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(Ghazal) साहिल पे खड़े हो तुम्हें क्या ग़म चले जाना

आफताब मुज़तर एहद ए हाजि़र के शायर साहिल पे खड़े हो तुम्हें क्या ग़म चले जाना ाहिल पर खड़े सहो तुम्हें क्या ग़म चले जाना! मैं डूब रहा हूं अभी डूबा ___तो नहीं हूं!! ساحل پہ کھڑے ہوں تمہیں کیا غم چلے جانا میں ڈوب رہا ہوں ابھی ڈوبا تو نہیں ہوں ऐ वादा फरामोश मैं तुझसे तो नहीं हूं! हर ज़ुल्म तेरा याद है __भुला तो नहीं हूं!! اے وعدہ فراموش میں تجھ سا تو نہیں ہوں ہر ظلم تیرا یاد ہے__ بھولا تو نہیں ہوں ऐ वक़्त मिटाना मुझे __आसां तो नहीं है! इंसान हूं मैं नक़्श ए कफ़ ए पा तो नहीं हूं !! اے وقت مٹانا مجھے آساں تو نہیں ہے انسان ہوں میں نقش کف پا تو نہیں ہوں चुपचाप सही मसलहतन ___वक़्त के हाथों! मजबूर सही वक़्त से हारा तो नहीं हूं!! چپ چاپ سہی مصلحتا وقت کے ہاتھوں مجبور ںسہی وقت سے__ ہارا تو نہیں ہوں दिल तोड़ा है अपनों ने तो शिकवा ना करेंगे! वह भूल गए मुझको मैं __भूला तो नहीं हूं!! دل توڑا ہے اپنوں نے تو شکوہ نہ کریں گے وہ بھول گئے مجھ کو میں بھولا تو نہیں ہوں मुज़तर मुझे क्यों देखता रहता है ज़माना! दीवाना सही उनका तमाशा तो नहीं हूं!! وہ بھول گئے مجھ کو مضطر مجھے کیوں دیکھتا رہتا ہے زمانہ دیوانہ سہی ان کا تماشہ تو نہیں ہوں

(simultaneous bilingualism) (additive bilingualism)

Bi linguistics कौन सी भाषा पहले जाती है? दो-भाषी होना और डिमेंशिया का भाषा-विज्ञान भाषा-विज्ञान की नज़र से! मैं दो-भाषी (bilingual) हूँ। मैं चालीस से ज़्यादा सालों से रोज़ाना अंग्रेज़ी बोल रहा हूँ। मैं इसी भाषा में सोचता हूँ, बहस करता हूँ, लिखता हूँ और पढ़ाई करता हूँ। मेरी पहली भाषा, फ़्रेंच, अब कम इस्तेमाल होती है। हाल ही में, मेरे मन में एक सवाल आया है जिसका जवाब भाषा-विज्ञान (linguistics) सिर्फ़ आंशिक रूप से Pavan Kumar Sharma Tue 6 Oct, 08:58 (0 minutes ago) to Pavan कौन सी भाषा पहले जाती है? दो-भाषी होना और डिमेंशिया का भाषा-विज्ञान भाषा-विज्ञान की नज़र से! मैं दो-भाषी (bilingual) हूँ। मैं चालीस से ज़्यादा सालों से रोज़ाना अंग्रेज़ी बोल रहा हूँ। मैं इसी भाषा में सोचता हूँ, बहस करता हूँ, लिखता हूँ और पढ़ाई करता हूँ। मेरी पहली भाषा, फ़्रेंच, अब कम इस्तेमाल होती है। हाल ही में, मेरे मन में एक सवाल आया है जिसका जवाब भाषा-विज्ञान (linguistics) सिर्फ़ आंशिक रूप से दे सकता है। अगर बुढ़ापे में सोचने-समझने की क्षमता (cognition) कमज़ोर हो जाए, तो मेरी भाषाओं का क्या होगा, और वे किस क्रम में जाएँगी? यहाँ, मैं यह देख रहा हूँ कि इस क्षेत्र में अभी क्या जानकारी उपलब्ध है। मैं किसी व्यक्ति के भविष्य के बारे में कोई भविष्यवाणी नहीं कर रहा हूँ, जिसमें मेरा अपना भविष्य भी शामिल है। आइए थोड़ी तकनीकी बात करते हैं मैं बस कुछ खास शब्दों (jargon) को संक्षेप में समझाना चाहता हूँ, पहले दो-भाषी होने के बारे में, और दूसरा भाषा के खोने के बारे में: पहला: दो-भाषी होने में मुख्य अंतर 'एक साथ दो-भाषी होने' (simultaneous bilingualism) और 'क्रमवार दो-भाषी होने' (sequential bilingualism) के बीच है। जो लोग एक साथ दो भाषाएँ सीखते हैं, वे जन्म से ही दोनों भाषाएँ अपनाते हैं - आमतौर पर घर या समुदाय में लगातार संपर्क के ज़रिए - और दोनों भाषाएँ साथ-साथ विकसित होती हैं। जो लोग क्रमवार दो-भाषी बनते हैं, वे पहले एक भाषा सीखते हैं और फिर दूसरी भाषा बाद में अपनाते हैं (अक्सर स्कूल, प्रवास या सामाजिक संपर्क के ज़रिए); इस तरह पहली भाषा वह आधार बनाती है जिस पर दूसरी भाषा खड़ी होती है। भाषा-विज्ञानी दो-भाषी होने को इस आधार पर भी समझाते हैं कि दोनों भाषाएँ आपस में कैसे काम करती हैं। कुछ लोगों में 'एडेटिव बाइलिंगुअलिज़्म' (additive bilingualism) विकसित होता है, जहाँ दूसरी भाषा पहली भाषा को हटाए बिना सोचने-समझने और सांस्कृतिक क्षमताओं को मज़बूत करती है; जबकि दूसरे लोग 'सबट्रैक्टिव बाइलिंगुअलिज़्म' (subtractive bilingualism) का अनुभव करते हैं, जहाँ दूसरी भाषा धीरे-धीरे पहली भाषा को कमज़ोर कर देती है। 'रिसेप्टिव बाइलिंगुअल्स' (receptive bilinguals) भी होते हैं, जो भाषा समझते तो हैं लेकिन उसे धाराप्रवाह बोल नहीं पाते; और 'कोऑर्डिनेट' बनाम 'कंपाउंड' बाइलिंगुअल्स भी होते हैं, जो

"Slow Down to Go Faster" (आगे बढ़ने के लिए गति धीमी करें)

में आगे बढ़ने और सफलता हासिल करने की होड़ में, हम अक्सर खुद को लगातार भागदौड़ और तनाव की स्थिति में पाते हैं। लेकिन क्या इस निरंतर गति से हमें वाकई वह परिणाम मिल रहे हैं जिनकी हम उम्मीद करते हैं? हाल ही में मैंने एक विचारोत्तेजक टॉक "Slow Down to Go Faster" (आगे बढ़ने के लिए गति धीमी करें) पर गहराई से विचार किया, जिसमें आधुनिक जीवनशैली और हमारी कार्यप्रणाली को लेकर कुछ बेहद महत्वपूर्ण मनोवैज्ञानिक व व्यावहारिक दृष्टिकोण सामने आते हैं। एक मनोचिकित्सक (Psychiatrist) के रूप में, मैं रोज़ाना ऐसे कई लोगों से मिलता हूँ जो अत्यधिक व्यस्तता, तनाव और मानसिक थकान की वजह से बर्नआउट (burnout) का शिकार हो रहे हैं। इस विषय का मूल संदेश हर उस व्यक्ति के लिए अत्यंत प्रासंगिक है जो मानसिक संतुलन के साथ सफलता प्राप्त करना चाहता है। 1. निरंतर भागदौड़ और 'Busyness' का भ्रम आज के समाज में "बहुत व्यस्त होना" (Being Busy) एक सम्मान के तमगे की तरह देखा जाता है। लोग गर्व से अपनी अंतहीन टू-डू लिस्ट (To-do list) का जिक्र करते हैं। लेकिन सच्चाई यह है कि अत्यधिक व्यस्तता (Urgency) का अर्थ यह नहीं है कि कार्य महत्वपूर्ण या उत्पादक (Important/Productive) भी है। जब हम बिना रुके लगातार काम करते हैं, बिना ब्रेक लिए बैठकों में शामिल होते हैं, नींद और भोजन की अनदेखी करते हैं, तो इससे हमारी कार्यकुशलता बढ़ती नहीं, बल्कि घटती है। निरंतर गति तनाव को बढ़ाती है, ध्यान केंद्रित करने की क्षमता को कम करती है और अंततः हमें बर्नआउट की ओर ले जाती है। 2. 'Busy' नहीं, 'Focused' बनें हमे अपने विचार और अपनी भाषा बदलने की ज़रूरत है। हमें खुद को "व्यस्त" कहने के बजाय "केंद्रित" (Focused) होने पर बल देना चाहिए। जो विचार हम अपने दिमाग में रखते हैं, वही हमारे आचरण और भावनाओं को आकार देते हैं। गति को धीमा करके ही हम अपनी एकाग्रता और निर्णय लेने की क्षमता को बेहतर बना सकते हैं। 3. जीवन में गति धीमी करने के 4 व्यावहारिक प्रयोग (4 Experiments to Slow Down) अपनी गति को कम करने और मानसिक स्पष्टता पाने के लिए आप इन 4 सरल अभ्यासों से शुरुआत कर सकते हैं: धीमी और गहरी साँसें लें (Breathe Slower): जिस तरह पेशेवर एथलीट और प्रदर्शनकर्ता किसी बड़े काम से पहले गहरी साँसों के जरिए अपनी एकाग्रता हासिल करते हैं, उसी तरह गहरी साँसें हमारे तंत्रिका तंत्र (Nervous System) को शांत करती हैं। शांति से और धीरे भोजन करें (Eat Slower): जल्दबाज़ी में खाना खाने के बजाय भोजन का आनंद लें। यह न केवल शारीरिक स्वास्थ्य के लिए अच्छा है, बल्कि अपनों के साथ जुड़ने और रिश्ते मजबूत करने का एक बेहतरीन अवसर भी प्रदान करता है। दिन की शुरुआत सहजता से करें (Ease into Your Day): सुबह उठते ही तुरंत फोन चेक करना, समय की चिंता करना और दिनभर की चिंताओं में डूब जाना हमारे 'सिम्पेथेटिक नर्वस सिस्टम' को तनाव की स्थिति में डाल देता है। अपने दिन की शुरुआत धीरे-धीरे, स्ट्रेचिंग और मानसिक शांति के साथ करें। संयम के साथ चलें (Drive/Move Slower): जब आप हड़बड़ी में नहीं होते, तो आप अपने आसपास की परिस्थितियों को अधिक स्पष्टता से देख पाते हैं और अनावश्यक मानसिक तनाव से बचते हैं। 4. 'Space for Grace' का निर्माण जब हम अपनी गति को धीमा करते हैं, तो हम अपने जीवन में एक मानसिक स्थान (Space for Grace) निर्मित करते हैं। यही वह स्थिति है जहाँ हमारा पूर्ण ध्यान वर्तमान क्षण (Present Moment) से जुड़ता है। इस मानसिक स्थिति में तीन मुख्य ऊर्जाएँ काम करती हैं: 1. अंतर्ज्ञान (Intuition): मन के शांत होने पर मिलने वाले वे सूक्ष्म संकेत, जो हमें सही और गलत का अहसास कराते हैं। 2. प्रेरणा (Inspiration): हमारे आसपास मौजूद अर्थ और उद्देश्य की पहचान होना। 3. संकल्प/इरादा (Intention): जब हम जानबूझकर और स्पष्ट इरादे के साथ कार्य करते हैं, तो हमारे विचार वास्तविक परिणामों में बदलने लगते हैं। 5. मानसिक शांति और एकाग्रता के लिए 4 मुख्य अभ्यास इस मानसिक स्पष्टता को बनाए रखने के लिए जीवन में कुछ आदतों को शामिल करना आवश्यक है: साप्ताहिक योजना (Weekly Planning): अपने समय का पहले से निर्धारण करें ताकि महत्वपूर्ण कार्यों के लिए पर्याप्त अवसर मिल सके। दैनिक ध्यान (Daily Meditation): ध्यान के जरिए अपनी एकाग्रता को प्रशिक्षित करें, जिससे अंतर्ज्ञान और प्रेरणा को पहचाना जा सके। दैनिक जर्नलिंग (Daily Journaling): अपने विचारों और दिनभर की गतिविधियों का विश्लेषण करें ताकि अपनी गति में आवश्यक सुधार किया जा सके। तकनीक से दूरी (Digital Detox / Screen-Free Time): आधुनिक दौर में हमारा अटेंशन स्पैन (Attention Span) लगातार घट रहा है। दिन का कुछ समय 'स्क्रीन-फ्री' रखें, जहाँ आप डिजिटल सूचनाओं के ओवरलोड से दूर रह सकें। निष्कर्ष: सफलता पाने का मतलब यह नहीं है कि आप लगातार दौड़ते रहें। कभी-कभी सही दिशा में तेज़ी से आगे बढ़ने के लिए अपनी गति को धीमा करना और रुककर सोचना ही सबसे शक्तिशाली कदम होता है। Slow Down to Go Faster!

Rasleela Nathdwara Style | Twin Eternals - Matter & Energy

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