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Geeta-03

 श्रीमद्भगवद्गीता :

कर्मक्षेत्रे - रणक्षेत्रे : अध्याय ३ :
क र्म  यो  ग  :
क्रमश :  श्लोक ४१  :

तस्मात् त्वम् इन्द्रियाणि
आदौ नियम्य भरतर्षभ ।
पाप्मानम् प्रजहि हि एनम्
ज्ञानविज्ञाननाशनम्  ॥४१॥

इसलिए सुनो हे भरतश्रेष्ठ !
सर्वप्रथम तू कर नियमन 
इन्द्रियों  का ।
इस ज्ञान और विज्ञान- नाशक
महापापी काम को बलपूर्वक तू 
मार दे ॥४१॥

काम को नष्ट करने की सीढ़ी का पहला चरण:

पिछले श्लोक (श्लोक सं०४०) में कहा कि इन्द्रियाँ , मन और बुद्धि इसके स्थान हैं । इसलिए सबसे पहले स्थान इन्द्रियों का नियमन कर उसे मन और बुद्धि की ओर बढ़ने और अपना डेरा जमाने का अवसर ही न दिया जाए ।
PAAVAN

ghazal-03

 एक ग़ज़ल- 


भुला के हक़ीक़त जो सोता रहेगा,
वो अश्क़ों से दामन भिगोता रहेगा।

लुटा तू, मरा तू, मगर कह रहे वो,
तमाशा हुआ है, ये होता रहेगा।

उसे फ़स्ल वो काटनी ही पड़ेगी,
जिसे ज़िन्दगानी में बोता रहेगा।

ग़रीबों को ज़ालिम सताते रहे हैं, 
न जागे वो, तब तो यह, होता रहेगा। 

किनारे-किनारे ही तैरा जो, उसको,
डुबोता है दरिया, डुबोता रहेगा।
 
तरक्की वही कर सका है जो इंसां, 
इरादों में ख़्वाबों को बोता रहेगा। 

 अदीबो क़लम सच की ख़ातिर उठाओ,
नहीं तो ग़लत है जो, होता रहेगा।

अदीब= साहित्यकार

MAAHIR

GHAZAL-2

प्रस्तुत है एक ग़ज़ल-


भला इंसांनियत का चाहती हो, 
ज़ुबां पे आज बस वो शायरी हो। 

सुने जो भी, लगे उसको कि जैसे,
ग़ज़ल में बात उसकी ही कही हो।

ख़ुदा से बस मेरी ये इल्तिज़ा है,  
न मुश्किल में किसी की ज़िन्दगी हो। 

मेरी कोशिश यही है दोस्तो बस,
हर इक की ज़िन्दगी में रोशनी हो।

हुआ है इश्क़ जब से, बस ये चाहा,
तेरी ख़ुशियों से ही मुझको ख़ुशी हो। 

सियासत देख के कहता है दिल ये,
ग़ज़ल अब जो लिखूँ वो आग - सी हो।

सुनेगा ग़ौर से तुमको ज़माना, 
तुम्हारी बात में कुछ बात भी हो।

'MAAHIR'

GEETA- SHLOKAS EXPLAINED VIS A VIS RAMCHARIT MANAS-2

 श्रीमद्भगवद्गीता  :

कर्मक्षेत्रे - रणक्षेत्रे  अध्याय ४ :
ज्ञानकर्मसंन्यास  योग  :
क्रमश :  श्लोक ९  :

श्रीभगवान  के जन्म और कर्मों की दिव्यता को तत्त्व से जानने का फल :

जन्म कर्म च मे दिव्यम्
एवम् य:वेत्ति तत्वत :  ।
त्यक्त्वा देहम् पुन : जन्म न एति
माम् एति स: अर्जुन  ॥९॥

हे अर्जुन ! जानता जो मेरे दिव्य जन्म को 
और कर्मों के तत्व को  ।
देह त्यागने पर जन्मता फिर वह नहीं 
प्राप्त हो जाता मुझे ही अन्त में ॥९॥

श्रीभगवान के जन्म की दिव्यता का तत्व:

श्रीरामचरितमानस के मनु- शतरूपा के तप और उसके परिणाम  में इसका अत्यन्त सुन्दर वर्णन हुआ है:

तप के सफलीभूत होने पर जो शरीर “अस्थिमात्र होइ रहे सरीरा”,
हो गए थे वे शब्द-ब्रह्म से :

मागु मांगु वर भइ नभवानी ।
परम गंभीर कृपामृत सानी ॥
मृतक जिआवन गिरा सुहाई ।
श्रवण- रंध्र होइ उर जबआई ॥

तो भक्त ने विनम्र विनती की:

सगुन अगुन जेहि निगम प्रसंसा ।
देखहिं हम सो रूप भरि लोचन ॥

और क्या देखा :

नील सरोरुह नील मणि 
नील नीरधर स्याम ॥
और 
वामभाग सोभित अनुकूला ।
आदिसक्ति छवि निधि जगमूला ॥
और जब आज्ञा दी कि 
“मागहु वर”

तो भक्त ने क्या माँग लिया:

“चाहउँ तुम्हहिं समान  सुत”

और शतरूपा ने कहीं भी उन्हें पहचानने मे गलती नहीं की:

“तुम्ह ब्रह्मादि जनक जग स्वामी, 
ब्रह्म सकल उर अंतरजामी!!

ब्रह्म ने किंतु जोड़ा :

आदिसक्ति जेहि जग उपजाया ।
सोउ अवतरिहि मोरि यह माया ॥

और भगवान के जन्म की झाँकी:

भए प्रगट कृपाला दीनदयाला 
कौसल्या हितकारी  ।
लोचन अभिरामा तनु घनस्यामा
सोभासिंधु  ख़रारी  ॥

सो मम हितलागी जन अनुरागी
भयउ प्रगट श्री कंता ॥

लेकिन जब भक्त ने चाहा :

माता पुनि बोली सो मति डोली
तजहु तात यह रूपा ।


PAAVAN
कीजै सिसुलीला अति प्रियसीला 
यह सुख परम अनूपा ॥१९२/बालकांड ॥

GHAZAL-1

तन्हाई ने मेरी रूह को घेरा है,

ख़ामोश है रात उदासी का डेरा है। १ 

इसरार की ज़ुल्मतों को मैं क्या जानूँ,
रब ने लिखा ज़िंदगी में ग़म तेरा है। २ 

होती है सहर से शाम पर रातों की,
क़िस्मत का न होता फिर कभी फेरा है। ३ 

हर एक क़दम पे तू बगूलों को तोड़,
मंज़िल का सही ये रास्ता तेरा है। ४ 

ग़म को मेरे तुम कभी नहीं बहलाओ,
रहने दो बचा खुचा जो भी मेरा है। ५ 

"माशूक़" बड़े सुकून की हैं साँसें, 
रिश्तों में मुझे तुम्ही ने अब झेरा है। ६
 
इसरार=ज़िद करना, हठ, ज़िद
ज़ुल्मतों=darkness, region of darkness, dark place
बगूलों=धूल भरी आँधी, बवंडर
झेरा=झंझट, बखेड़ा, झेर 

'MAAHIR'

GEETA -SHLOKAS EXPAINED VIS A VIS RAM CHARIT MANAS-1

 श्रीमद्भगवद्गीता  :

कर्म़क्षेत्रे - रणक्षेत्रे  अध्याय  ४ :
ज्ञानकर्मसंन्यास  योग :
क्रमश :  श्लोक १०  :

आत्म से परमात्म की प्राप्ति की ओर :

वीतरागभयक्रोध :
मन्मया : माम्  उपाश्रिता  : ।
बहवा :  ज्ञानतपसा : पूता :
मद्भावम्  आगता  :  ॥१०॥

बीत गए राग,भय,क्रोध 
जिनके हों
लगा मन जिनका मुझमें हो ।
केवल मेरा ही आश्रय जिन्हें हो
ऐसे अनेक ज्ञानी और तप :पूत
भक्त प्राप्त कर चुके हैं मेरे 
स्वरूप को ॥१०॥

श्लोक के अर्थ के साथ इसे पढ़िए:

रामचरितमानस में ऋषि वाल्मीकि ने भगवान श्री राम को जिन चौदह
स्थानों में रहने का आदेश दिया उनमें सर्वोच्च स्थान जो बताया ,
वह है :

ज़ाहि न चाहिअ कबहुँ कछु 
तुम्ह सन सहज सनेहु ।
बसहु निरंतर तासु मन
सो राउर निज गेहु ॥१३१/अयोध्या कांड ॥

यही यहाँ “ वीतरागभयक्रोध: “
में कहा गया है । राग के निवृत्त हो जाने पर ममता ,कामना , भय , लोभ , क्रोध , आदि सभी मन की 
दुर्भावनाएँ समाप्त हो जाती हैं ।

PAAVAN

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