ग़ज़ल बाबा_मरे_तो_गाँव_से_रिश्ता_सिमट_गया मैं_धीरे_धीरे_अपने_ही_लोगों_से_कट_गया दोस्तो, ज़ल मेरे सभी अहबाब और मुझसे बिछड़ गए रिश्तेदारों की याद में पेश है, उम्मीद है पसंद आएगी। अर्ज़ किया है- बाबा मरे तो गाँव से रिश्ता सिमट गया मैं धीरे धीरे अपने ही लोगों से कट गया //१ بابا مرے تو گاؤں سے رشتہ سمٹ گیا میں دھیرے دھیرے اپنے ہی لوگوں سے کٹ گیا//۱ फ़सलें ही जब ख़ुलूस के रिश्ते की जल गईं बंटने लगा जो खेत तो मैं पीछे हट गया //२ فصلیں ہی جب خلوص کے رشتے کی جل گئی بنٹنے لگا جو کھیت تو میں پیچھے ہٹ گیا//۲ दुन्या का क्या करूँ गिला, इस दौरे ज़र में मैं भाई ही जब ज़बान से मेरा पलट गया //३ دنیا کا کیا کرو گلہ، اس دور زر میں میں بھائی ہی جب زبان سے میرا پلٹ گیا//۳ देखी हैं इसने पीढ़ियाँ, ऐसा मैं सोच कर आँगन के बूढ़े पेड़ से जाकर लिपट गया //४ دیکھی ہیں اسے پیٹھیاں، ایسا میں سوچ کر آنگن کے بوڑھے پیڑ سے جاکر لپٹ گیا//۴ तर्के नसब से इक तेरी इज़्ज़त नहीं गई क़द मेरा भी तो ग़ैर की नज़रों में घट गया //५ ترکِ نسب سے ایک تری عزت نہیں گئی قد میرا بھی تو غیر کی نظروں میں گھٹ گیا//۵ माँ कल दिखी थीं ख़्वाब में रोते हुए ऐ 'राज़' मेरा कलेजा देख के इक दम से फट गया //६ ماں کل دکھی تھیں خواب میں روتے ہوئے اے راز میرا کلیجہ دیکھ کے اک دم سے پھٹ گیا बाबा- पिता ख़ुलूस- सच्चाई, निष्कपटता, सिद्क़दिली दौरे ज़र- रुपये पैसे, धन दौलत का ज़माना तर्के नसब- ख़ानदान/कुल का परित्याग