अष्टावक्र संहिता ; अध्याय XVIII : शान्ति अष्टावक्र उवाच : यस्य बोधोदये तावत् स्वप्नवत् भवति भ्रम : तस्मै सुखैकरूपाय नम : शान्ताय तेजसे ॥१॥ अष्टावक्र ने कहा : जिसके बोध होने पर भ्रम मिंट जाता स्वप्न की भाँति । उस सुख-स्वरूप शान्त तेजपुँज को मेरा नमन अनेक बार ॥१॥ अर्जयित्वा अखिलान् अर्थान् भोगान् आप्नोति पुष्कलान् । न हि सर्व परित्यागमन्तरेण सुखी भवेत ॥२॥ अर्जित कर भरपूर संपति सुख के अनेकों भोग भोग परन्तु सुख पाता है नर तभी जब अन्तर्मन से त्यागता सभी ॥२॥ कर्तव्यदु:खमार्तन्ड : ज्वालादग्धान् अन्तरात्मन : । कुत : प्रशमपीयूष- धारासारमृते सुखम् ॥३॥ कर्तव्य-दु:खों के प्रखर ताप की ज्वाला से दग्ध अन्तर्मन । तब तक शान्ति पाता नहीं जब तक पीयूष अमृत की धार से नहाता नहीं ॥३॥