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Aurat Ka Aashkar

Aurat Ka Aashkar पुरूष इसलिए श्रेष्ठ है... अगर औरत पुरुष को संतुष्ट न करती हो तब, भी घर गृहस्थी चलती रहती है।जबकि पुरूष, के नपुंसक होने या संबंध बनाने में असमर्थता के चलते कोई स्त्री रूकी हो तो एकाध उदाहरण, आप बताएं..।अगर दूसरी तीसरी औरत से नाजायज रिश्ता. बन जाए तो वह पहली की हत्या नहीं करता, (कुछ अपवादो को छोड़कर।)जबकि औरते 75% मामलो में प्रेमी संग मिलकर पति की हत्या कर दे रहीं हैंवह भी अत्यंत क्रूरतापूर्ण तरीको से..। पुरूष नगदी लाता है तो लगभग वह परिवार की होती है,मुख्यतः पत्नी को ही देता है..। अगर स्त्री कमाए तो पति जूठे टुकड़ो पर पलने वाला होता है..। औरत की कमाई पर पलता है ,हालांकि मजदूर वर्ग के शराबियों पर यह लागू नही..। आईएएस बनी औरत को उस पोस्ट से नीचे वाला खुद की बेइज्जती लगती है।औरत से कम कमाई भी चपरासी सा व्यवहार पाता है..। जबकि पुरूष कमाए तो केवल घर के कामो पर ही औरत आसमान सिर पर ले लेती है..। 1. वैवाहिक जीवन और शारीरिक संतुष्टि ​यह सच है कि कई मामलों में अगर आपसी शारीरिक संबंध कमजोर भी हों, तो भी परिवार के अन्य दायित्वों (जैसे बच्चों की परवरिश या सामाजिक दबाव) के कारण रिश्ते चलते रहते हैं। हालांकि, यह स्थिति केवल एकतरफा नहीं है: ​पुरुषों का समर्पण: इतिहास और वर्तमान में ऐसे अनगिनत उदाहरण हैं जहाँ पुरुषों ने अपनी जीवनसाथी की गंभीर बीमारी, असमर्थता या किसी अन्य कमी के बावजूद पूरी वफादारी और प्रेम के साथ जीवन बिताया है। ​स्त्रियों का त्याग: भारतीय समाज में ऐसे भी बहुत से उदाहरण हैं जहाँ महिलाओं ने पति की शारीरिक या मानसिक अक्षमता के बाद भी पूरी उम्र उनके साथ बिताई है, उनका ख्याल रखा है और परिवार को बिखरने नहीं दिया। सामाजिक लोकलाज या गहरे भावनात्मक लगाव के कारण स्त्रियाँ भी ऐसे रिश्तों को निभाती हैं। ​2. अपराध और मानवीय स्वभाव ​जब बात रिश्तों में धोखे या अपराध (जैसे जीवनसाथी की हत्या) की आती है, तो इसे किसी एक जेंडर (लिंग) के चश्मे से देखना पूरी तरह सटीक नहीं होगा: ​अपराध का संबंध किसी लिंग (स्त्री या पुरुष) से नहीं, बल्कि मानवीय प्रवृत्ति, मानसिक विकृति और व्यक्तिगत परिस्थितियों से होता है। ​मीडिया में जब भी इस तरह की क्रूर घटनाएं सामने आती हैं (चाहे वह पुरुष द्वारा की गई हो या महिला द्वारा), वे पूरे समाज को झकझोर देती हैं। कानूनी और सामाजिक आंकड़े बताते हैं कि घरेलू हिंसा या रिश्तों में गंभीर अपराधों के पीछे दोनों ही पक्षों के अलग-अलग मामले होते हैं। किसी भी पक्ष द्वारा किया गया ऐसा कृत्य पूरी तरह निंदनीय और अपवाद ही माना जाता है। ​3. आर्थिक भूमिका और सामाजिक नजरिया ​आर्थिक योगदान को लेकर समाज में तेजी से बदलाव आ रहा है, लेकिन पुरानी रूढ़ियाँ अभी भी कहीं-कहीं हावी हैं: ​पुरुष की कमाई: परंपरागत रूप से पुरुष को 'अन्नदाता' माना गया है, और अधिकांश पुरुष आज भी अपनी पूरी कमाई परिवार और बच्चों के भविष्य पर ही खर्च करते हैं। ​महिला की कमाई और समाज की सोच: जब कोई महिला अधिक कमाने लगती है या ऊंचे पद (जैसे IAS) पर पहुंचती है, तो कई बार समाज का पुराना ढांचा उस बदलाव को आसानी से स्वीकार नहीं कर पाता। पुरुष के मन में हीन भावना आना या महिला के व्यवहार में बदलाव आना—यह दोनों ही बातें पूरी तरह से व्यक्तिगत परिपक्वता (Maturity) पर निर्भर करती हैं, न कि उनके जेंडर पर। ऐसे कई उदाहरण भी हैं जहाँ उच्च पदों पर बैठी महिलाओं के पतियों ने उन्हें आगे बढ़ने में पूरा सहयोग दिया और वे बेहद सफल वैवाहिक जीवन जी रहे हैं। ​4. घरेलू श्रम की अहमियत ​यह धारणा कि "स्त्री केवल घर का काम करती है," धीरे-धीरे बदल रही है। अर्थशास्त्र और समाजशास्त्र अब मानते हैं कि घर की देखभाल करना, बच्चों की परवरिश करना और परिवार को संभालना एक अदृश्य लेकिन बेहद महत्वपूर्ण आर्थिक और भावनात्मक योगदान है। अगर घर का प्रबंधन सही न हो, तो बाहर जाकर पैसे कमाना भी मुश्किल हो जाता है। ​निष्कर्ष: कोई भी रिश्ता इस बात से 'श्रेष्ठ' नहीं बनता कि कौन कितना कमाता है या कौन अधिक त्याग करता है। रिश्ता तब चलता है जब दोनों पक्ष एक-दूसरे की कमियों को स्वीकार करते हुए, आपसी सम्मान और समझदारी के साथ आगे बढ़ते हैं। समाज में हर तरह के अच्छे और बुरे उदाहरण मौजूद हैं, लेकिन एक स्वस्थ समाज का निर्माण आपसी तालमेल से ही संभव है।

GHAZAL

ग़ज़ल दोस्तो, पेशे ख़िदमत है मेरी नयी ग़ज़ल, अर्ज़ किया है- करना तो चाहा अहदे जवानी में कुछ नया लेकिन मिला शराब न पानी में कुछ नया //१ کرنا تو چاہا عہد جوانی میں کچھ نیا لیکن ملا شراب نہ پانی میں کچھ نہ آیا//۱ इस आस में ही उम्र ये सारी गुज़र गई आएगा मोड़ मेरी कहानी में कुछ नया //२ اس آس میں ہی عمر یہ ساری گزر گئی آئے گا موڑ میری کہانی میں کچھ نیا//۲ हिजरत का सोज़, अजनबी शहरों की बेरुख़ी किसको मिला है नक़्ल मकानी में कुछ नया //३ ہجرت کا سوز، اجنبی شہروں کی بے رخی کس کو ملا ہے نقل مکانی میں کچھ نہیں یا//۳ इक फूल थी ये ज़िंदगी, खिल के बिखर गई होना भी क्या था गुलशने फ़ानी में कुछ नया //४ اک پھول تھی یہ زندگی، کھل کے بکھر گئی ہونا بھی کیا تھا گلشن فانی میں کچھ نیا//۴ मेरी सुख़नबरी के यूँ चर्चे नहीं हैं 'राज़' है पेंच मेरी तुर्रा बयानी में कुछ नया //५ میری سخن بری کے یوں چرچے نہیں ہیں راز ہے پنچ میری ترّہ بیانی میں کچھ نیا//۵ अहदे जवानी- युवावस्था हिजरत- विरह, जुदाई, वतन छोड़ना, परदेस में बसना, प्रवास, पलायन सोज़- जलन, दुख, वेदना नक़्ल मकानी- अपने आवासीय ठिकाने को बदलना, प्रवास, आप्रवासन, परदेश में बसना गुलशने फ़ानी- नश्वर उद्यान अर्थात दुन्या सुख़नबरी- शाइरी पेंच- घुमाव तुर्रा बयानी- वार्ता की अद्भुतता

सच्चा सेल्फ-केयर (Mental Freez)

क्या आपके साथ कभी ऐसा हुआ है कि आप पूरे 8 घंटे की नींद लेते हैं, दिनभर कोई भारी शारीरिक काम भी नहीं करते, फिर भी शाम होते-होते अंदर से एक गहरी थकावट महसूस होने लगती है? ऐसा लगता है जैसे मन और शरीर का बैटरी परसेंट एकदम 'ज़ीरो' हो गया है। अक्सर जब लोग मेरे पास आते हैं, तो उनका यही सवाल होता है — "डॉक्टर साहब, मैं तो दिनभर कुर्सी पर बैठा रहता हूँ, फिर भी इतनी थकावट और चिड़चिड़ापन क्यों महसूस होता है?" हममें से ज्यादातर लोग जब थकावट महसूस करते हैं, तो सोचते हैं कि शायद शारीरिक कमजोरी है, थोड़ा आराम कर लेंगे या किसी छुट्टी पर चले जाएँगे तो सब ठीक हो जाएगा। कुछ लोग एक दिन स्पा चले जाते हैं या कैफे में बैठकर कॉफी पी लेते हैं और सोचते हैं कि यह (Self-Care)' हो गया। लेकिन दो दिन बाद वही पुरानी थकावट, वही खालीपन फिर लौट आता है। ऐसा क्यों होता है? क्योंकि जिसे हम थकावट समझ रहे हैं, वह सिर्फ शरीर की नहीं, बल्कि हमारे इमोशनल (भावनात्मक), मेंटल (मानसिक) और रिलेशनल (संबंधों) स्तर पर हुआ 'ड्रेन (Depletion)' है। आज मैं आपसे इसी विषय पर विस्तार से बात करने आया हूँ कि आखिर हमारे अंदर की ऊर्जा (Energy) कहाँ-कहाँ से लीक हो रही है और सच्चा सेल्फ-केयर क्या होता है। 1. सिर्फ शारीरिक आराम ही काफी क्यों नहीं है? (Understanding Energy Tanks) हमारे शरीर के भीतर दो मुख्य प्रणालियाँ काम करती हैं: सिम्पेथेटिक नर्वस सिस्टम (Sympathetic Nervous System): यह हमारा 'एक्शन' या 'फाइट एंड फ्लाइट' मोड है। जब आप काम करते हैं, तनाव में होते हैं या किसी चुनौती का सामना करते हैं, तो यह सक्रिय हो जाता है। पैरासिम्पेथेटिक नर्वस सिस्टम (Parasympathetic Nervous System): यह हमारा 'रेस्ट एंड डाइजेस्ट' मोड है। यह शरीर और दिमाग को शांत करता है, हील (heal) करता है और नई ऊर्जा भरता है। समस्या तब शुरू होती है जब हम लगातार तनाव, भागदौड़ या अनसुलझी चिंताओं के कारण हर समय 'सिम्पेथेटिक मोड' में ही रहते हैं। शुरुआती दौर में एडेनालिन (Adrenaline) के कारण हमें लगता है कि हम बहुत एक्टिव हैं, लेकिन अंदर ही अंदर हमारी ऊर्जा का टैंक खाली होता रहता है। और जब टैंक पूरी तरह खाली हो जाता है, तो हमारा दिमाग 'फ्रीज मोड' में चला जाता है — हम प्रोक्रैस्टिनेट (काम टालना) करने लगते हैं, ज्यादा खाने लगते हैं या खुद को दुनिया से अलग-थलग कर लेते हैं। 2. हमारी ऊर्जा कहाँ-कहाँ खर्च हो रही है? (Where Is Your Energy Leaking?) आइए गहराई से समझें कि हमारी दिनचर्या में ऐसी कौन सी चीजें हैं जो हमसे बिना बताए हमारी ऊर्जा खींच लेती हैं: क) शारीरिक स्तर पर (Physical Depletion) मल्टीटास्किंग (Multitasking): एक ही समय में चार काम करने की आदत दिमाग पर भारी दबाव डालती है। बिखरा हुआ माहौल (Cluttered Space): यदि आपका कमरा या वर्क-टेबल बिखरी हुई और गंदी है, तो आपका दिमाग लगातार उस अव्यवस्था को प्रोसेस करता रहता है, जिससे अनजाने में थकावट होती है। कम पानी पीना और लगातार अंदर बंद रहना: दिनभर धूप और ताजी हवा से दूर रहना तथा पानी कम पीना शरीर को सुस्त बना देता है। दीर्घकालिक बीमारी या दर्द (Chronic Pain): यदि शरीर में कहीं हल्का दर्द या कोई इंफेक्शन लगातार बना हुआ है, तो शरीर उसे ठीक करने में अपनी भारी ऊर्जा खर्च करता रहता है। ख) भावनात्मक स्तर पर (Emotional Depletion) — सबसे बड़ा चोर! अधिकांश लोगों की ऊर्जा का 70% हिस्सा उनके भावनाओं के स्तर पर खर्च होता है: भावनाओं को दबाना (Suppressing Emotions): जब आप गुस्सा, डर, दुख या निराशा को खुलकर व्यक्त नहीं करते और अंदर ही अंदर दबाते हैं, तो यह वैसा ही है जैसे किसी गेंद को पानी के अंदर जोर से दबाकर रखना। उसमें बहुत ज्यादा ताकत लगती है! बीती बातों और पुरानी चोटों (Past Trauma) को मन में समेटे रखना: जब हम पुरानी दर्दनाक यादों या किसी के प्रति कड़वाहट (Resentment) को मन में बैठाए रखते हैं, तो हमारा शरीर लगातार 'कोर्टिसोल' (स्ट्रेस हार्मोन) बनाता रहता है, जो हमें मानसिक रूप से निचोड़ देता है। सहानुभूति की थकावट (Compassion Fatigue): यदि आप हमेशा किसी दुखी या बीमार प्रियजन को संभाल रहे हैं और उनकी तकलीफ को खुद महसूस कर रहे हैं, तो आप भावनात्मक रूप से खाली हो सकते हैं। हर समय नकारात्मक सोच (Negative Self-Talk): बात-बात पर शिकायत करना, खुद की आलोचना करना या हर स्थिति में बुरा सोचना हमारे दिमाग को डोपामाइन और सेरोटोनिन जैसे 'हैप्पी केमिकल्स' से वंचित कर देता है। ग) बौद्धिक/मानसिक स्तर पर (Intellectual Depletion) ओवरथिंकिंग और ऑब्सेशन (Overthinking): रात को सोते समय पुरानी गलतियों, किसी से हुई बहस या भविष्य की चिंताओं को दिमाग में बार-बार दोहराना (Replaying scenes)। गहन विचार और फैसले लेना: क्या आप जानते हैं कि हमारा दिमाग हमारी कुल कैलोरी का लगभग एक-तिहाई हिस्सा सिर्फ सोचने और निर्णय लेने में खर्च करता है? लगातार पढ़ाई, गहरी रिसर्च या जटिल फैसले लेने के बाद बहुत थकावट होना पूरी तरह स्वाभाविक है। घ) संबंधों के स्तर पर (Relational Depletion) दूसरों को खुश करने की आदत (People Pleasing): सबको खुश रखने के चक्कर में 'हाँ' कहना, अपनी सीमाएँ (Boundaries) न तय कर पाना और हर समय नकाब पहनकर जीना अत्यंत थकाऊ होता है। बनावटी बनकर रहना (Masking): आप अंदर से कुछ और महसूस कर रहे हैं, लेकिन लोक-लाज या शर्म के कारण बाहर से मुस्कुराने का नाटक कर रहे हैं — यह स्थिति दिमाग को बहुत थकाती है। अकेलापन या लगातार झगड़े: घर में बच्चों या जीवनसाथी के साथ लगातार होने वाले मतभेद और संवादहीनता हमारी मानसिक शांति को खत्म कर देती है। 3. 'डिफ़ॉल्ट सेटिंग्स' और बचपन के प्रभाव बचपन के माहौल या पुरानी परिस्थितियों के कारण कई लोगों के दिमाग में कुछ 'डिफ़ॉल्ट सेटिंग्स' (Default Settings) बन जाती हैं। जैसे: 1. शर्म और असुरक्षा (Chronic Shame): यह सोचना कि "मैं तो किसी काम का नहीं हूँ" या "लोग मेरे बारे में क्या सोचेंगे?" 2. परफेक्शनिज़्म (Perfectionism): हर काम 100% परफेक्ट होना चाहिए, वरना खुद को कोसना। 3. नियंत्रण करने की चाह (Control Freak): हर चीज़ और हर व्यक्ति को अपने हिसाब से चलाने की कोशिश करना। ये डिफ़ॉल्ट सेटिंग्स 24 घंटे बैकग्राउंड में एक 'हैवी ऐप' की तरह चलती रहती हैं, जो आपकी अंदरूनी बैटरी को बहुत तेज़ी से ड्रैन (drain) करती हैं। 4. तो फिर असली 'सेल्प-केयर' क्या है? (What is True Self-Care?) अब सवाल यह उठता है कि इस इमोशनल और मेंटल थकावट से बाहर कैसे निकलें? केवल एक दिन छुट्टी मना लेना या स्पा चले जाना इसका पक्का इलाज नहीं है। सच्चा सेल्फ-केयर इन चीज़ों से बनता है: 1. स्वयं के प्रति जागरूकता (Self-Awareness): सबसे पहले यह पहचानें कि आपकी ऊर्जा कहाँ खर्च हो रही है। क्या यह किसी रिश्ते का तनाव है? क्या आप अपनी भावनाएँ दबा रहे हैं? या फिर आप बहुत ज्यादा सोच रहे हैं? 2. अपनी भावनाओं को स्वीकार करें: अगर आपको गुस्सा, डर या दुख महसूस हो रहा है, तो उसे दबाने के बजाय स्वीकार करें। रोना आए तो रो लीजिए, किसी भरोसेमंद व्यक्ति से अपनी बात साझा कीजिए। 3. अपनी सीमाएँ तय करें (Set Boundaries): हर जगह 'हाँ' बोलना बंद कीजिए। जहाँ आपकी मानसिक शांति प्रभावित हो रही हो, वहाँ शालीनता से 'ना' कहना सीखें। 4. 'ओवरथिंकिंग' पर ब्रेक लगाएँ: जब दिमाग एक ही बात को बार-बार दोहराने लगे, तो खुद से कहें — "क्या अभी इस बात को सोचने से कोई समाधान निकलेगा?" अगर नहीं, तो अपना ध्यान किसी शारीरिक गतिविधि (सैर, संगीत, योग) में लगाएँ। 5. सहानुभूति रखें, लेकिन अपनी रीचार्जिंग भी करें: यदि आप किसी अपनों की देखभाल कर रहे हैं, तो याद रखें कि आप खाली कप से किसी दूसरे का कप नहीं भर सकते। पहले खुद को रीचार्ज करें।

चाय-चालीसा

चाय दिवस पर विशेष प्रस्तुति चाय-चालीसा (1) खोल रखे हैं चाय ने, स्वागत के शुभ द्वार। घर घर में आतिथ्य की, प्रथम चाय मनुहार।। (2) मन रंजक गुणवान यह, पैयन की सिरमौर। औषधि गुण इसमें निहित, इससा नाहीं और।। चौपाई जय जय माता चाय भवानी। पेय जगत की माँ महारानी।। सरल सुघड़ सकल्प स्वरूपा। अग्नि पर तप पाया रूपा।। औषधि गुण की यह भण्डारी। है संजीवन सम गुणकारी।। परवत पर जा खोजा इसको। जाय विदेशन रोपा इसको।। कोमल पत्ती जिसे सुखाया। तब ही जाकर इसको पाया।। शक्कर दूध संग में पानी। फिर तपकर यह बनी महानी।। श्यम वर्ण यह केसर गंधी। गोरस मधु से कीन्ही संधी।। पाकर तुलसी अदरक संगा। ज्वर जुकाम से करती जंगा।। इन्फेक्शन को मार भगाती। डेंगू तक को आँख दिखाती।। ब्लेक ग्रीन-टी नाम अनेका। यह ही करती सबमें एका ।। रोग विनाशक सुस्ती हारक। रुचिकर स्वादू पावन पाचक।। बहुगुण रूपा अलस हारणी। मनरंजक मुख स्वाद धारणी।। दिग्दिगंत मे राज अपारा। चाह पूर्णणी तृप्ति किनारा।। जनमानस में पैठि बढ़ाई। आदर को बढ़ आगे आई।। वृध्दजनन को यह वरदानी। इससे पाते वृद्ध जवानी।। कोटि कोटि जन इसके शरणा। सुबह शाम वन्दे जा चरणा।। ग्राम शहर कस्बा चौपाला। पीते पकड़ पकड़ कर प्याला।। ऊंच नीच में किया न भेदा। जन-गण-मन में रखा अभेदा।। चाय चाह के सभी मुरीदा। रामू थॉमस सिंह वहीदा।। मधूमेही न रहें अछूते। बिन शक्कर ही इसको पीते।। गप्प सड़ाका करते करते। पीते इसको रुकते चलते।। किटी पार्टी सैर सपाटा। जा बिन भैया सब सन्नाटा।। कोई धीरे होले लेता। कोई झटपट ही पी लेता।। मक्खन ब्रेड टोस्ट के संगा। होता वदन चाय पी चंगा।। राजा रंक सभी की प्यारी। जन जन की अति चाय दुलारी।। भेद मिटाती मध परिवारा। तमस तनावी आप विदारा।। तन जब अनुभव आलस करता। इसका सेवन फुरती भरता।। कविगण लिखते इस पर छंदा। स्वाद सदा है रसनानन्दा।। इसीलिए पूजे हर कोई। जो सुमरे यह उसकी होई।। कथनी करनी एक समाना। हर थकान पर इसका ध्याना।। क्या जोगी क्या साधू संता। सबकी प्यारी यह गुणवंता।। किस विधि करूँ बखान चाय का। बहुरंगी ससुराल मायका।। जन मन की यह अतिशय प्यारी। इसके बिन सब रहें दुखारी।। सिगरे पेयन की महतारी। जन मन इसकी आदत भारी।। इसे भजें तो रहें अशोका। इसे तजें तो छाये शोका।। हमरा साथ न छोड़ो कबहूँ। भजें स्वाद को आओ तबहूँ।। रोग विनाशी उम्र हजारी। जाऊँ इस पर मैं बलिहारी।। कृपा चाय की युग युग पाऊँ। यह चालीसा सदा सुनाऊँ।। अमिट चाय की हस्ती भ्राता। निर्धन की यह भाग्य विधाता।। मिले चाय का सदा अशीषा। 'अश्रु' नवावत अपना शीशा।। (3) सुरा भंग को दे धता, करती है यह राज। पेय सभी पीछे रहें, यह सबकी सरताज।। (4) राजा हो या रंक हो, करती कभी न भेद। तुला बराबर तौलती, जासे रहे न खेद।।

Ghazal (Faiz)

चलो अब ऐसा करते हैं सितारे बाँट लेते हैं, ज़रुरत के मुताबिक़ हम सहारे बाँट लेते हैं! मुहब्बत करने वालों की तिजारत भी अनोखी है, मुनाफा छोड़ देते हैं ख़सारे बाँट लेते हैं! अगर मिलना नहीं मुमकिन तो लहरों पर क़दम रख कर, अभी दरिया ए उल्फ़त के किनारे बाँट लेते हैं! मेरी झोली में जितने भी वफ़ा के फ़ूल हैं उन को, इकट्ठे बैठ कर सारे के सारे बाँट लेते हैं! मुहब्बत के अलावा पास अपने कुछ नहीं है फैज, इसी दौलत को हम क़िस्मत के मारे बाँट लेते हैं!! फैज़ अहमद फैज़

Aurat ka aashkaar-2

पराए मर्द से अफेयर चलाना दरअसल एक ऐसी 'डबल शिफ्ट' नौकरी है, जिसमें सैलरी ज़ीरो है और पकड़े जाने पर सीधा 'नौकरी से सस्पेंड' (तलाक) होने का खतरा रहता है! पराए मर्द से अफेयर रखना दरअसल 'बिना हेलमेट के 150 की स्पीड पर बाइक चलाने' जैसा है, जिसमें हवा तो बहुत अच्छी लगती है, लेकिन एक छोटा सा गड्ढा (यानी पति) आते ही सीधा हड्डियां टूटती हैं! फोन का पासवर्ड इतनी बार बदलता है कि महिला खुद भूल जाती है। फोन हमेशा स्क्रीन के बल उल्टा रखा जाता है, जैसे उसमें कोई खुफिया सरकारी राज छिपा हो। अगर गलती से पति फोन उठा ले, तो दिल की धड़कन सीधे 200 के पार पहुंच जाती है। राए पुरुष का नंबर फोन में 'पिंकी पार्लरवाली', 'धोबी' या 'कबाड़ीवाला' नाम से सेव होता है। बात करते समय आवाज इतनी धीमी हो जाती है कि चींटी की चाल भी उससे तेज सुनाई दे। इस रिश्ते में सबसे ज्यादा खर्च 'डिटर्जेंट' का होता है, क्योंकि मन के पाप और चेहरे का डर धोने में पूरा वक्त निकल जाता है। घर आते ही पति पर अचानक जरूरत से ज्यादा प्यार आने लगता है, ताकि शक की सुई घूमे ही नहीं। पकड़े जाने पर न पुराना बॉस (पति) रखता है और न नया क्लाइंट (पराया पुरुष) जिम्मेदारी लेता है। राए मर्द से दिल लगाना यानी 'आ बैल मुझे मार' वाली कहावत को सच करना है! इस डबल गेम का अंत बड़ा ही दर्दनाक (और थोड़ा मजेदार) होता है। जब राज खुलता है, तो पति घर का ताला बदल देता है और पराया मर्द अपना मोबाइल नंबर बदल लेता है। महिला बीच में खड़ी होकर सोचती है कि 'पिज्जा' के चक्कर में घर की 'दाल-रोटी' से भी हाथ धो बैठी…!!!

Aurat Ka Aashkaar

एक स्त्री वह औरत है जिसे बाकायदा हर महीने माहवारी आती है। वहीं माहवारी जिसको स्त्री अपने 14 साल के उम्र से हर महीने बर्दाश्त करती है। यह माहवारी उनका चॉइस नहीं होता। यह तो कुदरत का दिया हुआ एक वरदान होता है। वहीं माहवारी जिसमे पूरा शरीर अकड़ जाता है। कमर टूटने लगती है। पेट का दर्द असहनीय होता है। और मानसिक तनाव इतना की सामान्य दिनों में सिर्फ सोच कर ही सिहरन पैदा हो जाती है। हर महीने के माहवारी के दर्द को बर्दाश्त कर अपने आप को अगले महीने के लिए फिर से दर्द सहने के लिए तैयार कर लेना किसी जंग जितने से कम नहीं। हर महीने ना जाने कितने वर्षों तक ये जंग हर महीने जीतती है स्त्री। तब जाके किसी पुरुष के चेहरे की लालिमा बढ़ती है, तब जाके कोई परिवार चहकता है। और तब किसी के वंश की वृद्धि होती है। अरे एक लड़की तो अपने 14 वर्ष की उम्र से ही किसी की बहू किसी की पत्नी बनने कि मोल चुकाती है, हर महीने दर्द सहकर, ताकि किसी दिन वो वंश की वृद्धि की गौरव बन सके। गर्भधारण के बाद 3-4 महीने तो अपने आप से ही परेशान। मूड स्विंग, उल्टी, थकान, मानसिक तनाव, और कमर दर्द तो हिस्सा बनने लगता है जिंदगी का। बढ़ते महीने के साथ उस खुद को उस इंजेक्शन के लिए भी तैयार करना पड़ता है जिसे देखकर ही कभी घर में छुप जाया करती थी। और जब बारी आती है बच्चे को जन्म देने की तो वाहा भी असहनीय दर्द से होकर गुजरती है। 9 महीने तक शारीरिक और मानसिक रूप से तैयार करती है खुद को, परम्परा को आगे बढाने के लिए। प्रसव पीड़ा 6-8 घंटे। और कभी कभी तो 2- 3 दिन तक। अगर फिर भी नॉर्मल डिलीवरी संभव ना हो तो गर्भ चिर के भी बच्चे को बाहर लाने कि हिम्मत रखती है। शरीर पर स्ट्रेच मार्क्स और ऑपरेशन के निशान तक ताउम्र ढोने को तैयार हो जाती है। जो चेहरे पर एक पिंपल आ जाने से पूरा घर सिर पर उठा लेती थी। एक स्त्री की मनोदशा एक पुरुष कभी नहीं समझ सकता। और जो अपनी पत्नी की ये मनोदशा भर बस समझ ले तो वो भगवान का ही रूप होता है।

Rasleela Nathdwara Style | Twin Eternals - Matter & Energy

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