चिट्ठी एक समय था, जब प्रेम जेब में रखा हुआ मोबाइल नहीं था, वह डाकिए के थैले में धीरे-धीरे धड़कता हुआ हमारी गली तक आता था। चिट्ठियाँ काग़ज़ नहीं थीं, वे दो शहरों के बीच खींची गई साँस की सबसे लंबी डोर थीं जिसके दोनों सिरों पर दो मरासिम धड़कते रहते थे। बस्ती की उन दोपहरों में, डाकिए की साइकिल की घंटी मुझे अपने नाम से भी ज़्यादा प्यारी लगती थी। कहीं विनाश सिंह की चिट्ठी होगी, कि जॉर्जिया में उसे पहली बार किसी रूसी लड़की की आंखों ने चुप करा दिया या रविकांत ने लिखा होगा कि अल्माटी,कजाखिस्तान की बर्फ में भी उसे,बस्ती की धूप याद आती है शायद रोमेश ने बताया होगा कि उसने अभी-अभी कौन-सी नई किताब पढ़ी है, और इस बार निर्मल वर्मा ज्यादा देर साथ रहे या पाश उन दिनों किसी का हाल पूछने के लिए कॉल नहीं लगती थी स्याही लगती थी। और स्याही आदमी की उँगलियों से निकलकर सीधे दूसरे के दिल में हिचकियाँ लिख देती थी। हम अपने सारे मौसम चिट्ठियों में रख देते थे। माँ की हिदायत, पिता की कम बोलती चिंता, एक अधूरी शिकायत, दो-चार बेवक़ूफ़ियाँ, और प्रेमिका का बस एक शब्द "आना...!" उस एक शब्द में पूरा महीना रहने की जगह मिल जाती थी। जब लिफ़ाफ़ा खुलता था, काग़ज़ नहीं कोई अपना धीरे से कमरे में आकर बैठ जाता था। फिर शुरू होता था इंतज़ार का दूसरा जन्म। उत्तर लिखने से पहले हम अपने भीतर शब्दों को पकने देते थे क्योंकि जानते थे जल्दबाज़ी में लिखा गया वाक्य सफ़र तो कर सकता है, लेकिन किसी के भीतर घर नहीं बना सकता। चिट्ठियाँ एक बार नहीं पढ़ी जाती थीं। वे पुरानी किताबों के बीच दबी रहती थीं और बरसों बाद जब फिर खुलती थीं, तो उनमें से स्याही नहीं पूरा बचपन बाहर निकल आता था। बस्ती की गलियाँ लाल डाकपेटी डाकिए का पसीना दोस्तों की लिखावट और चिट्ठियों से भरा मेरा छोटा संदूक मुझे कभी-कभी लगता है दुनिया से चिट्ठियाँ नहीं गईं वे बस हमारी स्मृतियों की मिट्टी में बीज बनकर सो गई हैं। इसलिए जब भी किसी पुराने संदूक से एक चिट्ठी मिलती है, समय कुछ पल के लिए अपनी चाल धीमी कर देता है, ताकि दो पुराने दोस्त फिर से एक ही काग़ज़ पर बैठकर बात कर सकें। 'Paavan'