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A personal blog by Pavan Kumar "Paavan"
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9:03 PM
Article Published by : PAVAN KUMAR SHARMA,' PAAVAN &MAAHIR
मैं नहीं कहता कि मैं ही कहता हूं,मैं तो कहता हूँ कि मैं भी कहता हूं‼️ कहाँ किसकी जीत हार होगी?जान लें! रााजस्थान में एक कहावत है कि नाई नाई बाल कितने? कि जजमान! जस्ट वेट अभी सामने आ जाएंगे।यही कहावत आज मुझे दोहरानी पड़ रही है। जिस उम्मीदवार को देखो वही अपनी जीत के दावे कर रहा है। ऐसा लग रहा है कि दो सौ सीट के लिए दो हज़ार लोग जीतने वाले हैं। चुनाव लड़ने वाले भले ही डरे सहमे अपने अपने ईश्वर अल्लाह को याद कर रहे हों मगर उनके समर्थक तो ऐसा व्यवहार कर रहे हैं जैसे उनके नेता जी की जीत तो उनकी वज़ह से ही हो चुकी है। ज़रा किसी से उनके नेता की हार के समीकरण बताने लगो तो ऐसे गुर्राने लगते हैं जैसे बटका ही भर लेंगे। पिछले दिनों मैंने ऐसे बड़बोले मूर्खों से ख़ूब मुक़ाबला किया। जिस नेता जी की मैंने हालत पतली बता दी उनके चिल्गोज़े मेरे ऊपर टूट कर पड़ गए। जैसे मेरे लिख देने से ही उनके नेता जी हार जाएंगे। जैसे आठों विधानसभाओं में मैं ही किसी नेता जी को जितवा और दूसरों को हरवा रहा हूँ। असलियत तो यह है कि पत्रकार सिर्फ़ अपनी अक़्ल और नज़रिए का इस्तेमाल करते हैं । उनका आंकलन उनकी निजी बुद्धि पर टिका होता है। ज़रूरी नहीं कि वह जो कह रहे हैं वह ही अंतिम सत्य है। पत्थर की लक़ीर है। तो हमेशा अपने आंकलन को लेकर किसी तरह की ज़िद नहीं रखता। मैं नहीं कहता कि मैं ही कहता हूं। मैं तो कहता हूँ कि मैं भी कहता हूँ। पत्रकारों का काम होता है समय को पढ़ना और पढ़े हुए को प्रस्तुत करना। जो लोग यह सोचते हैं कि पत्रकार ब्रह्मा जी होते हैं । सृष्टि के रचयिता होते हैं। वही नेताओं के भाग्य विधाता होते हैं यह उनकी अल्पबुद्धि का परिचायक ही है। चुनावो को लेकर प्रायः यह होता है कि कोई अपनी निंदा सुनना ही पसंद नहीं करता। जिसको कमज़ोर बता दो लगता है जैसे उसकी पूंछ पर पैर रख दिया हो। इतनी आवाज़ें आती हैं कि लगता है पत्रकार से कोई पाप हो गया हो। जिस नेता को जीतता हुआ बता दो उसके समर्थक सराहना नहीं करेंगे मगर जिसे आप हारा हुआ बता दो उसके समर्थक कपड़े फाड़ने पर उतारू हो जाएंगे। मित्रों! किसी भी सीट पर कितने भी दिग्गज खड़े हों सब तो जीत नहीं सकते। जो जीतेगा सिकन्दर वही होगा। लेकिन परिणाम से पहले टुच्चे नेता भी ख़ुद को सिकन्दर के पिता मान कर चल रहे होते हैं। पिछले दिनों मैंने अजमेर की आठों विधानसभा का आंकलन प्रस्तुत किया।कौन जीतेगा ? कौन हारेगा यह कभी नहीं लिखा। हां नज़दीकी टक्कर किस किस के बीच है यह ज़रूर लिखा। आप ताज़्ज़ुब करेंगे कि यह बात भी लोगों के गले नहीं उतरी। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार सबको है।आपको है तो मुझे भी है। यह तो नहीं हो सकता कि कोई पत्रकार वही लिखे जो आप सुनना चाहते हैं। जब ज़रूरी नहीं कि आप मुझसे सहमत हों तो मैं भी आपसे सहमत होऊं यह भी ज़रूरी नहीं। ऐसे लोग जो मेरी बात से इक़तफ़ाक नहीं रखते उनसे मुझे कोई शिक़ायत नहीं और यदि किसी को मुझसे शिक़ायत हो तो क्षमा याचना करता हूँ। आज फिर आठों विधानसभाओं के लिए लिख रहा हूँ। ब्यावर में सीधी टक्कर मेरे हिसाब से कांग्रेस के पारस पंच और इंदर सिंह बागावास के बीच है। अब यह कहूँगा कि भाजपा के शंकर सिंह रावत तीसरे स्थान पर जा सकते हैं तो कही मित्र बुरा मान जाएंगे अतः मैं लिख रहा हूँ कि शंकर सिंह रावत ही चुनाव जीतेंगे। यह लिखने में भी मेरे क्या फ़र्क़ पड़ता है? केकड़ी में सीधी टक्कर भाजपा और कांग्रेस के बीच है। भाजपा के शत्रुघ्न गौतम कांग्रेस के रघु शर्मा पर भारी पड़ रहे हैं मगर फिर वही सावधानी ! नाराज़ होने वालों के लिए लिख रहा हूँ कि रघु शर्मा 25 हज़ार से जीतेंगे। मसूदा में मेरे हिसाब से आर एल पी के सचिन सांखला मज़बूत स्थिति में हैं। भाजपा के वीरेन्द्र कानावत उनसे सीधी टक्कर में हैं। वाज़िद अली चीता के साथ कुछ मजबूरियां जरूर नज़र आ रही हैं। किशनगढ में निर्दलीय सुरेश टांक सबसे मज़बूत स्थिति में हैं। उनके और कांग्रेस के डॉ विकास चौधरी के बीच टक्कर ज़रूर है मगर जीतना टांक का ही तय है। मेरे इस आंकलन पर यदि किसी को ठेस पहुंची हो तो लिख रहा हूँ कि भाजपा के भागीरथ चौधरी भारी मतों से विजयी होंगे। पुष्कर में भाजपा के सुरेश रावत ही सिकन्दर होंगे मगर यदि कुछ कट्टर समर्थक यह मानते हों कि यह लिख कर मैंने सच का साथ नहीं दिया तो क्षमा के साथ कह देता हूँ कि नसीम अख्तर यह चुनाव जीतने जा रही हैं। अशोक रावत और डॉ बाहेती के चाहने वालों के लिए यह सूचना कि उन दोनों की ज़मानत बच जाएगी। और बेहतर सुनना चाहें तो ये कि टक्कर दोनों के बीच ही है। अजमेर उत्तर से मेरा मानना है कि टक्कर कॉन्ग्रेस के महेन्द्र सिंह रलावता और निर्दलीय उम्मीदवार ज्ञान सारस्वत के बीच हैं। कौन जीत जाए कहा नहीं जा सकता। जो लोग भाजपा के देवनानी जी को जीता हुआ मान रहे हैं उनको शुभकामनाएं। ईश्वर उनको भारी मतों से विजयी बनाए। अजमेर दक्षिण से भाजपा की अनीता भदेल चुनाव जीतने जा रही हैं। यह मेरी निजी राय है मगर आप चाहें तो द्रोपदी बहन को भी जीता हुआ मान सकते हैं। मुझे ख़ुशी होगी। नसीराबाद से वैसे तो भाजपा के रामस्वरूप लाम्बा जीतते दिखाई दे रहे हैं मगर आप चाहें तो शिव प्रकाश को भी जितवा सकते हैं। Pavan Kumar 'Paavan'
8:34 PM
Article Published by : PAVAN KUMAR SHARMA,' PAAVAN &MAAHIR
बुजुर्गों का बचपन मोहन बेटा ! मैं तुम्हारे काका के घर जा रहा हूँ। क्यों पिताजी ? और आप आजकल काका के घर बहुत जा रहे हो ...? तुम्हारा मन मान रहा हो तो चले जाओ ... पिताजी ! लो ये पैसे रख लो, काम आएंगे। पिताजी का मन भर आया . उन्हें आज अपने बेटे को दिए गए संस्कार लौटते नजर आ रहे थे। जब मोहन स्कूल जाता था ... वह पिताजी से जेब खर्च लेने में हमेशा हिचकता था, क्यों कि घर की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं थी। पिताजी मजदूरी करके बड़ी मुश्किल से घर चला पाते थे ... पर माँ फिर भी उसकी जेब में कुछ सिक्के डाल देती थी ... जबकि वह बार-बार मना करता था। मोहन की पत्नी का स्वभाव भी उसके पिताजी की तरफ कुछ खास अच्छा नहीं था। वह रोज पिताजी की आदतों के बारे में कहासुनी करती थी ... उसे ये बडों की टोका टाकी पसन्द नही थी ... बच्चे भी दादा के कमरे में नहीं जाते, मोहन को भी देर से आने के कारण बात करने का समय नहीं मिलता। एक दिन पिताजी का पीछा किया ... आखिर पिताजी को काका के घर जाने की इतनी जल्दी क्यों रहती है ? वह यह देख कर हैरान रह गया कि पिताजी तो काका के घर जाते ही नहीं हैं ! !! वह तो स्टेशन पर एकान्त में शून्य एक पेड़ के सहारे घंटों बैठे रहते थे। तभी पास खड़े एक बजुर्ग, जो यह सब देख रहे थे, उन्होंने कहा ... बेटा...! क्या देख रहे हो ? जी....! वो । अच्छा, तुम उस बूढ़े आदमी को देख रहे हो....? वो यहाँ अक्सर आते हैं और घंटों पेड़ तले बैठ कर सांझ ढले अपने घर लौट जाते हैं . किसी अच्छे सभ्रांत घर के लगते हैं। बेटा ...! ऐसे एक नहीं अनेकों बुजुर्ग माएँ बुजुर्ग पिता तुम्हें यहाँ आसपास मिल जाएंगे ! जी, मगर क्यों ? बेटा ...! जब घर में बड़े बुजुर्गों को प्यार नहीं मिलता.... उन्हें बहुत अकेलापन महसूस होता है, तो वे यहाँ वहाँ बैठ कर अपना समय काटा करते हैं ! वैसे क्या तुम्हें पता है.... बुढ़ापे में इन्सान का मन बिल्कुल बच्चे जैसा हो जाता है । उस समय उन्हें अधिक प्यार और सम्मान की जरूरत पड़ती है , पर परिवार के सदस्य इस बात को समझ नहीं पाते। वो यही समझते हैं कि इन्होंने अपनी जिंदगी जी ली है फिर उन्हें अकेला छोड देते हैं . कहीं साथ ले जाने से कतराते हैं . बात करना तो दूर अक्सर उनकी राय भी उन्हें कड़वी लगती है। जब कि वही बुजुर्ग अपने बच्चों को अपने अनुभवों से आने वाले संकटों और परेशानियों से बचाने के लिए सटीक सलाह देते है। घर लौट कर मोहन ने किसी से कुछ नहीं कहा। जब पिताजी लौटे, मोहन घर के सभी सदस्यों को देखता रहा l किसी को भी पिताजी की चिन्ता नहीं थी।पिताजी से कोई बात नहीं करता, कोई हंसता खेलता नहीं था जैसे पिताजी का घर में कोई अस्तित्व ही न हो ! ऐसे परिवार में पत्नी बच्चे सभी पिताजी को इग्नोर करते हुए दिखे ! सबको राह दिखाने के लिऐ आखिर मोहन ने भी अपनी पत्नी और बच्चों से बोलना बन्द कर दिया ... वो काम पर जाता और वापस आता किसी से कोई बातचीत नही ...! बच्चे पत्नी बोलने की कोशिश भी करते , तो वह भी इग्नोर कर काम मे डूबे रहने का नाटक करता ! !! तीन दिन मे सभी परेशान हो उठे... पत्नी, बच्चे इस उदासी का कारण जानना चाहते थे। मोहन ने अपने परिवार को अपने पास बिठाया। उन्हें प्यार से समझाया कि मैंने तुम से चार दिन बात नहीं की तो तुम कितने परेशान हो गए ? अब सोचो तुम पिताजी के साथ ऐसा व्यवहार करके उन्हें कितना दुख दे रहे हो ? मेरे पिताजी मुझे जान से प्यारे हैं। जैसे तुम्हें तुम्हारी माँ ! और फिर पिताजी के अकेले स्टेशन जाकर घंटों बैठकर रोने की बात बताई। सभी को अपने बुरे व्यवहार का खेद था l उस दिन जैसे ही पिताजी शाम को घर लौटे, तीनों बच्चे उनसे चिपट गए ...! दादा जी ! आज हम आपके पास बैठेंगे...! कोई किस्सा कहानी सुनाओ ना। पिताजी की आँखें भीग आई। वो बच्चों को लिपटकर उन्हें प्यार करने लगे। और फिर जो किस्से कहानियों का दौर शुरू हुआ वो घंटों चला . इस बीच मोहन की पत्नी उनके लिए फल तो कभी चाय नमकीन लेकर आती lपिताजी बच्चों और मोहन के साथ स्वयं भी खाते और बच्चों को भी खिलाते। अब घर का माहौल पूरी तरह बदल गया था ! !! एक दिन मोहन बोला , पिताजी...! क्या बात है ! आजकल काका के घर नहीं जा रहे हो ...? नहीं बेटा ! अब तो अपना घर ही स्वर्ग लगता है ...! !!आज सभी में तो नहीं, लेकिन अधिकांश परिवारों के बुजुर्गों की यही कहानी है . बहुधा आस पास के बगीचों में , बस अड्डे पर , नजदीकी रेल्वे स्टेशन पर परिवार से तिरस्कृत भरे पूरे परिवार में एकाकी जीवन बिताते हुए ऐसे कई बुजुर्ग देखने को मिल जाएंगे I आप भी कभी न कभी अवश्य बूढ़े होंगे l आज नहीं तो कुछ वर्षों बाद होंगे . जीवन का सबसे बड़ा संकट है बुढ़ापा ! घर के बुजुर्ग ऐसे बूढ़े वृक्ष हैं , जो बेशक फल न देते हों पर छाँव तो देते ही हैं !अपना बुढापा खुशहाल बनाने के लिए बुजुर्गों को अकेलापन महसूस न होने दीजिये , उनका सम्मान भले ही न कर पाएँ , पर उन्हें तिरस्कृत मत कीजिये . उनका खयाल रखिये। और ध्यान रखियेगा की आपके बच्चे भी आपसे ही सीखेंगे अब ये आपके ऊपर निर्भर है कि आप उन्हें क्या सिखाना पसन्द करेंगे...I सदैव प्रसन्न रहिये। जो प्राप्त है, पर्याप्त है।। Pavan Kumar 'Paavan'
8:25 PM
Article Published by : PAVAN KUMAR SHARMA,' PAAVAN &MAAHIR
श्रीमद्भगवद्गीता : कर्मक्षेत्रे-रणक्षेत्रे : अध्याय ६ : आत्मसंयम योग : क्रमश : श्लोक १३ : योग के लिए शरीर की स्थिति: समम् कायशिरोग्रीवम् धारयन् अचलम् स्थिर : । सम्प्रेक्ष्य नासिकाग्रम् स्वम् दिश : च अनवलोकयन् ॥१३॥ शरीर, सिर और गर्दन को सीधा अचल स्थापित कर । दिशाओं को न देख कर दृष्टि को नासिका के अग्रभाग पर केन्द्रित करे ॥१३॥ ध्यानयोग : परमात्मा को पाने की राह: श्रीमद्भगवद्गीता में वर्णित ध्यानयोग कोरा हठयोगियों की योग-साधना नहीं है अपितु यह परमात्म-तत्व की ओर ले जाने वाला एक पड़ाव है । गीता का वर्णन कृष्ण-यजुर्वेदीय शाखा के श्वेता- श्वतरोपनिषद् के सन्निकट है।जहाँ वर्णन आता है: त्रिरुन्नतं स्थाप्य समम् शरीरम् ह्रदीन्द्रियाणि मनसा संनिरुध्य ब्रह्मोडुपेन प्रतरेतविद्वान्स्त्रोतांसि सर्वाणि भयावहानि ॥८/अध्याय २॥ विद्वान पुरुष को चाहिए कि वह सिर ,ग्रीवा और वक्षस्थल इन तीनों को सीधा और स्थिर रखे। वह उसी दृढ़ता के साथ संपूर्ण इन्द्रियों को मानसिक पुरुषार्थ कर अन्त:करण मे सन्निविष्ट करे और ॐकार रूप नौका द्वारा संपूर्ण प्रवाहों से पार हो जाए । ऐसे ही स्थान और आसन के बारे मैं : समे शुचौ शर्करावह्निवालुका- विवर्जिते शब्दजलाश्रयादिभि: मनोनुकूले न तु चक्षुपीडने गुहानिवाताश्रयणे प्रयोजयेत् ॥१०/अध्याय २॥ साधक को चाहिए कि वह समतल और पवित्र भूमि, कंकड़, अग्नि तथा बालू से रहित , जल के आश्रय और शब्द आदि की दृष्टि से मन के अनुकूल , नेत्रों को पीड़ा न देने वाले (तीक्ष्ण आतप से रहित) गुहा आदिआश्रय स्थल में मन को ध्यान के निमित्त अभ्यास में लगाए । Paavan Teerth.
8:22 PM
Article Published by : PAVAN KUMAR SHARMA,' PAAVAN &MAAHIR
एक ग़ज़ल- मुझे इस बात का शिकवा बहुत है, हुआ हर काम अब महँगा बहुत है। मिला जो दर्द मुझको इश्क़ में वो, कसकता है, मगर अच्छा बहुत है। ज़रूरत जब पड़ी, वो व्यस्त थे कुछ, मुझे इस बात का सदमा बहुत है। ख़यालों में वो इक चेहरा बसा है, जिसे देखा नहीं, सोचा बहुत है। वो मेरा था, रहेगा बस मेरा ही, किया जिसने हमें रुसवा बहुत है। उसे नफ़रत हुई अब आईने से, दिखा जब भी, लगा झटका बहुत है। 'Maahir'
8:20 PM
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ग़ज़ल- बाँचिए तो सुब्ह का अख़बार है ये ज़िन्दगी, नापिए तो वक़्त की रफ़्तार है ये ज़िन्दगी। ढालते अपनी समझ से हम इसे आकार में, क्या ग़जब का सोचिए किरदार है ये ज़िन्दगी। भाग्यवादी मानते, सब हो रहा है भाग्य से, जागरूकों के लिए दस्तार है ये ज़िन्दगी। दस्तार= सिर की पगड़ी, आत्मसम्मान शक्तिशाली के कई अपराध करती माफ़ ये, निर्बलों के वास्ते तो दार है ये ज़िन्दगी। आपदा में ढूँढते अवसर जो हैं, उनके लिए, कुछ नहीं बस एक कारोबार है ये ज़िन्दगी। जो नहीं तरजीह देते आदमीयत को कभी, दोस्तो उनके लिए धिक्कार है ये ज़िन्दगी। कर रहा मेहनत समझ के वक़्त के हालात, जो मैं कहूँ, उसके लिए गुलजार है ये ज़िन्दगी। किरदार=चरित्र, दार=फाँसी का फंदा, तरजीह= प्राथमिकता, गुलजार=ख़ूबसूरत बगीचा, सुन्दर उपवन 'Maahir'
8:18 PM
Article Published by : PAVAN KUMAR SHARMA,' PAAVAN &MAAHIR
सस्ता माइक्रोस्कोप प्रोटीन मैपिंग को जन-जन तक पहुंचा सकता हैगहराई में अनुभाग में | जीवविज्ञान टीम कम लागत वाले उपकरण के साथ पहली प्रोटीन संरचनाओं का समाधान करती है यूके के शोधकर्ताओं का कहना है कि उनका प्रोटोटाइप क्रायो-इलेक्ट्रॉन माइक्रोस्कोप $500,000 में बनाया और बेचा जा सकता है। फोटो: सीजे रूसो/मेडिकल रिसर्च काउंसिल प्रयोगशाला आण्विक जीवविज्ञान किसी भी संरचनात्मक जीवविज्ञानी से बात करें, और वे आपको बताएंगे कि कैसे एक अच्छी नई पद्धति उनके क्षेत्र पर हावी हो रही है। प्रोटीन को फ्लैश फ्रीजिंग करके और उन पर इलेक्ट्रॉनों की बमबारी करके, क्रायो-इलेक्ट्रॉन माइक्रोस्कोपी (क्रायो-ईएम) निकट-परमाणु रिज़ॉल्यूशन के साथ प्रोटीन आकृतियों को मैप कर सकता है, उनके कार्य के लिए सुराग प्रदान कर सकता है और उन धक्कों और घाटियों को प्रकट कर सकता है जिन्हें दवा डेवलपर्स लक्षित कर सकते हैं। तकनीक कई विन्यासों में टेढ़े-मेढ़े प्रोटीनों को पकड़ सकती है, और यह उन प्रोटीनों को भी पकड़ सकती है जो पारंपरिक एक्स-रे विश्लेषण की सीमा से बाहर हैं क्योंकि वे क्रिस्टलीकृत होने का हठपूर्वक विरोध करते हैं। कई शोधकर्ताओं को उम्मीद है कि क्रायो-ईएम अगले साल हल की गई नई प्रोटीन संरचनाओं की संख्या में एक्स-रे क्रिस्टलोग्राफी को पार कर जाएगा। फिर भी, अपने सभी आकर्षणों के बावजूद, क्रायो-ईएम में खामियां हैं: फ्रीजिंग प्रक्रिया जटिल है, और माइक्रोस्कोप महंगे हैं। हाई-एंड मशीनों को खरीदने में 5 मिलियन डॉलर से अधिक, स्थापित करने में लगभग इतनी ही लागत और संचालन और रखरखाव में प्रति वर्ष सैकड़ों हजारों की लागत आ सकती है। कई अमेरिकी राज्यों और देशों में एक भी क्रायो-ईएम माइक्रोस्कोप नहीं है। ओक्लाहोमा विश्वविद्यालय में संरचनात्मक जीवविज्ञानी राखी राजन कहती हैं, ''अभी जो है और जो नहीं है वही स्थिति है।'' विश्वविद्यालय में फिलहाल एक का अभाव है। मेडिकल रिसर्च काउंसिल की प्रयोगशाला आण्विक जीवविज्ञान (एलएमबी) के शोधकर्ता इस क्षेत्र को लोकतांत्रिक बनाने के लिए काम कर रहे हैं ( विज्ञान , 24 जनवरी 2020, पृष्ठ 354)। आज, नेशनल एकेडमी ऑफ साइंसेज की कार्यवाही में , यूके टीम ने एक प्रोटोटाइप क्रायो-ईएम माइक्रोस्कोप को एक साथ जोड़ने का वर्णन किया है जिसने इसकी पहली संरचनाओं को हल कर लिया है। मशीन - जिसे एलएमबी भौतिक विज्ञानी क्रिस रूसो "फेरारी" के बजाय "सस्ती छोटी हैचबैक" कहते हैं - लागत के दसवें हिस्से के लिए क्षमताओं में उच्च-स्तरीय मशीनों को टक्कर दे सकती है। रूसो का मानना है कि एक निर्माता $500,000 में डिज़ाइन बना और बेच सकता है। चैन जुकरबर्ग इमेजिंग इंस्टीट्यूट के संस्थापक तकनीकी निदेशक ब्रिजेट कैराघेर का कहना है कि यह नए कर्मचारियों के स्टार्टअप पैकेज या अनुसंधान एजेंसियों द्वारा दिए जाने वाले उपकरण अनुदान की पहुंच के भीतर है। वह कहती हैं, ''यह एक अद्भुत मशीन होगी।'' "हर कोई जो संरचनात्मक जीव विज्ञान करना चाहता है वह इसे कर सकता है।" कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) में हालिया प्रगति संरचनात्मक जीव विज्ञान करने का एक और भी सस्ता तरीका प्रदान करती प्रतीत हो सकती है। एआई एल्गोरिदम अपने अमीनो एसिड अनुक्रम से प्रोटीन की संरचना का सटीक अनुमान लगा सकता है। लेकिन क्योंकि एआई को ज्ञात संरचनाओं पर प्रशिक्षित किया जाता है, इसलिए उनकी भविष्यवाणियां कभी-कभी असामान्य प्रोटीन कॉन्फ़िगरेशन के साथ लड़खड़ा जाती हैं, रूसो कहते हैं, और वे अभी भी क्रायो-ईएम के विकल्प नहीं हैं। उच्च-स्तरीय क्रायो-ईएम माइक्रोस्कोप तक पहुंच को बढ़ावा देने के लिए, राष्ट्रीय स्वास्थ्य संस्थान ने तीन राष्ट्रीय केंद्र बनाए हैं जहां गैर-शोधकर्ता नमूने भेज सकते हैं। लेकिन हब-एंड-स्पोक्स प्रणाली समस्याओं के साथ आती है। राजन अक्सर राष्ट्रीय केंद्रों से नतीजों के इंतजार में कई महीने बिता देती है, लेकिन बाद में उसे पता चलता है कि उसके नमूने बेकार थे। हालाँकि वह प्रोटीन को फ़्रीज़ करने में बेहतर हो रही है, राजन का मानना है कि उसके 10% से भी कम नमूनों के नतीजे अच्छे डेटा आए हैं। इसीलिए, भले ही शोधकर्ता एक शीर्ष क्रायो-ईएम माइक्रोस्कोप नहीं खरीद सकते, कई लोग एक स्क्रीनिंग मशीन चाहते हैं जो उच्च रिज़ॉल्यूशन छवियों के लिए राष्ट्रीय केंद्रों को भेजने से पहले कम से कम नमूनों की गुणवत्ता की जांच कर सके। यह रुसो और उनके सहयोगियों के लिए एक प्राथमिक प्रेरणा थी, जिसमें एलएमबी में नोबेल पुरस्कार विजेता रिचर्ड हेंडरसन शामिल थे, जिन्होंने क्रायो-ईएम का नेतृत्व किया था। टीम की प्रमुख अंतर्दृष्टियों में से एक यह थी कि इलेक्ट्रॉन बीम को आमतौर पर उच्च-स्तरीय क्रायो-ईएम माइक्रोस्कोप में उपयोग की जाने वाली ऊर्जा की आवश्यकता नहीं होती है। 100 किलोइलेक्ट्रॉनवोल्ट (केवी) का स्तर - एक तिहाई उच्च - आणविक संरचना को प्रकट करने के लिए पर्याप्त है, और वे चिंगारी को बुझाने के लिए एक विनियमित गैस, सल्फर हेक्साफ्लोराइड की आवश्यकता को समाप्त करके लागत को कम करते हैं। टीम ने लेंस की प्रणाली में सुधार की गुंजाइश भी देखी जो इलेक्ट्रॉनों पर ध्यान केंद्रित करती है और डिटेक्टर जो नमूने की जांच के बाद उन्हें पकड़ लेता है। परिणामी प्रोटोटाइप के साथ, एलएमबी समूह ने 11 विविध प्रोटीनों की संरचना निर्धारित की। एक था आयरन-स्टोरिंग प्रोटीन एपोफेरिटिन, जिसका उपयोग क्रायो-ईएम बेंचमार्क के रूप में किया जाता है। एलएमबी शोधकर्ताओं ने इसे 2.6 एंगस्ट्रॉम पर मैप किया - जो हाइड्रोजन परमाणु के व्यास का 2.6 गुना है। रूसो का कहना है कि यह 1.2 एंगस्ट्रॉम के रिकॉर्ड क्रायो-ईएम रिज़ॉल्यूशन जितना ऊंचा नहीं है, लेकिन परमाणु मॉडल बनाने के लिए काफी अच्छा है। और प्रक्रिया तेज़ थी. क्योंकि माइक्रोस्कोप फ्रीजिंग चरण के रूप में उसी प्रयोगशाला में बैठा था, टीम जल्दी से जांच कर सकती थी कि उसके नमूने काफी अच्छे थे, बजाय किसी उच्च-स्तरीय मशीन से परिणामों के लिए हफ्तों इंतजार करने के। रुसो कहते हैं, "हर एक संरचना एक दिन से भी कम समय में तैयार की गई थी।" टॉप-एंड मशीन बनाने वाली थर्मो फिशर साइंटिफिक का कहना है कि वह पहले से ही क्रायो-ईएम बाजार का विस्तार कर रही है। 2020 में, इसने टुंड्रा नामक कम लागत वाला विकल्प बेचना शुरू किया, जो 100 केवी पर संचालित होता है। कंपनी के क्रायो-ईएम व्यवसाय की प्रमुख उपाध्यक्ष त्रिशा राइस कहती हैं, "ऐसे विश्वविद्यालय हैं जिन्होंने शायद कभी विश्वास नहीं किया था कि वे क्रायो-ईएम के मालिक हो सकते हैं, जिनके पास अब उपकरण हैं।" दरअसल, राजन के विश्वविद्यालय ने 1.5 मिलियन डॉलर में एक ऑर्डर दिया था। रूसो का कहना है कि टुंड्रा सही दिशा में एक कदम है, लेकिन उनकी टीम के नवाचार क्रायो-ईएम को और भी सस्ता बना सकते हैं। उदाहरण के लिए, वे कहते हैं, टुंड्रा शीर्ष-अंत सूक्ष्मदर्शी में उपयोग किए जाने वाले महंगे इलेक्ट्रॉन स्रोत के सरलीकृत संस्करण पर ऊर्जा को वापस डायल करता है, जबकि एलएमबी प्रोटोटाइप पर इलेक्ट्रॉन गन को शुरुआत से 100 केवी के लिए डिज़ाइन किया गया था। लेकिन वह समझते हैं कि उनकी टीम के डिज़ाइन के व्यावसायीकरण के लिए संभावित निर्माताओं द्वारा बड़े निवेश की आवश्यकता होगी। रूसो कहते हैं, ''हम उन सभी से बात कर रहे हैं।'' "लेकिन दिन के अंत में, यह उन पर निर्भर है
8:08 PM
Article Published by : PAVAN KUMAR SHARMA,' PAAVAN &MAAHIR
सर- फूफा किसे कहते हैं। छात्र- जी, फूफा एक रिटायर्ड जीजा होता है, जिसने एक जमाने में जिस घर में शाही पनीर खा रखा हो और उसे सुबह शाम धुली मुंग की दाल खिलाई जाए, उसका फू और फा करना वाजिब है, इसलिए ऐसे शख्स को फूफा कहना उचित है। प्र०: फूफा पर निबन्ध लिखिए। उत्तर: - फूफा बूआ के पति को फूफा कहते हैं। फूफाओं का बड़ा रोना रहता है शादी ब्याह में। किसी शादी में जब भी आप किसी ऐसे अधेड़ शख़्स को देखें जो पुराना, उधड़ती सिलाई वाला सूट पहने, मुँह बनाये, तना-तना सा घूम रहा हो। जिसके आसपास दो-तीन ऊबे हुए से लोग मनुहार की मुद्रा में हों तो बेखटके मान लीजिये कि यही बंदा दूल्हे का फूफा है ! ऐसे मांगलिक अवसर पर यदि फूफा मुँह न फुला ले तो लोग उसके फूफा होने पर ही संदेह करने लगते हैं। अपनी हैसियत जताने का आखिरी मौका होता है यह उसके लिये और कोई भी हिंदुस्तानी फूफा इसे गँवाता नहीं ! फूफा करता कैसे है यह सब ? वह किसी न किसी बात पर अनमना होगा। चिड़चिड़ाएगा। तीखी बयानबाज़ी करेगा। किसी बेतुकी सी बात पर अपनी बेइज़्ज़ती होने की घोषणा करता हुआ किसी ऐसी जानी-पहचानी जगह के लिये निकल लेगा, जहाँ से उसे मनाकर वापस लाया जा सके ! अगला वाजिब सवाल यह है कि फूफा ऐसा करता ही क्यों है ? दरअसल फूफा जो होता है, वह व्यतीत होता हुआ जीजा होता है। वह यह मानने को तैयार नहीं होता है कि उसके अच्छे दिन बीत चुके और उसकी सम्मान की राजगद्दी पर किसी नये छोकरे ने जीजा होकर क़ब्ज़ा जमा लिया है। फूफा, फूफा नहीं होना चाहता। वह जीजा ही बने रहना चाहता है और शादी-ब्याह जैसे नाज़ुक मौके पर उसका मुँह फुलाना, जीजा बने रहने की नाकाम कोशिश भर होती है। फूफा को यह ग़लतफ़हमी होती है कि उसकी नाराज़गी को बहुत गंभीरता से लिया जायेगा। पर अमूमन एेसा होता नहीं। लड़के का बाप उसे बतौर जीजा ढोते-ढोते ऑलरेडी थका हुआ होता है। ऊपर से लड़के के ब्याह के सौ लफड़े। इसलिये वह एकाध बार ख़ुद कोशिश करता है और थक-हारकर अपने इस बुढ़ाते जीजा को अपने किसी नकारे भाईबंद के हवाले कर दूसरे ज़्यादा ज़रूरी कामों में जुट जाता है। बाकी लोग फूफा के ऐंठने को शादी के दूसरे रिवाजों की ही तरह लेते हैं। वे यह मानते हैं कि यह यही सब करने ही आया था और वह अगर यही नहीं करेगा तो क्या करेगा, ज़ाहिर है कि वे भी उसे क़तई तवज्जो नहीं देते। फूफा यदि थोड़ा-बहुत भी समझदार हुआ तो बात को ज़्यादा लम्बा नहीं खींचता। वह माहौल भाँप जाता है। मामला हाथ से निकल जाये, उसके पहले ही मान जाता है। बीबी की तरेरी हुई आँखें उसे समझा देती हैं कि बात को और आगे बढ़ाना ठीक नहीं। लिहाजा, वह बहिष्कार समाप्त कर ब्याह की मुख्य धारा में लौट आता है। हालांकि, वह हँसता-बोलता फिर भी नहीं और तना-तना सा बना रहता है। उसकी एकाध उम्रदराज सालियां और उसकी ख़ुद की बीबी ज़रूर थोड़ी-बहुत उसके आगे-पीछे लगी रहती हैं। पर जल्दी ही वे भी उसे भगवान भरोसे छोड़-छाड़ दूसरों से रिश्तेदारी निभाने में व्यस्त हो जाती हैं। फूफा बहादुर शाह ज़फ़र की गति को प्राप्त होता है। अपना राज हाथ से निकलता देख कुढ़ता है, पर किसी से कुछ कह नहीं पाता। मनमसोस कर रोटी खाता है और दूसरों से बहुत पहले शादी का पंडाल छोड़ खर्राटे लेने अपने कमरे में लौट आता है। फूफा चूँकि और कुछ कर नहीं सकता, इसलिये वह यही करता है। इन हालात को देखते हुए मेरी आप सबसे यह अपील है कि फूफाओं पर हँसिये मत। आप आजीवन जीजा नहीं बने रह सकते। आज नहीं तो कल आपको भी फूफा होकर मार्गदर्शक मंडल का हिस्सा हो ही जाना है। अाज के फूफाओं की आप इज़्ज़त करेंगे, तभी अपने फूफा वाले दिनों में लोगों से आप भी इज़्ज़त पा सकेंगे। एक फूफा की दर्द भरी दास्तान, सभी फुफओ को समर्पित || फुफा पर िबन् समाप्त! Pavan Kumar "Paavan"
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