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A personal blog by Pavan Kumar "Paavan"
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7:58 PM
Article Published by : PAVAN KUMAR SHARMA,' PAAVAN &MAAHIR
प्रस्तुत है एक ग़ज़ल- रूप कितने ही दिखाए ज़िन्दगी में ज़िन्दगी ने, आइना मुझको दिखाया दोस्त मेरी शायरी ने। कुछ कसर छोड़ी कहाँ थी दुश्मनों ने दुश्मनी में, दोस्तो महफूज़ रक्खा आजतक बस दोस्ती ने। शोहरतें मुझको दिलाईं ज़िन्दगी में नौकरी ने, आपके नजदीक रक्खा मुझको मेरी सादगी ने। सब्र का मौका दिलाया ज़िन्दगी में दुश्मनी ने, दुश्मनों का कद्रदां लेकिन बनाया दोस्ती ने। कर दिया मुझको मुकम्मल यार की दिलकश हँसी ने, और उसको दे दिया इक रूप मेरी शायरी ने। आमजन की बेबसी ने गीत कुछ भावुक लिखाए, वास्तों को कर दिया जग में उजागर मुफ़लिसी ने। आधुनिक भारत की पहली शिक्षिका जो थीं उन्हें तो, रत्न भारत का बनाया सरफिरों की गंदगी ने। काँप जाते थे किले जिस शख़्स की हुंकार से ही, आसमां से भी गिराया उसको उसकी सरकशी ने। घाव देकर घाव पर धनपशु धरा को लूटते हैं। कुछ कहाँ छोड़ा बताओ पीढ़ियों हित इस सदी ने। कुछ न कुछ तो आज "र" लग रहा है हर किसी को, कुछ ग़लत ही मुझको समझा ज़िन्दगी में हर किसी ने। मुकम्मल=पूर्ण, महफूज़=सुरक्षित, शुहरत=प्रसिद्धि वास्तों=सम्बन्धों, उजागर=स्पष्ट, मुफ़लिसी =ग़रीबी, सरकशी=चालाकियों
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