skip to main |
skip to sidebar
RSS Feeds
A personal blog by Pavan Kumar "Paavan"
A personal blog by Pavan Kumar "Paavan"
![]() |
![]() |
8:03 PM
Article Published by : PAVAN KUMAR SHARMA,' PAAVAN &MAAHIR
क्षत्रिय के लिए है धर्मयुद्ध : अपने आप आ प्राप्त हुआ यह युद्ध मानो स्वर्ग का ही द्वार है आ खुला । इस प्रकार का यह युद्ध अवसर पार्थ ! भाग्यशाली क्षत्रिय लोग ही पाते कभी ॥३२/अध्याय २ ॥ श्लोक में आये कुछ शब्दों का विचार : यदृच्छया उपपन्नम् : अर्थात अपने आप आ उपस्थित हुए । पांडवों ने युद्ध नहीं चाहा था लेकिन दुर्योधन के उनके नीतियुक्त अधिकार- उनके राज्य को न लौटाने के कारण ,युद्ध की नौबत आई । युद्ध में परिवार के लोगों की हत्या का कारण काल की गति है, इसलिए वह शोक करने के योग्य नहीं है । सुखिन : - भाग्यवान अपने कर्तव्य का पालन करने में जो सुख है वह सांसारिक भोगों को भोगने में नहीं है । जिनको कर्तव्य-पालन का अवसर प्राप्त हुआ है ,उनको बड़ा भाग्यशाली समझना चाहिए । कर्मक्षेत्रे-रणक्षेत्रे
![]() |
Post a Comment