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TARHI MUSHAYARA (GHAZAL)

ग़ज़ल दोस्तो,पेशे ख़िदमत है मेरी नयी ग़ज़ल,बराए मेहरबानी मुलाहिज़ा फ़रमाएँ,अर्ज़ किया है- क्या इसमें छिपा कुछ नया दस्तूर रखा है बच्चे का लक़ब किसलिए तैमूर रखा है //१ کیا اسمیں چھپا کچھ نیا دستور رکھا ہے بچے کا لقب کس لئے تیمور رکھا ہے//۱ मग़रिब के तमद्दुन के लिए क्या है ये वहशत क्या अक्से फ़िरंगी में जुदा नूर रखा है //२ مغرب کے تمدّن کے لیے کیا ہے یہ وحشت کیا عَکْس فرنگی میں جُدا نور رکھا ہے//۲ हैं संगे तशद्दुद पे टिके क़ौमी अक़ीदे नफ़रत ने हक़ीक़त से जिन्हें दूर रखा है //३ ہیں سنگِ تشدّد پے ٹکے قومی عقیدے نفرت نے حقیقت سے جنہیں دور رکھا ہے//۳ क्या दर्से बक़ा ऐसे पुजारी से मिलेगा जिसमें न कोई ताब न ही नूर रखा है //४ کیا درسِ بقا ایسے پُجاری سے ملےگا جس میں نہ کوئی تاب نہ ہی نور رکھا ہے//۴ बस एक मुलाक़ात में दिल हो गया बेज़ार क्या ख़ाक मज़ा वस्ल में भरपूर रखा है //५ بس ایک مُلاقات میں دِل ہو گیا بیزار کیا خاک مزا وصل میں بھرپو رکھا ہے//۵ उस तक चलो लेकर हमें ऐ बूद की हसरत जिसके नशे ने रूह को मसरूर रखा है //६ اُس تک چلو لیکر ہمیں اے بود کی حسرت جسکے نشے نے روح کو مسرور رکھا ہے//۶ नज़दीक से देखा तो वाँ कीड़ा था कोई 'राज़' हम सोचते थे शाख़ पे अंगूर रखा है //७ نزدیک سے دیکھا تو واں کیڑا تھا کوئی راز ہم سوچتے تھے شاخ پے انگور رکھا ہے//۷ राज़_नवादवी راز_نوادوی (ایک انجان شاعر) ●दस्तूर- प्रथा या रीति, परंपरा, रस्म, रीति रिवाज, परिपाटी ●लक़ब- उपनाम, उपाधि, ख़िताब, पदवी, ऐसा नाम जिसमें उस व्यक्ति के गुणों का पता चले, गुण, योग्यता अथवा पदसूचक नाम ●मग़रिब- पश्चिम, पश्चिम के देश ●तमद्दुन- संस्कृति, सभ्यता ●वहशत- पागलपन ●अक्से फ़िरंगी- विदेशी चेहरा, प्रतिबिंब, छाया, आकृति ●नूर- प्रकाश ●संगे तशद्दुद- हिंसा रूपी पत्थर ●क़ौमी अक़ीदे- सामुदायिक, समुदाय आधारित विश्वास ●दर्से बक़ा- अनश्वरता का पाठ ●इल्म- ज्ञान ●ताब- चमक, आभा ●बेज़ार- परांगमुख, विमुख ●वस्ल- मिलन ●बूद की हसरत- अस्तित्व में आने या बने रहने की चाह ●मसरूर- प्रफुल्ल, हर्षित, आनंदित, ख़ुश, उल्लसित ●वाँ- वहाँ

Ghazal-203

ग़ज़ल- भला हम,आप,सब,का चाहती हो, ज़ुबां पे आज बस वो शायरी हो। सुने जो भी,लगे उसको कि जैसे, ग़ज़ल में बात उसकी ही कही हो। ख़ुदा से मे री बस ये इल्तिज़ा है, न मुश्किल में किसी की ज़िन्दगी हो। मेरी कोशिश यही है दोस्तो बस, कि सब की ज़िन्दगी में रोशनी हो। सँभाला होश जब से,बस ये चाहा, जुदा कोई न अपनों से कभी हो, गुजारिश है समय की अब कलम से, ग़ज़ल बस वो लिखूँ जो जागती हो। सुनेगा ग़ौर से तुमको ज़माना, तुम्हारी बात में कुछ बात भी हो। 'माहीर'

Who Am I ?Poem in english

Who Am I? After retirement, with no job, no routine, and a quiet house echoing with silence… I finally began to discover my true self. Who am I? I built bungalows, raised farmhouses, invested in ventures big and small, yet now, I find myself bound within four simple walls. From bicycle to moped, bike to car, I chased speed and style — but now, I walk slowly, alone, inside my room. Nature smiled and asked, “Who are you, dear friend?” And I replied, “I am... just me.” I’ve seen states, countries, continents, but today, my journeys stretch only from the drawing room to the kitchen. I learned about cultures and traditions, but now, I simply long to understand my own family. Nature smiled again, “Who are you, dear friend?” And I said, “I am... just me.” Once I celebrated birthdays, engagements, weddings in grand style — but today, I count coins to buy vegetables. Once I fed extra bread to cows and dogs, today, even my own meal feels like a challenge. Nature asked once more, “Who are you, dear friend?” And I answered, “I am... just me.” Gold, silver, diamonds, pearls — sleep quietly in lockers. Suits and blazers — hang untouched in wardrobes. But now, I live in soft cotton, simple and free. I once mastered English, French, Hindi — but now, I find comfort in reading my mother tongue. I travelled endlessly for work, and now, I reflect on those profits and losses — measured in memories. I ran businesses, nurtured a family, built many connections, but now, my dearest companion is the kind neighbour next door. I once followed every rule, strived in education — but now I finally see what truly matters. After all of life’s highs and lows, in a quiet moment, my soul whispered back to me. Enough now… Get ready, O Traveller… It’s time to prepare for the final journey… Nature smiled gently, “Who are you, dear friend?” And I replied: “O Nature, You are me… And I am you. Once I soared in the skies, Now I touch the earth with grace. Forgive me… Give me one more chance to live… Not as a money-making machine, But as a true human being — With values, With family, With love.” To my all family members & ‘Friends' , wishing you love, strength, and peace.Pavan Sharma

वो दिल कहां से लाऊं..?

वो दिल कहां से लाऊं,जो चाय के कप प्लेट्स के खनकने की आवाज भुला दे! पत्थर तो हज़ारों ने मारे थे मुझे,लेकिन जो दिल पर लगा, वो एक दोस्त का मारा हुआ पत्थर था! पहले ज़माना था जब दिन भर चाय के बर्तन खनकते थे और हमारा ड्राइंग रूम दोस्तों के कहकहों से गूंजता था। याद है वे दिन, जब अजमेर में हर रात 10 बजे हम सारे दोस्त रेलवे स्टेशन के सामने क्लॉक टावर थाने के पास इकट्ठा होते थे। वहाँ से रेलवे स्टेशन के प्लेटफार्म पर चाय की चुस्कियाँ लेते, घूमते-घूमते गप्पे मारते, और दुनिया जहान की बातें करते। (उसे जमाने में चर्चा का टॉपिक आज की तरह मोदी का पक्ष विपक्ष नहीं होता था। कोई भी मित्र किसी भी विषय पर पूर्वाग्रह दूराग्रह से ग्रस्त नहीं होता था।) रात के 2 बजे तक ये सिलसिला चलता, और मज़े की बात? इसमें किसी दोस्त की गैरहाजिरी न के बराबर होती थी 100% अटेंडेंस! लेकिन अब? अब तो हाल ये है कि किसी दोस्त या रिश्तेदार का फोन आता है, तो मन में पहला ख्याल यही आता है, “कहीं PNB से एजुकेशन लोन की बात तो नहीं?” दोस्ती का मतलब जैसे ज़रूरत बनकर रह गया है। क्या हमने कभी सोचा कि सच्ची दोस्ती हमारे जीवन का कितना बड़ा खज़ाना है? आजकल दोस्ती का स्थान “नेटवर्क” शब्द ने ले लिया है। नेटवर्क, यानी बहुत से लोगों से ऐसी जान-पहचान जिसमें आप उनके लाभ के लिए काम करेंगे और वो आपके लिए। इसमें निस्वार्थ दोस्ती का स्थान कहाँ? अब दोस्ती वो नहीं रही जो बिना किसी स्वार्थ के दिल से दिल तक जाती थी। अब तो लोग “कनेक्शन्स” बनाते हैं, लिंक्डइन पर फॉलो करते हैं, और कॉफी मीटिंग्स में बिजनेस कार्ड्स बाँटते हैं। लेकिन क्या ये नेटवर्किंग उस गर्मजोशी की जगह ले सकती है, जो अजमेर की रातों में चाय की चुस्कियों और बेपरवाह गपशप में थी? हमारी ज़िंदगी में दोस्ती धीरे-धीरे कहीं खो सी रही है। ज्यादातर लोग अपने बीवी बच्चों और अधिक से अधिक 'डॉग' तक सीमित रह गए हैं। एक अमेरिकी सर्वे के मुताबिक, 1990 से अब तक “कोई करीबी दोस्त नहीं” कहने वालों की संख्या चार गुना बढ़ गई है। भारत में भले ही कोई औपचारिक सर्वे न हो, लेकिन शहरी ज़िंदगी को देखकर लगता है कि हम भी उसी राह पर हैं। ऑफिस, ट्रैफिक, मोबाइल स्क्रीन, और पारिवारिक ज़िम्मेदारियों के बीच हमने दोस्तों के लिए वक्त निकालना लगभग छोड़ दिया है। पहले गली-मोहल्ले में शाम को क्रिकेट, चाय की टपरी पर गपशप, या त्योहारों पर दोस्तों का जमावड़ा आम था। आज हम अकेले बैठकर सोशल मीडिया स्क्रॉल करते हैं, और दोस्ती व्हाट्सएप स्टेटस तक सिमट गई है। सच्चे दोस्त सिर्फ हंसी-मज़ाक का बहाना नहीं, बल्कि हमारी ज़िंदगी का आधार हैं। हार्वर्ड यूनिवर्सिटी के 80 साल के एक अध्ययन में साफ कहा गया है कि जीवन में खुशी और सेहत का सबसे बड़ा स्रोत धन या करियर की सफलता नहीं, बल्कि करीबी रिश्ते और दोस्ती है। जब आपका दोस्त आपकी बात सुनता है, बिना जज किए सलाह देता है, या बस आपके साथ हंसता है, तो तनाव अपने आप कम हो जाता है। एक अच्छा दोस्त डिप्रेशन और अकेलेपन से लड़ने में सबसे बड़ा सहारा होता है। शोध बताते हैं कि सामाजिक अलगाव से हृदय रोग और डिमेंशिया का खतरा बढ़ता है, जो रोज़ 15 सिगरेट पीने जितना नुकसानदायक है। दोस्तों के साथ समय बिताने से ब्लड प्रेशर नियंत्रित रहता है और इम्यूनिटी मज़बूत होती है। त्योहारों पर दोस्तों के साथ मस्ती, रात को लंबी गपशप, या एक साथ ट्रिप प्लान करना – ये वो पल हैं जो ज़िंदगी को यादगार बनाते हैं। पहले दोस्ती अपने आप बन जाती थी – स्कूल, कॉलेज, मोहल्ले, या धार्मिक आयोजनों में। लेकिन अब ज़िंदगी की भागदौड़ में दोस्ती को वक्त देना एक सचेत प्रयास मांगता है। पहले लोग मंदिर, गुरुद्वारे, या सामुदायिक आयोजनों में मिलते थे; अब हम अपने फोन और पालतू जानवरों में ज्यादा व्यस्त हैं। हां, पालतू जानवर! मेरे कई दोस्तों ने अपने डॉगी की सैर के चक्कर में मिलना-जुलना छोड़ दिया है। बॉनी वेयर की किताब में एक बात दिल को छू जाती है: “काश मैं अपने दोस्तों के संपर्क में रहता।” ये पछतावा हमें आज से सबक लेने की याद दिलाता है। दोस्ती में समय, मेहनत, और सच्चाई चाहिए। एक फोन कॉल, एक छोटी-सी मुलाकात, या बस एक मैसेज – ये छोटे-छोटे कदम दोस्ती को ज़िंदा रख सकते हैं। दोस्ती अब हमारे रोज़मर्रा का हिस्सा नहीं रही; ये अब तभी संभव है जब बाकी ज़िम्मेदारियां पूरी करने के बाद वक्त बचे। लेकिन दोस्ती को विलासिता नहीं, ज़रूरत बनाएं। अपने दोस्तों को समय दें – उनके साथ कॉफी पीएं, पुरानी यादें ताज़ा करें, या एक छोटा-सा गेट-टुगेदर प्लान करें। माफ करें, भूलें, और ज़रूरत पड़े तो माफी मांग लें। साथ मिलकर यात्राएं प्लान करें, हंसी-मज़ाक करें, और यादें बनाएं। जैसा कि मिर्ज़ा ग़ालिब ने कहा, “दोस्तों के साथ जी लेने का मौका दे दे ऐ खुदा… तेरे साथ तो मरने के बाद भी रह लेंगे” तो आज ही अपने दोस्त को फोन करें, मिलने का प्लान बनाएं, मग के बजाय कप प्लेट्स में चाय पीने पिलाने का सिलसिला फिर से शुरू करें और अपनी ज़िंदगी में दोस्ती का रंग फिर से भरें। चलते चलते व्हाट्सएप के फोर्वेडेड मैसेजज को पर्सनल कॉल का विकल्प न बनाएं।

अमर शहीद मंगल पाण्डे

19 जुलाई / जन्मदिवस अमर शहीद मंगल पाण्डे अंग्रेजी शासन के विरुद्ध चले लम्बे संग्राम का बिगुल बजाने वाले पहले क्रान्तिवीर मंगल पांडे का जन्म 19 जुलाई 1827 ग्राम नगवा (बलिया, उत्तर प्रदेश) में हुआ था। युवावस्था में ही वे सेना में भर्ती हो गये थे। उन दिनों सैनिक छावनियों में गुलामी के विरुद्ध आग सुलग रही थी। अंग्रेज जानते थे कि हिन्दू गाय को पवित्र मानते हैं, जबकि मुसलमान सूअर से घृणा करते हैं। फिर भी वे सैनिकों को जो कारतूस देते थे, उनमें गाय और सूअर की चर्बी मिली होती थी। इन्हें सैनिक अपने मुँह से खोलते थे। ऐसा बहुत समय से चल रहा था; पर सैनिकों को इनका सच मालूम नहीं था। मंगल पांडे उस समय बैरकपुर में 34 वीं हिन्दुस्तानी बटालियन में तैनात थे। वहाँ पानी पिलाने वाले एक हिन्दू ने इसकी जानकारी सैनिकों को दी। इससे सैनिकों में आक्रोश फैल गया। मंगल पांडे से रहा नहीं गया। 29 मार्च, 1857 को उन्होंने विद्रोह कर दिया। एक भारतीय हवलदार मेजर ने जाकर सार्जेण्ट मेजर ह्यूसन को यह सब बताया। इस पर मेजर घोड़े पर बैठकर छावनी की ओर चल दिया। वहां मंगल पांडे सैनिकों से कह रहे थे कि अंग्रेज हमारे धर्म को भ्रष्ट कर रहे हैं। हमें उसकी नौकरी छोड़ देनी चाहिए। मैंने प्रतिज्ञा की है कि जो भी अंग्रेज मेरे सामने आयेगा, मैं उसे मार दूँगा। सार्जेण्ट मेजर ह्यूसन ने सैनिकों को मंगल पांडे को पकड़ने को कहा; पर तब तक मंगल पांडे की गोली ने उसका सीना छलनी कर दिया। उसकी लाश घोड़े से नीचे आ गिरी। गोली की आवाज सुनकर एक अंग्रेज लेफ्टिनेण्ट वहाँ आ पहुँचा। मंगल पांडे ने उस पर भी गोली चलाई; पर वह बचकर घोड़े से कूद गया। इस पर मंगल पांडे उस पर झपट पड़े और तलवार से उसका काम तमाम कर दिया। लेफ्टिनेण्ट की सहायता के लिए एक अन्य सार्जेण्ट मेजर आया; पर वह भी मंगल पांडे के हाथों मारा गया। तब तक चारों ओर शोर मच गया। 34 वीं पल्टन के कर्नल हीलट ने भारतीय सैनिकों को मंगल पांडे को पकड़ने का आदेश दिया; पर वे इसके लिए तैयार नहीं हुए। इस पर अंग्रेज सैनिकों को बुलाया गया। अब मंगल पांडे चारों ओर से घिर गये। वे समझ गये कि अब बचना असम्भव है। अतः उन्होंने अपनी बन्दूक से स्वयं को ही गोली मार ली; पर उससे वे मरे नहीं, अपितु घायल होकर गिर पड़े। इस पर अंग्रेज सैनिकों ने उन्हें पकड़ लिया। अब मंगल पांडे पर सैनिक न्यायालय में मुकदमा चलाया गया। उन्होंने कहा, ‘‘मैं अंग्रेजों को अपने देश का भाग्यविधाता नहीं मानता। देश को आजाद कराना यदि अपराध है, तो मैं हर दण्ड भुगतने को तैयार हूँ।’’ न्यायाधीश ने उन्हें फाँसी की सजा दी और इसके लिए 18 अप्रैल का दिन निर्धारित किया; पर अंग्रेजों ने देश भर में विद्रोह फैलने के डर से घायल अवस्था में ही 8 अप्रैल, 1857 को उन्हें फाँसी दे दी। बैरकपुर छावनी में कोई उन्हं फाँसी देने को तैयार नहीं हुआ। अतः कोलकाता से चार जल्लाद जबरन बुलाने पड़े। मंगल पांडे ने क्रान्ति की जो मशाल जलाई, उसने आगे चलकर 1857 के व्यापक स्वाधीनता संग्राम का रूप लिया। यद्यपि भारत 1947 में स्वतन्त्र हुआ; पर उस प्रथम क्रान्तिकारी मंगल पांडे के बलिदान को सदा श्रद्धापूर्वक स्मरण किया जाता है।

कुत्ते पाले हैं मैंने।

कुत्ते पाले हैं मैंने। बारी बारी लगभग दस दस साल एक फीमेल डाबरमेन और एक पामेरियन डॉग घर मे रहे और फिर कुछ महीनों तक एक बच्चा बीगल साथ में रहा। कुत्तों की इतने दिन की संगत के बाद मेरी राय यह कि आदमी को कुत्ते पालने से परहेज करना चाहिए। इस बात से इनकार नही कि वो आपसे प्यार करते है पर इनका प्यार अग्निसाक्षी के नाना पाटेकर टाईप का होता है। तुम किसी और को चाहोगी तो मुश्किल होगा जैसा। आप किसी और से प्यार जताएँगे तो ये गुर्राएँगे ।कोई आप के नज़दीक आना चाहेगा तो ये नाराज़ होंगे। ये हों तो आपका कहीं आना जाना मुश्किल। आप कहीं गए तो ये देवदास के रोल मे घुस जाएँगे। खाना पीना छोड़ देगें। टसुए बहाएँगे। आप जिनके भरोसे छोड़ आएँ है उसे,उसका खाना खराब कर देगें। और कुत्ते से दूर रहकर आपके हाल भी बेहाल होंगे,चाहे आप रामेश्वर मे मोक्ष की कामना कर रहे हों या गोवा मे सुंदरियाँ ताड़ रहे हों ,कुत्ता आपके मन मे घुसा रहेगा और आप कुछ नही कर पाएंगे। और आप इस गलतफहमी मे मत रहिए कि आपने कुत्ता पाला है। दरअसल उसने आपको पाला हुआ होता है। सुबह शाम टहलना होता है उसे। सुबह तेज बारिश हो रही है। खतरनाक किस्म की ठंड है। कोहरा छाया हुआ है।आप रात को देर से सोए हैं। तबीयत ठीक नही लग रही आपको ,आप बिस्तर मे घुसे रहना चाहते है। पर आपका कुत्ता सुबह छह बजते ही आपकी छाती पर चढ़ बैठेगा। आप चाहे या न चाहे आपको उसकी बेल्ट पकड़कर कॉलोनी पार्क सड़कों पर टहलना ही पड़ेगा। आप नही टहलाते कुत्ते को फिर,वो आपको टहलता है ,वो जिधर जाना चाहे जाता है और आप उसके पीछे पीछे घिसटते है।फिर कुत्ते को नहलाना धुलाना,मना मना कर खाना खिलाना ऐसे काम जैसे आपने एक और बच्चा पैदा कर लिया हो और मुश्किल यह भी कि यह बच्चा कभी बड़ा नहीं होता। और फीमेल डॉग पालना तो और बवाल ए जान। उसके बड़े होते ही मोहल्ले शहर के तमाम कुत्ते, लार टपकाते हुए आपके घर के आसपास मंडराने लगते है। फीमेल डॉग को हर कुत्ता पसंद आ जाता है और उसकी चरित्र रक्षा के प्रबंध करने मे आपकी नींदे हराम हो जाती है।आप झुंझलाते है। नाराज़ होते है ,पैर पटकते है और फिर हार जाते है।आपकी डॉगी आपके हर पहरेदार को मात दे देती है। हर चारदीवारी फलांग जाती है। माँ बनती है। दस बारह छोटे छोटे पिल्लों के नाना बनते है आप और उन्हें ठिकाने लगाने में आपकी अपनी नानी मर जाती है। और फिर कुत्ता किसी को न काटे तो वो काहे का कुत्ता। आपका कुत्ता किसी को काट ले। खरोंच दे तो इससे बडी आफत कोई दूसरी नही। जिसे काटा खरोंचा हो आपके कुत्ते ने उससे विनती कीजिए आप। लड़िये झगड़िए मनाइए उसे। उसका इलाज करवाइए। और जब ये सब करते है आप तो और कुछ करने लायक़ नही रह जाते। कुत्ता यदि पड़ोसी के लॉन में पेशाब न करे तो उसका कुत्ता होना गिना नहीं जाता। ऐसे में कुत्ते पालने वाले को पड़ोसी गालियाँ देते ही है चाहे वो मन ही मन दी गई हो। कुत्ता पालने वाला आदमी कुत्ते का बंधक होता है ,कुत्ता उसकी दिनचर्या निर्धारित करता है और जब तक जिंदा रहता है आदमी को उसका गुलाम होकर रहना पड़ता है। उससे कुत्तों की गंध आने लगती है ,दूसरों के कुत्ते भी उसे देख पूंछ हिलाने लगते है। वो फिर कुत्तो की ही दुनिया मे रहता है और दूसरे लोग उससे मिलने मे कतराते है। और फिर जब कुत्ता मरता है तो ऐसा लगता है कि घर का कोई मेंबर मर गया हो। सन्नाटा छा जाता है घर मे। आप उदास होते है,मातम मनाते है और फिर खुद से ,अपनी बीबी से,बच्चों से,आने जाने वालो से बस कुत्ते की बात करते है।कसम खाते है कि अब कभी कुत्ता नही पालेंगे और फिर कुछ दिनों महीनों बाद एक दूसरा कुत्ता आपके घर मे होता है। कुत्ता पालना आफत है। जी का जंजाल है।कुत्ते पालने से बचना चाहिए आदमी को। कुत्तों से प्यार करना अपने अपहरणकर्ता के प्रेम में पड़ जाने जैसा है। कुत्तों से प्यार करने का बहुत मन हो तो पड़ोसी या किसी दोस्त के कुत्ते से बतिया कर,सहला कर संतोष कर लेना चाहिए। यह सलाह इसलिए क्योंकि हम कुत्ता पाल चुके और अब कुत्तों से दूर रहते है। 'Paavan Teerth'

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक

1 अगस्त/पुण्यतिथि लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक समाज सुधारक और स्वतंत्रता सेनानी बाल गंगाधर तिलक का जन्म महाराष्ट्र के कोंकण प्रदेश (रत्नागिरि) के चिक्कन गांव में 23 जुलाई 1856 को हुआ था। इनके पिता गंगाधर रामचंद्र तिलक एक धर्मनिष्ठ ब्राह्मण थे। अपने परिश्रम के बल पर शाला के मेधावी छात्रों में बाल गंगाधर तिलक की गिनती होती थी। वे पढ़ने के साथ-साथ प्रतिदिन नियमित रूप से व्यायाम भी करते थे, अतः उनका शरीर स्वस्थ और पुष्ट था। 1879 में उन्होंने बी.ए. तथा कानून की परीक्षा उत्तीर्ण की। घरवाले और उनके मित्र संबंधी यह आशा कर रहे थे कि तिलक वकालत कर धन कमाएंगे और वंश के गौरव को बढ़ाएंगे, परंतु तिलक ने प्रारंभ से ही जनता की सेवा का व्रत धारण कर लिया था। परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद उन्होंने अपनी सेवाएं पूर्ण रूप से एक शिक्षण संस्था के निर्माण को दे दीं। सन्‌ 1880 में न्यू इंग्लिश स्कूल और कुछ साल बाद फर्ग्युसन कॉलेज की स्थापना की। तिलक का यह कथन कि 'स्वराज मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है और मैं इसे लेकर रहूंगा' बहुत प्रसिद्ध हुआ। लोग उन्हें आदर से 'लोकमान्य' नाम से पुकार कर सम्मानित करते थे। उन्हें हिन्दू राष्ट्रवाद का पिता भी कहा जाता है। लोकमान्य तिलक ने जनजागृति का कार्यक्रम पूरा करने के लिए महाराष्ट्र में गणेश उत्सव तथा शिवाजी उत्सव सप्ताह भर मनाना प्रारंभ किया। इन त्योहारों के माध्यम से जनता में देशप्रेम और अंगरेजों के अन्यायों के विरुद्ध संघर्ष का साहस भरा गया। तिलक के क्रांतिकारी कदमों से अंगरेज बौखला गए और उन पर राष्ट्रद्रोह का मुकदमा चलाकर छ: साल के लिए 'देश निकाला' का दंड दिया और बर्मा की मांडले जेल भेज दिया गया। इस अवधि में तिलक ने गीता का अध्ययन किया और गीता रहस्य नामक भाष्य भी लिखा। तिलक के जेल से छूटने के बाद जब उनका गीता रहस्य प्रकाशित हुआ तो उसका प्रचार-प्रसार आंधी-तूफान की तरह बढ़ा और जनमानस उससे अत्यधिक आंदोलित हुआ। तिलक ने मराठी में 'मराठा दर्पण व केसरी' नाम से दो दैनिक समाचार पत्र शुरू किए जो जनता में काफी लोकप्रिय हुए। जिसमें तिलक ने अंग्रेजी शासन की क्रूरता और भारतीय संस्कृति के प्रति हीनभावना की बहुत आलोचना की। उन्होंने ब्रिटिश सरकार को भारतीयों को तुरंत पूर्ण स्वराज देने की मांग की, जिसके फलस्वरूप और केसरी में छपने वाले उनके लेखों की वजह से उन्हें कई बार जेल भेजा गया। तिलक अपने क्रांतिकारी विचारों के लिए भी जाने जाते थे। ऐसे भारत के वीर स्वतंत्रता सेनानी का निधन 1 अगस्त 1920 को मुंबई में हुआ।

Rasleela Nathdwara Style | Twin Eternals - Matter & Energy

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