skip to main |
skip to sidebar
RSS Feeds
A personal blog by Pavan Kumar "Paavan"
A personal blog by Pavan Kumar "Paavan"
![]() |
![]() |
6:56 PM
Article Published by : PAVAN KUMAR SHARMA,' PAAVAN &MAAHIR
प्रस्तुत है एक ग़ज़ल- कठिन वो रास्ते अपनी जगह हैं, रवाँ कुछ क़ाफ़िले अपनी जगह हैंl अँधेरे खुश हैं, सूरज ढल रहा जो, वो जुगनू नाचते अपनी जगह हैं ज़ुबाँ खुलने से पहले लोग देखो, इशारे भाँपते अपनी जगह हैंl करें जमहूरियत की बात लेकिन, अधर उनके सिले अपनी जगह हैं। जमहूरियत=प्रजातंत्र क़फ़स की तीरगी के बाद भी तो, दहकते हौसले अपनी जगह हैं। क़फ़स=क़ैदखाना, तीरगी=अँधेरा बधाई चंद्रयानों की है उनको, ज़मीं के मसअले अपनी जगह हैं। मसअले= प्रकरण 'Maahir'
7:22 PM
Article Published by : PAVAN KUMAR SHARMA,' PAAVAN &MAAHIR
हुआ गुम-सुम है मंज़र, देखिए तो, मुझे तूफ़ाँ का है डर, देखिए तो। मंज़र=दृष्य, मसाइल आमजन के घूरते हैं, हुए हैं लोग पत्थर देखिए तो। मसाइल = मसअला का बहुवचन, वबा में ढूँढते थे, धूर्तता से, मुनाफ़े का वो अवसर देखिए तो। वबा = पेन्डेमिक, ग़लत हुक्मों पे नेता से तो अफ़सर, कहें बस आज सर-सर देखिए तो। अमीरों के लिए मुफ़लिस मरे फिर, यही होता है अक्सर देखिए तो। मुफ़लिस =ग़रीब, ग़रीबों के लिए हर सू है ज़िल्लत, न चाहें देखना, पर देखिए तो। हर सू= प्रत्येक दिशा में, ज़िल्लत= अपमान, प्रणयरत क्रौंच के इक तेज़-घातक, लगा फिर आज शर है देखिए तो। क्रौंच=एक पक्षी जिस को तीर लगने से प्रथम काव्य के जन्म की जनश्रुति है। शर=तीर। - Maahir
7:10 PM
Article Published by : PAVAN KUMAR SHARMA,' PAAVAN &MAAHIR
श्रीमद्भगवद्गीता : कर्मक्षेत्रे - रणक्षेत्रे : अध्याय ५: कर्मसंन्यास योग : क्रमश : श्लोक ७ : कर्मयोगी का सभी प्राणियों के साथ तादात्म्य स्थापन : योगयुक्त : विशुद्धात्मा विजितात्मा जितेन्द्रिय : । सर्नभूतात्मभूतात्मा कुर्वन् अपि न लिप्यते ॥७॥ अन्त:करण से शुद्ध , मन को वश किए इन्द्रियजित कर्मयोगी । निज आत्म को ही देखता सब प्राणियों में सब कर्म करते भी, उनमें लिप्त होता है नहीं ॥७॥ योगयुक्त कर्मयोगी के लक्षण और व्यवहार: योगयुक्त कर्मयोगी का अन्त: करण शुद्ध,मन और इन्द्रियों को जीते हुए अपनी आत्मा को सब प्राणियों में जानते हुए, सभी कर्म करते हुए भी राग और द्वेष से मुक्त हुआ सभी कर्मों को करता हुआ भी उनमें लिप्त नहीं होता अथवा वह कर्मबन्धन से मुक्त हुआ रहता है । 'Paavan Teerth '
7:09 PM
Article Published by : PAVAN KUMAR SHARMA,' PAAVAN &MAAHIR
ग़ज़ल- बेवजह, आज तक कुछ हुआ ही नहीं, इससे आसां कोई फ़लसफ़ा ही नहीं। फ़लसफ़ा=फ़िलासफ़ी, दर्शन माँगता है यह बैसाखियाँ उम्र भर, झूठ पैरों पे ख़ुद के चला ही नहीं। चाहता हूँ, कि सबको, मिले चैन-सुख, चाह में है मेरी, बस जज़ा ही नहीं। जज़ा=फल, परिणाम कितने किरदार मैं जी चुका आजतक, दिल है प्यासा अभी तक भरा ही नहीं। किरदार=चरित्र उस लड़ाके का तो हश्र सोचो ज़रा, दुश्मनों का जिसे है पता ही नहीं। हश्र=परिणाम छोड़ देता है कोशिश सँवरने की जो, वो बशर दोस्तो फिर बचा ही नहीं। बशर=व्यक्ति ज़ुल्म की वो हदें तोड़ते ही रहे हद है! अहसास तुम को हुआ ही नहीं। क्या वजह है, वो जिससे, यह दुनिया बनी, उसका अब तक मिला है पता ही नहीं। पंथ की ओट में बस ग़ुलामी मिली, था नशे में, वो यह जानता ही नहीं। 'Maahir'
7:15 PM
Article Published by : PAVAN KUMAR SHARMA,' PAAVAN &MAAHIR
श्रीमद्भगवद्गीता : कर्मक्षेत्रे-रणक्षेत्रे: अध्याय ५ : क्रमश : श्लोक ६ : कर्मयोग की सीढ़ी से ही संन्यास और ब्रह्म प्राप्ति : संन्यास : तु महाबाहो दु:खम् आप्तुम् अयोगत: योगयुक्त: मुनि: ब्रह्म नचिरेण अधिगच्छति ॥६॥ हे महाबाहो ! परंतु योग के अभाव में संन्यास-साधन कष्टकर । ब्रह्म का मननकर्ता कर्मयोगी शीघ्र ही प्राप्त होता ब्रह्म को ॥६॥ कर्मयोग से कैसे है सुगम ब्रह्म की प्राप्ति : दूसरों का हित कैसे हो? इस प्रकार मनन करने से राग छूट जाता है ।राग का सर्वथा अभाव होने पर स्वत:सिद्ध परमात्म-तत्व की अनुभूति हो जाती है । संत ज्ञानेश्वर ने व्यंग्योक्ति करते हुए कहा है: “किन्तु जो योग-साधन का आश्रय नहीं लेते वे वृथा खटपट करते रहते हैं और उन्हें कभी सच्चा संन्यास नहीं मिलता । 'Paavan Teerth'
7:00 PM
Article Published by : PAVAN KUMAR SHARMA,' PAAVAN &MAAHIR
जलाओ न दुनिया को ! मोहब्बत की दुनिया बसा करके देखो, हाथ से हाथ तू मिला करके देखो। सूखे पत्ते के जैसे न जलाओ जहां को, नफ़रत का परदा हटा करके देखो। गिराओ न मिसाइलें इस कदर गगन से, उजड़ते जहां को बसा करके देखो। अमन-शान्ति से रहना तो सीखो, खुशबू लबों से चुरा करके देखो। नहीं रुक रहा वो सिलसिला जंग का, कोई अपना दिल बढ़ा करके देखो। लावा हुआ देखो गुस्सा सभी का, बगावत का शोला बुझा करके देखो। मुट्ठी भर लोगों के हाथों में दुनिया, साजिशों का जाल जला करके देखो। खुशियों के नाम पे वो गमों को न बेचे, जब डूब रही कश्ती बचा करके देखो। आंसुओं का कर्ज है तेरे सर पे बहुत, जुबानी जंग जरा घटा करके देखो। बागों की देखभाल न उल्लू को सौंपो, न घटे उम्र जंग की,बढ़ा करके देखो। 'aavan'
6:56 PM
Article Published by : PAVAN KUMAR SHARMA,' PAAVAN &MAAHIR
श्रीमद्भगवद्गीता : कर्मक्षेत्रे - रणक्षेत्रे : अध्याय ५: कर्मसंन्यास योग : क्रमश : श्लोक ५ : कर्मयोग और सांख्य दोनों का अन्तिम लक्ष्य परमात्मा की प्राप्ति: यत् सांख्ये: प्राप्यते स्थानम् तत् योगै : अपि गम्यते । एकम् सांख्यम् च योगम् च य: पश्यति स: पश्यति ॥५॥ सांख्य- साधन पहुँचाता जहाँ योग। भी पहुँचाता वहाँ । सांख्य और योग को एकसा जो जानता वही सच में यथार्थ को है देखता ॥५॥ ध्यान दीजिए : पूर्व श्लोक चार में जो बात व्यतिरेक से कही गयी थी उसी को इस श्लोक में सकारात्मक रूप से कहा गया है । सांख्ययोगी और कर्मयोगी- दोनों का ही अन्त में कर्मों से अर्थात क्रियाशील प्रकृति से सम्बन्ध-विच्छेद होता है । सांख्ययोग का विवेक प्रकृति-पुरुष का सम्बन्ध-विच्छेद करने के लिए होता है और कर्मयोग का ज्ञान कर्म अपने लिए न कर संसार की सेवा के लिए समर्पित करने में रहता है । 'Paavan Teerth'
![]() |