चाय दिवस पर विशेष प्रस्तुति चाय-चालीसा (1) खोल रखे हैं चाय ने, स्वागत के शुभ द्वार। घर घर में आतिथ्य की, प्रथम चाय मनुहार।। (2) मन रंजक गुणवान यह, पैयन की सिरमौर। औषधि गुण इसमें निहित, इससा नाहीं और।। चौपाई जय जय माता चाय भवानी। पेय जगत की माँ महारानी।। सरल सुघड़ सकल्प स्वरूपा। अग्नि पर तप पाया रूपा।। औषधि गुण की यह भण्डारी। है संजीवन सम गुणकारी।। परवत पर जा खोजा इसको। जाय विदेशन रोपा इसको।। कोमल पत्ती जिसे सुखाया। तब ही जाकर इसको पाया।। शक्कर दूध संग में पानी। फिर तपकर यह बनी महानी।। श्यम वर्ण यह केसर गंधी। गोरस मधु से कीन्ही संधी।। पाकर तुलसी अदरक संगा। ज्वर जुकाम से करती जंगा।। इन्फेक्शन को मार भगाती। डेंगू तक को आँख दिखाती।। ब्लेक ग्रीन-टी नाम अनेका। यह ही करती सबमें एका ।। रोग विनाशक सुस्ती हारक। रुचिकर स्वादू पावन पाचक।। बहुगुण रूपा अलस हारणी। मनरंजक मुख स्वाद धारणी।। दिग्दिगंत मे राज अपारा। चाह पूर्णणी तृप्ति किनारा।। जनमानस में पैठि बढ़ाई। आदर को बढ़ आगे आई।। वृध्दजनन को यह वरदानी। इससे पाते वृद्ध जवानी।। कोटि कोटि जन इसके शरणा। सुबह शाम वन्दे जा चरणा।। ग्राम शहर कस्बा चौपाला। पीते पकड़ पकड़ कर प्याला।। ऊंच नीच में किया न भेदा। जन-गण-मन में रखा अभेदा।। चाय चाह के सभी मुरीदा। रामू थॉमस सिंह वहीदा।। मधूमेही न रहें अछूते। बिन शक्कर ही इसको पीते।। गप्प सड़ाका करते करते। पीते इसको रुकते चलते।। किटी पार्टी सैर सपाटा। जा बिन भैया सब सन्नाटा।। कोई धीरे होले लेता। कोई झटपट ही पी लेता।। मक्खन ब्रेड टोस्ट के संगा। होता वदन चाय पी चंगा।। राजा रंक सभी की प्यारी। जन जन की अति चाय दुलारी।। भेद मिटाती मध परिवारा। तमस तनावी आप विदारा।। तन जब अनुभव आलस करता। इसका सेवन फुरती भरता।। कविगण लिखते इस पर छंदा। स्वाद सदा है रसनानन्दा।। इसीलिए पूजे हर कोई। जो सुमरे यह उसकी होई।। कथनी करनी एक समाना। हर थकान पर इसका ध्याना।। क्या जोगी क्या साधू संता। सबकी प्यारी यह गुणवंता।। किस विधि करूँ बखान चाय का। बहुरंगी ससुराल मायका।। जन मन की यह अतिशय प्यारी। इसके बिन सब रहें दुखारी।। सिगरे पेयन की महतारी। जन मन इसकी आदत भारी।। इसे भजें तो रहें अशोका। इसे तजें तो छाये शोका।। हमरा साथ न छोड़ो कबहूँ। भजें स्वाद को आओ तबहूँ।। रोग विनाशी उम्र हजारी। जाऊँ इस पर मैं बलिहारी।। कृपा चाय की युग युग पाऊँ। यह चालीसा सदा सुनाऊँ।। अमिट चाय की हस्ती भ्राता। निर्धन की यह भाग्य विधाता।। मिले चाय का सदा अशीषा। 'अश्रु' नवावत अपना शीशा।। (3) सुरा भंग को दे धता, करती है यह राज। पेय सभी पीछे रहें, यह सबकी सरताज।। (4) राजा हो या रंक हो, करती कभी न भेद। तुला बराबर तौलती, जासे रहे न खेद।।