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स्वतन्त्रता के उद्घोषक : श्री अरविन्द !

स्वतन्त्रता के उद्घोषक:श्री अरविन्द! भारतीय स्वाधीनता संग्राम में श्री अरविन्द का महत्त्वपूर्ण योगदान रहा है।उनका बचपन घोर विदेशी और विधर्मी वातावरण में बीता;पर पूर्वजन्म के संस्कारों के बल पर वे महान आध्यात्मिक पुरुष कहलाये। उनका जन्म 15 अगस्त, 1872 को डा. कृष्णधन घोष के घर में हुआ था।उन दिनों बंगाल का बुद्धिजीवी और सम्पन्न वर्ग ईसाइयत से अत्यधिक प्रभावित था।वे मानते थे कि हिन्दू धर्म पिछड़ेपन का प्रतीक है। भारतीय परम्पराएँ अन्धविश्वासी और कूपमण्डूक बनाती हैं।जबकि ईसाई धर्म विज्ञान पर आधारित है।अंग्रेजी भाषा और राज्य को ऐसे लोग वरदान मानते थे। डा. कृष्णधन घोष भी इन्हीं विचारों के समर्थक थे। वे चाहते थे कि उनके बच्चों पर भारत और भारतीयता का जरा भी प्रभाव न पड़े। वे अंग्रेजी में सोचें,बोलें और लिखें। इसलिए उन्होंने अरविन्द को मात्र सात वर्ष की अवस्था में इंग्लैण्ड भेज दिया। अरविन्द असाधारण प्रतिभा के धनी थे।उन्होंने अपने अध्ययन काल में अंग्रेजों के मस्तिष्क का भी आन्तरिक अध्ययन किया। अंग्रेजों के मन में भारतीयों के प्रति भरी द्वेष भावना देखकर उनके मन में अंग्रेजों के प्रति घृणा उत्पन्न हो गयी। उन्होंने तब ही संकल्प लिया कि मैं अपना जीवन अंग्रेजों के चंगुल से भारत को मुक्त करने में लगाऊँगा। अरविन्द घोष ने क्वीन्स कालिज,कैम्ब्रिज से 1893 में स्नातक परीक्षा उत्तीर्ण की। इस समय तक वे अंग्रेजी,ग्रीक,लैटिन,फ्रेंच आदि 10 भाषाओं के विद्वान् हो गये थे। इससे पूर्व 1890 में उन्होंने सर्वाधिक प्रतिष्ठित आई.सी.एस. परीक्षा उत्तीर्ण कर ली थी। अब उनके लिए पद और प्रतिष्ठा के स्वर्णिम द्वार खुले थे;पर अंग्रेजों की नौकरी करने की इच्छा न होने से उन्होंने घुड़सवारी की परीक्षा नहीं दी। यह जान कर गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर ने उन्हें‘स्वदेश की आत्मा’की संज्ञा दी।इसके बाद वे भारत आ गये। भारत में 1893 से 1906 तक उन्होंने बड़ोदरा(गुजरात)में रहते हुए राजस्व विभाग,सचिवालय और फिर महाविद्यालय में प्राध्यापक और उपप्राचार्य जैसे स्थानों पर काम किया। यहाँ उन्होंने हिन्दी,संस्कृत,बंगला,गुजराती,मराठी भाषाओं के साथ हिन्दू धर्म एवं संस्कृति का गहरा अध्ययन किया;पर उनके मन में तो क्रान्तिकारी मार्ग से देश को स्वतन्त्र कराने की प्रबल इच्छा काम कर रही थी। अतः वे इसके लिए युवकों को तैयार करने लगे। अपने विचार युवकों तक पहुँचाने के लिए वे पत्र-पत्रिकाओं में लेख लिखने लगेे। वन्दे मातरम्,युगान्तर,इन्दु प्रकाश आदि पत्रों में प्रकाशित उनके लेखों ने युवाओं के मन में हलचल मचा दी। इनमें मातृभूमि के लिए सर्वस्व समर्पण की बात कही जाती थी। इन क्रान्तिकारी विचारों से डर कर शासन ने उन्हें अलीपुर बम काण्ड में फँसाकर एक वर्ष का सश्रम कारावास दिया। कारावास में उन्हें स्वामी विवेकानन्द की वाणी सुनायी दी और भगवान् श्रीकृष्ण से साक्षात्कार हुआ। अब उन्होंने अपने कार्य की दिशा बदल ली और 4 अप्रैल, 1910 को पाण्डिचेरी आ गये,यहाँ वे योग साधना,अध्यात्म चिन्तन और लेखन में डूब गये। 1924 में उनकी आध्यात्मिक उत्तराधिकारी श्रीमाँ का वहाँ आगमन हुआ। 24 नवम्बर, 1926 को उन्हें विशेष सिद्धि की प्राप्ति हुई।इससे उनके शरीर का रंग सुनहरा हो गया। श्री अरविन्द ने अनेक ग्रन्थों की रचना की। अध्यात्म साधना में डूबे रहते हुए ही 5 दिसम्बर, 1950 को वे अनन्त प्रकाश में लीन हो गये।

डीएनए: संरचना और प्रतिकृति-एक सिंहावलोकन️

क्रियाएं। डीएनए: संरचना और प्रतिकृति-एक सिंहावलोकन️ डीएनए की संरचना ? एक एंटीपैरल ओरिएंटेशन में दो स्ट्रैंड्स से बना। चीनी-फॉस्फेट रीढ़ के साथ न्यूक्लियोटाइड्स (ए, टी, सी, जी) से निर्मित। स्ट्रैंड्स 5' से 3' छोर तक चलते हैं । विशिष्ट आधार जोड़े (एटी, सीजी) और स्टैक्ड बेस के बीच हाइड्रोफोबिक इंटरैक्शन के बीच हाइड्रोजन बॉन्ड द्वारा स्थिर। प्रतिकृति प्रक्रिया: डीएनए प्रतिकृति अर्धविराम है-प्रत्येक नए डबल हेलिक्स में एक मूल स्ट्रैंड और एक नया संश्लेषित स्ट्रैंड होता है । अनइंडिंग: हेलिकेज़ एसएसबी प्रोटीन द्वारा स्थिर स्ट्रैंड्स को अलग करता है। प्राइमिंग: प्राइमेस प्रतिकृति शुरू करने के लिए एक छोटे आरएनए प्राइमर को संश्लेषित करता है। बढ़ाव: डीएनए पोलीमरेज़ केवल 5'3' दिशा में नए किस्में बनाता है । अग्रणी बनाम लैगिंग स्ट्रैंड: एक स्ट्रैंड को लगातार संश्लेषित किया जाता है;दूसरे को टुकड़ों में संश्लेषित किया जाता है । सुपरकोलिंग राहत: डीएनए टोपोइसोमेरेस कांटे के आगे मरोड़ वाले तनाव (सुपरकोइल) को हटा देता है ।

बाबरी ढाँचा तीनों गुम्बद गिरा दिये (राष्ट्रीय कलंक का परिमार्जन !)

6 दिसम्बर/इतिहास-स्मृति राष्ट्रीय कलंक का परिमार्जन! भारत में विधर्मी आक्रमणकारियों ने बड़ी संख्या में हिन्दू मन्दिरों का विध्वंस किया। स्वतन्त्रता के बाद सरकार ने मुस्लिम वोटों के लालच में ऐसी मस्जिदों,मजारों आदि को बना रहने दिया। इनमें से श्रीराम जन्मभूमि मन्दिर (अयोध्या),श्रीकृष्ण जन्मभूमि (मथुरा)और काशी विश्वनाथ मन्दिर के सीने पर बनी मस्जिदें सदा से हिन्दुओं को उद्वेलित करती रही हैं। इनमें से श्रीराम मन्दिर के लिए विश्व हिन्दू परिषद् ने देशव्यापी आन्दोलन किया,जिससे 6 दिसम्बर, 1992 को वह बाबरी ढाँचा धराशायी हो गया। श्रीराम मन्दिर को बाबर के आदेश से उसके सेनापति मीर बाकी ने 1528 ई. में गिराकर वहाँ एक मस्जिद बना दी। इसके बाद से हिन्दू समाज एक दिन भी चुप नहीं बैठा। वह लगातार इस स्थान को पाने के लिए संघर्ष करता रहा। 23 दिसम्बर, 1949 को हिन्दुओं ने वहाँ रामलला की मूर्ति स्थापित कर पूजन एवं अखण्ड कीर्तन शुरू कर दिया। 'विश्व हिन्दू परिषद्' द्वारा इस विषय को अपने हाथ में लेने से पूर्व तक 76 हमले हिन्दुओं ने किये;जिसमें देश के हर भाग से तीन लाख से अधिक नर नारियों का बलिदान हुआ;पर पूर्ण सफलता उन्हें कभी नहीं मिल पायी। विश्व हिन्दू परिषद ने लोकतान्त्रिक रीति से जनजागृति के लिए श्रीराम जन्मभूमि मुक्ति यज्ञ समिति का गठन कर 1984 में श्री राम-जानकी रथयात्रा निकाली,जो सीतामढ़ी से प्रारम्भ होकर अयोध्या पहुँची। इसके बाद हिन्दू नेताओं ने शासन से कहा कि श्री रामजन्मभूमि मन्दिर पर लगे अवैध ताले को खोला जाए।न्यायालय के आदेश से 1 फरवरी, 1986 को ताला खुल गया। इसके बाद वहाँ भव्य मन्दिर बनाने के लिए 1989 में देश भर से श्रीराम शिलाओं को पूजित कर अयोध्या लाया गया और बड़ी धूमधाम से 9 नवम्बर,1989 को श्रीराम मन्दिर का शिलान्यास कर दिया गया।जनता के दबाव के आगे प्रदेश और केन्द्र शासन को झुकना पड़ा। पर मन्दिर निर्माण तब तक सम्भव नहीं था,जब तक वहाँ खड़ा ढांँचा न हटे। हिन्दू नेताओं ने कहा कि यदि मुसलमानों को इस ढाँचे से मोह है,तो वैज्ञानिक विधि से इसे स्थानान्तरित कर दिया जाए;पर शासन मुस्लिम वोटों के लालच से बँधा था। हर बार न्यायालय की दुहाई देता रहा। विहिप का तर्क था कि आस्था के विषय का निर्णय न्यायालय नहीं कर सकता। शासन की हठधर्मी देखकर हिन्दू समाज ने आन्दोलन और तीव्र कर दिया। इसके अन्तर्गत 1990 में वहाँ कारसेवा का निर्णय किया गया। तब उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह की सरकार थी,उन्होेंने घोषणा कर दी कि बाबरी परिसर में एक परिन्दा तक पर नहीं मार सकता;पर हिन्दू युवकों ने शौर्य दिखाते हुए 29 अक्तूबर को गुम्बदों पर भगवा फहरा दिया। बौखला कर दो नवम्बर को मुलायम सिंह ने गोली चलवा दी,जिसमें कोलकाता के दो सगे भाई राम और शरद कोठारी सहित सैकड़ों कारसेवकों का बलिदान हुआ। इसके बाद प्रदेश में भाजपा की सरकार बनी,एक बार फिर 6 दिसम्बर,1992 को कारसेवा की तिथि निश्चित की गयी। विहिप की योजना तो केन्द्र शासन पर दबाव बनाने की ही थी;पर युवक आक्रोशित हो उठे। उन्होंने वहाँ लगी तार बाड़ के खम्भों से प्रहार कर बाबरी ढाँचे के तीनों गुम्बद गिरा दिये। इसके बाद विधिवत वहाँ श्री रामलला को भी विराजित कर दिया गया। इस प्रकार वह बाबरी कलंक नष्ट हुआ और तुलसी बाबा की यह उक्ति भी प्रमाणित हुई- 'होई है सोई,जो राम रचि राखा।'

नोम चॉम्स्की (आधुनिक भाषाविज्ञान के संस्थापक)

क्या चौमस्की 'गुणाढ्य की गुणसूत्र गाथा' हैं? छद्म रूप में? भाषाविज्ञान के लिए नोम चॉम्स्की का योगदान. नोम चॉम्स्की बीसवीं और इक्कीसवीं शताब्दी के सबसे प्रभावशाली भाषाविदों में से एक हैं और व्यापक रूप से आधुनिक भाषाविज्ञान के संस्थापक माने जाते हैं । उनके विचारों ने एक वर्णनात्मक और व्यवहारवादी दृष्टिकोण से एक संज्ञानात्मक और वैज्ञानिक अनुशासन में स्थानांतरित करके भाषा के अध्ययन में क्रांति ला दी। चॉम्स्की के काम ने न केवल भाषा विज्ञान में,बल्कि मनोविज्ञान,दर्शन और संज्ञानात्मक विज्ञान में भी भाषा को कैसे समझा,अध्ययन और समझाया,बदल दिया । चॉम्स्की के सबसे महत्वपूर्ण योगदानों में से एक- 'जनरेटिव व्याकरण का सिद्धांत' है। उनकी ग्राउंडब्रेकिंग बुक सिंटैक्टिक स्ट्रक्चर्स (1957) में,उन्होंने तर्क दिया कि भाषा केवल नकल और आदत के माध्यम से नहीं सीखी जाती है,जैसा कि व्यवहारवादियों ने दावा किया है,लेकिन मानव मन में आंतरिक नियमों के एक सेट द्वारा उत्पन्न होता है । इस सिद्धांत के अनुसार,व्याकरणिक नियमों का एक सीमित सेट अनंत संख्या में वाक्य उत्पन्न कर सकता है। इस विचार ने पहले के भाषाई मॉडल से एक कट्टरपंथी प्रस्थान को चिह्नित किया और आधुनिक वाक्यात्मक सिद्धांत की नींव रखी । जेनेरिक व्याकरण से निकटता से संबंधित चॉम्स्की की सार्वभौमिक व्याकरण की अवधारणा है । उन्होंने प्रस्तावित किया कि सभी मानव भाषाएं एक सामान्य अंतर्निहित संरचना साझा करती हैं क्योंकि मनुष्य जैविक रूप से भाषा के लिए एक जन्मजात क्षमता से संपन्न होते हैं । सार्वभौमिक व्याकरण में सभी भाषाओं और मापदंडों के लिए सामान्य सिद्धांत होते हैं जो भाषाओं में भिन्न होते हैं। यह सिद्धांत बताता है कि कैसे बच्चे जटिल व्याकरणिक प्रणालियों को तेजी से और सीमित इनपुट के साथ प्राप्त करते हैं! एक समस्या चॉम्स्की के जनरेटिव व्याकरणा सिद्धांत को 'उत्तेजना की गरीबी' के रूप में संदर्भित किया जाता है। ” चॉम्स्की ने क्षमता और प्रदर्शन के बीच महत्वपूर्ण अंतर भी पेश किया। क्षमता एक वक्ता के आदर्श,भाषा के आंतरिक ज्ञान को संदर्भित करती है,जबकि प्रदर्शन वास्तविक स्थितियों में भाषा के वास्तविक उपयोग को संदर्भित करता है,जो स्मृति सीमाओं,विकर्षणों या त्रुटियों से प्रभावित हो सकता है । भाषाई क्षमता पर ध्यान केंद्रित करके,चॉम्स्की ने मानसिक व्याकरण पर जोर दिया जो सतह-स्तरीय भाषण व्यवहार के बजाय भाषा को रेखांकित करता है । एक अन्य प्रमुख योगदान गहरी संरचना और सतह संरचना के बीच का अंतर है। गहरी संरचना अंतर्निहित वाक्यात्मक संबंधों का प्रतिनिधित्व करती है जो अर्थ व्यक्त करते हैं,जबकि सतह संरचना एक वाक्य का वास्तविक बोली जाने वाली या लिखित रूप है । परिवर्तनकारी नियम बताते हैं कि गहरी संरचनाओं को सतह संरचनाओं में कैसे परिवर्तित किया जाता है । हालांकि बाद में चॉम्स्की के अपने सिद्धांतों में संशोधित किया गया,इस अंतर ने वाक्यात्मक विश्लेषण और भाषाई सिद्धांत को गहराई से प्रभावित किया । चॉम्स्की के काम ने व्याकरण के क्रमिक मॉडल का विकास भी किया,जिसमें परिवर्तनकारी-जनरेटिव व्याकरण,सरकार और बाध्यकारी सिद्धांत और न्यूनतम कार्यक्रम शामिल हैं। न्यूनतम कार्यक्रम भाषा को सबसे किफायती और सरल सिद्धांतों के साथ समझाने का प्रयास करता है,यह सुझाव देता है कि भाषाई संरचनाएं ध्वनि और अर्थ की जरूरतों को पूरा करने के लिए बेहतर रूप से डिज़ाइन की गई हैं । यह दृष्टिकोण समकालीन भाषाई अनुसंधान को आकार देना जारी रखता है। भाषाविज्ञान से परे,चॉम्स्की के सिद्धांतों का गहरा प्रभाव पड़ा मनोवैज्ञानिक,संज्ञानात्मक विज्ञान,तथा भाषा का दर्शन। एक मानसिक संकाय के रूप में भाषा पर जोर देकर,उन्होंने संज्ञानात्मक क्रांति शुरू करने में मदद की,मन और सीखने के व्यवहारवादी सिद्धांतों को चुनौती दी । उनके विचारों ने प्रभावित किया कि शोधकर्ता मस्तिष्क,अनुभूति और मानव स्वभाव का अध्ययन कैसे करते हैं । अंत में,भाषा विज्ञान में नोम चॉम्स्की का योगदान एक सहज,नियम-शासित और संज्ञानात्मक प्रणाली के रूप में भाषा के उनके पुनर्गठन में निहित है । जनरेटिव व्याकरण,सार्वभौमिक व्याकरण और उनके विकसित सैद्धांतिक ढांचे के माध्यम से,चॉम्स्की ने भाषाविज्ञान को एक कठोर विज्ञान में बदल दिया । उनका काम भाषाई विचार पर हावी है और यह समझने के लिए आवश्यक है कि मानव भाषा कैसे काम करती है। जै-जै गुणाढ्य, भाषिकी साध्य, गुणसूत्र कथा, महिमा अनंत!

भारतीय वायुसेना के कमांडर इन चीफ सुब्रतो मुखर्जी (EXAMPLE OF UNCERTAINTY OF DEATH)

भारतीये वायुसेना के कमांडर इन चीफ सुब्रतो मुखर्जी सुब्रतो मुखर्जी का जन्म 6 मार्च 1911को एक प्रतिष्ठित बंगाली परिवार में हुआ,उनकी शिक्षा भारत और यूनाइटेड किंगडम दोनों में हुई। वह रॉयल एयर फोर्स में शामिल हुए और बाद में 1933 में भारतीय वायु सेना(आईएएफ)के पहले रंगरूटों में से एक थे।उन्होंने 1933 से 1941 तक नंबर 1 स्क्वाड्रन आईएएफ के साथ उड़ान भरी। उन्होंने उत्तर-पश्चिम सीमांत प्रांत में व्यापक कार्रवाई देखी। इस कार्यकाल के दौरान और प्रेषणों में इसका उल्लेख किया गया था। 1942 में कमांड नंबर 1 स्क्वाड्रन में लौटने से पहले उन्होंने 1941 में स्टाफ कॉलेज,क्वेटा में दाखिला लिया।उड़ान प्रशिक्षण के निदेशक के रूप में वायु मुख्यालय में जाने से पहले उन्होंने 1943 से 1944 तक आरएएफ स्टेशन कोहाट की कमान संभाली। उन्हें 1945 में ओबीई से सम्मानित किया गया था। भारत के विभाजन के बाद,उन्हें रॉयल इंडियन एयर फ़ोर्स का डिप्टी एयर कमांडर नियुक्त किया गया।इंपीरियल डिफेंस कॉलेज में उच्च कमान पाठ्यक्रम पूरा करने के बाद,उन्हें 1954 में भारतीय वायुसेना का कमांडर-इन-चीफ नियुक्त किया गया। उन्होंने भारतीय वायुसेना को एक ऑल-जेट बल में बदलने का निरीक्षण किया। 1955 से,उन्होंने चीफ्स ऑफ स्टाफ कमेटी के अध्यक्ष के रूप में भी कार्य किया । उन्हें कई चीजें पहली बार करने का श्रेय प्राप्त है: 1938 में एक उड़ान की कमान संभालने वाले पहले भारतीय,1939 में एक स्क्वाड्रन की कमान संभालने वाले पहले भारतीय,1943 में एक स्टेशन की कमान संभालने वाले पहले भारतीय और अंत में,सेवा की कमान संभालने वाले पहले भारतीय। नवंबर 1960 में,एयर इंडिया ने टोक्यो,जापान के लिए अपनी सेवा का उद्घाटन किया। मुखर्जी और एयर कमोडोर(बाद में एसीएम )प्रताप चंद्र लाल,इंडियन एयरलाइंस कॉर्पोरेशन के तत्कालीन महाप्रबंधक इस उड़ान में यात्री थे। 8 नवंबर 1960 को टोक्यो में उतरने के बाद,मुखर्जी अपने एक दोस्त,भारतीय नौसेना अधिकारी के साथ एक रेस्तरां में भोजन कर रहे थे। भोजन का एक टुकड़ा उसकी श्वास नली में फंस गया,जिससे उसका दम घुट गया। डॉक्टर को बुलाने से पहले ही मुखर्जी की मृत्यु हो गई। अगले दिन,उनका पार्थिव शरीर पालम हवाई अड्डे,नई दिल्ली ले जाया गया ।

एपिजेनेटिक्स इन एक्शन : द हनीबी स्टोर-

पराजेनेटिक परिवर्तन। मिथाइलेशन एपिजेनेटिक्स इन एक्शन:द हनीबी स्टोरी एपिजेनेटिक्स बताता है कि अंतर्निहित डीएनए अनुक्रम को बदले बिना जीन अभिव्यक्ति कैसे बदल सकती है । एक आकर्षक उदाहरण मधुमक्खियों (एपिस मेलिफेरा) से आता है । रानी और श्रमिक मधुमक्खियां आनुवंशिक रूप से समान हैं,फिर भी वे व्यवहार,शरीर विज्ञान और उपस्थिति में भिन्न हैं। मुख्य अंतर? आहार। रानी मधुमक्खियों को शाही जेली खिलाई जाती है,जबकि श्रमिक मधुमक्खियों को अमृत प्राप्त होता है। रॉयल जेली में ऐसे यौगिक होते हैं जो एंजाइम साइटोसिन मिथाइलट्रांसफेरेज़ को रोकते हैं,जो सामान्य रूप से डीएनए पर साइटोसिन बेस में मिथाइल समूह(–सीएच) जोड़ता है । जब मिथाइलेशन अवरुद्ध होता है,तो कुछ जीन सक्रिय हो जाते हैं,जिससे रानी मधुमक्खी का विकास होता है । वैज्ञानिकों ने भी इस प्रभाव को दोहराया है—शाही जेली जैसी स्थितियों को देखते हुए कार्यकर्ता मधुमक्खियों ने रानी जैसे लक्षण विकसित करना शुरू कर दिया है । यह एपिजेनेटिक्स है: डीएनए मिथाइलेशन या हिस्टोन प्रोटीन में संशोधन जैसे परिवर्तन जो डीएनए अनुक्रम को बदले बिना जीन अभिव्यक्ति को प्रभावित करते हैं । अन्य उदाहरणों में शामिल हैं: हिस्टोन संशोधन (मिथाइल या फॉस्फेट समूह) एक्स-महिला स्तनधारियों में निष्क्रियता,जहां भ्रूण के विकास के दौरान एक एक्स गुणसूत्र बेतरतीब ढंग से बंद हो जाता है । बायोकैमिस्ट्री-एपिजेनेटिक्स-जेनेटिक्स-डीएनए मिथाइलेशन

जीनोम (पिक्सेल)-तीन आयामी संरचन

20 से अधिक वर्षों से,वैज्ञानिकों ने मानव जीनोम के पूर्ण अनुक्रम को जाना है।लेकिन सबसे महत्वपूर्ण प्रश्नों में से एक अनुत्तरित रहा:यह कोड जीवन को नियंत्रित करने के लिए जीवित कोशिकाओं के अंदर शारीरिक रूप से खुद को कैसे व्यवस्थित करता है? उस प्रश्न का अब अभूतपूर्व स्पष्टता के साथ उत्तर दिया गया है। रेडक्लिफ डिपार्टमेंट ऑफ मेडिसिन के भीतर काम करने वाले ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं ने जीनोम की तीन आयामी संरचना का अब तक का सबसे विस्तृत नक्शा तैयार किया है,जो एक ही डीएनए बेस जोड़ी के लिए सभी तरह से हल किया गया है। एमसीसी अल्ट्रा नामक एक नई विकसित विधि का उपयोग करते हुए,टीम सीधे यह देखने में सक्षम थी कि डीएनए नाभिक के अंदर कैसे सिलवटों,छोरों और झुकता है। इससे पता चलता है कि जीन शारीरिक रूप से कैसे उजागर या छिपे हुए हैं,यह निर्धारित करते हुए कि कौन से जीन चालू हैं और कौन से चुप रहते हैं । यह खोज जीव विज्ञान के एक मुख्य सिद्धांत को फिर से परिभाषित करती है। यह सिर्फ आनुवंशिक कोड नहीं है जो मायने रखता है। इस तरह अंतरिक्ष में उस कोड की व्यवस्था की जाती है । प्रत्येक कोशिका के अंदर,लगभग दो मीटर डीएनए को एक मिलीमीटर के दसवें हिस्से से छोटे नाभिक में पैक किया जाता है। डीएनए सपाट नहीं होता है । यह संगठित छोरों और डोमेन बनाता है जो दूर के क्षेत्रों को संपर्क में लाते हैं । ये लूपिंग संरचनाएं नियामक स्विच के रूप में कार्य करती हैं,जिससे कुछ जीनों को दूसरों को निष्क्रिय रखते हुए पढ़ा जा सकता है । अब तक,वैज्ञानिक केवल अपेक्षाकृत कम संकल्प पर इस वास्तुकला का निरीक्षण कर सकते थे। एमसीसी अल्ट्रा एकल अक्षर परिशुद्धता पर इन इंटरैक्शन को कैप्चर करता है,यह बताता है कि डीएनए के गैर-कोडिंग क्षेत्र शारीरिक रूप से जीन से कैसे जुड़ते हैं और विनियमित करते हैं । यह मायने रखता है क्योंकि नब्बे प्रतिशत से अधिक बीमारी से जुड़े आनुवंशिक बदलाव इन नियामक क्षेत्रों के भीतर जीन के बाहर पाए जाते हैं । यह समझकर कि ये स्विच तीन आयामी अंतरिक्ष में कैसे काम करते हैं,शोधकर्ता कैंसर,हृदय रोग और ऑटोइम्यून विकारों के अध्ययन के साथ-साथ नए चिकित्सीय लक्ष्यों की पहचान करने के लिए नए उपकरण प्राप्त करते हैं । अध्ययन में एक नए मॉडल का भी परिचय दिया गया है जिसमें सुझाव दिया गया है कि विद्युत चुम्बकीय बल जीन गतिविधि के स्थानीय द्वीपों में लूपिंग डीएनए के आकार समूहों में मदद कर सकते हैं,जो जीन जीनोम के भीतर एक साथ व्यक्त किए जाते हैं । पहली बार,जीनोम की वास्तुकला अब सैद्धांतिक या अनुमानित नहीं है।यह दिख रहा है । यह काम एक प्रमुख मोड़ है कि हम आनुवंशिकी,बीमारी और जीवन के भौतिक यांत्रिकी को कैसे समझते हैं । वैज्ञानिकों ने अभूतपूर्व विस्तार से जीनोम की संरचना पर कब्जा कर लिया! ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय,2025 क्रेडिट रेडक्लिफ(मेडिसिन विभाग)

महाराजा रणजीत सिंह

महाराजा रणजीत सिंह महाराजा रणजीत सिंह शेर-ए पंजाब के नाम से प्रसिद्ध हैं। महाराजा रणजीत एक ऐसी व्यक्ति थे,जिन्होंने न केवल पंजाब को एक सशक्त सूबे के रूप में एकजुट रखा,बल्कि अपने जीते-जी अंग्रेजों को अपने साम्राज्य के पास भी नहीं फटकने दिया। महाराजा रणजीत सिंह का जन्म: 13 नवंबर 1780, गुजरांवाला, (वर्तमान पाकिस्तान) में हुआ था l बात सन् 1812 की है। पंजाब पर महाराजा रणजीत सिंह का एकछत्र राज्य था। उस समय महाराजा रणजीत सिंह ने कश्मीर के सूबेदार अतामोहम्मद के शिकंजे से कश्मीर को मुक्त कराने का अभियान शुरू किया था। इस अभियान से भयभीत होकर अतामोहम्मद कश्मीर छोड़कर भाग गया।कश्मीर अभियान के पीछे एक अन्य कारण भी था,अतामोहम्मद ने महमूद शाह द्वारा पराजित शाहशुजा को शेरगढ़ के किले में कैद कर रखा था। उसे कैदखाने से मुक्त कराने के लिए उसकी बेगम वफा बेगम ने लाहौर आकर महाराजा रणजीत सिंह से प्रार्थना की और कहा कि मेहरबानी कर आप मेरे पति को अतामोहम्मद की कैद से रिहा करवा दें,इस अहसान के बदले बेशकीमती कोहिनूर हीरा आपको भेंट कर दूंगी। शाहशुजा के कैद हो जाने के बाद वफा बेगम ही उन दिनों अफगानिस्तान की शासिका थी। इसी कोहिनूर को हड़पने के लालच में भारत पर आक्रमण करने वाले अहमद शाह अब्दाली के पौत्र जमान शाह को स्वयं उसी के भाई महमूद शाह ने कैदखाने में भयंकर यातनाएं देकर उसकी आंखें निकलवा ली थीं। जमान शाह अहमद शाह अब्दाली के बेटे तैमूर शाह का बेटा था,जिसका भाई था महमूद शाह। अस्तु,महाराजा रणजीति सिंह स्वयं चाहते थे कि वे कश्मीर को अतामोहम्मद से मुक्त करवाएं।अत: सुयोग आने पर महाराजा रणजीत सिंह ने कश्मीर को आजाद करा लिया। उनके दीवान मोहकमचंद ने शेरगढ़ के किले को घेर कर वफा बेगम के पति शाहशुजा को रिहा कर वफा बेगम के पास लाहौर पहुंचा दिया। राजकुमार खड्गसिंह ने उन्हें मुबारक हवेली में ठहराया।पर वफा बेगम अपने वादे के अनुसार कोहिनूर हीरा महाराजा रणजीत सिंह को भेंट करने में विलम्ब करती रही,यहां तक कि कई महीने बीत गए। जब महाराजा ने शाहशुजा से कोहिनूर हीरे के बारे में पूछा तो वह और उसकी बेगम दोनों ही बहाने बनाने लगे।जब ज्यादा जोर दिया गया तो उन्होंने एक नकली हीरा महाराजा रणजीत सिंह को सौंप दिया,जो जौहरियों के परीक्षण की कसौटी पर नकली साबित हुआ। रणजीत सिंह क्रोध से भर उठे और मुबारक हवेली घेर ली गई,दो दिन तक वहां खाना नहीं दिया गया।वर्ष 1813 की पहली जून थी जब महाराजा रणजीत सिंह शाहशुजा के पास आए और फिर कोहिनूर के विषय में पूछा।धूर्त शाहशुजा ने कोहिनूर अपनी पगड़ी में छिपा रखा था। किसी तरह महाराजा को इसका पता चल गया,अत:उन्होंने शाहशुजा को काबुल की राजगद्दी दिलाने के लिए'गुरुग्रंथ साहब'पर हाथ रखकर प्रतिज्ञा की,फिर उसे'पगड़ी-बदल भाई'बनाने के लिए उससे पगड़ी बदल कर कोहिनूर प्राप्त कर लिया। पर्दे की ओट में बैठी वफा बेगम महाराजा की चतुराई समझ गईं।अब कोहिनूर महाराजा रणजीत सिंह के पास पहुंच गया था और वे संतुष्ट थे कि उन्होंने कश्मीर को आजाद करा लिया था।उनकी इच्छा थी कि वे कोहिनूर हीरे को जगन्नाथपुरी के मंदिर में प्रतिष्ठित भगवान जगन्नाथ को अर्पित करें। हिन्दू मंदिरों को मनों सोना भेंट करने के लिए वे प्रसिद्ध थे।काशी के विश्वनाथ मंदिर में भी उन्होंने अकूत सोना अर्पित किया था।परन्तु जगन्नाथ भगवान (पुरी)तक पहुंचने की उनकी इच्छा कोषाध्यक्ष बेलीराम की कुनीति के कारण पूरी न हो सकी। महाराजा रणजीतसिंह अस्वस्थ हो रहे थे। 1838 में लकवा का आक्रमण हुआ,यद्यपि उपचार किया गया और अंग्रेज डाक्टरों ने भी इलाज किया,लेकिन 27 जून 1839 ई. को उनका प्राणांत हो गया।

Ghazal-206

क्यों खयालों में कोई एक ख्याल अच्छा है जो ग़ज़ल बन पड़े तो ही मेरा हाल अच्छा है//1 मैं किसी हुस्न परी के ही तलब मैं हूँ जिंदा कोई हासिल तो हो जिसका की ज़माल अच्छा है//2 तू बिछड़ता तो भी ये कारवाँ चलता रहता तेरे होने नही होने से तो मेरा ये मलाल अच्छा है//3 कतरा कतरा लहू जलता गया अंदर से मेरे और वो सोचता है खूँ में उबाल अच्छा है//4 जब तरन्नुम में नही आता सलीका पढ़ने का फिर तो पढ़ने का तहत में ही कमाल अच्छा है//5 शायरी करना अदब मैं खरा व्यापार है मेरा कोई तो देखे की इस बनिए का माल अच्छा है//6 बोसा इक गाल पे देकर मैं यहीं सोचता हूँ दूसरी और का शायद तेरा गाल अच्छा है//7 एक ही बात पे मैंने दे दी जागीर मेरी कैसा भी है वो मगर उसका जमाल अच्छा है//8 क्यों मेरा तुझसे भी मिलना नही मुमकिन अब तक कुछ है अफ़सोस मगर मेरा ये हाल अच्छा है//9 'Maahir'

खानअब्दुल गफ्फार खाँ (सीमान्त गांधी)

24 दिसम्बर/जन्म-दिवस भारत रत्न सीमान्त गांधी आज जैसा कटा-फटा भारत हमें दिखाई देता है,किसी समय वह ऐसा नहीं था। तब हिमालय के नीचे का सारा भाग भारत ही कहलाता था;पर मुस्लिम आक्रमण और धर्मान्तरण के कारण इनमें से पूर्व और पश्चिम के अनेक भाग भारत से कट गये। अफगानिस्तान से लगे ऐसे ही एक भाग पख्तूनिस्तान के उतमानजई गाँव में 24 दिसम्बर, 1880 को अब्दुल गफ्फार खाँ का जन्म हुआ।उन दिनों इसे भारत का नार्थ वेस्ट या फ्रण्टियर क्षेत्र कहा जाता था। इस क्षेत्र के लोग स्वभाव से विद्रोही एवं लड़ाकू थे।अंग्रेज शासकों ने इन्हें बर्बर और अपराधी कहकर यहाँ‘फ्रंटियर क्राइम्स रेगुलेशन ऐक्ट’लगा दिया और इसके अन्तर्गत यहाँ के निवासियों का दमन किया। अब्दुल गफ्फार खाँ का मत था कि शिक्षा के अभाव में यह क्षेत्र पिछड़ा है और लोग मजबूरी में अपराधी बन रहे हैं। इसलिए 17 वर्ष की अवस्था में इन्होंने मौलवी अब्दुल अजीज के साथ मिलकर अपने गाँव में एक विद्यालय स्थापित किया,जहाँ उनकी मातृभाषा में ही शिक्षा दी जाती थी। थोड़े समय में ही इनके विद्यालय की ख्याति हो गयी।इससे प्रेरित होकर और लोगों ने भी ऐसे ही मदरसे खोले। 1921 में इन्होंने अंजुमन इस्लाह अल् अफशाना आजाद हाईस्कूल की स्थापना की।इस प्रकार इनकी छवि शिक्षा के माध्यम से समाज सेवा करने वाले व्यक्ति की बन गयी। हाईस्कूल करने के बाद ये अलीगढ़ आ गये,जहाँ इनकी भेंट अनेक स्वतन्त्रता सेनानियों से हुई।वहाँ ये गांधी जी के विचारों से अत्यधिक प्रभावित हुए। पेशावर की खिलाफत समिति के अध्यक्ष पद पर रहकर इन्होंने सीमा प्रान्त में शिक्षा का पर्याप्त विस्तार किया। इसके बाद ये सेना में भर्ती हो गये।एक बार ये अपने एक सैनिक मित्र के साथ अंग्रेज अधिकारी से मिलने गये। वहाँ एक छोटी सी भूल पर इनके मित्र को उस अधिकारी ने बहुत डाँटा।अब्दुल गफ्फार खां के मन को इससे भारी चोट लगी और इन्होंने सेना छोड़ दी। अब इन्होंने एक संस्था‘खुदाई खिदमतगार’तथा उसके अन्तर्गत‘लाल कुर्ती वालंटियर फोर्स’बनाई। इसके सदस्य लाल रंग के कुर्ते पहनते थे। खान अब्दुल गफ्फार खाँ ने सदा अहिंसात्मक तरीके से अंग्रेजों का विरोध किया। प्रतिबन्ध के बावजूद ये जनसभाओं का नेतृत्व करते रहे।इस कारण इन्हें कई बार जेल जाना पड़ा। एक बार जब इन्हें पकड़कर न्यायालय में प्रस्तुत किया गया,तो न्यायाधीश ने व्यंग्य से पूछा-क्या तुम पठानों के बादशाह हो? तब से ये‘बादशाह खान’के नाम से प्रसिद्ध हो गये।गांधीवादी रीति के समर्थक होने के कारण इन्हें ‘सीमान्त गांधी’ भी कहा जाता है। इन्होंने 1942 में‘भारत छोड़ो आन्दोलन’में उत्साहपूर्वक भाग लिया और जेल गये। विभाजन की चर्चा होने पर इन्हें बहुत कष्ट होता था।पाकिस्तान कैसा मजहबी,असहिष्णु और अलोकतान्त्रिक देश होगा,इसकी इन्हें कल्पना थी। इसलिए ये बार-बार कांग्रेस के नेताओं और अंग्रेजों से प्रार्थना करते थे उन्हें भूखे पाकिस्तानी भेड़ियों के सामने न फेंके। उनके क्षेत्र को या तो भारत में रखें या फिर स्वतन्त्र देश बना दें;पर यह इच्छा पूरी नहीं हो सकी।15 अगस्त, 1947 को पख्तूनिस्तान पाकिस्तान का अंग बन गया। बादशाह खान भारत में भी अत्यधिक लोकप्रिय थे।शासन ने 1987 में उन्हें‘भारत रत्न’देकर सम्मानित किया। 20 जनवरी, 1988 को 98 वर्ष की आयु में भारत के इस घनिष्ठ मित्र का देहान्त हुआ।

"उर्मिला निद्रा"

उर्मिला के विषय में उसकी निद्रा बड़ी प्रसिद्ध है जिसे "उर्मिला निद्रा" कहा जाता है। अपने 14 वर्ष के वनवास में लक्ष्मण एक रात्रि के लिए भी नहीं सोये, जब निद्रा देवी ने उनकी आँखों में प्रवेश किया तो उन्होंने निद्रा को अपने बाणों से बींध दिया, जब निद्रा देवी ने कहा कि उन्हें अपने हिस्से की निद्रा किसी और को देनी होगी तब लक्ष्मण ने अपनी निद्रा उर्मिला को दे दी। इसीलिए कहते हैं कि लक्ष्मण वन में 14 वर्षों तक जागते रहे और उर्मिला अयोध्या में 14 वर्षों तक सोती रही। भारत में आज भी कुम्भकर्ण निद्रा के साथ-साथ उर्मिला निद्रा का भी जिक्र उन लोगों के लिए किया जाता है जिसे आसानी से जगाया ना सके। ये इसलिए भी जरुरी था कि रावण के पुत्र मेघनाद को ये वरदान प्राप्त था कि उसे केवल वही मार सकता है जो 14 वर्षों तक सोया ना हो! यही कारण था जब श्रीराम का राज्याभिषेक हो रहा था तो अपने वचन के अनुसार निद्रा देवी ने लक्ष्मण को घेरा और उनके हाथ से छत्र छूट गया, इसी कारण वे सो गए और राम का राज्याभिषेक नहीं देख पाए, उनके स्थान पर उर्मिला ने राज्याभिषेक देखा। एक तरह से कहा जाये तो मेघनाद के वध में उर्मिला का भी उतना ही योगदान है जितना कि लक्ष्मण का, जब लक्ष्मण के हाँथों मेघनाद की मृत्यु हो गयी तो उसकी पत्नी सुलोचना वहाँ आती है और क्रोध पूर्वक लक्ष्मण से कहती है "हे महारथी! तुम इस भुलावे में मत रहना कि मेरे पति का वध तुमने किया है, ये तो दो सतियों के अपने भाग्य का परिणाम है, यहाँ पर सुलोचना ने दूसरे सती के रूप में उर्मिला का ही सन्दर्भ दिया है। यहाँ एक प्रश्न और आता है कि अगर उर्मिला 14 वर्षों तक सोती रही तो उसने अपने पति के आदेशानुसार अपने कटुम्ब का ध्यान कब रखा, इसका जवाब हमें रामायण में ही मिलता है कि उर्मिला को ये वरदान था कि वो एक साथ तीन-तीन जगह उपस्थित हो सकती थी और तीन अलग-अलग कार्य कर सकती थी और उनका ही एक रूप 14 वर्षों तक सोता रहा। वाकई उर्मिला के विरह और त्याग को जितना समझा जाये उतना कम है, शायद इसीलिये सीता ने एक बार कहा था, "हजार सीता मिलकर भी उर्मिला के त्याग की बराबरी नहीं कर सकती"।

कर्मक्षेत्रे-रणक्षेत्रे -

क्षत्रिय के लिए है धर्मयुद्ध : अपने आप आ प्राप्त हुआ यह युद्ध मानो स्वर्ग का ही द्वार है आ खुला । इस प्रकार का यह युद्ध अवसर पार्थ ! भाग्यशाली क्षत्रिय लोग ही पाते कभी ॥३२/अध्याय २ ॥ श्लोक में आये कुछ शब्दों का विचार : यदृच्छया उपपन्नम् : अर्थात अपने आप आ उपस्थित हुए । पांडवों ने युद्ध नहीं चाहा था लेकिन दुर्योधन के उनके नीतियुक्त अधिकार- उनके राज्य को न लौटाने के कारण ,युद्ध की नौबत आई । युद्ध में परिवार के लोगों की हत्या का कारण काल की गति है, इसलिए वह शोक करने के योग्य नहीं है । सुखिन : - भाग्यवान अपने कर्तव्य का पालन करने में जो सुख है वह सांसारिक भोगों को भोगने में नहीं है । जिनको कर्तव्य-पालन का अवसर प्राप्त हुआ है ,उनको बड़ा भाग्यशाली समझना चाहिए । कर्मक्षेत्रे-रणक्षेत्रे

अष्टावक्र संहिता ; अध्याय XVIII : शान्ति

अष्टावक्र संहिता ; अध्याय XVIII : शान्ति अष्टावक्र उवाच : यस्य बोधोदये तावत् स्वप्नवत् भवति भ्रम : तस्मै सुखैकरूपाय नम : शान्ताय तेजसे ॥१॥ अष्टावक्र ने कहा : जिसके बोध होने पर भ्रम मिंट जाता स्वप्न की भाँति । उस सुख-स्वरूप शान्त तेजपुँज को मेरा नमन अनेक बार ॥१॥ अर्जयित्वा अखिलान् अर्थान् भोगान् आप्नोति पुष्कलान् । न हि सर्व परित्यागमन्तरेण सुखी भवेत ॥२॥ अर्जित कर भरपूर संपति सुख के अनेकों भोग भोग परन्तु सुख पाता है नर तभी जब अन्तर्मन से त्यागता सभी ॥२॥ कर्तव्यदु:खमार्तन्ड : ज्वालादग्धान् अन्तरात्मन : । कुत : प्रशमपीयूष- धारासारमृते सुखम् ॥३॥ कर्तव्य-दु:खों के प्रखर ताप की ज्वाला से दग्ध अन्तर्मन । तब तक शान्ति पाता नहीं जब तक पीयूष अमृत की धार से नहाता नहीं ॥३॥

AURAT KA AASHKAAR

महिलाओं से ही घर है समाज है। मगर ताना एक ही है यह कि पुरूष प्रधान समाज है। परिवार के सभी कार्य स्त्री की सहमति से मगर आरोप "करेंगे तो अपने मन की"। पुरूष भी दिन रात मेहनत करें तो यह उसकी जिम्मेदारी और औरत काम करेगी तो कहेगी "नौकरानी बना दिया"। स्त्री के पास अपने पैसे होते हैं और होता है स्त्री धन और पुरुष सब कमाकर भी उसका अपना कुछ नहीं। क्योंकि वह समझता है पैसे पर पहला हक परिवार का है। विडम्बना यह कि पुरुष अत्याचारी होता है, भले ही वह भूखा रहकर रात दिन मेहनत करें, धूप में बोझा उठाये या रात दिन व्यापार में व्यस्त रहे। बात महिला समानता की जो अग्रणीय है उसको किससे समानता चाहिए? पूजा पाठ शादी विवाह बिना पत्नी की इच्छा और सहयोग कभी नहीं सम्भव घर पर अधिकार माँ का,पत्नी का और बेटी का। विचार संघर्ष माँ पत्नी बहु बेटी का आखिर पुरुष कहाँ है इस सबमें? कालांतर से वर्तमान तक महिलायें आगे बढ़ी नये कीर्तिमान गढ़ी परन्तु कितनी महिलाओं ने श्रेय दिया पिता पति भाई या पुरुष मित्र को मगर कहा जाता है सफल व्यक्ति के पीछे महिला का योगदान। अगर महिला बात करती है समानता की शायद छोड़ना पड़ जाए वह बहुत कुछ जो उसे मिलता है समानता के अधिकारों से अधिक महिला होने के कारण और शायद तब यही कहा जायेगा पुरूष अत्याचारी अहंकारी हैं।

Transfer RNA (tRNA)

Transfer RNA (tRNA) is a crucial molecule in protein synthesis, characterized by its cloverleaf structure and function as an adapter that translates mRNA codons into amino acids. Structure of tRNA Primary Structure: tRNA is a single strand of ribonucleotides, typically consisting of 70-90 nucleotides. It contains modified bases that contribute to its stability and function. The primary structure includes several key regions: Acceptor Arm: This end of the tRNA molecule has a CCA sequence at the 3' end, where the corresponding amino acid attaches. Anticodon Arm: Contains the anticodon, a sequence of three nucleotides that pairs with the complementary codon on mRNA during translation. D Arm and TΨC Arm: These regions contain specific modified bases that help in the recognition and binding of tRNA to the ribosome and mRNA. Secondary Structure: The tRNA molecule folds into a cloverleaf shape due to intramolecular base pairing. This structure includes four arms: the acceptor arm, D arm, TΨC arm, and anticodon arm, which are stabilized by hydrogen bonds between complementary bases. Tertiary Structure: The cloverleaf structure further folds into a compact "L" shape, which is essential for its function in the ribosome during protein synthesis. Function of tRNA Amino Acid Transport: tRNA serves as a carrier for specific amino acids, bringing them to the ribosome based on the sequence of codons in the mRNA. Each tRNA molecule is specific to one amino acid, ensuring that proteins are synthesized accurately. Codon-Anticodon Pairing: The anticodon on tRNA pairs with the corresponding codon on mRNA in an antiparallel manner, which is crucial for the correct translation of the genetic code into a polypeptide chain. Peptide Bond Formation: During translation, the ribosome facilitates the formation of peptide bonds between the amino acids brought by tRNA, linking them together to form a growing protein chain. Role in Translation: tRNA moves through the ribosome's A (aminoacyl), P (peptidyl), and E (exit) sites, playing a vital role in the elongation of the polypeptide chain until the entire protein is synthesized. In summary, tRNA is an essential component of the protein synthesis machinery, with a unique structure that allows it to function effectively in translating the genetic code into functional proteins. Its ability to carry amino acids and pair with mRNA codons ensures the accuracy and efficiency of protein synthesis.

AURAT KA AASHKAR

स्त्री कभी संतुष्ट नहीं होती! स्त्री से प्रेम में अगर आप ये उम्मीद करते हैं कि वो आपसे पूरी तरह खुश है तो आप नादानी में हैं! ये स्त्री के मूल में ही नहीं है! अगर आप बहुत ज्यादा केयर करते है तो उससे भी ऊब जाएगी, अगर आप बहुत उग्र हैं तो वो उससे भी बिदक जाएगी, अगर आप बहुत ज्यादा विनम्र हैं तो वो उससे भी चिढ जाएगी, अगर आप उससे बहुत ज्यादा बात करते हैं तो वो आपको टेक इट फौर ग्रांटड लेने लगेगी, अगर आप उससे बहुत कम बात करते हैं तो वो मान लेगी कि आपका चक्कर कहीं और चल रहा है! यानी आप कुछ भी कर लीजिए वो संतुष्ट नहीं हो सकती, ये उसका स्वभाव है वो एक ऐसा डेडली काॅम्बीनेशन खोजती है जो बना ही न हो बन ही न सकता हो! ठीक वैसे ही जैसे कपड़ा खरीदने जाती है तो कहती कि इसी कलर में कोई दूसरा डिजाइन दिखाओ,इसी डिजाइन में कोई दूसरा कलर दिखाओ कपड़े का गट्ठर लगा देती है! बहुत परिश्रम के बाद एक पसंद आ भी गया, तो भी संतुष्ट नहीं हो सकती! आखिरी तक सोचती है कि इसमे ये डिजाइन ऐसे होता तो परफैक्ट होता! इन सबके बावजूद एक बहुत बड़ी खूबी भी है स्त्री के अंदर, एक बार उसे कुछ पसंद आ गया तो उसे आखिरी दम तक सजो के रखती है वो चाहे रिश्ते हो या चूड़ी! रंग उतर जाएगा चमक खत्म हो जाएगी पर खुद से जुदा नहीं करेगी, बस यही खूबी स्त्री को विशिष्ट बनाती है! स्त्री से प्रेम में अगर आप ये उम्मीद करते हैं कि वो आपसे पूरी तरह खुश है तो आप नादानी में हैं, ये स्त्री के मूल में ही नहीं है!

वीर तुम अड़े रहो,रजाई में पड़े रहो!

रजाईधारी सिंह'दिनभर'की अमिट छाप! वीर तुम अड़े रहो,रजाई में पड़े रहो! ठंड है भाई ठंड है,यह बड़ी प्रचंड है, कक्ष शीत से भरा,है बर्फ से ढकी धरा, यत्न कर संभाल लो,ये समय निकाल लो, वीर तुम अड़े रहो,रजाई में पड़े रहो। चाय का मजा रहे,पकोड़ा दल सजा रहे, मुंह कभी थके नहीं,रजाई भी हटे नहीं, लाख मिन्नतें करे,स्नान से बचे रहो, वीर तुम अड़े रहो,रजाई में पड़े रहो! एक प्रण किए हुए,है कंबलों को लिए, तुम निडर डटो वहीं,पलंग से हटो नहीं, मम्मी की लताड़ हो,या डैडी की दहाड़ हो, वीर तुम अड़े रहो,रजाई में पड़े रहो! शब्दों के बाण से,या बेलनों की मार से, पत्नी जी भड़क उठे,या चप्पलें खड़क उठे, लानतें हज़ार हों,धमकियां या प्यार हो, वीर तुम अड़े रहो,रजाई में पड़े रहो! बधिर बन सुनो नहीं,कर्म से डिगो नहीं, प्रातः हो कि रात हो,संग हो न साथ हो, पलंग पर पड़े रहो,तुम वहीं डटे रहो, वीर तुम अड़े रहो,रजाई में पड़े रहो! रजाईधारी सिंह 'दिनभर'

6 दिसम्बर/इतिहास-स्मृति श्रीराम जन्मभूमि मन्दिर

6 दिसम्बर/इतिहास-स्मृति राष्ट्रीय कलंक का परिमार्जन! भारत में विधर्मी आक्रमणकारियों ने बड़ी संख्या में हिन्दू मन्दिरों का विध्वंस किया। स्वतन्त्रता के बाद सरकार ने मुस्लिम वोटों के लालच में ऐसी मस्जिदों, मजारों आदि को बना रहने दिया। इनमें से श्रीराम जन्मभूमि मन्दिर (अयोध्या), श्रीकृष्ण जन्मभूमि (मथुरा) और काशी विश्वनाथ मन्दिर के सीने पर बनी मस्जिदें सदा से हिन्दुओं को उद्वेलित करती रही हैं। इनमें से श्रीराम मन्दिर के लिए विश्व हिन्दू परिषद् ने देशव्यापी आन्दोलन किया, जिससे 6 दिसम्बर, 1992 को वह बाबरी ढाँचा धराशायी हो गया। श्रीराम मन्दिर को बाबर के आदेश से उसके सेनापति मीर बाकी ने 1528 ई. में गिराकर वहाँ एक मस्जिद बना दी। इसके बाद से हिन्दू समाज एक दिन भी चुप नहीं बैठा। वह लगातार इस स्थान को पाने के लिए संघर्ष करता रहा। 23 दिसम्बर, 1949 को हिन्दुओं ने वहाँ रामलला की मूर्ति स्थापित कर पूजन एवं अखण्ड कीर्तन शुरू कर दिया। 'विश्व हिन्दू परिषद्' द्वारा इस विषय को अपने हाथ में लेने से पूर्व तक 76 हमले हिन्दुओं ने किये; जिसमें देश के हर भाग से तीन लाख से अधिक नर नारियों का बलिदान हुआ; पर पूर्ण सफलता उन्हें कभी नहीं मिल पायी। विश्व हिन्दू परिषद ने लोकतान्त्रिक रीति से जनजागृति के लिए श्रीराम जन्मभूमि मुक्ति यज्ञ समिति का गठन कर 1984 में श्री रामजानकी रथयात्रा निकाली! जो सीतामढ़ी से प्रारम्भ होकर अयोध्या पहुँची। इसके बाद हिन्दू नेताओं ने शासन से कहा कि श्री रामजन्मभूमि मन्दिर पर लगे अवैध ताले को खोला जाए। न्यायालय के आदेश से 1 फरवरी, 1986 को ताला खुल गया। इसके बाद वहाँ भव्य मन्दिर बनाने के लिए 1989 में देश भर से श्रीराम शिलाओं को पूजित कर अयोध्या लाया गया और बड़ी धूमधाम से 9 नवम्बर, 1989 को श्रीराम मन्दिर का शिलान्यास कर दिया गया। जनता के दबाव के आगे प्रदेश और केन्द्र शासन को झुकना पड़ा। पर मन्दिर निर्माण तब तक सम्भव नहीं था, जब तक वहाँ खड़ा ढांँचा न हटे। हिन्दू नेताओं ने कहा कि यदि मुसलमानों को इस ढाँचे से मोह है, तो वैज्ञानिक विधि से इसे स्थानान्तरित कर दिया जाए; पर शासन मुस्लिम वोटों के लालच से बँधा था। वह हर बार न्यायालय की दुहाई देता रहा। विहिप का तर्क था कि आस्था के विषय का निर्णय न्यायालय नहीं कर सकता। शासन की हठधर्मी देखकर हिन्दू समाज ने आन्दोलन और तीव्र कर दिया। इसके अन्तर्गत 1990 में वहाँ कारसेवा का निर्णय किया गया,तब उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह की सरकार थी। उन्होेंने घोषणा कर दी कि बाबरी परिसर में एक परिन्दा तक पर नहीं मार सकता; पर हिन्दू युवकों ने शौर्य दिखाते हुए 29 अक्तूबर को गुम्बदों पर भगवा फहरा दिया। बौखला कर दो नवम्बर को मुलायम सिंह ने गोली चलवा दी, जिसमें कोलकाता के दो सगे भाई राम और शरद कोठारी सहित सैकड़ों कारसेवकों का बलिदान हुआ। इसके बाद प्रदेश में भाजपा की सरकार बनी। एक बार फिर 6 दिसम्बर, 1992 को कारसेवा की तिथि निश्चित की गयी। हिप की योजना तो केन्द्र शासन पर दबाव बनाने की ही थी; पर युवक आक्रोशित हो उठे। उन्होंने वहाँ लगी तार बाड़ के खम्भों से प्रहार कर बाबरी ढाँचे के तीनों गुम्बद गिरा दिये। सके बाद विधिवत वहाँ श्री रामलला को भी विराजित कर दिया गया। इस प्रकार वह बाबरी कलंक नष्ट हुआ और तुलसी बाबा की यह उक्ति भी प्रमाणित हुई-होई है सोई, जो राम रचि राखा।

"बा-अदब ! बा-मुलाहिज़ा ! होशियार !

नाम में क्या रखा है? दिल में रखो तो बात बने! 'इज़्ज़त शब्दों की पोशाक में नहीं,नीयत की धड़कनों में रहती है'। कभी-कभी लोग नामों की इबारत में ऐसी गंभीरता ढूंढ लेते हैं,जैसे दिल का GPS वहीं अटका हुआ हो,या जैसे जीवन की पूरी श्रद्धा वहीं टंगी हो। आज एक भाई ने शिकायत दर्ज कराई कि- आप“हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम” या “हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा को" सिर्फ़ मुहम्मद कह देते हैं,इससे दुख होता है।" मैंने विनम्रता की चाय घोलते हुए कहा,कि भैया- हमारे यहां तो श्रीकृष्ण कभी कृष्ण,श्रीराम कभी राम,और हनुमानजी कभी हनुमान ही कह दिए जाते हैं! किसी की श्रद्धा को इससे चोट नहीं लगती,क्योंकि प्यार शब्दों की लंबाई से नहीं,दिल की चौड़ाई से चलता है। मैंने हल्की-सी शरारत के साथ पूछा कि अगर नामों को लेकर इतनी ही शाही गैरत है,और बात नामों की गरिमा तक जा ही पहुंची! तो क्या फिर अकबर बादशाह के आगमन के उद्घोष की तरह यूँ सम्बोधित किया जाए,अर्थात “आपका मतलब ये वाला अंदाज़ तो नहीं?” "शाहे-ंशाह,बादशाह अकबर आलमपनाह तशरीफ़ ला रहे हैं!" या अधिक फ़ारसी-राजसी रूप में: "हज़रत-ए-बादशाह अकबर,जलालुद्दीन मुहम्मद,आलमपनाह! बारगाह में तशरीफ़ ला रहे हैं!" या फिर, "बा-अदब! बा-मुलाहिज़ा! होशियार! हुज़ूर-ए-आलिया, बादशाह-ए-हिंद तशरीफ़ ला रहे हैं!" और साथ में एक दरबारी मुनादी ची (उद्घोषक) भी नियुक्त कर लिया जाए?

न्यूरोलिंग्विस्टिक्स,और भाषा

न्यूरोलिंग्विस्टिक्स,और भाषा यह उस पर कंप्यूटर घटकों के साथ एक मस्तिष्क दिखाता है यह इस विचार को मजबूत करता है कि मस्तिष्क पहले से अधिक तरल और संदर्भ-संचालित तरीके से अर्थ को एकीकृत करता है । मस्तिष्क भाषा के लिए एआई जैसी संगणना का उपयोग करता है। सारांश: मानव मस्तिष्क एक चरण-दर-चरण अनुक्रम में बोली जाने वाली भाषा को संसाधित करता है जो बारीकी से मेल खाता है कि बड़े भाषा मॉडल पाठ को कैसे बदलते हैं । पॉडकास्ट सुनने वाले लोगों से इलेक्ट्रोकार्टिकोग्राफी रिकॉर्डिंग का उपयोग करते हुए, शोधकर्ताओं ने पाया कि शुरुआती मस्तिष्क प्रतिक्रियाएं शुरुआती एआई परतों के साथ संरेखित होती हैं, जबकि गहरी परतें ब्रोका के क्षेत्र जैसे क्षेत्रों में बाद में तंत्रिका गतिविधि के अनुरूप होती हैं । निष्कर्ष भाषा के पारंपरिक सिद्धांतों को चुनौती देते हैं जो गतिशील, संदर्भ-संचालित गणना को उजागर करने के बजाय निश्चित नियमों पर भरोसा करते हैं । टीम ने भाषाई विशेषताओं के साथ तंत्रिका संकेतों को जोड़ने वाला एक समृद्ध डेटासेट भी जारी किया, जो भविष्य के तंत्रिका विज्ञान अनुसंधान के लिए एक शक्तिशाली संसाधन प्रदान करता है । मुख्य तथ्य स्तरित संरेखण: प्रारंभिक मस्तिष्क प्रतिक्रियाओं ने शुरुआती एआई मॉडल परतों को ट्रैक किया, जबकि गहरी परतें बाद में तंत्रिका गतिविधि के साथ संरेखित हुईं । नियमों पर संदर्भ: एआई-व्युत्पन्न प्रासंगिक एम्बेडिंग ने शास्त्रीय भाषाई इकाइयों की तुलना में मस्तिष्क गतिविधि की बेहतर भविष्यवाणी की । नया संसाधन: शोधकर्ताओं ने भाषा तंत्रिका विज्ञान में तेजी लाने के लिए एक बड़ा तंत्रिका–भाषाई डेटासेट जारी किया । नेचर कम्युनिकेशंस में प्रकाशित एक अध्ययन में, हिब्रू विश्वविद्यालय के डॉ एरियल गोल्डस्टीन के नेतृत्व में शोधकर्ताओं ने प्रिंसटन विश्वविद्यालय के प्रोफेसर उरी हसन और एरिक हैम के साथ गूगल रिसर्च के डॉ मारियानो स्कैन के सहयोग से, हमारे दिमाग के बीच एक आश्चर्यजनक संबंध का खुलासा किया । तीस मिनट के पॉडकास्ट को सुनने वाले प्रतिभागियों से इलेक्ट्रोकार्टिकोग्राफी रिकॉर्डिंग का उपयोग करते हुए, टीम ने दिखाया कि मस्तिष्क एक संरचित अनुक्रम में भाषा को संसाधित करता है जो जीपीटी -2 और लामा 2 जैसे बड़े भाषा मॉडल के स्तरित वास्तुकला को प्रतिबिंबित करता है । अध्ययन में क्या पाया गया जब हम किसी को बोलते हुए सुनते हैं, तो हमारा मस्तिष्क प्रत्येक आने वाले शब्द को तंत्रिका गणनाओं के कैस्केड के माध्यम से बदल देता है । गोल्डस्टीन की टीम ने पाया कि ये परिवर्तन समय के साथ एक पैटर्न में सामने आते हैं जो एआई भाषा मॉडल की स्तरीय परतों को समानता देता है । प्रारंभिक एआई परतें शब्दों की सरल विशेषताओं को ट्रैक करती हैं, जबकि गहरी परतें संदर्भ, स्वर और अर्थ को एकीकृत करती हैं । अध्ययन में पाया गया कि मानव मस्तिष्क गतिविधि एक समान प्रगति का अनुसरण करती है: प्रारंभिक तंत्रिका प्रतिक्रियाएं प्रारंभिक मॉडल परतों के साथ संरेखित होती हैं, और बाद में तंत्रिका प्रतिक्रियाएं गहरी परतों के साथ संरेखित होती हैं । यह संरेखण ब्रोका के क्षेत्र जैसे उच्च-स्तरीय भाषा क्षेत्रों में विशेष रूप से स्पष्ट था, जहां शिखर मस्तिष्क की प्रतिक्रिया बाद में गहरी एआई परतों के लिए हुई थी । गोल्डस्टीन के अनुसार, " हमें सबसे ज्यादा आश्चर्य हुआ कि मस्तिष्क के लौकिक अर्थ का खुलासा बड़े भाषा मॉडल के अंदर परिवर्तनों के अनुक्रम से कितना मेल खाता है । भले ही इन प्रणालियों को बहुत अलग तरीके से बनाया गया हो, दोनों को समझने की दिशा में एक समान चरण-दर-चरण बिल्डअप पर अभिसरण लगता है" यह क्यों मायने रखता है निष्कर्ष बताते हैं कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता केवल पाठ उत्पन्न करने का एक उपकरण नहीं है । यह यह समझने में एक नई विंडो भी पेश कर सकता है कि मानव मस्तिष्क कैसे अर्थ को संसाधित करता है । दशकों तक, वैज्ञानिकों का मानना था कि भाषा की समझ प्रतीकात्मक नियमों और कठोर भाषाई पदानुक्रमों पर निर्भर करती है । यह अध्ययन उस दृष्टिकोण को चुनौती देता है । इसके बजाय, यह भाषा के लिए एक अधिक गतिशील और सांख्यिकीय दृष्टिकोण का समर्थन करता है, जिसमें अर्थ प्रासंगिक प्रसंस्करण की परतों के माध्यम से धीरे-धीरे उभरता है । शोधकर्ताओं ने यह भी पाया कि शास्त्रीय भाषाई विशेषताएं जैसे कि फोनेम और मॉर्फेम ने मस्तिष्क की वास्तविक समय की गतिविधि के साथ-साथ एआई-व्युत्पन्न प्रासंगिक एम्बेडिंग की भविष्यवाणी नहीं की थी । यह इस विचार को मजबूत करता है कि मस्तिष्क पहले से अधिक तरल और संदर्भ-संचालित तरीके से अर्थ को एकीकृत करता है । तंत्रिका विज्ञान के लिए एक नया बेंचमार्क क्षेत्र को आगे बढ़ाने के लिए, टीम ने सार्वजनिक रूप से भाषाई विशेषताओं के साथ जोड़े गए तंत्रिका रिकॉर्डिंग का पूरा डेटासेट जारी किया । यह नया संसाधन दुनिया भर के वैज्ञानिकों को प्रतिस्पर्धी सिद्धांतों का परीक्षण करने में सक्षम बनाता है कि मस्तिष्क प्राकृतिक भाषा को कैसे समझता है, कम्प्यूटेशनल मॉडल के लिए मार्ग प्रशस्त करता है जो मानव अनुभूति से अधिक निकटता से मिलते जुलते हैं । प्रमुख सवालों के जवाब दिए: प्रश्न: मस्तिष्क की भाषा प्रसंस्करण एआई मॉडल से कैसे मिलती है? ए: मस्तिष्क बोली जाने वाली भाषा को संगणना के अनुक्रम के माध्यम से बदल देता है जो बड़े भाषा मॉडल की उत्तरोत्तर गहरी परतों के साथ संरेखित होता है । प्रश्न: अर्थ समझने के लिए यह अध्ययन क्यों महत्वपूर्ण है? ए: यह भाषा के नियम-आधारित सिद्धांतों को चुनौती देता है, इसके बजाय यह सुझाव देता है कि अर्थ आधुनिक एआई सिस्टम के समान गतिशील, संदर्भ-संचालित प्रसंस्करण के माध्यम से उभरता है । प्रश्न: शोधकर्ताओं ने क्या संसाधन जारी किया? ए: भाषाई सुविधाओं के साथ इलेक्ट्रोकार्टिकोग्राफी रिकॉर्डिंग को सार्वजनिक रूप से उपलब्ध डेटासेट, प्रतिस्पर्धी भाषा सिद्धांतों के नए परीक्षणों को सक्षम करता है । नोट्:- यह लेख एक तंत्रिका विज्ञान समाचार संपादक द्वारा संपादित किया गया था । सार अस्थायी संरचना की प्राकृतिक भाषा प्रसंस्करण में मानव मस्तिष्क से मेल खाती स्तरित पदानुक्रम की बड़ी भाषा मॉडल बड़े भाषा मॉडल (एलएलएम) मानव मस्तिष्क में भाषा प्रसंस्करण को समझने के लिए एक रूपरेखा प्रदान करते हैं । पारंपरिक मॉडल के विपरीत, एलएलएम स्तरित संख्यात्मक एम्बेडिंग के माध्यम से शब्दों और संदर्भ का प्रतिनिधित्व करते हैं । यहां, हम प्रदर्शित करते हैं कि एलएलएमएस की परत पदानुक्रम मस्तिष्क में भाषा की समझ की अस्थायी गतिशीलता के साथ संरेखित होती है । 30 मिनट की कथा सुनने वाले प्रतिभागियों से इलेक्ट्रोकार्टिकोग्राफी (ईसीओजी) डेटा का उपयोग करते हुए, हम दिखाते हैं कि गहरी एलएलएम परतें बाद की मस्तिष्क गतिविधि से मेल खाती हैं, खासकर ब्रोका के क्षेत्र और अन्य भाषा से संबंधित क्षेत्रों में । हम जीपीटी -2 एक्सएल और लामा -2 से प्रासंगिक एम्बेडिंग निकालते हैं और समय के साथ तंत्रिका प्रतिक्रियाओं की भविष्यवाणी करने के लिए रैखिक मॉडल का उपयोग करते हैं । हमारे परिणाम समझ के दौरान मॉडल की गहराई और मस्तिष्क की अस्थायी ग्रहणशील खिड़की के बीच एक मजबूत संबंध प्रकट करते हैं । हम प्रतीकात्मक दृष्टिकोणों के साथ एलएलएम-आधारित भविष्यवाणियों की तुलना भी करते हैं, मस्तिष्क की गतिशीलता को पकड़ने में गहन शिक्षण मॉडल के लाभों पर प्रकाश डालते हैं । हम भाषा प्रसंस्करण के प्रतिस्पर्धी सिद्धांतों का परीक्षण करने के लिए अपने संरेखित तंत्रिका और भाषाई डेटासेट को एक सार्वजनिक बेंचमार्क के रूप में जारी करते हैं । एआईकृत्रिम बुद्धि मस्तिष्क अनुसंधान ब्रोका का क्षेत्र ज्ञान गहरी सीखना जेरूसलेम लंगागेल मशीन सीख

जलेबी तेरे कितने नाम..

जलेबी जलेबी यह शब्द वैदिक साइंस पेज पर सुनकर थोड़ा सा अचंभित होना स्वभाविक है किन्तु वास्तविकता यह है कि जलेबी हमारी संस्कृति का हिस्सा है जो की औषधि के साथ साथ बहुत ही स्वादिष्ट मिष्ठान भी है जो काफी गुणकारी भी है तो चलिए आज आपको जलेबी के विषय में कुछ रोचक और दुर्लभ जानकारी देते हैं दुनिया के 90 फीसदी लोग जलेबी का संस्कृत और अंग्रेजी नाम नहीं जानते? सुबह जलेबी के नाश्ते में है बहुत गुणकारी, साथ ही जाने…. जलेबी से जुड़े दिलचस्प किस्से….. क्या है जलेबी? – जाने उलझनें भी मीठी हो सकती हैं, जलेब,इस बात की मिसाल है। जलेबी का जलजला जलेबी में जल तत्व की अधिकता होने से इसे जलेबी कहा जाता है। मानव शरीर में 70 फीसदी पानी होता है, इसलिए इसे खाने से जलतत्व की पूर्ति होती है। जलेबी को रोगनाशक ओषधि भी बताया है। गर्म जलेबी चर्म रोग की बेहतरीन चिकित्सा है। जलेबी तेरे कितने नाम.. संस्कृत में कुण्डलिनी, महाराष्ट्र में जिलबी तथा बंगाल में जिलपी कहते है । जलेबी का भारतीय नाम जलवल्लिका है। अंग्रेजी में जलेबी को स्वीट्मीट (Sweetmeet) और सिरप फील्ड रिंग कहते हैं। जलेबी के भेद वेद में भी लिखे है। महिलाएं अपने केशों से “जलेबी जूड़ा” भी बनाती हैं। जलेबी का जलवा… बंगाल में पनीर की, बिहार में आलू की, उत्तरप्रदेश में आम की, म.प्र. के बघेलखण्ड-रीवा, सतना में मावा की जलेबी खाने का भारी प्रचलन है। कहीं-कहीं चावल के आटे की और उड़द की दाल की जलेबी का भी प्रचलन है। ग्रामीण क्षेत्रों में दूध-जलेबी का नाश्ता करते हैं। जलेबी तेरे रूप अने जलेबी डेढ अण्टे, ढाई अण्टे और साढे तीन अण्टे की होती है। अंगूर दाना जलेबी, कुल्हड़ जलेबी आदि की बनावट वाली गोल-गोल बनती है। जलेबी से तात्पर्य…. जलेबी दो शब्दों से मिलकर बनता है। जल +एबी अर्थात् यह शरीर में स्थित जल के ऐब (दोष) दूर करती है। शरीर में आध्यात्मिक शक्ति, सिद्धि एवं ऊर्जा में वृद्धि कर स्वाधिष्ठान चक्र जाग्रत करने में सहायक है। जलेबी के खाने से शरीर के सारे ऐब (रोग दोष )जल जाते हैं । जलेबी ओषधि भी है…. जलेबी अर्थात जल+एबी। यह शरीर में जल के ऐब, जलोदर की तकलीफ मिटाती है। जलेबी की बनावट शरीर में कुण्डलिनी चक्र की तरह होती है। अघोरी की तिजोरी….. अघोरी सन्त आध्यात्मिक सिद्धि तथा कुण्डलिनी जागरण के लिए सुबह नित्य जलेबी खाने की सलाह देते हैं । मैदा, जल, मीठा, तेल और अग्नि इन 5 चीजों से निर्मित जलेबी में पंचतत्व का वास होता है । जलेबी खाने से पंचमुखी महादेव, पंचमुखी हनुमान तथा पाॅंच फनवाले शेषनाग की कृपा प्राप्त होती है! अपने ऐब (दोष) जलाने, मिटाने हेतु नित्य जलेबी खाना चाहिये । वात-पित्त-कफ यानि त्रिदोष की शांति के लिए सुबह खाली पेट दही के साथ, वात विकार से बचने के लिए-दूध में मिलाकर और कफ से मुक्ति के लिए गर्म-गर्म चाशनी सहित जलेबी खावें । रोग निवारक जलेबी…. 【】जलेबी ओषधि भी है जो लोग सिरदर्द, माईग्रेन से पीड़ित हैं वे सूर्योदय से पूर्व प्रातः खाली पेट २से 3 जलेबी चाशनी में डुबोकर खाकर पानी नहीं पीएं सभी तरह मानसिक विकार जलेबी के सेवन सेे नष्ट हो जाते हैं। 【】जलेबी पीलिया से पीड़ित रोगियों के लिए यह चमत्कारी ओषधि है। सुबह खाने से पांडुरोग दूर हो जाता है। 【】जिन लोगों के पैर की बिम्बाई फटने या त्वचा निकलने की परेशानी रहती हो हो वे 21 दिन लगातार जलेबी का सेवन करें। जलेबी का जलवा…. जलवा दिखाने की इच्छा रखने वालों को हमेशा सुबह नाश्ते में जलेबी जरूर खाना चाहिये, जिन्हे ईश्वर से जुड़ने की कामना हो, तब जलेबी खायें। आयुर्वेदिक जड़ी बूटी जलेबी… जंगली जलेबी नामक फल उदर एवं मस्तिष्क रोगों का नाश करता है। भावप्रकाश निघण्टु में उल्लेख है – जो जंगल जलेबी खावै, दुःख संताप मिटावै। जलेबी खाये जगत गति पावै! जलेबी खाने वालों को ब्रह्मचर्य का विधिवत् पालन करना चाहिये । ‘‘टपकी जाये जलेबी रस की’’ अतः आयुर्वेद में विवाह होने तक स्वयं पर अंकुश रखने का निर्देश है। जलेबी केे फायदे… जलने, कुढन में उलझे लोग यदि जानवरों को जलेबी खिलाये तो मन शांत होता है। क्योंकि मन में अमन है, तो तन चमन बन जाता है और तन ही हमारा वतन है नहीं तो सबका पतन हो जाता है इसे जतन से संभालो। जलेबी की कहावतें….. खाये जलेबी बनो दयालु तहि चीन्हे नर कोई। तत्पर हाल-निहाल करत हैं रीझत है निज सोई। जलेबी खाने से दया, उदारता उत्पन्न होती है। पहचान बनती है। आत्मविश्वास आता है। टूटी की नही बनी है बूटी झूठी की नही बनी है खूॅंटी फूटी को नही बनी है सूठी रूठी तो बने काली कलूटी अर्थात- जिस व्यक्ति का आत्मविश्वास अंदर से टूट जाये उसको ठीक करने की कोई बूटी यानी ओषधि आज तक नहीं बनी है। जो आदमी बार -बार बदलता है इनकी एक खूटी यानि ठिकाना नही होता। जिसकी किस्मत फूटी हो, जो भाग्यहीन हो, उसका भला सूफी-संत भी नही कर सकते और स्त्री रूठ जाये तो काली का भयंकर रूप धारण कर लेती है। अतः इन सबका इलाज जलेबी है। रोज सुबह जलेबी खाओ। भव सागर से पार लगाओ । खाली पेट करे मुख मीठा विद्वान वाद-विवाद बसो दे झूठा ….. बाबा कीनाराम सिद्ध अवधूत लिखते हैं – बिनु देखे बिनु अर्स-पर्स बिनु, प्रातः जलेबी खाये जोई । तन-मन अन्तर्मन शुद्ध होवे वर्ष में निर्धन रहे न कोई एक संत ने जलेबी का नाता आदिकाल से वताया है- पार लगावे चैरासी से, मत ढूके इत और। जलेबी का नियम से प्रातःकाल सेवन करें, तो बार-बार क जन्म-मरण से मुक्ति मिलती है। जलेबी के अलावा अन्य मिठाई की कभी देखें भी नहीं। एक बहुत मशहूर कहावत है कि- तुम तो जलेबी की तरह सीधे हो एक लोक गीत है – ■ मन करे खाये के जिलेबी ■ जब मोसे बनिया पैसा माॅंगे, वाये दूध-जलेबी खिलादऊॅंगी जलेबी बनाने हेतु आवश्यक सामग्री:- मैदा 900 ग्राम, उड़द दाल 50 ग्राम पानी में गला कर पीस कर 500 ग्राम मैदा में 50 ग्राम दही मिलाकर दो दिन पूर्व खमीर हेतु घोल कर रखे शेष मैदा जलेबी बनाते समय खमीर में मिलाये शक्कर करीब 1 किलो 300-400 ML पानी में डालकर चाशनी बनाये। जलेेबी को बहुत स्वादिष्ट बनाने के लिए चाशनी में एक चम्मच नीबू का रस और केशर मिला सकते हैं। जलेबी के खाने से लाभ…. एषा कुण्डलिनी नाम्ना पुष्टिकान्तिबलप्रदा। धातुवृद्धिकरीवृष्या रुच्या चेन्द्रीयतर्पणी।। (आयुर्वेदिक ग्रन्थ भावप्रकाश पृष्ठ ७४०) अर्थात – जलेबी कुण्डलिनी जागरण करने वाली, पुष्टि, कान्ति तथा बल को देने वाली, धातुवर्धक, वीर्यवर्धक, रुचिकारक एवं इन्द्रिय सुख और रसेन्द्रीय को तृप्त करने वाली होती है। जलेबी का अविष्कार… दुनिया में सर्वप्रथम जलेबी का अविष्कार किसने किया यह तो ज्ञात नहीं हो सका। लेकिन उत्तरभारत का यह सबसे लोकप्रिय व्यंजन है। भारत की जलेबी अब अंतरराष्ट्रीय मिठाई है। प्राचीन समय के सुप्रसिद्ध हलवाई शिवदयाल विश्वनाथ हलवाई के अनुसार जलेेबी मुख्यतः अरबी शब्द है। तुर्की मोहम्मद बिन हसन “किताब-अल-तबिक़” एक अरबी किताब जलेबी का असली पुराना नाम जलाबिया लिखा है। 300 वर्ष पुरानी पुस्तकें “भोजनकटुहला” एवं संस्कृतमें लिखी “गुण्यगुणबोधिनी” में भी जलेबी बनाने की विधि का वर्णन है। घुमंतू लेखक श्री शरतचंद पेंढारकर ने जलेबी का आदिकालीन भारतीय नाम कुण्डलिका बताया है। वे बंजारे बहुरूपिये शब्द और रघुनाथकृत “भोज कौतूहल” नामक ग्रन्थ का भी हवाला देते हैं। इन ग्रंथों में जलेबी बनाने की विधि का भी उल्लेख है। मिष्ठान भारत की जान जैसी पुस्तकों में जलेबी रस से परिपूर्ण होने के कारण इसे जल-वल्लिका नाम मिला है। जैन धर्म का ग्रन्थ “कर्णपकथा” में भगवान महावीर को जलेबी नैवेद्य लगाने वाली मिठाई माना जाता है।

अनोखीबाई

अनोखीबाई अनोखीबाई की आदत थी बात से बात निकालना और फिर उसे फिरकी पर चढ़ाकर सूत की तरह कताई करना। जब तक वह हर किसी की जड़ें न खोद लेती उसे चैन न पड़ता। सुबह तक वह सबसे पहले अखबार उठा लेती और सोये हुए पति के मुंह से मक्खियां उड़ाते हुए बेपर की उड़ाने लगती। कोई बुरी खबर होती तो चिल्‍लाने लगती,देखो तो संसार में अनार्थ हो रहा है,एक तुम हो जो अब तक सो रहे हो। यह देखते हो कोई रोहिणी चक्‍कर काटने लगी है धरती के।यहां आवे तो नासपीटी की हड्डी-पसली एक कर दूं। अनोखीबाई के पति शामतलाल की शामत तो उसी शाम आ गयी थी जिस दिन उन्‍होंने शादी का फंदा गले में डाला!अनोखीबाई के माता-पिता परिचित थे। वे शामतलाल को समझाते हुए बोले थे,बेटा!अब तुम ही ध्‍यान रखना।‘ शामतलाल का तभी माथा ठनका और उसने घूंघट में से ताकती-झांकती आँखों में हाथ-पांव मारने शुरू कर दिये थे।अनोखी बाई के मधुर स्‍वभाव से आस पड़ोस को परिचित होने में शायद देर लगी हो, पर शामतलाल को कुछ घंटे में ही सब समझ आने लगा था। इसीलिए पहले दिन से ही वे अपनी प्रिय धर्म पत्‍नी के लिए चाय बनाने लगे।अनोखीबाई उन्‍हें बदले में ताजा समाचार सुनाती।समाचारों पर अपने कमेंट देती और शाम को जब शामतलाल लौटकर आते तो वह फिर उनका मगज चाटना शुरू कर देती।शाम की चोरी या डकैती की ताजा खबरें वह चाय के साथ ऐसे पेश करती जैसे पति को गरमागरम समोसे या कचौरी दे रही हो। एक दिन शामतलाल लौटे तो अनोखी बोली, ‘’सुनते हो जी वह अन्‍नपूर्ण के घर डाकू आए और पच्‍चीस हजार के जेवर ले गए।‘’ शामतलाल घबराए से बोले,‘’तब तो बहुत बुरा हुआ।‘’ ‘’बुरा?अरे इस अन्‍नपूर्ण के घर तो कभी फूटी कौड़ी नहीं होती।नकली गहने,नकली मोती और मिलावट उसका पहला धर्म है।पच्‍चीस हजार ताकती जेवर की तो बात ही छोड़ो,उसके घर एक सुच्‍चा छल्‍ला भी नहीं! मैं तो कहती हूं चोर डाकुओं को ये अखबारें पढ़कर अपना स्‍टेटमेंट देना चाहिए।बताना चाहिए कि खबर झूठ है।इसके घर तो कानी कौड़ी न पाकर चोरों ने सिर पीट लिया होगा।या फिर दया आई हो तो वे कुछ माल भी छोड़ गए हों।मैं अन्‍नापूर्णा को खूब जानती हूँ।'' शामतलाल ने अनोखीबाई की इस अनोखी बात पर एक ठण्‍डी सांस भरते हुए कहा, ’शुक्र है तुम किसी चोर या उठाईगीर की बीबी नही,वरना तुम तो सलाह देकर उसकी ऐसी मति फेर देती कि वह बेचार अपना भांडाफोड करके जेल की हवा खा रहा होता।‘’ हवा खाने की बात पर अनोखीबाई की नजर अखबार में पंखे से लटक-कर आत्‍महत्‍या करने वाले तीन व्‍यक्तियों पर पड़ गई।अब तो शमतलाल की शाम के चाय पानी का भी स्‍कोप खत्‍म हो गया।अनोखी वहीं धम्‍म से बैठ गई और बोली,’समझ नहीं आता कि इस उमस भरी गर्मी में,लोगों को हवा खाने का इना चाव चढ़ता है कि वे पंखे से ही लटक जाते हैं।यह देखो जी, अनोखी ने फिल्‍मी हीरोइनों की पंखों से लटकने वाली कतरनें सम्‍मुख रख दीं। फिर बोली,’अच्‍छा यह तो कहो जब मरने के लिए उमदा से उमदा तरीके मौजूद हैं, ऊंची से ऊंची हैं तो फिर यह पंखों से लिपट मरने का शोक क्‍यों सिर पर सवार होने लगा है।हर रोज कितने ही पंखे से लटके लोग मिलते हैं। गोया पंखे का काम हवा देना न होकर लोगों को लटक जाने की प्रेरणा देना हो गया। पंखें से साड़ी लटकाना,साड़ी का फंदा गले में डालना,क्‍या है यह सब?’’ शामतलाल बोले–‘’सारा धंधा साड़ी के फंदे से शुरू होता है। हर रोज नयी साड़ी की मांग,बढ़ती महंगाई,सबका गला घोंट रही है।‘’पर अनोखी ने शामतलाल की बात तेजी से काटते हुए कहा–’साड़ी का फंदा किसी को नहीं मारता।यह तो रेशमी जकड़ है।बात कुछ और ही लगती है।एक बात बताओ,ये सब लोग किसी कम्‍पनी के पंखे से लटके हैं।आज तक तो किसी कंपनी का यह विज्ञापन नहीं सुना,हमारी कंपनी के पंखे खरीदिए,लटक जाएं तो भी पंखे को आंच न आए,बढि़या मजबूत टिकाऊ पंखे!असल में लोडशैडिंग अगर इतनी ज्‍यादा रही तो पंखे हवा देने की बजाय सिर्फ इसी काम के लिए रह जाएंगे।‘’ फिर अनोखीबाई ने सिर उठाकर अपने छत के पंखे को गौर से देखा।जब से इस घर में यह पंखा आया था, भली प्रकार चल न पाया था।गर्मियों में प्रात: बत्‍ती बंद रहती और बंद न भी होती तो पूरा फ्यूज उड़ जाता। अनोखी को बार-बार लगता था कि न चलने की वजह से शायद यह पंखा भी बेकार हो चुका हो जैसे किसी के घुटने जुड़ गए हों। यही सोचकर वह फिर बोली, ‘’सुनते हो जी,मैं तो सोचती हूं कि यह तीन पंख वाला पंखा,एक जरा-सी हत्‍थी के सहारे तो खड़ा है,इससे कोई लटक ही कैसे सकता है।‘’ ‘’अनोखीबाई को एकटक पंखे को निहारते देख शामतलाल का माथा ठनका।वे बोले,‘’लटकने वाली तो लटक गई पर पीछे वालों को तो उमस भरी गर्मीं में तड़पने को छोड़ गई। पंखा तो फिर भी पंखे वाले से सुधर सकता है।‘’ शामतलाल ने अनोखीबाई की आंखों में बढ़ती हुई उत्‍सुकता देखी तो उन्‍हें खटका लगा। वे तुरंत बोल उठे,‘’दरअसल यह पंखे से लटकने का माजरा ही कुछ और है। तुम मत सोचो वरना मेरी मुसीबत हो जाएगी। तुम्‍हारी यह ढाई मन की देह पंखा बेचारा नहीं संभल पाएगा। और पंखे के साथ-साथ छत भी नीचे होगी। तुम एक हाथ में छत थामे दूसरे हाथ में उस गरीब पंखे के पंखों को,मुर्गे के पंखों की तरह तोड.,मरोडकर,मेरी राह में आंखें बिछाए खड़ी होगी और तुम तो जानती हो आजकल छतें बन पाना कितना महंगा पड़ता है।‘’ और उस दिन से शामतलाल हर रोज अपने कमरे में लगे इकलौते पंखे के लिए प्रार्थना करके जाते हैं। और दफतर से आते ही उसे सही सलामत पाकर खुदा से पंखे की लम्‍बी उमर के लिए खैर मनाते हैं!

वीर शम्भा जी

वीर शम्भा जी का जन्म 14 मई 1657 को हुआ था। आप वीर शिवाजी के साथ अल्पायु में औरंगजेब की कैद में आगरे के किले में बंद भी रहे थे। आपने 11 मार्च 1689 को वीरगति प्राप्त की थी। इस लेख के माध्यम से हम शम्भा जी के जीवन बलिदान की घटना से धर्म रक्षा की प्रेरणा ले सकते हैं. इतिहास में ऐसे उदाहरण विरले ही मिलते है। औरंगजेब के जासूसों ने सुचना दी की शम्भा जी इस समय आपने पाँच-दस सैनिकों के साथ वारद्वारी से रायगढ़ की ओर जा रहे है। बीजापुर और गोलकुंडा की विजय में औरंगजेब को शेख निजाम के नाम से एक सरदार भी मिला जिसे उसने मुकर्रब की उपाधि से नवाजा था। मुकर्रब अत्यंत क्रूर और मतान्ध था। शम्भा जी के विषय में सुचना मिलते ही उसकी बांछे खिल उठी। वह दौड़ पड़ा रायगढ़ की और. शम्भा जी आपने मित्र कवि कलश के साथ इस समय संगमेश्वर पहुँच चुके थे। वह एक बाड़ी में बैठे थे की उन्होंने देखा कवि कलश भागे चले आ रहे है और उनके हाथ से रक्त बह रहा है। कलश ने शम्भा जी से कुछ भी नहीं कहाँ बल्कि उनका हाथ पकड़कर उन्हें खींचते हुए बाड़ी के तलघर में ले गए परन्तु उन्हें तलघर में घुसते हुए मुकर्रब खान के पुत्र ने देख लिया था। शीघ्र ही मराठा रणबांकुरों को बंदी बना लिया गया। शम्भा जी व कवि कलश को लोहे की जंजीरों में जकड़ कर मुकर्रब खान के सामने लाया गया। वह उन्हें देखकर खुशी से नाच उठा। दोनों वीरों को बोरों के समान हाथी पर लादकर मुस्लिम सेना बादशाह औरंगजेब की छावनी की और चल पड़ी। औरंगजेब को जब यह समाचार मिला तो वह ख़ुशी से झूम उठा। उसने चार मील की दूरी पर उन शाही कैदियों को रुकवाया। वहां शम्भा जी और कवि कलश को रंग बिरंगे कपडे और विदूषकों जैसी घुंघरूदार लम्बी टोपी पहनाई गयी। फिर उन्हें ऊंट पर बैठा कर गाजे बाजे के साथ औरंगजेब की छावनी पर लाया गया। औरंगजेब ने बड़े ही अपशब्द शब्दों में उनका स्वागत किया। शम्भा जी के नेत्रों से अग्नि निकल रही थी परन्तु वह शांत रहे। उन्हें बंदी ग्रह भेज दिया गया। औरंगजेब ने शम्भा जी का वध करने से पहले उन्हें इस्लाम काबुल करने का न्योता देने के लिए रूह्ल्ला खान को भेजा। नर केसरी लोहे के सींखचों में बंद था। कल तक जो मराठों का सम्राट था। आज उसकी दशा देखकर करुणा को भी दया आ जाये। फटे हुए चिथड़ों में लिप्त हुआ उनका शरीर मिटटी में पड़े हुए स्वर्ण के समान हो गया था। उन्हें स्वर्ग में खड़े हुए छत्रपति शिवाजी टकटकी बंधे हुए देख रहे थे। पिता जी पिता जी वे चिल्ला उठे- मैं आपका पुत्र हूँ। निश्चित रहिये। मैं मर जाऊँगा लेकिन….. लेकिन क्या शम्भा जी …रूह्ल्ला खान ने एक और से प्रकट होते हुए कहां। तुम मरने से बच सकते हो शम्भा जी परन्तु एक शर्त पर। शम्भा जी ने उत्तर दिया में उन शर्तों को सुनना ही नहीं चाहता। शिवाजी का पुत्र मरने से कब डरता है। लेकिन जिस प्रकार तुम्हारी मौत यहाँ होगी उसे देखकर तो खुद मौत भी थर्रा उठेगी शम्भा जी- रुहल्ला खान ने कहा। कोई चिंता नहीं , उस जैसी मौत भी हम हिन्दुओं को नहीं डरा सकती। संभव है कि तुम जैसे कायर ही उससे डर जाते हो। शम्भा जी ने उत्तर दिया। लेकिन… रुहल्ला खान बोला वह शर्त है बड़ी मामूली। तुझे बस इस्लाम कबूल करना है। तेरी जान बख्श दी जाएगी। शम्भा जी बोले बस रुहल्ला खान आगे एक भी शब्द मत निकालना मलेच्छ। रुहल्ला खान अट्टहास लगाते हुए वहाँ से चला गया। उस रात लोहे की तपती हुई सलाखों से शम्भा जी की दोनों आँखें फोड़ दी गयी उन्हें खाना और पानी भी देना बंद कर दिया गया। आखिर 11 मार्च को वीर शम्भा जी के बलिदान का दिन आ गया। सबसे पहले शम्भा जी का एक हाथ काटा गया, फिर दूसरा, फिर एक पैर को काटा गया और फिर दूसरा पैर। शम्भा जी कर पाद विहीन धड़ दिन भर खून की तल्य्या में तैरता रहा। फिर सायंकाल में उनका सर काट दिया गया और उनका शरीर कुत्तों के आगे डाल दिया गया। फिर भाले पर उनके सर को टांगकर सेना के सामने उसे घुमाया गया और बाद में कूड़े में फेंक दिया गया। मरहठों ने अपनी छातियों पर पत्थर रखकर आपने सम्राट के सर का इंद्रायणी और भीमा के संगम पर तुलापुर में दांह संस्कार कर दिया गया। आज भी उस स्थान पर शम्भा जी की समाधी है जो पुकार पुकार कर वीर शम्भा जी की याद दिलाती है कि हम सर कटा सकते है पर अपना प्यारे वैदिक धर्म कभी नहीं छोड़ सकते। मित्रों शिवाजी के तेजस्वी पुत्र शंभाजी के अमर बलिदान यह गाथा हिन्दू माताएं अपनी लोरियों में बच्चों को सुनाये तो हर घर से महाराणा प्रताप और शिवाजी जैसे महान वीर जन्मेंगे। इतिहास के इन महान वीरों के बलिदान के कारण ही आज हम गर्व से अपने आपको श्री राम और श्री कृष्ण की संतान कहने का गर्व करते है। आइये आज हम प्रण ले हम उसी वीरों के पथ के अनुगामी बनेंगे।।।

आपका शरीर कैसे जानता है कि यह रात है?

निशा निमंत्रण लिखते बच्चन दिन जल्दी जल्दी ढलता है । ढ़ल रात में काहे बदलता है ? जैविक व्याख्या: आपका शरीर कैसे जानता है कि यह रात है? आपका शरीर जानता है कि यह रात है क्योंकि आपकी आंखें प्रकाश को मापती हैं, और आपका मस्तिष्क एक अंतर्निहित समय प्रणाली चलाता है जो नींद, हार्मोन, तापमान और ऊर्जा को नियंत्रित करता है । आपका शरीर अनुमान नहीं लगा रहा है-यह आपके मस्तिष्क में एक छोटे से क्षेत्र द्वारा नियंत्रित एक जैविक घड़ी का अनुसरण करता है जिसे एससीएन (सुप्राचियास्मैटिक न्यूक्लियस) कहा जाता है । यहाँ यह कैसे काम करता है: 🔹 1. आपकी आंखें प्रकाश का पता लगाती हैं आपकी आंखों के अंदर, प्रकाश के मंद होने पर प्रकाश संश्लेषक नाड़ीग्रन्थि कोशिकाओं नामक विशेष कोशिकाएं महसूस होती हैं । वे सीधे एससीएन को एक संदेश भेजते हैं जिसमें कहा गया है: "प्रकाश कम हो रहा है-रात आ रही है । ” 🔹 2. एससीएन आपके शरीर को "नाइट मोड"में बदल देता है एक बार जब एससीएन संकेत प्राप्त करता है, तो यह आपके पूरे शरीर को समायोजित करना शुरू कर देता है: शरीर का तापमान कम करना अपने चयापचय धीमा मांसपेशियों को आराम सतर्कता कम करना 🔹 3. मेलाटोनिन जारी किया गया है आपके मस्तिष्क की पीनियल ग्रंथि मेलाटोनिन को छोड़ना शुरू कर देती है, जिसके लिए जिम्मेदार हार्मोन है: तंद्रा शांति मस्तिष्क की गतिविधि में कमी आराम के लिए अपनी कोशिकाओं को तैयार करना मेलाटोनिन का स्तर स्वाभाविक रूप से रात में बढ़ता है और सुबह गिरता है । 🔹 4. सुबह की रोशनी सब कुछ बंद कर देती है एक बार दिन की रोशनी सुबह आपकी आँखों से टकराती है: मेलाटोनिन उत्पादन बंद हो जाता है कोर्टिसोल धीरे से आपको जगाने के लिए उठता है आपका मस्तिष्क "दिन मोड" पर स्विच करता है यह चक्र हर 24 घंटे में दोहराता है — यही आपकी सर्कैडियन लय है । विज्ञान तथ्यों का ही पालन करें । बच्चे प्रत्याशा में होंगे नीड़ों से झाँक रहे होंगे यह ध्यान पगों में चिड़िया के भरता कितनी चंचलता है। आदम भी कहाँ बदलता है।

धूजते हुए हाथ

चोरों के हाथ नहीं धूजते डकैतों के हाथ नहीं धूजते बलात्कारियों के हाथ नहीं धूजते धन पशुओं के हाथ नहीं धूजते मुझे अच्छे लगे मेरे प्रधानमंत्री के वे धूजते हुए हाथ जिन्होंने संभाल रखा है हमारी अपेक्षाओं का लौह-भार धूजने चाहिए थे पहले के प्रधानमंत्रियों के हाथ लेकिन वे बहुत कम धूजे क्योंकि धूजने वाले हाथों के लिए चाहिए बहुत संवेदनशील हृदय! जब भी धूजे हैं हाथ मेरे देश के प्रधानमंत्रियों के शुभ ही हुआ है हर काम! जब भी नहीं धूजे हैं हाथ मेरे देश के प्रधानमंत्रियों के अशुभ ही हुआ है कुछ न कुछ! मुझे पता है : नेहरू जी के हाथ नहीं धूजे थे जब उन्होंने चीन से हाथ मिलाया था! इंदिरा जी के हाथ नहीं धूजे थे जब अमरीका ने दिखाई थी आँख! राजीव जी के हाथ नहीं धूजे थे जब उतार दिए गए थे लंका के जंगलों में हमारी मासूम सेनाओं के जत्थे! वाजपेयी जी के हाथ धूजे थे, जब पोकरण में हुआ था विस्फोट! जब कारगिल से लौटे थे शहीदों के शव जीत का झंडा लहरा कर! मनमोहन जी के हाथ धूजने न धूजने का कोई प्रश्न ही नहीं उठता क्योंकि दस सालों तक हम उनके हाथ ही ढूंढ़ते रहे! मोदी जी के धूजते हुए हाथों को देखकर मुझे बहुत ख़ुशी हुई मुझे सचमुच ऐसा लगा जैसे भारत नाम का चिरंतन युवा बालक अपने अभिभावक के हाथ से निवाला खा रहा भगवान करे जो भी प्रधानमंत्री बने उसके हाथ धूजते रहें ! कवियों के हाथों में हो धूजती हुई कलम! चित्रकारों के हाथों में धूजती हुई कूँची! वाद्यकारों के हाथों में हो धूजते हुए हारमोनियम तबले और गिटार! धूजते हुए हाथ कमज़ोरी या बीमारी नहीं ताक़त और स्वास्थ्य का प्रतीक हैं ! यह धूजते हुए हाथ ही बताते हैं कि बक़ौल अनवर शुऊर-- "शहपारा बन रहा है अभी बन नहीं गया" मोदी जी और कुछ बरसों तक धूजते रहने दीजिये अपने हाथ! यदि यह अभिनय भी है तब भी इस अभिनय के हम भारत के नागरिक आपको सौ में से एक सौ दस अंक देते हैं ! अभी कई ध्वज हैं जो ज़मीन में गड़े हैं, इन्हें उठना है मंदिरों के शिखरों तक! और मंदिरों को उठना है गहरी नींद से,जो कम से कम हज़ार पांच सौ बरस पुरानी है! --- यह धूजते हुए हाथ यह धूजते हुए हाथों के सफ़ेद रोम यह आँखों में सदियों के स्वप्न का उबलता जल यह चेहरे पर एक संकल्प की सिद्धि की संतुष्टि वसूल हो गया हमारा एक एक वोट! धूजते हुए हाथों से पूरी करता हूँ यह कविता! लड़खड़ाती हुई साँसों से पहुँचता हूँ अपने ही हस्ताक्षर तक! अराजक समकालीन कविता को देता हूँ नागरिक बोध का संस्कार! पुरस्कारों को दिखाता हूँ, अपने ललाट पर जड़ित, स्वाभिमानी दर्पण में उनका चेहरा! उछालता हूँ फूल ही फूल अभिनन्दन और तलवे चाटने के बीच खींचता हूँ,एक बहुत महीन लक़ीर हे ईश्वर! जिस दिन मेरे प्रधानमंत्री में हाथ नहीं धूजें मुझे साहस देना कि लिख सकूं एक बेहद ख़तरनाक कविता, और चीख़ सकूं रामधारी सिंह दिनकर के शिल्प में- "सिंहासन ख़ाली करो कि जनता आती है!"

माँ कामाख्या योनि स्तोत्र एवं कवच !

माँ कामाख्या योनि स्तोत्र एवं कवच 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ वामाचार पूजा में कामख्या योनि स्तोत्र एवं कवच पाठ माता कामख्या देवी की आराधना का अतिसुगम एवं शक्तिशाली पाठ है। सौभाग्य एवं मनोकामना पूर्ति की इच्छा रखने वाले साधक इसका नित्य पाठ करने से कुछ ही समय मे आश्चर्यजनक फल पा सकते है। इसका नित्य यथा सामर्थ्य अधिक से अधिक पाठ करने से फल शीघ्र मिलने की सम्भवना बढ़ती है। इसका पाठ निष्काम भाव से ही करें सकाम भाव से पाठ करने के लिये श्रीविद्या दीक्षित होना आवश्यक है तथा इसके नियम भी कठिन होते है। साधक पाठ करने से पहले माता का मणिपुर चक्र में नीचे दिए श्लोकों को पढ़ते हुए मानसिक ध्यान करके पाठ आरम्भ कर सकते है पाठ पूर्ण होने के बाद मानसिक रूप से ही पाठ को अपने गुरु को समर्पण कर आसन के आगे जल छोड़कर उसे माथे पर लगाकर प्राणाम करके एक पाठ सिद्ध कुंजिका के बाद देव्यापराध क्षमापन स्तोत्र का पाठ करें तो माता पाठ की त्रुटियों को क्षमा करके इच्छित फल प्रदान करती है। मां कामाख्या योनि स्त्रोत 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ ॐभग-रूपा जगन्माता सृष्टि-स्थिति-लयान्विता । दशविद्या - स्वरूपात्मा योनिर्मां पातु सर्वदा ।।१।। कोण-त्रय-युता देवि स्तुति-निन्दा-विवर्जिता । जगदानन्द-सम्भूता योनिर्मां पातु सर्वदा ।।२।। कात्र्रिकी - कुन्तलं रूपं योन्युपरि सुशोभितम् । भुक्ति-मुक्ति-प्रदा योनि: योनिर्मां पातु सर्वदा ।।३।। वीर्यरूपा शैलपुत्री मध्यस्थाने विराजिता । ब्रह्म-विष्णु-शिव श्रेष्ठा योनिर्मां पातु सर्वदा ।।४।। योनिमध्ये महाकाली छिद्ररूपा सुशोभना । सुखदा मदनागारा योनिर्मां पातु सर्वदा ।।५।। काल्यादि-योगिनी-देवी योनिकोणेषु संस्थिता । मनोहरा दुःख लभ्या योनिर्मां पातु सर्वदा ।।६।। सदा शिवो मेरु-रूपो योनिमध्ये वसेत् सदा । वैवल्यदा काममुक्ता योनिर्मां पातु सर्वदा ।।७।। सर्व-देव स्तुता योनि सर्व-देव-प्रपूजिता । सर्व-प्रसवकत्र्री त्वं योनिर्मां पातु सर्वदा ।।८।। सर्व-तीर्थ-मयी योनि: सर्व-पाप प्रणाशिनी । सर्वगेहे स्थिता योनि: योनिर्मां पातु सर्वदा ।।९।। मुक्तिदा धनदा देवी सुखदा कीर्तिदा तथा । आरोग्यदा वीर-रता पञ्च-तत्व-युता सदा ।।१०।। योनिस्तोत्रमिदं प्रोत्तं य: पठेत् योनि-सन्निधौ । शक्तिरूपा महादेवी तस्य गेहे सदा स्थिता ।।११।। ।। मां कामाख्या देवी कवच।। 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ महादेव उवाच शृणुष्व परमं गुहयं महाभयनिवर्तकम्।कामाख्याया: सुरश्रेष्ठ कवचं सर्व मंगलम्।।यस्य स्मरणमात्रेण योगिनी डाकिनीगणा:।राक्षस्यो विघ्नकारिण्यो याश्चान्या विघ्नकारिका:।।क्षुत्पिपासा तथा निद्रा तथान्ये ये च विघ्नदा:।दूरादपि पलायन्ते कवचस्य प्रसादत:।।निर्भयो जायते मत्र्यस्तेजस्वी भैरवोयम:।समासक्तमनाश्चापि जपहोमादिकर्मसु।भवेच्च मन्त्रतन्त्राणां निर्वघ्नेन सुसिद्घये। महादेव जी बोले-सुरश्रेष्ठ! अर्थ👉 भगवती कामाख्या का परम गोपनीय महाभय को दूर करने वाला तथा सर्वमंगलदायक वह कवच सुनिये, जिसकी कृपा तथा स्मरण मात्र से सभी योगिनी, डाकिनीगण, विघ्नकारी राक्षसियां तथा बाधा उत्पन्न करने वाले अन्य उपद्रव, भूख, प्यास, निद्रा तथा उत्पन्न विघ्नदायक दूर से ही पलायन कर जाते हैं। इस कवच के प्रभाव से मनुष्य भय रहित, तेजस्वी तथा भैरवतुल्य हो जाता है। जप, होम आदि कर्मों में समासक्त मन वाले भक्त की मंत्र-तंत्रों में सिद्घि निर्विघ्न हो जाती है।। कवच पाठ आरम्भ 〰️〰️〰️〰️〰️〰️ ओं प्राच्यां रक्षतु मे तारा कामरूपनिवासिनी।आग्नेय्यां षोडशी पातु याम्यां धूमावती स्वयम्।।नैर्ऋत्यां भैरवी पातु वारुण्यां भुवनेश्वरी।वायव्यां सततं पातु छिन्नमस्ता महेश्वरी।। कौबेर्यां पातु मे देवी श्रीविद्या बगलामुखी।ऐशान्यां पातु मे नित्यं महात्रिपुरसुन्दरी।। ऊध्र्वरक्षतु मे विद्या मातंगी पीठवासिनी।सर्वत: पातु मे नित्यं कामाख्या कलिकास्वयम्।। ब्रह्मरूपा महाविद्या सर्वविद्यामयी स्वयम्।शीर्षे रक्षतु मे दुर्गा भालं श्री भवगेहिनी।। त्रिपुरा भ्रूयुगे पातु शर्वाणी पातु नासिकाम।चक्षुषी चण्डिका पातु श्रोत्रे नीलसरस्वती।। मुखं सौम्यमुखी पातु ग्रीवां रक्षतु पार्वती।जिव्हां रक्षतु मे देवी जिव्हाललनभीषणा।। वाग्देवी वदनं पातु वक्ष: पातु महेश्वरी।बाहू महाभुजा पातु कराङ्गुली: सुरेश्वरी।। पृष्ठत: पातु भीमास्या कट्यां देवी दिगम्बरी।उदरं पातु मे नित्यं महाविद्या महोदरी।। उग्रतारा महादेवी जङ्घोरू परिरक्षतु।गुदं मुष्कं च मेदं च नाभिं च सुरसुंदरी।। पादाङ्गुली: सदा पातु भवानी त्रिदशेश्वरी।रक्तमासास्थिमज्जादीनपातु देवी शवासना।। ।महाभयेषु घोरेषु महाभयनिवारिणी।पातु देवी महामाया कामाख्यापीठवासिनी।। भस्माचलगता दिव्यसिंहासनकृताश्रया।पातु श्री कालिकादेवी सर्वोत्पातेषु सर्वदा।। रक्षाहीनं तु यत्स्थानं कवचेनापि वर्जितम्।तत्सर्वं सर्वदा पातु सर्वरक्षण कारिणी।। इदं तु परमं गुह्यं कवचं मुनिसत्तम।कामाख्या भयोक्तं ते सर्वरक्षाकरं परम्।। अनेन कृत्वा रक्षां तु निर्भय: साधको भवेत।न तं स्पृशेदभयं घोरं मन्त्रसिद्घि विरोधकम्।। जायते च मन: सिद्घिर्निर्विघ्नेन महामते।इदं यो धारयेत्कण्ठे बाहौ वा कवचं महत्।। अव्याहताज्ञ: स भवेत्सर्वविद्याविशारद:।सर्वत्र लभते सौख्यं मंगलं तु दिनेदिने।। य: पठेत्प्रयतो भूत्वा कवचं चेदमद्भुतम्।स देव्या: पदवीं याति सत्यं सत्यं न संशय:।। मांकामाख्या देवी कवच हिन्दी अर्थ 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ कामरूप में निवास करने वाली भगवती तारा पूर्व दिशा में, पोडशी देवी अग्निकोण में तथा स्वयं धूमावती दक्षिण दिशा में रक्षा करें।। नैऋत्यकोण में भैरवी, पश्चिम दिशा में भुवनेश्वरी और वायव्यकोण में भगवती महेश्वरी छिन्नमस्ता निरंतर मेरी रक्षा करें।। उत्तरदिशा में श्रीविद्यादेवी बगलामुखी तथा ईशानकोण में महात्रिपुर सुंदरी सदा मेरी रक्षा करें।। भगवती भगवती कामाख्या के शक्तिपीठ में निवास करने वाली मातंगी विद्या ऊध्र्वभाग में और भगवती कालिका कामाख्या स्वयं सर्वत्र मेरी नित्य रक्षा करें।। ब्रह्मरूपा महाविद्या सर्व विद्यामयी स्वयं दुर्गा सिर की रक्षा करें और भगवती श्री भवगेहिनी मेरे ललाट की रक्षा करें।। त्रिपुरा दोनों भौंहों की, शर्वाणी नासिका की, देवी चंडिका आँखों की तथा नीलसरस्वती दोनों कानों की रक्षा करें।। भगवती सौम्यमुखी मुख की, देवी पार्वती ग्रीवा की और जिव्हाललन भीषणा देवी मेरी जिव्हा की रक्षा करें।। वाग्देवी वदन की, भगवती महेश्वरी वक्ष: स्थल की, महाभुजा दोनों बाहु की तथा सुरेश्वरी हाथ की, अंगुलियों की रक्षा करें।। भीमास्या पृष्ठ भाग की, भगवती दिगम्बरी कटि प्रदेश की और महाविद्या महोदरी सर्वदा मेरे उदर की रक्षा करें।। महादेवी उग्रतारा जंघा और ऊरुओं की एवं सुरसुन्दरी गुदा, अण्डकोश, लिंग तथा नाभि की रक्षा करें।। भवानी त्रिदशेश्वरी सदा पैर की, अंगुलियों की रक्षा करें और देवी शवासना रक्त, मांस, अस्थि, मज्जा आदि की रक्षा करें।। भगवती कामाख्या शक्तिपीठ में निवास करने वाली, महाभय का निवारण करने वाली देवी महामाया भयंकर महाभय से रक्षा करें। भस्माचल पर स्थित दिव्य सिंहासन विराजमान रहने वाली श्री कालिका देवी सदा सभी प्रकार के विघ्नों से रक्षा करें।। जो स्थान कवच में नहीं कहा गया है, अतएव रक्षा से रहित है उन सबकी रक्षा सर्वदा भगवती सर्वरक्षकारिणी करे।। मुनिश्रेष्ठ! मेरे द्वारा आप से महामाया सभी प्रकार की रक्षा करने वाला भगवती कामाख्या का जो यह उत्तम कवच है वह अत्यन्त गोपनीय एवं श्रेष्ठ है।। इस कवच से रहित होकर साधक निर्भय हो जाता है। मन्त्र सिद्घि का विरोध करने वाले भयंकर भय उसका कभी स्पर्श तक नहीं करते हैं।। महामते! जो व्यक्ति इस महान कवच को कंठ में अथवा बाहु में धारण करता है उसे निर्विघ्न मनोवांछित फल मिलता है।। वह अमोघ आज्ञावाला होकर सभी विद्याओं में प्रवीण हो जाता है तथा सभी जगह दिनोंदिन मंगल और सुख प्राप्त करता है। जो जितेन्द्रिय व्यक्ति इस अद्भुत कवच का पाठ करता है वह भगवती के दिव्य धाम को जाता है। यह सत्य है, इसमें संशय नहीं है।। 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️

Ghazal-205

ग़ज़ल- बस'इफ''बट'में ही दिन गँँवाया न कर, तेरा जो तजुर्बा है,जाया न कर। बहुत झूठ बोले,न सच मर सका, हक़ीक़त से नज़रें चुराया न कर। उन्हें तेरी तकलीफ़ देती है सुख, लगे चोट तो तड़फड़ाया न कर। हुई ज़िंदगी जुर्रतों से शुरू, इसे सोच में ही गँवाया न कर। कभी दिल जो टूटा जुड़ेगा नहीं, हसीं ख़्वाब'यूँ ही'दिखाया न कर। सियासत में बातों के मतलब कहाँ? , ये झांसे हैं झांसों में आया न करl गिनीपिग न मुझको समझ दोस्त अब, किया जो न ख़ुद वो सुझाया न कर। ज़हां के ग़मों से नज़र फेर कर, मुहब्बत की ग़ज़लें ही गाया न कर।

Ghazal-204

ग़ज़ल- मुखौटों को लगाना तो,सियासी होशियारी है, अदाकारी पे जनता दिल हमेशा से जो हारी है। विवादित कुछ बयां देते हैं वो,सब सोच के यारो, हमें मुद्दों से भटकाने की ये इक होशियारी है। उचित अवसर के आने तक बचाने के लिए ख़ुद को, रणों को छोड़ने की राह दिखलाता “मुरारी” है। ग़रीबी गर ठहर जाती है लम्बे वक़्त तक,तो फिर, उन्हें लगने ये लगता है,यही क़िस्मत हम!री है। किसी मुर्गे सा मक़्तल में नज़र वो फेर लेता है, नहीं जो जानता आगे उसी की ही तो बारी है। बुझेगी आग भी जब जल चुकेगा फूस यह 'Maahir' बचा है फूस जब तक, बस तभी तक आग जारी है।

TARHI MUSHAYARA (GHAZAL)

ग़ज़ल दोस्तो,पेशे ख़िदमत है मेरी नयी ग़ज़ल,बराए मेहरबानी मुलाहिज़ा फ़रमाएँ,अर्ज़ किया है- क्या इसमें छिपा कुछ नया दस्तूर रखा है बच्चे का लक़ब किसलिए तैमूर रखा है //१ کیا اسمیں چھپا کچھ نیا دستور رکھا ہے بچے کا لقب کس لئے تیمور رکھا ہے//۱ मग़रिब के तमद्दुन के लिए क्या है ये वहशत क्या अक्से फ़िरंगी में जुदा नूर रखा है //२ مغرب کے تمدّن کے لیے کیا ہے یہ وحشت کیا عَکْس فرنگی میں جُدا نور رکھا ہے//۲ हैं संगे तशद्दुद पे टिके क़ौमी अक़ीदे नफ़रत ने हक़ीक़त से जिन्हें दूर रखा है //३ ہیں سنگِ تشدّد پے ٹکے قومی عقیدے نفرت نے حقیقت سے جنہیں دور رکھا ہے//۳ क्या दर्से बक़ा ऐसे पुजारी से मिलेगा जिसमें न कोई ताब न ही नूर रखा है //४ کیا درسِ بقا ایسے پُجاری سے ملےگا جس میں نہ کوئی تاب نہ ہی نور رکھا ہے//۴ बस एक मुलाक़ात में दिल हो गया बेज़ार क्या ख़ाक मज़ा वस्ल में भरपूर रखा है //५ بس ایک مُلاقات میں دِل ہو گیا بیزار کیا خاک مزا وصل میں بھرپو رکھا ہے//۵ उस तक चलो लेकर हमें ऐ बूद की हसरत जिसके नशे ने रूह को मसरूर रखा है //६ اُس تک چلو لیکر ہمیں اے بود کی حسرت جسکے نشے نے روح کو مسرور رکھا ہے//۶ नज़दीक से देखा तो वाँ कीड़ा था कोई 'राज़' हम सोचते थे शाख़ पे अंगूर रखा है //७ نزدیک سے دیکھا تو واں کیڑا تھا کوئی راز ہم سوچتے تھے شاخ پے انگور رکھا ہے//۷ राज़_नवादवी راز_نوادوی (ایک انجان شاعر) ●दस्तूर- प्रथा या रीति, परंपरा, रस्म, रीति रिवाज, परिपाटी ●लक़ब- उपनाम, उपाधि, ख़िताब, पदवी, ऐसा नाम जिसमें उस व्यक्ति के गुणों का पता चले, गुण, योग्यता अथवा पदसूचक नाम ●मग़रिब- पश्चिम, पश्चिम के देश ●तमद्दुन- संस्कृति, सभ्यता ●वहशत- पागलपन ●अक्से फ़िरंगी- विदेशी चेहरा, प्रतिबिंब, छाया, आकृति ●नूर- प्रकाश ●संगे तशद्दुद- हिंसा रूपी पत्थर ●क़ौमी अक़ीदे- सामुदायिक, समुदाय आधारित विश्वास ●दर्से बक़ा- अनश्वरता का पाठ ●इल्म- ज्ञान ●ताब- चमक, आभा ●बेज़ार- परांगमुख, विमुख ●वस्ल- मिलन ●बूद की हसरत- अस्तित्व में आने या बने रहने की चाह ●मसरूर- प्रफुल्ल, हर्षित, आनंदित, ख़ुश, उल्लसित ●वाँ- वहाँ

Ghazal-203

ग़ज़ल- भला हम,आप,सब,का चाहती हो, ज़ुबां पे आज बस वो शायरी हो। सुने जो भी,लगे उसको कि जैसे, ग़ज़ल में बात उसकी ही कही हो। ख़ुदा से मे री बस ये इल्तिज़ा है, न मुश्किल में किसी की ज़िन्दगी हो। मेरी कोशिश यही है दोस्तो बस, कि सब की ज़िन्दगी में रोशनी हो। सँभाला होश जब से,बस ये चाहा, जुदा कोई न अपनों से कभी हो, गुजारिश है समय की अब कलम से, ग़ज़ल बस वो लिखूँ जो जागती हो। सुनेगा ग़ौर से तुमको ज़माना, तुम्हारी बात में कुछ बात भी हो। 'माहीर'

Who Am I ?Poem in english

Who Am I? After retirement, with no job, no routine, and a quiet house echoing with silence… I finally began to discover my true self. Who am I? I built bungalows, raised farmhouses, invested in ventures big and small, yet now, I find myself bound within four simple walls. From bicycle to moped, bike to car, I chased speed and style — but now, I walk slowly, alone, inside my room. Nature smiled and asked, “Who are you, dear friend?” And I replied, “I am... just me.” I’ve seen states, countries, continents, but today, my journeys stretch only from the drawing room to the kitchen. I learned about cultures and traditions, but now, I simply long to understand my own family. Nature smiled again, “Who are you, dear friend?” And I said, “I am... just me.” Once I celebrated birthdays, engagements, weddings in grand style — but today, I count coins to buy vegetables. Once I fed extra bread to cows and dogs, today, even my own meal feels like a challenge. Nature asked once more, “Who are you, dear friend?” And I answered, “I am... just me.” Gold, silver, diamonds, pearls — sleep quietly in lockers. Suits and blazers — hang untouched in wardrobes. But now, I live in soft cotton, simple and free. I once mastered English, French, Hindi — but now, I find comfort in reading my mother tongue. I travelled endlessly for work, and now, I reflect on those profits and losses — measured in memories. I ran businesses, nurtured a family, built many connections, but now, my dearest companion is the kind neighbour next door. I once followed every rule, strived in education — but now I finally see what truly matters. After all of life’s highs and lows, in a quiet moment, my soul whispered back to me. Enough now… Get ready, O Traveller… It’s time to prepare for the final journey… Nature smiled gently, “Who are you, dear friend?” And I replied: “O Nature, You are me… And I am you. Once I soared in the skies, Now I touch the earth with grace. Forgive me… Give me one more chance to live… Not as a money-making machine, But as a true human being — With values, With family, With love.” To my all family members & ‘Friends' , wishing you love, strength, and peace.Pavan Sharma

वो दिल कहां से लाऊं..?

वो दिल कहां से लाऊं,जो चाय के कप प्लेट्स के खनकने की आवाज भुला दे! पत्थर तो हज़ारों ने मारे थे मुझे,लेकिन जो दिल पर लगा, वो एक दोस्त का मारा हुआ पत्थर था! पहले ज़माना था जब दिन भर चाय के बर्तन खनकते थे और हमारा ड्राइंग रूम दोस्तों के कहकहों से गूंजता था। याद है वे दिन, जब अजमेर में हर रात 10 बजे हम सारे दोस्त रेलवे स्टेशन के सामने क्लॉक टावर थाने के पास इकट्ठा होते थे। वहाँ से रेलवे स्टेशन के प्लेटफार्म पर चाय की चुस्कियाँ लेते, घूमते-घूमते गप्पे मारते, और दुनिया जहान की बातें करते। (उसे जमाने में चर्चा का टॉपिक आज की तरह मोदी का पक्ष विपक्ष नहीं होता था। कोई भी मित्र किसी भी विषय पर पूर्वाग्रह दूराग्रह से ग्रस्त नहीं होता था।) रात के 2 बजे तक ये सिलसिला चलता, और मज़े की बात? इसमें किसी दोस्त की गैरहाजिरी न के बराबर होती थी 100% अटेंडेंस! लेकिन अब? अब तो हाल ये है कि किसी दोस्त या रिश्तेदार का फोन आता है, तो मन में पहला ख्याल यही आता है, “कहीं PNB से एजुकेशन लोन की बात तो नहीं?” दोस्ती का मतलब जैसे ज़रूरत बनकर रह गया है। क्या हमने कभी सोचा कि सच्ची दोस्ती हमारे जीवन का कितना बड़ा खज़ाना है? आजकल दोस्ती का स्थान “नेटवर्क” शब्द ने ले लिया है। नेटवर्क, यानी बहुत से लोगों से ऐसी जान-पहचान जिसमें आप उनके लाभ के लिए काम करेंगे और वो आपके लिए। इसमें निस्वार्थ दोस्ती का स्थान कहाँ? अब दोस्ती वो नहीं रही जो बिना किसी स्वार्थ के दिल से दिल तक जाती थी। अब तो लोग “कनेक्शन्स” बनाते हैं, लिंक्डइन पर फॉलो करते हैं, और कॉफी मीटिंग्स में बिजनेस कार्ड्स बाँटते हैं। लेकिन क्या ये नेटवर्किंग उस गर्मजोशी की जगह ले सकती है, जो अजमेर की रातों में चाय की चुस्कियों और बेपरवाह गपशप में थी? हमारी ज़िंदगी में दोस्ती धीरे-धीरे कहीं खो सी रही है। ज्यादातर लोग अपने बीवी बच्चों और अधिक से अधिक 'डॉग' तक सीमित रह गए हैं। एक अमेरिकी सर्वे के मुताबिक, 1990 से अब तक “कोई करीबी दोस्त नहीं” कहने वालों की संख्या चार गुना बढ़ गई है। भारत में भले ही कोई औपचारिक सर्वे न हो, लेकिन शहरी ज़िंदगी को देखकर लगता है कि हम भी उसी राह पर हैं। ऑफिस, ट्रैफिक, मोबाइल स्क्रीन, और पारिवारिक ज़िम्मेदारियों के बीच हमने दोस्तों के लिए वक्त निकालना लगभग छोड़ दिया है। पहले गली-मोहल्ले में शाम को क्रिकेट, चाय की टपरी पर गपशप, या त्योहारों पर दोस्तों का जमावड़ा आम था। आज हम अकेले बैठकर सोशल मीडिया स्क्रॉल करते हैं, और दोस्ती व्हाट्सएप स्टेटस तक सिमट गई है। सच्चे दोस्त सिर्फ हंसी-मज़ाक का बहाना नहीं, बल्कि हमारी ज़िंदगी का आधार हैं। हार्वर्ड यूनिवर्सिटी के 80 साल के एक अध्ययन में साफ कहा गया है कि जीवन में खुशी और सेहत का सबसे बड़ा स्रोत धन या करियर की सफलता नहीं, बल्कि करीबी रिश्ते और दोस्ती है। जब आपका दोस्त आपकी बात सुनता है, बिना जज किए सलाह देता है, या बस आपके साथ हंसता है, तो तनाव अपने आप कम हो जाता है। एक अच्छा दोस्त डिप्रेशन और अकेलेपन से लड़ने में सबसे बड़ा सहारा होता है। शोध बताते हैं कि सामाजिक अलगाव से हृदय रोग और डिमेंशिया का खतरा बढ़ता है, जो रोज़ 15 सिगरेट पीने जितना नुकसानदायक है। दोस्तों के साथ समय बिताने से ब्लड प्रेशर नियंत्रित रहता है और इम्यूनिटी मज़बूत होती है। त्योहारों पर दोस्तों के साथ मस्ती, रात को लंबी गपशप, या एक साथ ट्रिप प्लान करना – ये वो पल हैं जो ज़िंदगी को यादगार बनाते हैं। पहले दोस्ती अपने आप बन जाती थी – स्कूल, कॉलेज, मोहल्ले, या धार्मिक आयोजनों में। लेकिन अब ज़िंदगी की भागदौड़ में दोस्ती को वक्त देना एक सचेत प्रयास मांगता है। पहले लोग मंदिर, गुरुद्वारे, या सामुदायिक आयोजनों में मिलते थे; अब हम अपने फोन और पालतू जानवरों में ज्यादा व्यस्त हैं। हां, पालतू जानवर! मेरे कई दोस्तों ने अपने डॉगी की सैर के चक्कर में मिलना-जुलना छोड़ दिया है। बॉनी वेयर की किताब में एक बात दिल को छू जाती है: “काश मैं अपने दोस्तों के संपर्क में रहता।” ये पछतावा हमें आज से सबक लेने की याद दिलाता है। दोस्ती में समय, मेहनत, और सच्चाई चाहिए। एक फोन कॉल, एक छोटी-सी मुलाकात, या बस एक मैसेज – ये छोटे-छोटे कदम दोस्ती को ज़िंदा रख सकते हैं। दोस्ती अब हमारे रोज़मर्रा का हिस्सा नहीं रही; ये अब तभी संभव है जब बाकी ज़िम्मेदारियां पूरी करने के बाद वक्त बचे। लेकिन दोस्ती को विलासिता नहीं, ज़रूरत बनाएं। अपने दोस्तों को समय दें – उनके साथ कॉफी पीएं, पुरानी यादें ताज़ा करें, या एक छोटा-सा गेट-टुगेदर प्लान करें। माफ करें, भूलें, और ज़रूरत पड़े तो माफी मांग लें। साथ मिलकर यात्राएं प्लान करें, हंसी-मज़ाक करें, और यादें बनाएं। जैसा कि मिर्ज़ा ग़ालिब ने कहा, “दोस्तों के साथ जी लेने का मौका दे दे ऐ खुदा… तेरे साथ तो मरने के बाद भी रह लेंगे” तो आज ही अपने दोस्त को फोन करें, मिलने का प्लान बनाएं, मग के बजाय कप प्लेट्स में चाय पीने पिलाने का सिलसिला फिर से शुरू करें और अपनी ज़िंदगी में दोस्ती का रंग फिर से भरें। चलते चलते व्हाट्सएप के फोर्वेडेड मैसेजज को पर्सनल कॉल का विकल्प न बनाएं।

अमर शहीद मंगल पाण्डे

19 जुलाई / जन्मदिवस अमर शहीद मंगल पाण्डे अंग्रेजी शासन के विरुद्ध चले लम्बे संग्राम का बिगुल बजाने वाले पहले क्रान्तिवीर मंगल पांडे का जन्म 19 जुलाई 1827 ग्राम नगवा (बलिया, उत्तर प्रदेश) में हुआ था। युवावस्था में ही वे सेना में भर्ती हो गये थे। उन दिनों सैनिक छावनियों में गुलामी के विरुद्ध आग सुलग रही थी। अंग्रेज जानते थे कि हिन्दू गाय को पवित्र मानते हैं, जबकि मुसलमान सूअर से घृणा करते हैं। फिर भी वे सैनिकों को जो कारतूस देते थे, उनमें गाय और सूअर की चर्बी मिली होती थी। इन्हें सैनिक अपने मुँह से खोलते थे। ऐसा बहुत समय से चल रहा था; पर सैनिकों को इनका सच मालूम नहीं था। मंगल पांडे उस समय बैरकपुर में 34 वीं हिन्दुस्तानी बटालियन में तैनात थे। वहाँ पानी पिलाने वाले एक हिन्दू ने इसकी जानकारी सैनिकों को दी। इससे सैनिकों में आक्रोश फैल गया। मंगल पांडे से रहा नहीं गया। 29 मार्च, 1857 को उन्होंने विद्रोह कर दिया। एक भारतीय हवलदार मेजर ने जाकर सार्जेण्ट मेजर ह्यूसन को यह सब बताया। इस पर मेजर घोड़े पर बैठकर छावनी की ओर चल दिया। वहां मंगल पांडे सैनिकों से कह रहे थे कि अंग्रेज हमारे धर्म को भ्रष्ट कर रहे हैं। हमें उसकी नौकरी छोड़ देनी चाहिए। मैंने प्रतिज्ञा की है कि जो भी अंग्रेज मेरे सामने आयेगा, मैं उसे मार दूँगा। सार्जेण्ट मेजर ह्यूसन ने सैनिकों को मंगल पांडे को पकड़ने को कहा; पर तब तक मंगल पांडे की गोली ने उसका सीना छलनी कर दिया। उसकी लाश घोड़े से नीचे आ गिरी। गोली की आवाज सुनकर एक अंग्रेज लेफ्टिनेण्ट वहाँ आ पहुँचा। मंगल पांडे ने उस पर भी गोली चलाई; पर वह बचकर घोड़े से कूद गया। इस पर मंगल पांडे उस पर झपट पड़े और तलवार से उसका काम तमाम कर दिया। लेफ्टिनेण्ट की सहायता के लिए एक अन्य सार्जेण्ट मेजर आया; पर वह भी मंगल पांडे के हाथों मारा गया। तब तक चारों ओर शोर मच गया। 34 वीं पल्टन के कर्नल हीलट ने भारतीय सैनिकों को मंगल पांडे को पकड़ने का आदेश दिया; पर वे इसके लिए तैयार नहीं हुए। इस पर अंग्रेज सैनिकों को बुलाया गया। अब मंगल पांडे चारों ओर से घिर गये। वे समझ गये कि अब बचना असम्भव है। अतः उन्होंने अपनी बन्दूक से स्वयं को ही गोली मार ली; पर उससे वे मरे नहीं, अपितु घायल होकर गिर पड़े। इस पर अंग्रेज सैनिकों ने उन्हें पकड़ लिया। अब मंगल पांडे पर सैनिक न्यायालय में मुकदमा चलाया गया। उन्होंने कहा, ‘‘मैं अंग्रेजों को अपने देश का भाग्यविधाता नहीं मानता। देश को आजाद कराना यदि अपराध है, तो मैं हर दण्ड भुगतने को तैयार हूँ।’’ न्यायाधीश ने उन्हें फाँसी की सजा दी और इसके लिए 18 अप्रैल का दिन निर्धारित किया; पर अंग्रेजों ने देश भर में विद्रोह फैलने के डर से घायल अवस्था में ही 8 अप्रैल, 1857 को उन्हें फाँसी दे दी। बैरकपुर छावनी में कोई उन्हं फाँसी देने को तैयार नहीं हुआ। अतः कोलकाता से चार जल्लाद जबरन बुलाने पड़े। मंगल पांडे ने क्रान्ति की जो मशाल जलाई, उसने आगे चलकर 1857 के व्यापक स्वाधीनता संग्राम का रूप लिया। यद्यपि भारत 1947 में स्वतन्त्र हुआ; पर उस प्रथम क्रान्तिकारी मंगल पांडे के बलिदान को सदा श्रद्धापूर्वक स्मरण किया जाता है।

कुत्ते पाले हैं मैंने।

कुत्ते पाले हैं मैंने। बारी बारी लगभग दस दस साल एक फीमेल डाबरमेन और एक पामेरियन डॉग घर मे रहे और फिर कुछ महीनों तक एक बच्चा बीगल साथ में रहा। कुत्तों की इतने दिन की संगत के बाद मेरी राय यह कि आदमी को कुत्ते पालने से परहेज करना चाहिए। इस बात से इनकार नही कि वो आपसे प्यार करते है पर इनका प्यार अग्निसाक्षी के नाना पाटेकर टाईप का होता है। तुम किसी और को चाहोगी तो मुश्किल होगा जैसा। आप किसी और से प्यार जताएँगे तो ये गुर्राएँगे ।कोई आप के नज़दीक आना चाहेगा तो ये नाराज़ होंगे। ये हों तो आपका कहीं आना जाना मुश्किल। आप कहीं गए तो ये देवदास के रोल मे घुस जाएँगे। खाना पीना छोड़ देगें। टसुए बहाएँगे। आप जिनके भरोसे छोड़ आएँ है उसे,उसका खाना खराब कर देगें। और कुत्ते से दूर रहकर आपके हाल भी बेहाल होंगे,चाहे आप रामेश्वर मे मोक्ष की कामना कर रहे हों या गोवा मे सुंदरियाँ ताड़ रहे हों ,कुत्ता आपके मन मे घुसा रहेगा और आप कुछ नही कर पाएंगे। और आप इस गलतफहमी मे मत रहिए कि आपने कुत्ता पाला है। दरअसल उसने आपको पाला हुआ होता है। सुबह शाम टहलना होता है उसे। सुबह तेज बारिश हो रही है। खतरनाक किस्म की ठंड है। कोहरा छाया हुआ है।आप रात को देर से सोए हैं। तबीयत ठीक नही लग रही आपको ,आप बिस्तर मे घुसे रहना चाहते है। पर आपका कुत्ता सुबह छह बजते ही आपकी छाती पर चढ़ बैठेगा। आप चाहे या न चाहे आपको उसकी बेल्ट पकड़कर कॉलोनी पार्क सड़कों पर टहलना ही पड़ेगा। आप नही टहलाते कुत्ते को फिर,वो आपको टहलता है ,वो जिधर जाना चाहे जाता है और आप उसके पीछे पीछे घिसटते है।फिर कुत्ते को नहलाना धुलाना,मना मना कर खाना खिलाना ऐसे काम जैसे आपने एक और बच्चा पैदा कर लिया हो और मुश्किल यह भी कि यह बच्चा कभी बड़ा नहीं होता। और फीमेल डॉग पालना तो और बवाल ए जान। उसके बड़े होते ही मोहल्ले शहर के तमाम कुत्ते, लार टपकाते हुए आपके घर के आसपास मंडराने लगते है। फीमेल डॉग को हर कुत्ता पसंद आ जाता है और उसकी चरित्र रक्षा के प्रबंध करने मे आपकी नींदे हराम हो जाती है।आप झुंझलाते है। नाराज़ होते है ,पैर पटकते है और फिर हार जाते है।आपकी डॉगी आपके हर पहरेदार को मात दे देती है। हर चारदीवारी फलांग जाती है। माँ बनती है। दस बारह छोटे छोटे पिल्लों के नाना बनते है आप और उन्हें ठिकाने लगाने में आपकी अपनी नानी मर जाती है। और फिर कुत्ता किसी को न काटे तो वो काहे का कुत्ता। आपका कुत्ता किसी को काट ले। खरोंच दे तो इससे बडी आफत कोई दूसरी नही। जिसे काटा खरोंचा हो आपके कुत्ते ने उससे विनती कीजिए आप। लड़िये झगड़िए मनाइए उसे। उसका इलाज करवाइए। और जब ये सब करते है आप तो और कुछ करने लायक़ नही रह जाते। कुत्ता यदि पड़ोसी के लॉन में पेशाब न करे तो उसका कुत्ता होना गिना नहीं जाता। ऐसे में कुत्ते पालने वाले को पड़ोसी गालियाँ देते ही है चाहे वो मन ही मन दी गई हो। कुत्ता पालने वाला आदमी कुत्ते का बंधक होता है ,कुत्ता उसकी दिनचर्या निर्धारित करता है और जब तक जिंदा रहता है आदमी को उसका गुलाम होकर रहना पड़ता है। उससे कुत्तों की गंध आने लगती है ,दूसरों के कुत्ते भी उसे देख पूंछ हिलाने लगते है। वो फिर कुत्तो की ही दुनिया मे रहता है और दूसरे लोग उससे मिलने मे कतराते है। और फिर जब कुत्ता मरता है तो ऐसा लगता है कि घर का कोई मेंबर मर गया हो। सन्नाटा छा जाता है घर मे। आप उदास होते है,मातम मनाते है और फिर खुद से ,अपनी बीबी से,बच्चों से,आने जाने वालो से बस कुत्ते की बात करते है।कसम खाते है कि अब कभी कुत्ता नही पालेंगे और फिर कुछ दिनों महीनों बाद एक दूसरा कुत्ता आपके घर मे होता है। कुत्ता पालना आफत है। जी का जंजाल है।कुत्ते पालने से बचना चाहिए आदमी को। कुत्तों से प्यार करना अपने अपहरणकर्ता के प्रेम में पड़ जाने जैसा है। कुत्तों से प्यार करने का बहुत मन हो तो पड़ोसी या किसी दोस्त के कुत्ते से बतिया कर,सहला कर संतोष कर लेना चाहिए। यह सलाह इसलिए क्योंकि हम कुत्ता पाल चुके और अब कुत्तों से दूर रहते है। 'Paavan Teerth'

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक

1 अगस्त/पुण्यतिथि लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक समाज सुधारक और स्वतंत्रता सेनानी बाल गंगाधर तिलक का जन्म महाराष्ट्र के कोंकण प्रदेश (रत्नागिरि) के चिक्कन गांव में 23 जुलाई 1856 को हुआ था। इनके पिता गंगाधर रामचंद्र तिलक एक धर्मनिष्ठ ब्राह्मण थे। अपने परिश्रम के बल पर शाला के मेधावी छात्रों में बाल गंगाधर तिलक की गिनती होती थी। वे पढ़ने के साथ-साथ प्रतिदिन नियमित रूप से व्यायाम भी करते थे, अतः उनका शरीर स्वस्थ और पुष्ट था। 1879 में उन्होंने बी.ए. तथा कानून की परीक्षा उत्तीर्ण की। घरवाले और उनके मित्र संबंधी यह आशा कर रहे थे कि तिलक वकालत कर धन कमाएंगे और वंश के गौरव को बढ़ाएंगे, परंतु तिलक ने प्रारंभ से ही जनता की सेवा का व्रत धारण कर लिया था। परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद उन्होंने अपनी सेवाएं पूर्ण रूप से एक शिक्षण संस्था के निर्माण को दे दीं। सन्‌ 1880 में न्यू इंग्लिश स्कूल और कुछ साल बाद फर्ग्युसन कॉलेज की स्थापना की। तिलक का यह कथन कि 'स्वराज मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है और मैं इसे लेकर रहूंगा' बहुत प्रसिद्ध हुआ। लोग उन्हें आदर से 'लोकमान्य' नाम से पुकार कर सम्मानित करते थे। उन्हें हिन्दू राष्ट्रवाद का पिता भी कहा जाता है। लोकमान्य तिलक ने जनजागृति का कार्यक्रम पूरा करने के लिए महाराष्ट्र में गणेश उत्सव तथा शिवाजी उत्सव सप्ताह भर मनाना प्रारंभ किया। इन त्योहारों के माध्यम से जनता में देशप्रेम और अंगरेजों के अन्यायों के विरुद्ध संघर्ष का साहस भरा गया। तिलक के क्रांतिकारी कदमों से अंगरेज बौखला गए और उन पर राष्ट्रद्रोह का मुकदमा चलाकर छ: साल के लिए 'देश निकाला' का दंड दिया और बर्मा की मांडले जेल भेज दिया गया। इस अवधि में तिलक ने गीता का अध्ययन किया और गीता रहस्य नामक भाष्य भी लिखा। तिलक के जेल से छूटने के बाद जब उनका गीता रहस्य प्रकाशित हुआ तो उसका प्रचार-प्रसार आंधी-तूफान की तरह बढ़ा और जनमानस उससे अत्यधिक आंदोलित हुआ। तिलक ने मराठी में 'मराठा दर्पण व केसरी' नाम से दो दैनिक समाचार पत्र शुरू किए जो जनता में काफी लोकप्रिय हुए। जिसमें तिलक ने अंग्रेजी शासन की क्रूरता और भारतीय संस्कृति के प्रति हीनभावना की बहुत आलोचना की। उन्होंने ब्रिटिश सरकार को भारतीयों को तुरंत पूर्ण स्वराज देने की मांग की, जिसके फलस्वरूप और केसरी में छपने वाले उनके लेखों की वजह से उन्हें कई बार जेल भेजा गया। तिलक अपने क्रांतिकारी विचारों के लिए भी जाने जाते थे। ऐसे भारत के वीर स्वतंत्रता सेनानी का निधन 1 अगस्त 1920 को मुंबई में हुआ।

जहांगीर रतनजी दादाभाई टाटा

29 जुलाई/जन्मदिन जहांगीर रतनजी दादाभाई टाटा जे॰आर॰डी॰ टाटा का जन्म 29 जुलाई 1904 पेरिस, फ्रांस मे हुआ। वे रतनजी दादाभाई टाटा और उनकी फ्रांसीसी पत्नी सुज़ेन्न ब्रीरे (en:Suzanne Briere) के पांच संतानो मे से दुसरे थे। जेआरडी टाटा वायुयान उद्योग और अन्य उद्योगो के अग्रणी थे। 10 फरवरी 1929 को टाटा ने भारत में जारी किया गया पहला पायलट लाइसेंस प्राप्त किया। सन् 1932 में उन्होंने भारत की पहली वाणिज्यिक एयरलाइन, टाटा एयरलाइंस की स्थापना की जो बाद में वर्ष 1946 में भारत की राष्ट्रीय एयरलाइन , एयर इंडिया बनी। बाद में उन्हें भारतीय नागर विमानन के पिता के रूप में जाना जाने लगा। सन् 1925 में वे एक अवैतनिक प्रशिक्षु के रूप में टाटा एंड संस में शामिल हो गए।वर्ष 1938 में उन्हें भारत के सबसे बड़े औद्योगिक समूह टाटा एंड संस का अध्यक्ष चुना गया। दशकों तक उन्होंने स्टील, इंजीनियरिंग, ऊर्जा, रसायन और आतिथ्य के क्षेत्र में कार्यरत विशाल टाटा समूह की कंपनियों का निर्देशन किया। वह अपने व्यापारिक क्षेत्र में सफलता और उच्च नैतिक मानकों के लिए बहुत प्रसिद्ध थे। उनकी अध्यक्षता में टाटा समूह की संपत्ति $ 1000 लाख से बढ़कर 5 अरब अमरीकी डालर हो गयी। उन्होंने अपने नेतृत्व में 14 उद्यमों के साथ शुरूआत की थी ,जो 26 जुलाई 1988 को उनके पद छोड़ने के समय,बढ़कर 95 उद्यमों का एक विशाल समूह बन गया।उन्होंने वर्ष 1968 में टाटा कंप्यूटर सेंटर(अब टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज) और सन् 1979 में टाटा स्टील की स्थापना की। वे 50 वर्ष से अधिक समय तक , सन् 1932 में स्थापित सर दोराबजी टाटा ट्रस्ट के ट्रस्टी थे। उनके मार्गदर्शन में इस ट्रस्ट ने राष्ट्रीय महत्व के कई संस्थनों की स्थापना की , जैसे टाटा सामाजिक विज्ञान संस्थान (टीआईएसएस, 1936),टाटा मूलभूत अनुसंधान संस्थान( टीआईएफआर, 1945), एशिया का पहला कैंसर अस्पताल, टाटा मेमोरियल सेंटर और प्रदर्शन कला के लिए राष्ट्रीय केंद्र। सन् 1945 में उन्होंने टाटा मोटर्स की स्थापना की। जेआरडी टाटा ने सन् 1948 में भारत की पहली अंतरराष्ट्रीय एयरलाइन के रूप में एयर इंडिया इंटरनेशनल का शुभारंभ किया। सन् 1953 में भारत सरकार ने उन्हें एयर इंडिया का अध्यक्ष और इंडियन एयरलाइंस के बोर्ड का निर्देशक नियुक्त किया। वे इस पद पर 25 साल तक बने रहे। जेआरडी टाटा ने अपने कम्पनी के कर्मचारियों के हित के लिए कई नीतियाँ अपनाई। सन् 1956 में, उन्होंने कंपनी के मामलों में श्रमिकों को एक मजबूत आवाज देने के लिए 'प्रबंधन के साथ कर्मचारी एसोसिएशन' कार्यक्रम की शुरूआत की।उन्होंने प्रति दिन आठ घंटे काम , नि: शुल्क चिकित्सा सहायता, कामगार दुर्घटना क्षतिपूर्ति जैसी योजनाओं को अपनाया। जेआरडी टाटा को कई पुरस्कारों से सम्मानित किया गया है। भारतीय वायु सेना ने उन्हें ग्रुप कैप्टन की मानद पद से सम्मानित किया था और बाद में उन्हें एयर कमोडोर पद पर पदोन्नत किया गया और फिर 1 अप्रैल 1974 को एयर वाइस मार्शल पद दिया गया। विमानन के लिए उनको कई अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार दिया गया -मार्च 1979 में टोनी जेनस पुरस्कार ,सन् 1995 में फेडरेशन ऐरोनॉटिक इंटरनेशनेल द्वारा गोल्ड एयर पदक,सन् 1986 में कनाडा स्थित अंतर्राष्ट्रीय नागर विमानन संगठन द्वारा एडवर्ड वार्नर पुरस्कार और सन् 1988 में डैनियल गुग्नेइनिम अवार्ड। सन् 1955 में उन्हें पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया। उनके नि: स्वार्थ मानवीय प्रयासों के लिए ,सन् 1992 में जेआरडी टाटा को भारत के सर्वोच्च नागरिक सम्मान, भारत रत्न से सम्मानित किया गया। 29 नवंबर 1993 को गुर्दे में संक्रमण के कारण जिनेवा में 89 वर्ष की आयु में उनका निधन हो गया। उनकी मृत्यु पर भारतीय संसद उनकी स्मृति में स्थगित कर दी गई थी।

GENETIC CURE OF DIABETES

डायबिटीज वाले , जल्दी ही चाहिए यही कमाल। प्री-प्रिनसुलिन से इंसुलिन तक?️ आईएनएस इंसुलिन जीन का अनुवाद राइबोसोम पर अग्न्याशय के लैंगरहैंस के आइलेट्स के बीटा कोशिकाओं में किया जाता है । अनुवाद का उत्पाद एक निष्क्रिय पॉलीपेप्टाइड है जिसमें 106 अमीनो एसिड होते हैं जिन्हें प्री-प्रोन्सुलिन के रूप में जाना जाता है । प्री-प्रिनसुलिन राइबोसोम से रफ एंडोप्लाज्मिक रेटिकुलम के चैनलों में चला जाता है जहां यह एक प्रोटीज एंजाइम द्वारा कार्य किया जाता है जो इस अणु के प्रमुख 24 अमीनो एसिड को हटा देता है, एक संकेत अनुक्रम । यह 82 अमीनो एसिड के एक निष्क्रिय अग्रदूत अणु को छोड़ देता है जिसे प्रिनसुलिन कहा जाता है । प्रोन्सुलिन को गोल्गी कॉम्प्लेक्स में ले जाया जाता है जहां यह आगे संशोधन से गुजरता है । गोल्गी कॉम्प्लेक्स में, प्रोन्सुलिन अणुओं को मोड़ दिया जाता है, सहसंयोजक बंधन बनते हैं और अणुओं को झिल्ली-बाध्य स्रावी कणिकाओं में पैक किया जाता है । स्रावी कणिकाओं के भीतर, प्रिनसुलिन को एक एंजाइम द्वारा साफ किया जाता है जो 31 अमीनो एसिड के एक खंड को हटा देता है, जिसे सी चेन (या सी पेप्टाइड) कहा जाता है । शेष सक्रिय इंसुलिन अणुओं का निर्माण करता है, प्रत्येक एक ए श्रृंखला और एक बी श्रृंखला से बना होता है जो मजबूत सहसंयोजक डाइसल्फ़ाइड - एस – एस - बॉन्ड द्वारा एक साथ रखा जाता है । सक्रिय इंसुलिन को तब गोल्गी कॉम्प्लेक्स से रक्तप्रवाह में आवश्यकतानुसार निर्यात किया जाता है । इसकी रिहाई का संकेत सामान्य रक्त शर्करा के स्तर में वृद्धि है । यह आंकड़ा प्री-प्रोन्सुलिन को इंसुलिन में बदलने की इस प्रक्रिया का एक सरलीकृत सारांश देता है । प्री-प्रिनसुलिन से सक्रिय इंसुलिन के गठन को दर्शाने वाला आरेख। (ए) प्री-प्रिनसुलिन, जीन अनुवाद का तत्काल उत्पाद, प्रमुख सिग्नल अनुक्रम को हटाकर जल्दी से प्रिनसुलिन में संशोधित किया जाता है । (बी) इंसुलिन के निष्क्रिय अग्रदूत प्रोन्सुलिन को सी श्रृंखला को हटाकर सक्रिय इंसुलिन में संशोधित किया जाता है । (सी) सक्रिय इंसुलिन सी टुकड़े को हटाने से बनता है, ए और बी श्रृंखलाओं को सहसंयोजक डाइसल्फ़ाइड बांड द्वारा एक साथ रखा जाता है ।

Ghazal--202

दोस्तों पेश-ए-ख़िदमत है एक पुरानी ग़ज़ल अर्ज़ किया है- ग़ज़ल -------------------------- सियासत की बिना पे क्या किसी को तू बनाता है यहाँ मुस्लिम का बधना भी कोई हिन्दू बनाता है//१ हमारी खाट को जुम्मन चचा बुनते हैं हाथों से और उसके वास्ते तोशक मदन काकू बनाता है//२ पढ़ा लिक्खा हो नेता या नहीं,मंसूब इससे क्या यहाँ सरकार की हर योजना बाबू बनाता है//३ अगर आदम का बच्चा है तो मिहनत की डगर पर चल किसी के सामने क्यों भीख का चुल्लू बनाता है//४ कोई चिमटा बनाता है बनाने के लिए रोटी उसी लोहे के टुकड़े से कोई चाक़ू बनाता है//५ ख़िरद को रब की जानिब मोड़ती हैं मुश्किलें जाँ की ज़मन का दर्द ही इंसाँ को चारा जू बनाता है//६ अगर शौहर को तू लड़ने की ताक़त दे नहीं सकता तो फिर बीवी को क्यों तू ऐ ख़ुदा गबरू बनाता है//७ हक़ीक़त 'र' पे भी है अयाँ ऐ ख़ालिके दुन्या मिटा सकता है उसको कौन जिसको तू बनाता है //८ सियासत-राजनीति बिना पे-आधार पे बधना-लोटा,utensil(made of clay)with a pipe to wash;for ablution तोशक-खाट पे बिछाने वाला गद्दा मंसूब-संबंधित आदम-आदमी चुल्लू-अंजुलि ख़िरद-बुद्धि,अक़्ल जानिब-तरफ़,जानिब ज़मन-समय,ज़माना,काल,संसार चारा जू-समाधान ढूँढने वाला गबरू-हृष्ट-पुष्ट अयाँ-स्पष्ट,ज़ाहिर,दृष्टिगोचर,प्रकट,व्यक्त ख़ालिके दुन्या-दुनिया की रचना करने वाला अर्थात ईश्वर

Ghazal-201

ग़ज़ल ----- अर्ज़ किया है- चिंता नहीं है कुछ,मेरी दुनिया मज़े में है सागर में खो के जैसे कि दर्या मज़े में है //1 मैंने सुना है जागना-सोना मज़े में है मेरे बिना भी आपकी दुनिया मज़े में है //2 उसको भी आसमान की आती है याद पर हम सोचते हैं पिंजरे में तोता मज़े में है //3 इक हम है तेरे नाम जो हर सू हुए ज़लील जबकी तेरी गली का भी कुत्ता मज़े में है //4 दुनिया में आके उसको भी रोना है ज़ार ज़ार जब तक है मां के पेट में, बच्चा मज़े में है //5 कब तक मनाए ख़ैर वो, रेशम के वास्ते जब तक उबाला जाए न, कीड़ा मज़े में है //6 खा लो तुम अपने पैसों से तुमको अगर है भूख रहने दो मेरी जेब में रुपया, मज़े में है //7 आख़िर में उसको जाना है लोगों के पेट में जब तक नहीं बिका है, समोसा मज़े में है //8 थूका कभी तो जाएगा नाली में एक दिन जब तक है मुँह में आपके, गुटखा मज़े में है //9 मैंने सुना है बीवी के बाद-अज़-वफ़ात 'राज़' साली के साथ इन दिनों जीजा मज़े में है //10 چنتا نہیں ہے کچھ، میری دنیا مزے میں ہے ساگر میں کھو کے جیسے کہ دریا مزے میں ہے //1 میں نے سنا ہے جاگنا سونا مزے میں ہے میرے بنا بھی آپکی دنیا مزے میں ہے //2 اسکو بھی آسمان کی آتی ہے یاد پر ہم سوچتے ہیں پنجرے میں طوطا مزے میں ہے //3 اک ہم ہے تیرے نام جو ہر سو ہوئے ذلیل جب کی تیری گلی کا بھی کتا مزے میں ہے //4 دنیا میں آکے اسکو بھی رونا ہے زار زار جب تک ہے ماں کے پیٹ میں، بچہ مزے میں ہے //5 کب تک منائے خیر وہ، ریشم کے واسطے جب تک ابالا جائے نہ، کیڑا مزے میں ہے //6 کھا لو تم اپنے پیسوں سے تم کو اگر ہے بھوک رہنے دو میری جیب میں روپیہ، مزے میں ہے //7 آخر میں اسکو جانا ہے لوگوں کے پیٹ میں جب تک نہیں بکا ہے، سموسہ مزے میں ہے //8 تھوکا کبھی تو جائیگا نالی میں ایک دن جب تک ہے منہ میں آپکے، گٹکھا مزے میں ہے //9 میں نے سنا ہے بیوی کے بعد از وفات 'راز' سالی کے ساتھ ان دنوں جیجا مزے میں ہے //10 ज़लील-जिसका अपमान हुआ हो,बेइज़्ज़त,अपमानित,तिरस्कृत ज़ार ज़ार-अत्यधिक फूट-फूट कर बाद-अज़-वफ़ात-मृत्यु के बाद

Aurat Ka Aashkar

वैश्या की जरूरत ही आदमी को तब पड़ी,जब उसकी खुद की पत्नी ने उसे ना कहना शुरु कर दिया। खासकर तब, जब औरतों ने अपनी नाजायज मांगों को पूरा कराने के लिए सेक्स को अपना हथियार बनाना और अपने पति को सताना शुरू कर दिया। कड़वी है, पर सच्चाई भी है। हमारा उद्देश्य किसी की भावनाओं को ठेस पहुंचाना नहीं है, परंतु सच्चाई को सामने रखना भी परम आवश्यक है। इसीलिए किसी की भावनाओं को ठेस पहुंची हो तो, हम पहले ही क्षमा मांगते हैं। 'Paavan Teerth'

Ghazal-200

ग़ज़ल - तबीयत फिर, मचलना चाहती है, किसी से वो उलझना चाहती है। मुख़ालिफ़ ताक़तों की साजिशों से, जुबां फिर से फिसलना चाहती है। मुख़ालिफ़=विरोधी अना मेरी जवां होने की ख़ातिर, चुनौती से निखरना चाहती है। अना= स्व, self वजूदों पे दिखे ख़तरे तो जाने, फ़िजा ख़ुुद को बदलना चाहती है। मुसीबत सामने पाई तो समझे, मेरी क़िस्मत सँवरना चाहती है। जो देखीं कोशिशें जीने की तब से, उदासी हाथ मलना चाहती है। सियासी सोच से हुशियार रहना, वो फिर चेहरा बदलना चाहती है। जो देखा जोश बच्चों का तो नई उम्मीद पलना चाहती है।

Aurat ka AASHKAR

कामसूत्र महर्षि वात्स्यायन द्वारा रचित भारत का एक प्राचीन कामशास्त्र ग्रंथ है। यह विश्व की प्रथम यौन संहिता है जिसमें यौन प्रेम के मनोशारीरिक सिद्धान्तों तथा प्रयोग की विस्तृत व्याख्या एवं विवेचना की गई है। वात्स्यायन ने जब कामसूत्र लिखा तब अरेंज्ड मैरिज होती थी और तब फोन,फेसबुक या व्हाट्सऐप भी नहीं थे कि शादी से पहले ही दोनों गुड नाइट स्वीटू वाला मैसेज भेजकर सोएं. हालत तो ये थी कि लड़का लड़की एक दूसरे की शकल भी ढंग से सुहाग रात के दिन ही देखते थे. स दिन बालक क्या करे, क्या न करे,इसको लेकर गुरु वात्स्यायन ने कुछ ज्ञान दिया है. लिया जाए. क्योंकि कामसूत्र आज भी काम का है. 1. शादी के बाद के पहले तीन दिन पति और पत्नी बिस्तर पे न सो कर ज़मीन पर सोयें. कम्फर्ट से दूर रहें और सेक्स का कीड़ा दिमाग में न आने दें. 2. तीन दिनों तक बिना नमक का खाना खाएं. 3. अगले सात दिनों तक पति और पत्नी एक दूसरे को समझने में बिताएं. इसके लिए वो साथ में म्यूजिक सुनें, खाना साथ में खाएं और शादी में आये मेहमानों से मिलें. इससे उनका रिश्ता मजबूत होगा. 4. दसवीं रात को पुरुष स्त्री की तरफ हौले- हौले बढ़े. वात्स्यायन की मानें तो औरतें नाज़ुक स्वभाव की होती हैं, और सेक्स में किसी भी तरह की जल्दबाजी से डर सकती हैं. ऐसी स्थिति में शायद वो सेक्स से हमेशा डरती रहें. इसलिए पुरुष को पहले उसे गले लगा कर उसे कम्फर्टेबल फील कराना चाहिए. 5. पत्नी अगर गले लगने के लिए मान जाए, तो हसबैंड को उसे पान खिलाना चाहिए. उसके पान खाने का अर्थ होगा कि पत्नी भी सेक्स करना चाहती है. अगर पत्नी पान न खाए तो पति को रिक्वेस्ट करनी चाहिए, और हाथ जोड़ने से ले कर घुटने टेकने की नौबत आए तो वो भी कर देना चाहिए. पर कभी पत्नी के साथ जबरन शारीरिक संबंध नहीं बनाने चाहिए. 6. अगर पत्नी मान जाए तो उसे चूम कर उससे पूछना चाहिए कि क्या वो पति के साथ सेक्स करना चाहती है. पति को तब तक कोशिश करनी चाहिए जब तक वो सर हिला कर हां न कह दे. वात्स्यायन का मानना है कि जो पति पत्नी का ध्यान रखता है, और उसकी बातें मानता है, पत्नी उसी के साथ सेक्स करने में कॉन्फिडेंट फील करती हैं. इग्नोर करने वाले पतियों की पत्नियां जानवर समझती हैं जो केवल सेक्स का भूखा हो. आप सभी से निबेदन है की कम्युनिटी को ध्यान में रख के अपने बिचार को रखे फोटो भी मर्यादा के अंदर होनी चाहिए धन्यवाद See less

Rasleela Nathdwara Style | Twin Eternals - Matter & Energy

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