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A personal blog by Pavan Kumar "Paavan"
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8:51 PM
Article Published by : PAVAN KUMAR SHARMA,' PAAVAN &MAAHIR
शकेब जलाली उर्दू अदब के पाकिस्तान के मुमताज़ शायर प्यार की जोत से घर-घर है चरागा़ं वरना! एक भी शम्मा ना रोशन हो हवा के डर से!!(शकेब जलाली) शकेब जलाली उर्दू अदब के पाकिस्तान के मुमताज़ और मक़बूल शायरों में शुमार होते हैं। उनका असली नाम (सैयद हसन रिज़वी )था। उनकी शायरी में दर्द, उदासी, तन्हाई और ज़िंदगी की तल्ख़ हक़ीक़तों का गहरा इज़हार मिलता है। उन्होंने अपनी जदीद शायरी के ज़रिए उर्दू ग़ज़ल को एक नई पहचान दी। उनके अशआर में गहरी सोच, दिलकश तसव्वुर और असरदार अल्फ़ाज़ की ख़ूबसूरत आमेज़िश मिलती है। उनका पहला मजमूआ-ए-कलाम ‘रौशनी ऐ रौशनी’ उनके इंतिक़ाल के बाद 1972 में प्रकाशित हुआ। 12 नवंबर 1966 को पाकिस्तान के सरगोधा में उनका इंतिक़ाल हुआ। मुख़्तसर उम्र के बावजूद उन्होंने उर्दू ग़ज़ल पर गहरे और देरपा नक़ूश छोड़े। उनकी एक ग़ज़ल आपके लिए ोई इस दिल का हाल क्या जाने! एक ख़्वाहिश हज़ार तह-ख़ाने!! کوئی اس دل کا حال کیا جان ایک خواہش ہزار___ تہ خانے मौत ने आज ख़ुद-कुशी कर ली! ज़ीस्त पर क्या बन ख़ुदा जाने!! موت نے آج خودکشی کر لی زیست پر کیا بنی __ خدا جانے फिर हुआ कोई बद-गुमाँ हम से! फिर जनम ले रहे हैं अफ़्साने!! ھر ہوا کوئی بدگماں ہم سے پھر جنم لے رہے ہیں__ افسانے वक़्त ने ये कहा है रुक रुक कर! आज के दोस्त कल के बेगाने!! وقت نے یہ کہا ہےک رک کر آج کے دوست کل__ کے بیگانے ज़ीस्त के शोर-ओ-शर में डूब गए! वक़्त को नापने के पैमाने!! زیست کے شور و شر میں ڈوب گئے وقت کے ناپنے___یمانے** कितना मुश्किल है मंज़िलों का हुसूल! कितने आसाँ हैं जाल फैलाने!! کتنا مشکل ہے منزلوں کا حصول ے آساں ہیں جال___ پھیلانے राज़ ये है कि कोई राज़ नहीं! लोग फिर भी मुझे न पहचाने!! راز یہ ہے کہ کوئی راز نہیں لوگ پھر بھی مجھے نہ پہچانے
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