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A personal blog by Pavan Kumar "Paavan"
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8:44 PM
Article Published by : PAVAN KUMAR SHARMA,' PAAVAN &MAAHIR
फेक मई का दिन मज़दूर दिवस है आज— फिर कवियों,नेताओं के मंच सजेंगे, विद्रोह के झंडे लहराएँगे, काग़ज़ी क्रांतियाँ होंगी। वे कहेंगे— “मज़दूर मेरा भाई है, उसका दर्द मेरी कविता है…” और तालियों की गूँज में उनकी संवेदना बिखर जाएगी। पर सच पूछो तो— किसी हथेली की फटी लकीरों को उन्होंने कब छुआ है? किसी पसीने की बूंद को कविता के बाहर कब जिया है? शब्दों में समाजवाद, पर जीवन में सुख का साम्राज्य, उनकी स्याही में क्रांति है, यही सबसे बड़ी भ्रांति है। मज़दूर तो अब भी कहीं इलाहबाद के पथ पर, तोड़ रहा है पत्थर भूख-प्यास, धूप से लड़ता — बिना किसी कविता के बल पर।
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