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अष्टावक्र संहिता A-04

अष्टावक्र संहिता अध्याय १: आत्मानुभूति का निर्देश : एको विशुद्धबोधोऽहमिति निश्चय वह्निना । प्रज्वाल्य अज्ञान गहनम् वीतशोक : सुखी भव ॥९॥ ‘मैं हूँ विशुद्ध बोधत्वम् ‘ इस निश्चय की अग्नि में जल तू । गहन अज्ञान से होकर शोक- मुक्त तुरंत सुखी होगा तू ॥९॥ यत्र विश्वमिदम् भाति कल्पित रज्जुसर्पवत् । आनन्दपरमानन्द : स बोधस्त्वम् सुखम् चर ॥१०॥ यहाँ ‘ रस्सी में सर्प के भय सा’ यह विश्व दिखता है सभी । आनन्द-परमानन्द को प्राप्त कर तू मुक्त हो सुख से विचर ॥१०॥ Paavan Teerth

अष्टावक्र संहिता A-03

अष्टावक्र संहिता अध्याय १ : आत्मानुभूति का निर्देश एको द्रष्टासि सर्वस्य मुक्तप्रायोऽसि सर्वदा । अयमेव हि ते बन्धो द्रष्टारं पश्यसि इतरम् ॥७॥ तू एक द्रष्टा सभी का पर मुक्त सबसे सर्वदा । बंधन तेरा मात्र इतना तू देखता निज को अलग ॥७॥ अहम् कर्ता इति अहम् मानमहाकृष्ण अहि:दंशित : । न अहं कर्तेति विश्वास अमृतम् पीत्वा सुखी भव ॥८॥ ‘कर्ता मैं हूँ ‘ यह समझ कर काले नाग के दंश से तू है डसा ‘मैं नहीं कर्ता ‘ समझकर विश्वास-अमृत पान कर तू हो सुखी ॥८॥ Paavan Teerth

अष्टावक्र संहिता A-02

अष्टावक्र संहिता अध्याय २ : आत्म- अनुभूति का निर्देश न त्वं विप्रादिको वर्णो न आश्रमी न अक्ष गोचर:। असंगोऽसि निराकारो विश्वसाक्षी सुखी भव ॥५ ॥ विप्रादि तेरा वर्ण *क्योंकर आश्रमों** से भिन्न तू है । दृष्टि का विषय न तू है तू नि:संग है , निराकार तू है विश्व-साक्षी रह सुखी हो ॥५॥ ब्राह्मण,क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ, संन्यास । धर्म अधर्मौ सुखं दु:खं मानसानि न ते विभो । न कर्तासि न भोक्तासि मुक्त एवासि सर्वदा ॥६॥ धर्म-अधर्म, सुख- दु:ख मन की क्रिया भर,तेरी न हैं हे विभो । कर्ता नहीं तू, भोक्ता नहीं तू मुक्त तू है सर्वदा ॥६॥ Paavan Teerth

अष्टावक्र संहिता A-01

अष्टावक्र संहिता अध्याय I : आत्म- अनुभूति का निर्देश : अष्टावक्र संहिता शुद्ध अद्वैत को समझने के लिए बीस अध्यायों का एक महत्वपूर्ण ग्रंथ है। अभी तक इसके अन्तिम दो और अठारहवें अध्याय के कुछ श्लोकों का भावानुवाद प्रस्तुत किया गया अब ग्रंथ के प्रथम अध्याय से प्रारम्भ करते हैं । यह कृति विदेह राजर्षि जनक और अष्टावक्र ऋषि के संवाद के रूप प्रस्तुत की गई है । जनक उवाच: कथं ज्ञानम् अवाप्नोति कथं मस्तिष्क : भविष्यति । वैराग्यं च कथं प्राप्तम् एतत् ब्रूहि मम प्रभो ॥१॥ कैसे होगा प्राप्त ज्ञान, कैसे होगी मुक्ति । कैसे पाऊँगा विराग हे प्रभो आप कहिये मुझसे ॥१॥ अष्टावक्र उवाच : मुक्तिम् इच्छसि चेत् तात विषयान् विषवत् त्यज । क्षमा, आर्जवम्, दया, संतोष सत्यम् पीयूषवत् भज ॥२॥ तात ! मुक्ति इच्छा तुझे यदि है छोड़ विषयों को विष समान । और क्षमा, आर्जव,दया, संतोष सत्य को तू पीयूष समान जान ॥२॥ Paavan Teerth

अष्टावक्र संहिता -06

अष्टावक्र संहिता अध्याय XIX : आत्म-स्थित क्व दूरं क्व समीपं वा बाह्यं आभ्यन्तरं क्व वा । क्व स्थूलं क्व च वा सूक्ष्मं स्वमहिम्न स्थितस्य मे ॥६॥ कहाँ दूर और पास कहाँ बाहर कहाँ भीतर कहाँ । स्थूल कहाँ अथवा सूक्ष्म कहाँ उसको जो योगसिद्ध होकर बैठा ॥६॥ क्व मृत्यु: जीवितं वा क्व लोका : कास्य क्व लौकिकम् । क्व लय : क्व समाधिर्वा स्वमहिम्न स्थितस्य मे ॥७॥ मृत्यु कहाँ अथवा जीवन कहाँ विभिन्न लोक कहाँ और लौकिक व्यवहार कहाँ । लय भी कहाँ और समाधि भी कहाँ उसको जो योगसिद्ध होकर बैठा ॥७॥ अलं त्रिवर्गकथया योगस्य कथयाप्यलम् । अलं विज्ञानकथया विश्रान्तस्य ममात्मनि ॥८॥ जानो व्यर्थ जीवन की तीनों गति जानो व्यर्थ कथा योग की । विज्ञान की बात भी व्यर्थ जानो उसको रम गया है आत्म में जो ॥८॥ Paavan Teerth

अष्टावक्र संहिता -05

अष्टावक्र संहिता अध्याय XX : जीवन - मुक्ति क्व विक्षेप: क्व च एकाग्रा क्व निर्बोध: क्व मूढता । क्व हर्ष : क्व विषादो वा सर्वदा निष्क्रियस्य मे ॥९॥ भटकाव कहाँ, एकाग्रता कहाँ ज्ञान परिपूर्णता कहाँ, मूढ़ता कहाँ । हर्ष कहाँ , विषाद कहाँ मुझ सर्वदा निष्क्रिय के लिए ॥९॥ क्व च एष व्यवहारो वा क्व च सा परमार्थता । क्व सुखं क्व च वा दु:खं निर्विमर्शस्य मे सदा ॥१०॥ यह व्यवहार किसके लिए और कहाँ वह परमार्थ भी । सुख कहाँ और दु:ख भी कहाँ मुझ सदा विमर्शहीन के लिए ॥१०॥ Paavan Teerth

अष्टावक्र संहिता -04

अष्टावक्र संहिता अध्याय XIX : आत्म-स्थित क्व दूरं क्व समीपं वा बाह्यं आभ्यन्तरं क्व वा । क्व स्थूलं क्व च वा सूक्ष्मं स्वमहिम्न स्थितस्य मे ॥६॥ कहाँ दूर और पास कहाँ बाहर कहाँ भीतर कहाँ । स्थूल कहाँ अथवा सूक्ष्म कहाँ उसको जो योगसिद्ध होकर बैठा ॥६॥ क्व मृत्यु: जीवितं वा क्व लोका : कास्य क्व लौकिकम् । क्व लय : क्व समाधिर्वा स्वमहिम्न स्थितस्य मे ॥७॥ मृत्यु कहाँ अथवा जीवन कहाँ विभिन्न लोक कहाँ और लौकिक व्यवहार कहाँ । लय भी कहाँ और समाधि भी कहाँ उसको जो योगसिद्ध होकर बैठा ॥७॥ अलं त्रिवर्गकथया योगस्य कथयाप्यलम् । अलं विज्ञानकथया विश्रान्तस्य ममात्मनि ॥८॥ जानो व्यर्थ जीवन की तीनों गति जानो व्यर्थ कथा योग की । विज्ञान की बात भी व्यर्थ जानो उसको रम गया है आत्म में जो ॥८॥ Paavan Teerth

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