ग़ज़ल -------------------------- बाबा_मरे_तो_गाँव_से_रिश्ता_सिमट_गया मैं_धीरे_धीरे_अपने_ही_लोगों_से_कट_गया दोस्तो, फॅमिली डे के लिए विशेष रूप से अभी अभी लिखी गई मेरी ये त्वरित ग़ज़ल मेरे सभी अहबाब और मुझसे बिछड़ गए रिश्तेदारों की याद में पेश है, उम्मीद है पसंद आएगी। अर्ज़ किया है- बाबा मरे तो गाँव से रिश्ता सिमट गया मैं धीरे धीरे अपने ही लोगों से कट गया //१ بابا مرے تو گاؤں سے رشتہ سمٹ گیا میں دھیرے دھیرے اپنے ہی لوگوں سے کٹ گیا//۱ फ़सलें ही जब ख़ुलूस के रिश्ते की जल गईं बंटने लगा जो खेत तो मैं पीछे हट गया //२ فصلیں ہی جب خلوص کے رشتے کی جل گئی بنٹنے لگا جو کھیت تو میں پیچھے ہٹ گیا//۲ दुन्या का क्या करूँ गिला, इस दौरे ज़र में मैं भाई ही जब ज़बान से मेरा पलट गया //३ دنیا کا کیا کرو گلہ، اس دور زر میں میں بھائی ہی جب زبان سے میرا پلٹ گیا//۳ देखी हैं इसने पीढ़ियाँ, ऐसा मैं सोच कर आँगन के बूढ़े पेड़ से जाकर लिपट गया //४ دیکھی ہیں اسے پیٹھیاں، ایسا میں سوچ کر آنگن کے بوڑھے پیڑ سے جاکر لپٹ گیا//۴ तर्के नसब से इक तेरी इज़्ज़त नहीं गई क़द मेरा भी तो ग़ैर की नज़रों में घट गया //५ ترکِ نسب سے ایک تری عزت نہیں گئی قد میرا بھی تو غیر کی نظروں میں گھٹ گیا//۵ माँ कल दिखी थीं ख़्वाब में रोते हुए ऐ 'राज़' मेरा कलेजा देख के इक दम से फट गया //६ ماں کل دکھی تھیں خواب میں روتے ہوئے اے راز میرا کلیجہ دیکھ کے اک دم سے پھٹ گیا बाबा- पिता ख़ुलूस- सच्चाई, निष्कपटता, सिद्क़दिली दौरे ज़र- रुपये पैसे, धन दौलत का ज़माना तर्के नसब- ख़ानदान/कुल का परित्याग