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Ghazal-159

ग़ज़ल - इश्क़ में कुछ मज़ा नहीं होता, उनसे जब फ़ासला नहीं होता। इश्क़ अक्सर फ़रेब देता है, ख़त्म पर सिलसिला नहीं होता। इश्क़ का दर्द ही वो दर्द है जो, कुछ भी हो,बेमज़ा नहीं होता। दर्द-ए-दिल एक बार उट्ठा तो, मौत से भी जुदा नहीं होता। तुम नहीं जान पाए क्या अब तक? इश्क़ का कुछ सिला नहीं होता। ज़ुल्म करते हुए समझते हो, बेकसों का ख़ुदा नहीं होता। बात अब ख़त्म भी हो जल्वों की, तज़किरों से भला नहीं होता। इश्क़ में अब ख़बर नहीं "र", दर्द होता है या नहीं होता। सिला=प्रतिफल,इनाम बेकस=मज़बूर,असहाय तज़किरा=ज़िक्र,चर्चा

Ghazal-158

आप क्यों इतना तमतमाए हैं किसकी अम्मा से मिल के आए हैं//1 एक पगड़ी उठा नहीं सकते सर पे क्यों आसमाँ उठाए हैं//2 मीलों पैदल चले हैं जंगल में कुछ तो पूछो कि कैसे आए हैं//3 कब तू होगा तुलू'अ खिड़की पर कब से हम टकटकी लगाए हैं//4 नुस्ख़ा कोई नया न बोलो तुम नुस्ख़े सब हमने आज़माए हैं//5 चार घण्टे हैं रात होने में पर वो ठरकी हैं, अकबकाए हैं//6 गार्ड बोला नहीं हैं मैडम जी आप क्यों इतना सज के आए हैं//7 यूँ न दिखते हैं हम परेशाँ हाल 'राज़'हमने भी ग़म उठाए हैं//8

Ghazal-157

ग़ज़ल- पतंगों को ख़लाओं में उड़ाना सीख लो साहिब, ए आई दौर में जीवन चलाना सीख लो साहिब, सभी जीवों से बेहतर मानते ख़ुद को,तो लाज़िम है, ज़रा इंसानियत से दिल लगाना सीख लो साहिब। कड़ी मेहनत से पाया है मुकाम ऊँचा,चलो माना, अना को भी तो कुछ अपनी,झुकाना सीख लो साहिब। बुरा गर वक़्त आया तो,यही कुछ काम आयेगा, ज़रा मिल-बाँट के जीवन चलाना सीख लो साहिब। यहाँ होता वही जिससे कि वो इंकार करते हैं, सही अनुमान लहजों से लगाना सीख लो साहिब। 'वही’का आसमानों से तो अब आना नहीं मुमकिन, जहां अपने तजारिब से सजाना सीख लो साहिब। मुझे लगता है'माहिर'काम है यह भी इबादत-सा, किसी रोते हुए जन को हँसाना सीख लो साहिब। ए आई = आर्टिफिशल इंटेलिजेंस, ख़ला= निर्वात, अना=अहंकार,वही = ईश्वरीय निर्देश, तजारिब= तजुर्बे

Ghazal-156

ग़ज़ल- जब भी इंसाँ ख़ुदी को भूल गया वो हक़ीक़तन, ख़ुशी को भूल गया ख़ुदी=स्व, निजित्व, self आमजन के सुने मसाइल तो, मैं भी कमफ़ुर्सती को भूल गया। मसाइल= प्रकरण, मामले, समस्याएं कम फुर्सती=वक़्त की कमी फ़र्ज़ यूँ हैं किए अदा, जिनमें, मैं निजी दुश्मनी को भूल गया। काम की दौड़-भाग में फँसकर, आदमी, आदमी को भूल गया। फेसबुक के हसीन ख़्वाबों में, अस्ल की ताज़गी को भूल गया काम में डूब के सुकूँ वो मिला मैं ग़म-ए-ज़िंदगी को भूल गया इसक़दर याद में डूबा, उसकी, जब मिला वो, उसी को भूल गया।

Ghazal-155

ग़ज़ल- कौन जाने जीत है या हार है, सोच मेरी बादलों के पार है। शाख़ माने गुल का कुछ अहसान क्यों ? ज़िन्दगी उसकी बचाता ख़ार है। रेंगते,डसते वो, जब मौक़ा मिले, रीढ़ वाला अब कहाँ किरदार है। रंग रोग़न से उबर पाता नहीं, इश्क़ जिसकी सोच में व्यापार है। ज़ोर से नारे लगाते हैं वही, बात का जिनकी न कुछ आधार है। बात ही से तो नहीं बहलेगा ये, आदमी इस दौर का बेदार है। मस्लहत दिल में निहाँ "र" यहाँ, आदमीयत ऊपरी आचार है।

Ghazal-154

ग़ज़ल- लड़कपन से उबर पाए हैं जब से, जिए बस ज़िन्दगी अपने ही ढब से। दुआ मेरी रही बस ये ही रब से। रहे इंसानियत का मान अब से, हुआ जब से मुझे दीदार उनका, रहा मक़्सद यही इक ख़ास तब से। बताया बेज़ुबां आँखों ने वो भी, वो कह पाए जिसे अब तक न लब से। जो उपदेशों पे अपने चल सका हो, ज़माना मुंतज़िर है उसका कब से। मसाइल ज़िन्दगी के हो सके हल, रखा है स्वार्थ को कुछ दूर जब से। व्यवस्था कुछ बने ऐसी वतन में, किसी का भी न हो अपमान, अब से। सचाई से किया जब आकलन तो, लगे कुछ फ़ैसले अपने अजब से। अँधेरे जब डराते ज़िन्दगी के। तो पाते रास्ता 'माहीर'अदब से। मुंतज़िर=प्रतीक्षा करने वाला, इंतजार में। अदब=साहित्य, शिष्टाचार। माहीर

Ghazal153

ग़ज़ल- ग़जब है शायरी इसकी अलग ही राह होती है, किसी की आह पे इसमें, किसी की वाह होती है। सँवरना रोज पड़ता है बिगड़ हम खुद ही जाते हैं, मगर यारो, तरक्की की इसी से राह होती है। न रखना याद पड़ता सच, न होते झूठ के हैं पैर, मगर झूठे को सच्चे से कसकती डाह होती है। डरो मत मुश्किलों से तुम, करो हिम्मत, बढ़ो आगे,, जहाँ रस्ते नहीं दिखते, वहां भी राह होती है। कभी जो लड़खड़ाओ तो, करो कोशिश सँभलने की, निकलती कोशिशों से जो, हसीं वो राह होती है। मुझे भी करने दो वो सब जिन्हें तुम करते थे अब तक, तजारिब से जो मिलती है, सही वो राह होती है।, जहाँ के वास्ते “मैं” है, न "मैं" होता, न कुछ होता, सभी हैं फलसफे "मैं" से इसी से आह होती है। हराया "मैं" ने ही मुझको न "मैं" होता न ग़म होता, बिना इसके न कोई ज़िन्दगी में चाह होती है। Maahir

Rasleela Nathdwara Style | Twin Eternals - Matter & Energy

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