skip to main |
skip to sidebar
RSS Feeds
A personal blog by Pavan Kumar "Paavan"
A personal blog by Pavan Kumar "Paavan"
![]() |
![]() |
2:00 PM
Article Published by : PAVAN KUMAR SHARMA,' PAAVAN &MAAHIR
न्याय व्यवस्था हमारी अभी तक मैं सोचता था कि अर्जुन युद्ध नहीं करना चाहता था,पर कृष्ण ने उसे लड़वा दिया,यह अच्छा नहीं किया। लेकिन अर्जुन युद्ध नहीं करता तो क्या करता? कचहरी जाता!जमीन का मुकदमा दायर करता। अगर वन से लौटे पांडव,जैसे तैसे कोर्ट-फीस चुका भी देते,तो वकीलों की फीस कहां से देते,गवाहों को पैसे कहां से देते? और कचहरी में धर्मराज का क्या हाल होता?वे क्रॉस एक्जामिनेशन के पहले ही झटके में उखड़ जाते।सत्यवादी भी कहीं मुकदमा लड़ सकते! कचहरी की चपेट में भीम की चर्बी उतर जाती। युद्ध में तो अट्ठारह दिन में फैसला हो गया,कचहरी में अट्ठारह साल भी लग जाते,और जीतता दुर्योधन ही,क्योंकि उसके पास पैसा था। सत्य सूक्ष्म है,पैसा स्थूल है। न्याय देवता को पैसा दिख जाता है,सत्य नहीं दिखता। शायद पांडव मुकदमा लड़ते-लड़ते मर जाते,क्योंकि दुर्योधन पेशी बढ़वाता जाता। पांडवों के बाद उनके बेटे लड़ते,फिर उनके बेटे। बड़ा अच्छा किया कृष्ण ने जो अर्जुन को लड़वाकर,अट्ठारह दिनों में फैसला करा लिया, वरना आज कौरव-पांडव के वंशज किसी दीवानी कचहरी में वही मुकदमा लड़ रहे होते! Paavan Teerth
1:51 PM
Article Published by : PAVAN KUMAR SHARMA,' PAAVAN &MAAHIR
प्रस्तुत है एक ग़ज़ल- कितनी गड़बड़ फैलाते हैं अंधों में ये काने लोग। समझ न पाते ख़ुद, वो भी तो, आते हैं समझाने लोग। कुर्सी पाने पर कैसे ये हो जाते बेगाने लोग, वक़्त पड़ा तो काम न आए कुछ जाने पहचाने लोग। भेदभाव, शोषण, मक्कारी को देकर पंथों का रूप, सीधे-साधे इंसानों को आ जाते बहकाने लोग। भू, जल, हवा, गगन, अनल का लालच में करके उपभोग, मुस्तक़बिल बर्बाद कर रहे, कितने हैं दीवाने लोग। बहुत कशिश है उस ग़लती में जो क़स्दन हम करते थे, बचपन की यादों में खोकर लगते हैं शर्माने लोग। लालच के अंधों को भाता कब सुख-चैन ज़माने का, अमन-चैन गर टिकता कुछ दिन, आ जाते भड़काने लोग। प्रकृति के सब नियम क़ायदे हैं जन-जीवन के हक़ में, नियम तोड़ते हैं जब भी, तब भरते हैं हर्जाने लोग। मुस्तक़बिल=भविष्य 'Maahir'
6:35 PM
Article Published by : PAVAN KUMAR SHARMA,' PAAVAN &MAAHIR
रहता है दिल ये मेरा हाल ए ख़राब में हूं पाता ख़ुद को मैं दुनिया के सराब में/१ آتی نہیں ہے نیندیں مجھ کو تو رات میں جگتی ہیں میری آنکھیں اس کے گلاب میں आती नहीं हैं नींदें मुझ को तो रात में जगती हैं मेरी आँखें उस के गुलाब में/२ کچھ سال پہلے کی لذت ہی عجیب تھی آتا نہیں مزا دلی کے کباب میں कुछ साल पहले की लज़्जत ही अजीब थी आता नहीं मज़ा दिल्ली के कबाब में/३ یہ کیا کہ ہم کو ان کا دیدار بھی نہیں رخ زلف میں چھپایا یا پھر حجاب میں ये क्या कि हम को उनका दीदार भी नहीं रुख जुल्फ में छुपाया या फिर हिजाब में/४ گر تنہا پیتے تو کچھ غیرت کی بات تھی ہم نے انہیں اٹھایا جو تھے شراب میں गर तन्हा पीते तो कुछ गैरत की बात थी हम ने उन्हें उठाया जो थे शराब में/५ 'Maahir'
7:27 PM
Article Published by : PAVAN KUMAR SHARMA,' PAAVAN &MAAHIR
हमारी आन है हिंदी, हमारी शान है हिंदी। मगर अब तक न पा पाई, राष्ट्र भाषा का सम्मान हिंदी। यही तुलसी यही मीरा इसी के बन गए कबीरा। मिलता बरस में सिर्फ एक दिन है इसी बात ने मन चीरा। पितृ पक्ष सा पक्ष मनाते, जन जन की है प्यारी हिंदी! मान यही है हिन्द देश की, पूजित सबकी भाषा हिंदी। भाव सुधा से परिपूरित है, स्नेहसिक्त इसकी बोली है! प्रेम भाव फैलाने वाल,ी प्यारी है मातृ भाषा हिंदी। 'Paavan'
7:26 PM
Article Published by : PAVAN KUMAR SHARMA,' PAAVAN &MAAHIR
प्रस्तुत है एक ग़ज़ल- हमारी अस्मिता, आदर्श की, पहिचान है हिन्दी। हमारी संस्कृति की आन-बान औ शान है हिन्दी। इसी के माध्यम से हम ज़माने को समझ पाए, हमारे राष्ट्र की अवधारणा की आन है हिन्दी। सभी भावों, विचारों को वहन करने में है सक्षम, हमारे देश के चिंतन की अविरल शान है हिन्दी। कुछ इसकी बोलियाँ तो हैं कई भाषाओं पर भारी, बहुत सी बोलियों का दोस्तो उन्वान है हिन्दी। वो जो हम बोलते हैं बस वही लिखते हैं हिन्दी में, सभी भाषाओं के सापेक्ष कुछ आसान है हिन्दी। प्रफुल्लित या दुखी होकर, इसी में बोलते हैं हम, सनातन सोच की यारो सहज सन्तान है हिन्दी। इसे विज्ञान, जन-जीवन, कला, व्यापार से जोड़ें, तरक़्क़ी, शान्ति, ख़ुशहाली की अद्भुत खान है हिन्दी। 'Maahir'
7:21 PM
Article Published by : PAVAN KUMAR SHARMA,' PAAVAN &MAAHIR
प्रस्तुत है एक ग़ज़ल- ज़माने में अक्सर यही तो दिखा है, किसी को बनाने में कोई मिटा है। रुई-तेल को श्रेेय देता न कोई, सभी कहते देखो,दिया जल रहा है। समझना न चाहे,वो समझेगा कैसे ? समझ का इरादे से ही सिलसिला है। बढ़ी भुखमरी,जिंस मँहगी हुईं सब, मगर वोट का कुछ अलग मुद्दआ है। बदल के अमीरों की फ़ितरत दिखाओ, हर इक शय बदलती है,मैंने सुना है। जो सुख - दुःख के गहरे हुए हैं तजारिब, उन्हें ही तो हमने ग़ज़ल में कहा है। लगी चोट दिल पे,तो तड़पा बदन कुछ, मगर कुछ फरिश्तों को इस पर गिला है। 'Maahir'
6:52 PM
Article Published by : PAVAN KUMAR SHARMA,' PAAVAN &MAAHIR
मिलती नही निस्बत कभी चाहत नही मिलती अफसोस ही करते तो मोहब्बत नहीं मिलती//1 घर छोड़ के कर दी थी मैं ने जिंदगी बर्बाद इस काम से अब मुझको विरासत नही मिलती//2 दिल फेंक के आया था तेरी शान के आगे इससे बड़ी तुझको कभी ज़िल्लत नही मिलती//3 जब सर को छुपाना पड़ा दिह़के को कहीं पर उस रोज़ दिहाड़ी में मशक़्क़त नही मिलती//4 दो जून की रोटी के लिए क्या नही होता क्यों ऐसी अमीरों को मुसीबत नही मिलती//5 हमको भी सियासत में है किरदार की चाहत सरकार मैं क्यों हमको ये शोहरत नही मिलती//6 "Maahir'
![]() |