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रामकृष्ण परमहंस

16 अगस्त/पुण्य-तिथि रामकृष्ण परमहंस की महासमाधि श्री रामकृष्ण परमहंस का जन्म फागुन शुक्ल 2, विक्रमी सम्वत् 1893 (18 फरवरी, 1836) को कोलकाता के समीप ग्राम कामारपुकुर में हुआ था। पिता श्री खुदीराम चट्टोपाध्याय एवं माता श्रीमती चन्द्रादेवी ने अपने पुत्र का नाम गदाधर रखा था। सब उन्हें स्नेहवश 'गदाई' भी कहते थे। बचपन से ही उन्हें साधु-सन्तों का साथ तथा धर्मग्रन्थों का अध्ययन अच्छा लगता था। वे पाठशाला जाते थे; पर मन वहाँ नहीं लगता था। इसी कारण छोटी अवस्था में ही उन्हें रामायण, महाभारत आदि पौराणिक कथाएँ याद हो गयीं थीं। बड़े होने के साथ ही प्रकृति के प्रति इनका अनुराग बहुत बढ़ने लगा। प्रायः ये प्राकृतिक दृश्यों को देखकर भावसमाधि में डूब जाते थे। एक बार वे मुरमुरे खाते हुए जा रहे थे कि आकाश में काले बादलों के बीच उड़ते श्वेत बगुलों को देखकर इनकी समाधि लग गयी। ये वहीं निश्चेष्ट होकर गिर पड़े। काफी प्रयास के बाद इनकी समाधि टूटी। पिता के देहान्त के बाद बड़े भाई रामकुमार इन्हें कोलकाता ले आये और हुगली नदी के तट पर स्थित रानी रासमणि द्वारा निर्मित माँ काली के मन्दिर में पुजारी नियुक्ति करा दिया। मन्दिर में आकर उनकी दशा और विचित्र हो गयी। प्रायः वे घण्टों काली माँ की मूर्त्ति के आगे बैठकर रोते रहते थे। एक बार तो वे माँ के दर्शन के लिए इतने उत्तेजित हो गये कि कटार के प्रहार से अपना जीवन ही समाप्त करने लगे; पर तभी माँ काली ने उन्हें दर्शन दिये। मन्दिर में वे कोई भेदभाव नहीं चलने देते थे; पर वहाँ भी सांसारिक बातों में डूबे रहने वालों से वे नाराज हो जाते थे। एक बार तो मन्दिर की निर्मात्री रानी रासमणि को ही उन्होंने चाँटा मार दिया। क्योंकि वह माँ की मूर्त्ति के आगे बैठकर भी अपनी रियासत के बारे में ही सोच रही थी। यह देखकर कुछ लोगों ने रानी को इनके विरुद्ध भड़काया; पर रानी इनकी मनस्थिति समझती थी, अतः वह शान्त रहीं। इनके भाई ने सोचा कि विवाह से इनकी दशा सुधर जाएगी; पर कोई इन्हें अपनी कन्या देने को तैयार नहीं होता था। अन्ततः इन्होंने अपने भाई को रामचन्द्र मुखोपाध्याय की पुत्री सारदा के बारे में बताया। उससे ही इनका विवाह हुआ; पर इन्होंने अपनी पत्नी को सदैव माँ के रूप में ही प्रतिष्ठित रखा। मन्दिर में आने वाले भक्त माँ सारदा के प्रति भी अतीव श्रद्धा रखते थे। धन से ये बहुत दूर रहते थे। एक बार किसी ने परीक्षा लेने के लिए दरी के नीचे कुछ पैसे रख दिये; पर लेटते ही ये चिल्ला पड़े। मन्दिर के पास गाय चरा रहे ग्वाले ने एक बार गाय को छड़ी मार दी। उसके चिन्ह रामकृष्ण की पीठ पर भी उभर आये। यह एकात्मभाव देखकर लोग इन्हें परमहंस कहने लगे। मन्दिर में आने वाले युवकों में से नरेन्द्र को वे बहुत प्रेम करते थे। यही आगे चलकर विवेकानन्द के रूप में प्रसिद्ध हुए। सितम्बर 1893 में शिकागो धर्मसम्मेलन में जाकर उन्होंने हिन्दू धर्म की जयकार विश्व भर में गुँजायी। उन्होंने ही ‘रामकृष्ण मिशन’ की स्थापना की। इसके माध्यम से देश भर में सैकड़ों विद्यालय, चिकित्सालय तथा समाज सेवा के प्रकल्प चला।ये जाते हैं। एक समय ऐसा था, जब पूरे बंगाल में ईसाइयत के प्रभाव से लोगों की आस्था हिन्दुत्व से डिगने लगी थी; पर रामकृष्ण परमहंस तथा उनके शिष्यों के प्रयास से फिर से लोग हिन्दू धर्म की ओर आकृष्ट हुए। 16 अगस्त, 1886 को श्री रामकृष्ण ने महासमाधि ले ली।

Ghazal-171

ग़ज़ल- दोस्तो गुलशन हमारा अब से लाला-ज़ार हो। भूख,बीमारी,जफ़ा,से मुक्त अब संसार हो। लाला-ज़ार=फूलों से भरा हुआ,समृद्ध,जफ़ा=अत्याचार अब सभी के क़ायदे से काम हों,इसके लिए, ऑफ़िसों की पारदर्शी आज से दीवार हो। भागते रहते मशीनों की तरह हम लोग क्यों? दोस्तो कुछ देर थम कर आपसी गुफ़्तार हो। गुफ़्तार=बातचीत सोचने,कहने की तो आज़ादी मिलती जन्म से, आज जैसा हो गया,वैसा न अब अख़बार हो। झूठ, आलस,स्वार्थ का हो ख़ात्मा व्यवहार में, बस सचाई मेहनतों का अब से कारोबार हो। हैं बराबर लोग सब,मानें सभी इस सत्य को, पेट की ख़ातिर न क़दमों में कोई दस्तार हो। दस्तार=पगड़ी,इज़्ज़त फ़ैसले करते रहें हम,लोकहित में रात-दिन, फिर तो तेज़ चाहे जितनी वक़्त की रफ़्तार हो। ताक़तें जो हैं मुख़ालिफ़ आमजन के,उन से अब, जंग हो जिसका नतीजा आर हो या पार हो। मुख़ालिफ़=विरोध में सांसदों को चुन सकें,आईन देता हक़ हमें, वोट को देते समय तो आदमी हुशियार हो। आईन= संविध

Ghazal-170

चूहों की भरमार है बाबा ये ग़ल्ला बाज़ार है बाबा//1 वोट मैं अपने मन से दूँगा ये मेरा अधिकार है बाबा//2 रह्म करे वो हम मुफ़्लिस पर जिसकी भी सरकार है बाबा//3 डर तो लगता है,लड़की का चाचा थानेदार है बाबा//4 बीड़ी मैं सुलगाऊँ कैसे पास मेरे सरदार है बाबा//5 लोग यहाँ पीते हैं दारू ये चखना बाज़ार है बाबा//6 नफ़रत से मस्जिद भी महकी मंदिर भी बू-दार है बाबा//7 उसको याँ का हाल बताओ वो जो पालनहार है बाबा//8 '' का क्या है उस पर रब की किरपा अपरंपार है बाबा//9 शब्दार्थ- --------------- •ग़ल्ला- अन्न, अनाज, धान्य, दाना। •रह्म- रहम, दया •मुफ़्लिस- ग़रीब, निर्धन •चखना- शराब के साथ खाया जाने वाले खाद्य पदार्थ, जैसे चिप्स, भुना हुआ चना, मूंगफली, बादाम, काजू इत्यादि •बू-दार- बदबूदार, दुर्गंधयुक्त •याँ का- यहाँ का •किरपा- कृपा का देसी, बिगड़ा रूप •अपरंपार- अपार, असीम

Ghazal-169

ग़ज़ल- ज़रूरी है जो सबके वास्ते,वो काम हो जाए, तो मेरी ज़िन्दगी में भी ज़रा आराम हो जाए। जहाँ में एक भी कण एक भी क्षण रुक नहीं सकता, सफल होती वही बस सोच,जो निष्काम हो जाए। बहुत हैं चाहतें लेकिन टिका हूँ एक चाहत पे, अहं कुछ दूर रख पाऊँ,तो मेरा काम हो जाए। तुम्हारी ज़िंदगी में भी खिलेंगे फूल चाहत के, तुम्हें भी इश्क़ की दौलत अगर इनआम हो जाए। सताने में जुटे हैं वो कि सब चुपचाप बैठे हैं, न गहरी ख़ामुशी ये बाइस-ए-कुहराम हो जाए। मेरी मजबूरियाँ समझो मुझे ख़ामोश रहने दो, वफ़ा बदनाम होती है,अगर ये आम हो जाए। थकन होती है होने दो,मेरा मकसद है चलूँ इतना कि सबके वास्ते आराम हो जाए। आवश्यक शब्दार्थ - निष्काम=वह व्यक्ति जिसमें निजी स्वार्थगत लाभ की इच्छा नहीं होती,परन्तु जो सबके हित के लिए काम करता है,इनआम=इनाम,ख़ामुशी=ख़ामोशी,वाइस= कारण,कुहराम = हंगामा,बहुत अधिक शोर शराबा

रानी पद्मिनी

26 अगस्त/इतिहास-स्मृति चित्तौड़ का पहला जौहर जौहर की गाथाओं से भरे पृष्ठ भारतीय इतिहास की अमूल्य धरोहर हैं। ऐसे अवसर एक नहीं, कई बार आये हैं, जब हिन्दू ललनाओं ने अपनी पवित्रता की रक्षा के लिए ‘जय हर-जय हर’ कहते हुए हजारों की संख्या में सामूहिक अग्नि प्रवेश किया था। यही उद्घोष आगे चलकर ‘जौहर’ बन गया। जौहर की गाथाओं में सर्वाधिक चर्चित प्रसंग चित्तौड़ की रानी पद्मिनी का है, जिन्होंने 26 अगस्त, 1303 को 16,000 क्षत्राणियों के साथ जौहर किया था। पद्मिनी का मूल नाम पद्मावती था। वह सिंहलद्वीप के राजा रतनसेन की पुत्री थी। एक बार चित्तौड़ के चित्रकार चेतन राघव ने सिंहलद्वीप से लौटकर राजा रतनसिंह को उसका एक सुंदर चित्र बनाकर दिया। इससे प्रेरित होकर राजा रतनसिंह सिंहलद्वीप गया और वहां स्वयंवर में विजयी होकर उसे अपनी पत्नी बनाकर ले आया। इस प्रकार पद्मिनी चित्तौड़ की रानी बन गयी। पद्मिनी की सुंदरता की ख्याति अलाउद्दीन खिलजी ने भी सुनी थी। वह उसे किसी भी तरह अपने हरम में डालना चाहता था। उसने इसके लिए चित्तौड़ के राजा के पास धमकी भरा संदेश भेजा; पर राव रतनसिंह ने उसे ठुकरा दिया। अब वह धोखे पर उतर आया। उसने रतनसिंह को कहा कि वह तो बस पद्मिनी को केवल एक बार देखना चाहता है। रतनसिंह ने खून-खराबा टालने के लिए यह बात मान ली। एक दर्पण में रानी पद्मिनी का चेहरा अलाउद्दीन को दिखाया गया। वापसी पर रतनसिंह उसे छोड़ने द्वार पर आये। इसी समय उसके सैनिकों ने धोखे से रतनसिंह को बंदी बनाया और अपने शिविर में ले गये। अब यह शर्त रखी गयी कि यदि पद्मिनी अलाउद्दीन के पास आ जाए, तो रतनसिंह को छोड़ दिया जाएगा। यह समाचार पाते ही चित्तौड़ में हाहाकार मच गया; पर पद्मिनी ने हिम्मत नहीं हारी। उसने कांटे से ही कांटा निकालने की योजना बनाई। अलाउद्दीन के पास समाचार भेजा गया कि पद्मिनी रानी हैं। अतः वह अकेले नहीं आएंगी। उनके साथ पालकियों में 800 सखियां और सेविकाएं भी आएंगी। अलाउद्दीन और उसके साथी यह सुनकर बहुत प्रसन्न हुए। उन्हें पद्मिनी के साथ 800 हिन्दू युवतियां अपने आप ही मिल रही थीं; पर उधर पालकियों में पद्मिनी और उसकी सखियों के बदले सशस्त्र हिन्दू वीर बैठाये गये। हर पालकी को चार कहारों ने उठा रखा था। वे भी सैनिक ही थे। पहली पालकी के मुगल शिविर में पहुंचते ही रतनसिंह को उसमें बैठाकर वापस भेज दिया गया और फिर सब योद्धा अपने शस्त्र निकालकर शत्रुओं पर टूट पड़े। कुछ ही देर में शत्रु शिविर में हजारों सैनिकों की लाशें बिछ गयीं। इससे बौखलाकर अलाउद्दीन खिलजी ने चित्तौड़ पर हमला बोल दिया। इस युद्ध में राव रतनसिंह तथा हजारों सैनिक मारे गये। जब रानी पद्मिनी ने देखा कि अब हिन्दुओं के जीतने की आशा नहीं है, तो उसने जौहर का निर्णय किया। रानी और किले में उपस्थित सभी नारियों ने सम्पूर्ण शृंगार किया। हजारों बड़ी चिताएं सजाई गयीं। ‘जय हर-जय हर’ का उद्घोष करते हुए सर्वप्रथम पद्मिनी ने चिता में छलांग लगाई और फिर क्रमशः सभी हिन्दू वीरांगनाएं अग्नि प्रवेश कर गयीं। जब युद्ध में जीत कर अलाउद्दीन पद्मिनी को पाने की आशा से किले में घुसा, तो वहां जलती चिताएं उसे मुंह चिढ़ा रही थीं।

Geeta-12(02)

अष्टावक्र संहिता ; अध्याय XII : आत्म- स्थित जनक उवाच : कायकृत्यासह : पूर्वम् तत : वाग्विस्तरासह : । अय चिन्तासह : तस्मात् अहम् एवम् एवं आस्थित : ॥१॥ जनक ने कहा: पहले हुआ मैं असहिष्णु कायिक कृत्यों पर फिर वाणी की वाचालता तत्पश्चात् विचार पर इन सबके ऊपर उठकर अब मैं हुआ अवस्थित आत्म में ॥१॥ प्रीत्यभावेन शब्दादे : अदृश्यत्वेन च आत्मन : । विक्षेपैकाग्रह्रदय एवम् एव अहम् आस्थित: ॥२॥ शब्द-जाल से प्रीति तोड़करदेखा यह आत्म को छू नहीं पाता । मन का ध्यान हटाकर इन सबसे एकाग्रचित्त हो मैं हुआ अवस्थित आत्म में ॥२॥

Ghazal-168

ग़ज़ल जिनको हमने दुश्मन समझा वे सब अपने भाई निकले जिस पर भी विश्वास किया था अंत में वे हरजाई निकले जन सेवा का भाव था जिनमें वे सब लोग ईसाई निकले खुद केवल मज़हबी मानते कट्टर और कसाई निकले बात आई जब आन बान की सब के सब सौदाई निकले देश भक्ति की बात चली तो ज्यादातर तमाशाई निकले पीठ दिखा कर भाग गए जो ऐसे भी सिपाही निकले दर्द दूसरे का तब जानेगे जब उनके पैर बिवाई निकले साधु फकीरों के वेष में ढोंगी और कसाई निकले आँखे चौकस रखना अपनी पडोसी ना आई ऐस आई निकले 'Maahir' वो जिनको चाहा था कभी हमने पागलों की तरहा याद आये है वही आज हमको दुश्मनों की तरहा वो लिखे बैठे है लेन देन बरसों का ये जिंदगी तो है पानी के बुलबुलों की तरहा मन पपीहे को तो एक ही बूँद काफ़ी थी प्यार बरसा है हम पे बादलों की तरहा जिनको पाना ही जिंदगी का मक़सद था भूल जाएँगे उनको सुबह के सपनों की तरहा उनका ख़याल उनका तस्सवुर उनकी याद सम्भाल के रक्खा है हथेली के आबलो की तरहा 'Maahir' वो जो दरिया की तरहा से बह रहा है चलना ही जीवन है वो ये कह रहा है ढल रहा है हरदम सूरज की तरह जो और धरती की तरह ग़म सह रहा है हर जनम में बेशक इसका रूप और था हर युग में मौजूद लेकिन वह रहा है ये हमारी रस्में है पाराम्पराए और रिवाज़ खून बन कर जो नसों में बह रहा है सत्य का है बोलबाला झूठ का हरदम मुँह काला युग कोई भी हो मगर ये तय रहा है क्या करोगे दूर परदेसो में जाकर प्रेम का दरिया यहाँ पर बह रहा है क्यों ना हम बच्चो को बांटे प्रेम अपना बडो का हम पर सदा स्नेह रहा है अपने ही अब तो पराए हो गए पारस विश्वास का पर्वत दरक कर ढह रहा है 'Maahir'

Rasleela Nathdwara Style | Twin Eternals - Matter & Energy

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