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A personal blog by Pavan Kumar "Paavan"
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8:13 PM
Article Published by : PAVAN KUMAR SHARMA,' PAAVAN &MAAHIR
अष्टावक्र संहिता अध्याय XX : जीवन - मुक्ति क्व विक्षेप: क्व च एकाग्रा क्व निर्बोध: क्व मूढता । क्व हर्ष : क्व विषादो वा सर्वदा निष्क्रियस्य मे ॥९॥ भटकाव कहाँ, एकाग्रता कहाँ ज्ञान परिपूर्णता कहाँ, मूढ़ता कहाँ । हर्ष कहाँ , विषाद कहाँ मुझ सर्वदा निष्क्रिय के लिए ॥९॥ क्व च एष व्यवहारो वा क्व च सा परमार्थता । क्व सुखं क्व च वा दु:खं निर्विमर्शस्य मे सदा ॥१०॥ यह व्यवहार किसके लिए और कहाँ वह परमार्थ भी । सुख कहाँ और दु:ख भी कहाँ मुझ सदा विमर्शहीन के लिए ॥१०॥ Paavan Teerth
8:09 PM
Article Published by : PAVAN KUMAR SHARMA,' PAAVAN &MAAHIR
Geeta अष्टावक्र संहिता जीवन - मुक्ति क्व भूतानि क्व देहो वा क्वेन्द्रियाणि क्व वा मन: । क्व शून्यं क्व च नैराश्यं मत्स्वरूपे निरंजने ॥१॥ स्रष्टि-तत्व कहाँ, देह कहाँ इन्द्रियाँ कहाँ अथवा मन कहाँ । शून्य कहाँ और नैराश्य कहाँ उसको जो निरंजन- स्वरूप है ॥१॥ क्व शास्त्रं क्व आत्मविज्ञानम् क्व वा निर्विषयं मन : । क्व तृप्ति : क्व वितृष्णत्वम् गतद्वन्द्वस्य में सदा ॥२॥ शास्त्र कहाँ , आत्मज्ञान कहाँ विषयों से अनासक्त मन कहाँ तृप्ति कहाँ अथवा वितृष्णा कहाँ जो द्वैत से ऊपर उठा ॥२॥ Paavan Teerth
7:45 PM
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Geeta. अष्टावक्र संहिता अध्याय XIX : आत्म-स्थित क्व भूतं क्व भविष्यत् वा वर्तमानम् अपि क्व वा । क्व देश: क्व च वा नित्यं स्वमहिम्न स्थितस्य मे ॥३॥ भूत कहाँ, भविष्य कहाँ और फिर वर्तमान ही रहाकहाँ शून्य कहाँ और अनन्त कहाँ उसको जो योगसिद्ध होकर बैठा ॥३॥ क्व च आत्मा क्व च अनात्मा क्व शुभम् क्व अशुभम् तथा । क्व चिन्ता क्व च वा अचिन्ता स्वमहिम्न स्थितस्य मे ॥४॥ आत्म कहाँ अथवा अनात्म कहाँ शुभ कहाँ और फिर अशुभ कहाँ चिन्त्य और अचिन्त्य फिर रहा कहाँ उसको जो योगसिद्ध होकर बैठा ॥४॥ Paavan Teerth
7:43 PM
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ग़ज़ल वादों पे लुट रहे हैं,दुनिया-जहान वाले, सूरज को खा गए वो,ऊँचे मकान वाले। झगड़े हैं तब सुलझते,जब बात हो सके कुछ, मिलने न देंगे तुमको ये दरम्यान वाले। दरम्यान वाले=बीच के लोग क़द की कहाँ ज़रूरत,व्यापार में रही कुछ, फ्लैटों को बेचते हैं,छोटी दुकान वाले। सच की ज़ुबां तो लगती तीखी,मगर समझिए, दिल के बहुत हैं काले,शीरीं ज़ुबान वाले। शीरीं ज़ुबान वाले=केवल मीठा मीठा बोलने वाले सच को कहा है सच जब,भड़के हैं पंथ सारे, निकले घरों से सजकर,तीर-ओ-कमान वाले। 'Maahir'
1:19 PM
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प्रस्तुत है आज की ग़ज़ल- झूठ को आज ही जो नकारा नहीं, झेल पाओगे कल का नज़ारा नहीं। क़त्ल पर मेरे चुप हैं वो ये सोच कर, आज नम्बर है इसका,हमारा नहीं। रोटियों के लिए सोच बिकने लगें, इससे बदतर तो कोई नज़ारा नहीं। जंग है हक़,वजूदों की ख़ातिर जो हो, और इसके बिना तो गुज़ारा नहीं। तोड़ देना न इस को हँसी खेल में, टूट कर दिल ये जुड़ता दुबारा नहीं। जान दे दूँ मैं दिल तो ये है चीज़ क्या, आपने प्यार से बस निहारा नहीं। वक़्त देता नहीं है मुआफ़ी उसे, भूल को जिसने अपनी सुधारा नहीं।
1:17 PM
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ग़ज़ल- सब विषयों का स्रोत-विषय दर्शन होता है। जिसमें जड़-चेतन पर ही मंथन होता है। सबको उनकी ही तस्वीरें दिखलाता है। योगी सा निर्लिप्त यहाँ,दर्पण होता है। बाग़-बग़ीचे शहरों के आकर्षित करते। लेकिन सबको प्यारा मन-कानन होता है। आसान मगर मुश्किल भी है,सोचो कितना, बह्म ज्ञान के जैसा ही जीवन होता है। इसको काबू में कर के ही,कुछ कर पाते, अच्छा सेवक,ओछा मालिक मन होता है। आपसदारी सहज भाव है जनजीवन का, कण-कण में स्वाभाविक आकर्षण होता है। दर्पण-सा कुछ काम किया करते ये भी तो, चेहरों पर भावों का कुछ मंचन होता है।
1:15 PM
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प्रस्तुत है एक ग़ज़ल- आदमी को ये क्या हुआ यारो, रोग को मानता दवा यारो। जो है सबका उसे भी दुनिया में, कर रहे सब से हम जुदा यारो। जो नहीं हो सकी थी दिल से वो, कैसे करती असर दुआ यारो। इश्क़ का रोग लग गया तब तो, काम करती कहाँ दवा यारो। आज मासूमियत को ढूँढा जब, आइना देख के डरा यारो। ज़िन्दगी कैसे मुझको जीनी है, दो न अब इस पे मशविरा यारो। कामयाबी में आज " " की, उसकी चाहत का है नशा यारो।
1:11 PM
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ग़ज़ल- आसमां का जो बहुत,गुणगान करते रह गए, वो धरा का दोस्तो,नुक्सान करते रह गए। फ़र्ज़ जो दिल से निभाता है,उपेक्षित रह गया, मुजरिमों का किन्तु वो सम्मान करते रह गए। तात्कालिक मौज़मस्ती से न जो ऊपर उठे, वो ज़मा बस कष्ट के सामान करते रह गए। चाह थी अमृत की उनको,स्वार्थ के कारण मगर, ज़िन्दगी भर वो महज विषपान करते रह गए। देश कुछ अपनी,समझदारी से उन्नति कर सके, और कुछ इंसान को हलकान करते रह गए। ग़लतियों से सीख लेकर,लोग कुछ आगे बढ़े, शेष बस सत्कर्म का अभियान करते रह गए। शानो-शौकत काल्पनिक जो थी वो उसके फेर में, आदमीयत का बहुत नुक्सान करते रह गए। 'Maahir'
1:06 PM
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मुख़्तसर बात कर और इतना Sang साबित आख़िर तुझे यार!करना है क्या?/1 दोस्ती था,मुहब्बत था या था जुनूं तर्क जो हो गया वो था क्या राब्ता!/2 दिल में जो दर्द है,बेश बेदर्द है डर है मुझको न कर दे कहीं ये फ़ना/3 पोंछ पाई नहीं उसके आंसू मैं तब जब खड़ी कठघरे में थी मेरी वफ़ा/4 जुड़ता दिल तो जुदा तुझसे कर देती मैं तुझसे तो जुड़ चुकी है मेरी आत्मा/5 तेरी मूरत को सजदे किए थे जहां कैसे तोडूं बता अब मैं वो बुतकदा/6 दिन वो अच्छे थे जब हम ज़रा दूर थे क़ुर्बतें क्या बढ़ीं हो गया फ़ासला/7 पास आना सबब दूरियों का सही फिर भी कहता है दिल पास आ,पास आ/8 चांद के पहलू में कल सितारा था जो गर्दिश-ए-वक्त में वो कहीं खो गया/9 छू के हंसती थी दोनों की नज़रें जिसे तेरे बिन अब रुलाता है वो चन्द्रमा/10 थाम कर हाथ तेरा थी जिस पर चली अब चिढ़ाता है मुझको वही रास्ता/11 क्या कहूं?पूछता है चमन मुझसे जब क्यूं हो तन्हा?कहां है तेरा बेलिया?/12 मैंने पतवार ख़ामोशी की थाम ली दिल में जब शोर का इक तलातुम उठा/13 दर्द-ए-दिल जाते जाते ही जाएगा अब "अंगिरा"सीख ले सहना और मुस्कुरा/14
12:54 PM
Article Published by : PAVAN KUMAR SHARMA,' PAAVAN &MAAHIR
चूल्हा चौका गोबर से लीपा जाता था, चौके में ही बैठ भोजन किया जाता था। फूँकनी से फूंक मार,था चुल्हा जलता, माँ के हाथों से उस पर खाना बनता था। पटरी पर बैठ माँ के सभी काम पूरे होते थे, कपड़े धोने तक सभी काम पटरी पर होते थे। घुटती दाल पतीली में,उबाल निकाला जाता, रोटी सेंकने को कोयले चिमटे से करने होते थे। वह स्वाद दाल का आज तलक भी याद हमें है, गन्ने के रस की खीर का वो स्वाद,याद हमें है। फूली और करारी रोटी,ताज़ा मक्खन रखकर, साग चने का घुटा हुआ मक्का रोटी,याद हमें है। सोच रहा हूँ फिर से बचपन पा जाँऊ, चूल्हे सम्मुख बैठ कर रोटी फिर खाऊँ। ताजा मट्ठा साथ में मक्खन दाल उरद की, एक और रोटी की ज़िद,माँ का प्यार पाऊँ!
12:51 PM
Article Published by : PAVAN KUMAR SHARMA,' PAAVAN &MAAHIR
ग़ज़ल- बस'इफ'बट'में ही दिन गँँवाया न कर, तेरा जो तजुर्बा है,जाया न कर। बहुत झूठ बोले,न सच मर सका, हक़ीक़त से नज़रें चुराया न कर। उन्हें तेरी तकलीफ़ देती है सुख, लगे चोट तो तड़फड़ाया न कर। हुई ज़िंदगी जुर्रतों से शुरू, इसे सोच में ही गँवाया न कर। कभी दिल जो टूटा जुड़ेगा नहीं, हसीं ख़्वाब'यूँ ही'दिखाया न कर। सियासत में बातों के मतलब कहाँ? , ये झांसे हैं झांसों में आया न कर! गिनीपिग न मुझको समझ दोस्त अब, किया जो न ख़ुद वो सुझाया न कर। ज़हां के ग़मों से नज़र फेर कर, मुहब्बत की ग़ज़लें ही गाया न कर।
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