबसूरत है कि आईने में अपनी सूरत देख खुद उस पर दिल दे बैठा, तो आशिक का क्या दोष? क़ासिद को अपने हाथ से गर्दन न मारिये । उसकी खता नहीं है, ये मेरा कुसूर था ।। पत्रवाहक को मारने से कोई लाभ नहीं, आप मुझे मारिये क्योंकि उसके साथ ख़त मैंने भेजा था। यानि कासिद को माशूक़ के हाथ से मार पड़े इस बात से भी आशिक़ को तकलीफ होती है, रश्क होता है। जाते हुऐ कहते हो, ‘कयामत को मिलेंगे’। क्या खूब, क़यामत है, गोया कोई दिन और।। माशूक़ जिस रोज़ आता है आशिक़ के लिये तो वही दिन क़यामत का दिन है, इसलिए अगर मिलना है तो उसी रोज़ मिलना हो सकता है। इसी सिलसिले में मिर्ज़ा साहब की एक गज़ल के तीन चार मिसरे पेशे-ख़िदमत हैं- वो फ़िराक और वो विसाल कहां ? वो शबो-रोज़ो-माहोसाल कहां।। फ़ुर्सते-कारोबारे-शौक़3 किसे ? ज़ौक़े-नज़्ज़ारा-ए-ज़माल4 कहां।। थी वो इक शख्स के तसव्वुर5 से । अब वो रानाई-ए-ख़याल6 कहां।। 1. नेस्तानाबूद- तहस नहस; 2. शाइब ए खूबिये तकदीर- तकदीर भी शामिल थी; 3. फुर्सते कारोबारे शौक- इश्क़ में व्यस्त रहने की फुर्सत; 4. ज़ौके-नज़्ज़ारा-ए-जमाल- हुस्न के नज़ारे को देखने की ताकत; 5. तसव्वुर-कल्पना; 6. रानाई-ए-ख़याल- खयालों की सुन्दरता। फिक्रे दुनिया में सर खपाता हूं। मैं कहां और ये बवाल कहां।। इन मिसरों में प्रेम का महत्व और संसार की प्रेम के बिना निस्सारता दोनों ही स्पष्ट है। गालिब एक और तख़ल्लुस ‘असद’ के नाम से शेर कहते थे। उनकी पाक इश्क़िया शायरी की एक और गज़ल के कुछ शेर पेश हैं। आह को चाहिए इक उम्र असर होने तक। कौन जीता है तेरी जुल्फ़ के सर1 होने तक।। आशिक़ी सब्र तलब और तमन्ना बेताब। दिल का क्या रंग करूं ख़ूने-ज़िगर2 होने तक।। हमने माना कि तग़ाफ़ुल3 न करोगे लेकिन। ख़ाक हो जायेंगे हम तुम को ख़बर होने तक।। ग़मे-हस्ती का ‘असद’ किस से हो ज़ुज़-मर्ग4 इलाज़। शम्अ हर रंग में जलती है सहर5 होने तक।। यह बात करने का कोई ढंग नहीं कि हर बात पर मुझे नीचा दिखाया जाये। वह लहू लहू नहीं जो सिर्फ रगों में दौड़ता रहे, आँख से जो टपके वही असली लहू है। अर्थात वह मनुष्य नहीं जो दूसरे से बदतमीजी से पेश आये, मनुष्य तो वही है जो इंसानियत और अदब से पेश आये। हर एक बात पै कहते हो तुम कि तू क्या है ? तुम्हीं कहो कि ये अन्दाजे-गुफ़्तगू6 क्या है ? रगों में दौड़ते फिरने के हम नहीं कायल7। जब आँख ही से न टपका तो फिर लहू क्या है ? अब फिर से कुछ इश्क़ की शायरी के चुनिंदा शेर पेश करता हूं, दिल नहीं चाहता कि जनाब ग़ालिब से रूख़सत लूं। पर क्या करूं? और भी तो है सुख़नवर बहुत अच्छे। गैर लें महफ़िल में बोसे जाम के, हम रहे तिश्नालब8 पैग़ाम के। ख़त लिखेंगे गरचे मतलब कुछ न हो, हम तो आशिक हैं तुम्हारे नाम के।। 1. सर- हासिल; 2. ख़ूने जिगर- दिल का खून; 3. तगाफ़ुल - बेरूखी, लापरवाही; 4. ज़ुज़ मर्ग- मृत्यु के बगैर; 5. सहर- सुबह; 6. अन्दाजे गुफ़्तगू- बात करने का ढ़ंग; 7. कायल- विश्वासु, आदी, फिदा; 8. तिश्नालब- प्यासे। नुक्ताचीं1 है ग़मे-दिल उसको सुनाये न बने। क्या बने बात जहां बात बनाये न बने।। ग़ैर फिरता है लिये यूं तेरे ख़त को कि अगर। कोई पूछे कि ये क्या है तो छुपाये न बने।। इश्क़ पर जोर नहीं है यह वोह आतिश गालिब। कि लगाये न लगे और बुझाये न बने।। रोने से इश्क़ में और बेबाक2 हो गये। धोये गये हम ऐसे कि बस पाक हो गये।। और ग़ालिब से अगर रूख़सत लेना हो तो इस शेर से अच्छा और शेर क्या हो सकता है, जो गालिब की शख्सियत और उनके क़लाम दोनों ही पर सटीक ठहरता है। मुहब्बत में नहीं है फ़र्क़ मरने और जीने का। उसी को देखकर जीते हैं जिस काफ़िर पे दम निकले।। कहां मयखाने का दरवाजा गालिब और कहां वाइज। पर इतना जानते हैं कल वोह जाता था कि हम निकले।। ग़ालिब ने इतना अच्छा कहा कि अच्छे से भी अच्छा कहा। ग़ालिब की शायरी का तसव्वुर एक खूबसूरत परीवश के तसव्वुर से भी खूबसूरत है, और मैं यह तसव्वुर बार-बार करना चाहता हूं। इसके लिए मैं सदैव फुर्सत के दिन रात ढूंढ़ता रहता हूं। बकौल ग़ालिब‒ जी ढूंढ़ता है फिर वही फुर्सत के रात दिन। बैठे रहें तसव्वुरे-जानाँ3 किए हुए।। अब अन्त में मेरा एक शेर ग़ालिब को सलाम कहने को- फ़कत मैं और तेरा दीवान हो ग़ालिब ! और कोई न हो मेरा शौक बंटाने के लिए।। * 1. नुक्ताचीं- छिद्रान्वेषी, नुक्श निकालने वाला; 2. बेबाक- निडर, बेअदब; 3. तसव्वुरे जानाँ- प्रेमिका का ख़याल।
9:13 PM
Article Published by : PAVAN KUMAR SHARMA,' PAAVAN &MAAHIR
हकीम मुहम्मद मोमिन खान ‘मोमिन’ हकीम मुहम्मद मोमिन खान ‘मोमिन’ दिल्ली में पैदा हुए और उन्होंने अरबी तथा फ़ारसी की तालीम हासिल की। वे हिकमत, नज़टम1 तथा रमल2 के भी जानकार थे। उन्होंने शाह नसीर की शागिर्दी की और नासिख से भी थोड़े प्रभावित रहे। मोमिन जितनी अच्छी गज़लें बनाते थे पढ़ते भी उतने ही अच्छे अंदाज से थे। मोमिन एक ख़ालिस कलाकार थे। किसी की प्रशंसा में कसीदे कहना या किसी पर तंज करते हुए हिजो कहना उनकी तबियत के बिल्कुल ही ख़िलाफ था। इसीलिए वह नौकरी के फंदे से सदैव मुक्त रहे। मोमिन को मुफ़लिसी की परीक्षा से भी नहीं गुज़रना पड़ा। गज़ल उनकी शायरी की विशेषता थी और उसमें वे तसव्वुफ और फलसफ़े की जगह इन्सानी मुहब्बत को अहमियत देते थे। वे मुआमलात बन्दी के शायर थे और आशिक़ तथा माशूक़ के प्रेम संबंधों का वर्णन उन्होंने बहुत ही नफ़ासत3 से किया है। इस बात के उदाहरण के लिए उनके चंद शेर पेशे-ख़िदमत हैं। आग अश्के-गरम को लगे जी क्या ही जल गया। आँसू जो पूछे उसने शब और हाथ जल गया।। (मेरे गर्म आँसुओं को आग लगे क्योंकि कल रात उनको पोंछने में मेरी माशूक के हाथ जल गये।) उस कूचे की हवा थी कि मेरी ही आह थी। कोई तो दिल की आग पे पंखा सा झल गया।। (यह मेरी आह थी या उसके घर की हवा जिससे मेरे दिल की आग को भड़का दिया) ये नातवाँ4 हूँ कि हूँ और नज़र नहीं आता। मेरा भी हाल हुआ, तेरी ही कमर सा।। 1. नजूम- ज्योतिष; 2. रमल- पासे फैंक कर भविष्य जानना; 3. नफ़ासत- उम्दगी, सफाई; 4. नातवाँ- कमजोर। (मेरी नज़ाकत इतनी बढ़ गई है उसके प्रेम में कि माशूक की कमर की तरह पतला हो गया हूं।) क्यों उम्मीदे-वफ़ा से हो तसल्ली दिल को। फ़िक्र है यह कि वह वादे से पशेमाँ1 होगा।। (माशूक के इश्क की स्वीकृति और उसके वादे से दिल को तसल्ली तो कम और यह फ़िक्र ज्यादा है कि उसको इससे कोई पछतावा नहीं हो।) बात करने में रक़ीबों से अभी टूट गया। दिल भी शायद उसी बद-अहद2 का पैमाँ होगा।। (माशूक के रकीबों से बात करने से उसका अहद टूटा और आशिक का दिल टूटा क्योंकि वो भी माशूक के अहद ही की तरह कमजोर था।) मुए न इश्क में जब तक वोह महरबाँ न हुआ। बलाए जाँ है वोह दिल जो बलाएजाँ न हुआ।। (वह जीवन किस काम का जो किसी पे निसार न हो। ऐसी जिन्दगी को ढोना एक मुसीबत है।) उनका इश्क़ हक़ीक़ी इश्क़ जैसा ही मुबारक था एक कतआ पेशे-ख़िदमत है- दमे-हिसाब रहा, रोजे-हश्र3 यह ही ज़िक्र। हमारे इश्क़ का चर्चा कहाँ कहाँ न हुआ।। उमीदे-वायदे-दीदारे हश्र पर ‘मोमिन’। तू बेमज़ा था कि हसरते बुताँ न हुआ।। (मोमिन इस कदर उदास था कि हश्र के समय मिलने के वायदे पर डटा रहा, संसार में माशूक की चाहत पाने की कोशिश न की।) लेकिन बाज़ अशआर ऐसे भी हैं जिनसे बाज़ारी इश्क भी टपकता है। गौर फर्माइये- माशूक से भी हमने निभाई बराबरी। वाँ लुत्फ कम हुआ तो यहाँ प्यार कम हुआ।। (माशूक का लुत्फ कम होने के साथ-साथ मेरा इश्क़ भी कमजोर हो गया।) आये गज़ालचश्म4 सदा मेरे दाम में। सैयाद5 ही रहा मैं, गिरफ़्तार कम हुआ।। (मेरे जाल में सदा हिरणी जैसे नयनों वाले माशूक ही फँसे, मैं खुद कभी गिरफ़्तार न हुआ।) 1. पशेमाँ- शर्मिन्दा; 2. बद अहद- दगाबाज़; 3. रोजे हश्र- कयामत के रोज; 4. गज़ाल चश्म- हिरनी सी आँखों वाले; 5. सैय्याद- शिकारी (माशूक)। यानि न केवल मोमिन का माशूक बाज़ारी रहा बल्कि उनका आशिक़ भी बाज़ारी हुआ और इश्क भी। वादा-ए-वसलत1 से हो दिल शाद2 क्या ? तुमसे दुश्मन की मुबारक बाद क्या ? मैं असीर3 उसका जो है अपना असीर। हम न समझें सैद4 क्या सैयाद क्या ? (जो मेरे इश्क़ में कैद हैं मैं भी उसी का कैदी हूँ। मैं नहीं जानता कि कौन सैद है और कौन सैयाद।) तो ज्यादातर उन्होंने पाक इश्क़िया शायरी कही लेकिन कभी-कभी ज़माने के दौर में बाज़ारी इश्क़ की शायरी भी की। एक और शेर पेश है- वो आये हैं पेशमाँ लाश पर अब, तुझे ए जिन्दगी लाऊँ कहाँ से। जहाँ से तंगतर जन्नत न हो जाय, बहुत हसरत भरा जाता हूँ याँ से।। आख़िर में उनकी एक बेहतरीन गज़ल पेशे-ख़िदमत है - वोह जो हम में तुम में करार था, तुम्हे याद हो कि न याद हो। वही वादा यानी निबाह का, तुम्हें याद हो कि न याद हो।। वोह नये गिले वो शिकायतें, वो मज़े मज़े की हिकायतें5। वोह हरेक बात पै रूठना, तुम्हें याद हो कि न याद हो।। कभी बैठे बज़्म में रूबरू, तो इशारों से ही गुफ़्तगू6। वो बयान शौक़ का बरमला7, तुम्हें याद हो कि न याद हो।। कोई बात गर ऐसी हुई कि, तुम्हारे जी को बुरी लगी। तो बयाँ से पहले ही भूलना, तुम्हें याद हो कि न याद हो।। कभी हममें तुममे भी चाह थी, कभी हमसे तुमसे राह थी। कभी हम भी तुम भी थे आशना, तुम्हें याद हो कि न याद हो।। वोह बिगड़ना वस्ल की रात का, वोह न मानना किसी बात का। वोह नहीं नहीं की हर अदा, तुम्हें याद हो कि न याद हो।। अब चन्द और बेहतरीन शेर पेश कर के मोमिन साहब से रूख़सत लेता हूँ- है निगाहें-लुत्फ़ दुश्मन पर तो बंदा जाय है। यह सितम ऐ बे-मुरव्वत8 किससे देखा जाये है।। ग़ैर के हमराह वोह आता है, मैं हैरान हूँ। जिसके इस्तक़बाल9 को जी मेरा तन से जाय है।। 1. वादा ए वसलत- मिलने का वादा; 2. शाद- खुश, प्रसन्न; 3. असीर- गुलाम, कैदी; 4. सैद- शिकार होने वाला; 5. हिकायतें- दास्तानें, बातें; 6. गुफ्तगू- बातचीत; 7. बरमला- मुँह दर मुँह; 8. बे मुरव्वत- जिसे कोई लगाव न हो; 9. इस्तकबाल - स्वागत। बुलहविस1 और लाफेजाँ बाज़ी2, खेल कैसा समझ लिया है इश्क़। क़हर है, मौत है, क़जा है इश्क़, सच तो यह है, बुरी बला है इश्क़।। जो पहले दिन ही से दिल का कहा न करते हम। तो अब यह लोगों की बातें सुना न करते हम।। अगर न आँख त़ग़ाफुल शआर3 से लगती। तो बैठे बैठे यूं चौंक उठा न करते हम।। अगर न हँसना हँसाना किसी का भा जाता। तो बात-बात पै यूँ रो दिया न करते हम।। कूद कर घर में तो पहुँचा मैं तेरे, पर क्या करूँ। दम निकल जाता था खटके से, बराबर रात को।। याद दिलवाई तपिश4 ने तेरी शोखी5 वस्ल की। मर गये हम देखकर चीं हाये बिस्तर रात को।। हम समझतें हैं आज़माने को। उज़्र कुछ चाहिए सताने को।। संगेदर6 से तेरी निकाली आग हमने। दुश्मन का घर जलाने को।। रोज़े-महशर7 भी होश गर आया। जायेंगे हम शराब खाने को।। मुझपै बादे-इम्तहाँ8 भी ज़ोर कम क्यों कर करे ? वोह सताए गैर को ऐसा सितम क्यों कर करे ? है दोस्ती तो जानिबे-दुश्मन9 न देखना। जादू भरा हुआ है तुम्हारी निगाह में।। देखते ही गुल, नज़र में तेरा हँसना फिर गया। आतिशे-गुल10 ने लगाई, आग ऐ गुलरू11! हमें।। क्या असर था अश्क़े-दुश्मन में जो कूए-यार से। मारे ग़ैरत के बहाकर ले चले आँसू, हमें।। * 1. बुलहविस- कामेच्छा; 2. लाफेजाँ बाजी- डींगे मारना, शेखी बघारना; 3. शआर- आदत, अभ्यास; 4. तपिश- गर्मी; 5. शोखी- चंचलता; 6. संगेदर- घर का पत्थर; 7. रोजे महशर- कयामत के रोज; 8. बादे इम्तहाँ- परीक्षा के बाद; 9. जानिबे दुश्मन- दुश्मन की तरफ; 10. आतिशे गुल- गुलों की चिंगारी; 11. गुलरू - फूलों से रूख वाले।
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