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A personal blog by Pavan Kumar "Paavan"
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8:41 PM
Article Published by : PAVAN KUMAR SHARMA,' PAAVAN &MAAHIR
जो शख़्स मुद्दतों मिरे शैदाइयों में था आफ़त के वक़्त वो भी तमाशाइयों में था उस का इलाज कोई मसीहा न कर सका जो ज़ख़्म मेरी रूह की गहराइयों में था वो थे बहुत क़रीब तो थी गर्मी-ए-हयात शोला हुजूम-ए-शौक़ का पुरवाइयों में था कोई भी साज़ उन की तड़प को न पा सका वो सोज़ वो गुदाज़ जो शहनाइयों में था बज़्म-ए-तसव्वुरात में यादों की रौशनी आलम अजीब रात की तन्हाइयों में था
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