skip to main |
skip to sidebar
RSS Feeds
A personal blog by Pavan Kumar "Paavan"
A personal blog by Pavan Kumar "Paavan"
![]() |
![]() |
8:23 PM
Article Published by : PAVAN KUMAR SHARMA,' PAAVAN &MAAHIR
नहीं होती क्रांति कविता से न ही दूर होता है कदाचार न ही थमती है निरंकुशता सरकार की न ही कमी आती है किंचित् भी विशेषाधिकारियों के विशेषाधिकार में और आम आदमी की आम दिक़्क़त में. कुछ भी नहीं होता जो चाहती है कविता पाठक बस धन्य करता है पढ़कर कविता को और कवि को भी. कविता का पाठक बस पाठक होता है नहीं उतरता वह किसी दिव्य लोक से हो सकता है वह भी विशेषाधिकारों से लैस निरंकुश सरकार का निरंकुश कारिंदा आम आदमी की दिक़्क़तों का जनक शोषण और लफंगई में मुब्तला भी हो सकता है पाठक. लेकिन कुछ भी होने से पहले ‘दुनियादार’ होता है पाठक कवि से ज़्यादा होशियार होता है पाठक और लग जाता है ‘धंधे’ में तुरंत धन्य करने के बाद कवि और कविता को. पता नहीं, जिस आदमी की लड़ाई लड़ती है कविता पढ़ना मयस्सर भी है उसे कविता उसके लिए तो ज़ंग लगा औज़ार है कविता. उसका कर्ज़ अदा नहीं करती कविता उसकी बेटी की शादी नहीं कराती कविता बच्चों की पढ़ाई का ख़र्च भी नहीं उठाती कविता बस क्रांति और आम आदमी की बात करती है कविता. कवि लिखता है फिर भी कविता कर लेता है क्रांति वह कविता में ही फिर रहता है मगन सफलता के नशे में क्रांति कर पाने की नहीं,कविता लिख पाने की. ख़ुश होता है लिखकर हर बार एक कविता और भी ख़ुश होता है पाकर सम्मान,पुरस्कार बढ़ जाती है हैसियत उसकी दुनिया में हो जाती है थोड़ी सहूलियत खड़े होने में‘विशिष्ट’लोगों की कतार में जिसके लिए दरअसल उसने लिखनी शुरू की थी कविता. ……………..
8:20 PM
Article Published by : PAVAN KUMAR SHARMA,' PAAVAN &MAAHIR
कार्डियक केयर में एक सफलता दिल तो पागल है दिल दीवाना है। कार्डियक केयर में एक सफलता इसे चित्रित करें: हृदय उपचार जिसमें चीरों, तारों या अस्पताल में रहने की आवश्यकता नहीं होती है । एमआईटी की एक टीम ने एक पतला, लचीला पैच बनाया है जो पहनने योग्य पेसमेकर के रूप में काम करता है, शरीर के बाहर से दिल की धड़कन को ट्रैक पर रखने के लिए केंद्रित अल्ट्रासाउंड का उपयोग करता है । कोई सर्जरी की आवश्यकता नहीं है । पैच सीधे त्वचा के माध्यम से दालों को वितरित करता है । ध्वनि की शक्ति का दोहन डिवाइस हृदय की मांसपेशी तक पहुंचने के लिए छाती में सावधानीपूर्वक लक्षित अल्ट्रासाउंड तरंगों को भेजता है । रास्ते में कुछ भी नुकसान पहुंचाए बिना लहरें छाती की दीवार से गुजरती हैं । सिस्टम कुछ मुख्य नौकरियों को संभालता है: * धीमी हृदय गति वाले रोगियों के लिए गैर-इनवेसिव पेसिंग । * गहरी ऊतक इमेजिंग के माध्यम से हृदय गतिविधि की वास्तविक समय की निगरानी । * निरंतर संचालन के लिए बाहरी बिजली स्रोतों से कनेक्शन । लचीले डिजाइन के माध्यम से नवाचार पैच उन सामग्रियों से बनाया गया है जो त्वचा की तरह खिंचाव करते हैं । पुराने स्कूल के पेसमेकर नसों के माध्यम से चलने वाले लीड के साथ छाती के अंदर बैठते हैं । यह एक कागज-पतला है और शरीर की आकृति का पालन करने के लिए झुकता है । छोटे ट्रांसड्यूसर की एक पंक्ति ऊतक में ध्वनिक ऊर्जा को आग लगाती है, और पहनने वाला इसे बिना किसी असुविधा के घंटों तक रख सकता है । आपातकालीन चिकित्सा प्रतिक्रिया बदलना पैरामेडिक्स और रिकवरी रूम के कर्मचारी एक मरीज पर पैच को थप्पड़ मार सकते हैं, जिसकी हृदय गति बस गिर गई है और एक नस के माध्यम से अस्थायी पेसिंग तारों को फैलाने के बिना चीजें स्थिर हो जाती हैं । दिल की सर्जरी के बाद, या जब कोई स्थायी प्रत्यारोपण की प्रतीक्षा करता है, तो पैच पुलों को संक्रमण के जोखिम और ऊतक क्षति पर अंतराल और कटौती करता है । गैर-आक्रामक उपचार का भविष्य लाइन के नीचे, इस तरह एक पहनने योग्य बदल सकता है कि दुनिया भर में पुरानी हृदय स्थितियों का प्रबंधन कैसे किया जाता है । सर्जरी के लिए भी कमजोर मरीजों को अभी भी कार्डियक सपोर्ट मिलेगा। ध्वनिक ऊर्जा की ओर उपचार को धक्का देने से गंभीर चिकित्सा हार्डवेयर आपके पास एक शीट को छीलने और अपनी छाती पर छड़ी करने के करीब आता है ।
8:16 PM
Article Published by : PAVAN KUMAR SHARMA,' PAAVAN &MAAHIR
जीवन और मानसिक स्वास्थ्य की दृष्टि से: अवकाश (Leisure) केवल विश्राम नहीं, एक वैज्ञानिक कला है आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में हम सभी ‘हसल कल्चर’ (अति-व्यस्तता) और कभी न खत्म होने वाली महत्वाकांक्षाओं के शिकार हैं। एक मनोचिकित्सक के रूप में अपने क्लीनिकल अनुभव में मैं अक्सर ऐसे लोगों को देखता हूँ जो दिन-रात काम करते हैं, मानसिक रूप से पूरी तरह थक जाते हैं, और फिर सोचते हैं कि कुछ दिन कहीं शांत बैठकर "कुछ न करना" (Doing Nothing) ही उनका इलाज है। लेकिन हकीकत यह है कि खाली बैठना या बिना सोचे-समझे वक्त काटना हमारे तनाव को कम करने के बजाय हमें और अधिक अशांत और अकेला बना देता है। आइए, इस पूरे दर्शन और विज्ञान को एक नए नजरिए से समझें। 1. क्या काम ही हमारी संस्कृति का आधार है? प्रसिद्ध जर्मन दार्शनिक जोसेफ पीपर (Josef Pieper) ने अपनी कालजयी रचना में कहा था कि "अवकाश ही संस्कृति का आधार है" (Leisure is the Basis of Culture)। परंतु आधुनिक समाज ने इसे उलट दिया है; आज 'काम' (Work) को ही संस्कृति और पहचान का आधार मान लिया गया है। हम दिन-रात काम करते हैं, और बीच में थोड़ा सा समय केवल इसलिए निकालते हैं ताकि दोबारा काम करने के लिए सांस ले सकें। जब हम काम नहीं कर रहे होते और जिसके लिए हमें कोई भुगतान नहीं मिल रहा होता, वास्तव में वही समय तय करता है कि हम भीतर से कौन हैं। इसलिए अवकाश को काम का अभाव (absence of work) समझना सबसे बड़ी भूल है; अवकाश अपने आप में एक स्वतंत्र और निपुण कौशल (skill) है। 2. खुशी के तीन घटक: सुख (Pleasure) बनाम सच्चा आनंद (Enjoyment) खुशी (Happiness) के तीन बुनियादी पोषक तत्व (Macronutrients) होते हैं: आनंद (Enjoyment) संतुष्टि (Satisfaction) सार्थकता/अर्थ (Meaning) अधिकांश लोग 'सुख' (Pleasure) और 'आनंद' (Enjoyment) के बीच के बुनियादी अंतर को नहीं समझ पाते: क्षणिक सुख (Pleasure): यह हमारे मस्तिष्क के आदिम लिम्बिक सिस्टम (Limbic System) की रासायनिक प्रतिक्रिया है। भोजन, सोशल मीडिया का डोपामाइन रश या नशा—ये केवल शारीरिक और पशुवत प्रवृत्तियां हैं। केवल सुख के पीछे भागने से जीवन में संतुष्टि नहीं, बल्कि लत और अवसाद आते हैं। सच्चा आनंद (Enjoyment): जब हम सुख को अपने चेतन मस्तिष्क यानी प्रीफ्रंटल कॉर्टेक्स (Prefrontal Cortex) में ले जाते हैं, तब वह सच्चा आनंद बनता है। इसके लिए दो चीजें अनिवार्य हैं: सचेतन स्मृति (Consciousness/Memory) और सामाजिक जुड़ाव (People/Social Connection)। जब कोई गतिविधि सचेत रूप से अपनों के साथ साझा की जाती है, तभी वह आत्मा को तृप्त करती है। 3. 'असीडिया' (Acedia) का जाल: मानसिक और आध्यात्मिक आलस्य दार्शनिक परंपरा में सात महापापों में एक शब्द आता है—'स्लॉथ' (Sloth), जिसे ग्रीक में असीडिया (Acedia) कहा गया है। यह केवल बिस्तर पर लेटे रहना नहीं है, बल्कि यह मानसिक और आध्यात्मिक सुस्ती है। आज के समय में फोन पर अंतहीन रील्स स्क्रॉल करना (Mindless Scrolling), टीवी पर शोज़ बिंज-वॉच करना या शराब के नशे में दिमाग को सुन्न करना—ये सभी असीडिया के लक्षण हैं। यह विश्राम नहीं है, बल्कि अपनी आत्मा और मस्तिष्क को कोमा में डालने जैसा है। न्यूरोसाइंस के अनुसार, यह आदत स्ट्रेस हार्मोन्स को बढ़ाती है और इंसान को भीतर से खाली कर देती है। 4. सच्चे अवकाश की वैज्ञानिक परिभाषा (True Leisure) सच्चा अवकाश निष्क्रिय (Passive) नहीं, बल्कि सक्रिय, चिंतनशील और सृजनात्मक (Contemplative & Generative) होता है: दाएँ गोलार्ध (Right Hemisphere) को जाग्रत करना: आधुनिक कार्यशैली हमारे मस्तिष्क के विश्लेषणात्मक और तार्किक बाएँ हिस्से को थका देती है। अवसाद और एंग्जायटी से मुक्ति के लिए दाएँ हिस्से को सक्रिय करना जरूरी है, जो रहस्य, अर्थ, सौंदर्य और भावनाओं का केंद्र है। प्रकृति के सान्निध्य में समय बिताना: गैजेट्स से दूर रहकर खुली हवा में टहलना, सूर्योदय देखना और प्रकृति के सौंदर्य को महसूस करना हमारे कॉग्निटिव फंक्शन और मूड को तुरंत स्थिर करता है। कला और संगीत का सृजन व आस्वादन: संगीत और कला केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि शक्तिशाली न्यूरोलॉजिकल उपचार हैं। यह अल्जाइमर और पार्किंसंस जैसी बीमारियों तक में मस्तिष्क की कार्यप्रणाली को सक्रिय करने में सक्षम हैं। गहन और सार्थक मानवीय रिश्ते: सतही गपशप के बजाय गहरे संवाद स्थापित करें। अपनों से दिल की बात साझा करना और सार्थक विषयों पर चर्चा करना मानसिक स्वास्थ्य के लिए संजीवनी है। आंतरिक संतुष्टि के लिए सीखना: कोई नई विद्या या गहरा दार्शनिक ग्रंथ इसलिए पढ़ना कि वह आपकी चेतना को समृद्ध करे, न कि इसलिए कि उससे धन या पद कमाना है। कहावत है कि "लोहा ही लोहे को धार देता है"—जब आप अपने खाली समय को कुशल और समृद्ध बनाते हैं, तो आपके कार्य की गुणवत्ता और एकाग्रता भी कई गुना बढ़ जाती है। 5. अवकाश को बेहतर बनाने के 3 अचूक वैज्ञानिक नियम (The 3 Leisure Protocols) यदि आप अपने विश्राम को वास्तविक ऊर्जा में बदलना चाहते हैं, तो इन तीन नियमों को अपने जीवन में लागू करें: 1. अवकाश को व्यवस्थित और संरचित करें (Structure Your Leisure): जैसे आप जिम जाने या बिजनेस मीटिंग के लिए समय तय करते हैं, वैसे ही अपने खाली समय की योजना बनाएं। प्राचीन परंपराओं में इसे 'पवित्र समय' (Holy Hour) कहा जाता था। तय करें कि इस निर्धारित समय में आप स्क्रीन से दूर रहकर कौन सी आध्यात्मिक, रचनात्मक या बौद्धिक गतिविधि करेंगे। 2. समय को व्यर्थ न गंवाएं (Don’t Waste It): अक्सर लोग ब्रेक मिलते ही पहले 15-20 मिनट सोशल मीडिया देखने या व्यर्थ की बातों में गंवा देते हैं। ऐसा न करें। जो तय किया है—चाहे वह कोई पुस्तक पढ़ना हो या टहलना—अलार्म बजते ही तुरंत उसी क्षण उस गतिविधि में डूब जाएं। 3. अवकाश के स्पष्ट लक्ष्य तय करें (Set Specific Leisure Goals): जैसे करियर में लक्ष्य होते हैं, वैसे ही मन और आत्मा के विकास के लक्ष्य बनाएं। उदाहरण के लिए—इस वर्ष किसी शास्त्रीय ग्रंथ का अध्ययन पूरा करना, ध्यान साधना की अवधि बढ़ाना, या किसी विशेष कला व संगीत की समझ विकसित करना। प्रगति की यही भावना स्थायी प्रसन्नता देती है। डॉ. तांबी का संदेश: हम केवल आर्थिक लाभ कमाने वाले 'होमो इकोनॉमिकस' (Homo Economicus) नहीं हैं; हम संवेदनशील और विवेकशील मनुष्य ('Homo Sapiens') हैं। यदि आपका खाली समय केवल थकावट मिटाने और सांस फूलने पर रुकने तक सीमित है, तो यह मानसिक रुग्णता का संकेत है। अपने अवकाश को एक कुशल एथलीट की तरह गंभीरता, अनुशासन और उद्देश्य के साथ जिएं। जब आपका खाली समय सार्थक होगा, तभी आपका मन शांत, मस्तिष्क स्वस्थ और जीवन आनंदमय होगा।
9:03 PM
Article Published by : PAVAN KUMAR SHARMA,' PAAVAN &MAAHIR
क़स्बा जो छूट गया बहुत मोहक, बहुत काम्य था वह क़स्बा डेढ़ कोस दूर गाँव से पहला पड़ाव हर यात्रा का वहीं से मिलती थी बस ज़िले के सदर मुक़ाम की जहाँ था जंक्शन जाती थीं गाड़ियाँ वहीं से भरकर लोगों को दूर-दूर जाने किस दुनिया में. दिखने से पहले ही क़स्बे के सुनाई पड़ती थी पुक-पुक चक्की की और शुरू हो जाती थी थरथराहट नन्हें-से दिल के किसी कोने में. फिर दिखते थे बड़े-बड़े अक्षर सुघड़, सुडौल, रंगीन झोंपड़ों के पिछवाड़े रंगीन पुती, साफ़-सुथरी कच्ची दीवार पर डोंगरे का बालामृत, वैद्यनाथ का बालासर डाबर की कोई घुट्टी भी जुड़ गई थी बाद में मोटे-ताज़े ख़ुशहाल बच्चे के साथ. रंगों का दिखना ही था क़स्बे का पूर्वराग खींचता था एक लहर की तरह मन के आर-पार. फिर दिखती थी नई-नवेली सड़क तारकोल की चिकनी, दूर तक बहती छरहरी नदी-सी गुज़र जाती थी उस पर कभी कोई बस दुकानों के बीच से झलक दिखाकर पीछे छोड़कर भोंपू की काँपती आवाज़ और पेट्रोल की वह अनचीन्हीं रोमांचक गंध हवा में घुलती-तैरती आती थी नासाग्र तक उछल पड़ता था दिल ज़ोर से उस अनजानी दुनिया के लिए जो सर्राटे से निकलती बस की मंज़िल होगी. फिर दिखता दुकानों के ठीक पिछवाड़े, दूर तक फैले खेतों के बीच रावण का खड़ा और कुम्भकर्ण का लेटा पुतला टूटा-फूटा, प्लास्टर झड़ा सजेगा साल के सिर्फ़ एक दिन दशमी के मेले के लिए आयेगी ज़रूर उसमें कंपनी नौटंकी की बनारस वाली नाचेंगी, ‘खेला’ भी करेंगी, असली औरतें गाँव की तरह औरत-बने मर्द नहीं. और मौत के कुँएँ की दीवार पर नीचे से ऊपर, ऊपर से नीचे बेधड़क चलाती फटफटिया वह क़द्दावर लड़की भी और गोल-गोल घूमते खटोलों वाले झूले ऊँचाई से उतरते भीतर का कुछ रह जाता था ऊपर डर की लहर के साथ फिर आता था तहसील का अहाता बीच में कुआँ, बरगद का पेड़ और गोल-मटोल मोटी दीवारवाली छोटी सख़्त इमारत ख़जाने की भारी-भरकम ताला-लगे दरवाज़े के सामने सीधा खड़ा संतरी सावधान बंदूक में खुँसी संगीन के साथ हमेशा अटेंशन में गोल इमारत के मुस्तक़िल हिस्से-जैसा. बाद में बताया गया ख़ज़ाने की वसूली के लिए ही तहसील थी और था सारा ताम-झाम. कि सन् बयालीस में इसी को लूटने आए थे आस-पास के गाँवों से ‘क्रांतिकारी’ नाम लेकर बताते थे कौन-कौन गया था डेढ़ कोस दूर हमारे गाँव से लेकिन चूक हो गई नहीं तोड़ा पुल पहले ही नाले का फिर मुख़बिर की ख़बर पर आ गई 'गारद' सदर मुक़ाम से और बच गया ख़ज़ाना और रह गया क़स्बा इतिहास में दर्ज होते-होते. फिर आता था बाज़ार सड़क से निकलती एक गली में जो आगे बनाती थी गलियों का संजाल क़िस्म-क़िस्म की दुकानों के लिए क़िस्म-क़िस्म की गलियाँ बड़ों को हमेशा होता था वहाँ कोई काम और नहीं तो ख़रीदारी सुरती-सुपारी की. मन न लगा कभी उसका बाज़ार में हमेशा वह चाहता आगे निकलकर बैठे पुल पर देखे बस को बिल्कुल पास से गुज़रते झन्नाटे से, हिलाते पुल को. पुल था उस चौड़े नाले पर जिसका एक दुबला-पतला सहायक जाता था उसके गाँव तक टेढ़ा-मेढ़ा, लम्बी दूरी तयकर. कितनी बार मन हुआ, चलें नाले के साथ अपने गाँव तक खेतों से, मेड़ों से, कुश-काश, ढाक-बबूल के जंगलों से सरपत और बेहया की झाड़ियों से पर कभी न हो सका इतना-सा साहस. आख़िर छूट गया गाँव, छूट गया क़स्बा. कहाँ खो गया वह बचपन का गाँव, बचपन का क़स्बा अब नहीं गुज़रता वह क़स्बे से गाँव जाते या गाँव से लौटते हुए मुँह छिपाकर निकल लेता है बायपास से शर्म लगती है बचपन के उस दोस्त से पहले-पहले प्यार से दुनिया खोलनेवाले द्वार से. कहाँ मालूम था दुनिया इतनी बड़ी, इतनी बेरहम है रँग देती है अपने ही रंग में छील-छीलकर सिखा देती है मीठे-मुलायम शब्दोंवाली कथनी और छल-कपट आडम्बरोंवाली करनी दो पाटों की दुधारी दुनियादारी. ...............
9:00 PM
Article Published by : PAVAN KUMAR SHARMA,' PAAVAN &MAAHIR
आइए ग़ज़ल कहना सीखें- ------------------------------------- वज़्न/बह्र/रुक्न क्या है-२ पिछले पोस्ट में हमने जाना कि शब्दों का वज़्न या भार क्या होता है और किस तरह लघु/ हर्स्व/ लाम(उर्दू) को छोटा ध्वनि-भार गिनते हुए १ की संख्या से एवं गुरु/ दीर्घ/ ग़ाफ़ (उर्दू) को बड़ा ध्वनि-भार गिनते हुए २ की संख्या से इंगित करते हैं. सीखने के इच्छुक व्यक्तियों को पढ़ने के साथ साथ मश्क़ (अभ्यास) की सलाह दी जाती है. जिस तरह अंग्रेज़ी भाषा में शब्दों के syllables होते हैं, जो उनके उच्चारण और accent को निर्धारित करते हैं, उसी तरह हिन्दी/ उर्दू में भी शब्दों को syllables एवं accent के आधार पर तोड़कर उनके वज़्न या भार को आसानी से पता किया जा सकता है. उदहारण के तौर पे अंग्रेज़ी का एक शब्द psychology/ साइकोलॉजी लेते हैं. इसे अंग्रेज़ी में सपाट तौर पे साइकोलॉजी न बोलकर साइक’लजी बोलते हैं. यदि सपाट साइकोलॉजी पे भार गिनें तो भार होगा २१२२२ (सा-२, इ-१, को-२, लॉ-२, जी-२), मगर यदि syllables एवं accent को ध्यान में रखकर बोले जाने वाले शब्द साइ’क’लजी पे भार गिनें तो भार होगा २१११२/ या २११११ (यदि जी पर भी ध्वनि छोटी रखी जाए तो). ये उदहारण इस बात को समझने के लिए पर्याप्त है कि हमें हिंदी/उर्दू के शब्दों के भार को पता करने के लिए शब्दों की मात्रा के साथ साथ शब्दों के syllables एवं accent को भी ध्यान में रखना होगा, अर्थात ये देखना होगा कि किसी शब्द में कितनी अलग-अलग ध्वनियाँ हैं. जैसे एक शब्द है इम्तिहान, इसे खंडित करके यदि पढेंगे तो शब्द इस प्रकार होगा इम+ति+हा+न और इस प्रकार इसका भार होगा इम२+ति१+हा२+न१, यानी २१२१. अगर इसी शब्द को उर्दू क़ायदे के हिसाब से इम्तिहाँ बोलें तो भार होगा २१२ (इम+ति+हाँ). एक अन्य उदाहरण लेते हैं, कलम. इसे क+लम बोलते हैं, कल+म नहीं. यदि क+लम बोला जाए, जो कि सही है, तो भार होगा १२ (क१+लम२), और यदि कल+म बोला जाए, जो कि ग़लत है, तो भार होगा २१ (कल२+म१). तो आइए भार के हम कुछ और उदाहरण देखते हैं. दिवाली १२२ दीवाली २२२ ख़ामोश २२१ ख़मोश १२१ पटना २२ लंका २२ स्त्री २२ पूर्ण २१ पूर्णा २२ अर्ध २१ कल्पना २१२ दोस्ती २१२ मुलाक़ात १२२१ बरसात २२१ मुहब्बत १२२ मकान १२१ मकाँ १२ दूकान २२१ अत्याचारी २२२२ वैरागी २२२ दुश्मन २२ पूर्व २१ पूर्वा २२ पुरवाई २२२/२२१ गुलाम १२१ राजा २२ राज़ २१ रज़ा १२ सल्तनत २१२ इत्तिफ़ाक़ २१२१ ग़मनाक २२१ उज्जवल २१२ विध्वंस २२१ वंश २१ अंश २१ तृप्ति २१ इत्यदि
8:57 PM
Article Published by : PAVAN KUMAR SHARMA,' PAAVAN &MAAHIR
Hustle Culture (Savoring) जीवन को सच में कैसे जिएं: आनंद, अर्थ और 'सavoring' (रस लेने) का मनोविज्ञान डॉ. अनिल तांबी आज के भागदौड़ और 'हसल-कल्चर' (Hustle Culture) के दौर में हम सभी सफल होने की रेस में भाग रहे हैं। हमने करियर बना लिया, जिम्मेदारियां पूरी कर लीं, लेकिन इसके बावजूद भीतर एक खालीपन महसूस होता है। कई बार ऐसा लगता है जैसे हम केवल दिन काट रहे हैं, जीवन को गहराई से महसूस नहीं कर पा रहे। समस्या यह नहीं है कि आपके जीवन में खुशियों या उपलब्धियों की कमी है; असली समस्या यह है कि हम 'सavoring' (जीवन के अनुभवों का स्वाद या रस लेना) भूल चुके हैं। विज्ञान और न्यूरोसाइंस (Neuroscience) के अनुसार, जब तक आप अपने वर्तमान, अतीत और भविष्य के अनुभवों को गहराई से महसूस नहीं करते, तब तक सच्चा मानसिक संतोष और आनंद पाना असंभव है। 1. 'सavoring' (रस लेना) क्या है और यह क्यों जरूरी है? 'Savoring' का सीधा सा अर्थ है—किसी भी अनुभव (चाहे वह अच्छा हो, सामान्य हो या कठिन) में पूरी तरह उपस्थित होना, ठहरना और उसे गहराई से महसूस करना। न्यूरोलॉजिकल प्रभाव: जब आप किसी पल का रस लेते हैं—जैसे चाय की चुस्की लेना, अपनों के चेहरे को ध्यान से देखना या ठंडी हवा को महसूस करना—तो यह आपके मस्तिष्क के रिवॉर्ड सेंटर (Ventral Striatum) को सक्रिय करता है। इससे डोपामाइन और खुशी के केमिकल्स रिलीज होते हैं। अवसाद (Depression) से बचाव: अध्ययनों से पता चलता है कि जो लोग रोजमर्रा की छोटी-छोटी घटनाओं में पूरी तरह मौजूद रहते हैं, उनमें अवसाद और तनाव का स्तर काफी कम होता है। सकारात्मक स्मृतियाँ: जितना गहराई से आप वर्तमान का आनंद लेंगे, आपका मस्तिष्क (Hippocampus) उतनी ही मजबूत और सुखद यादें तैयार करेगा, जो भविष्य में आपको मानसिक शक्ति देंगी। 2. हम स्वाभाविक रूप से खुशियों का आनंद क्यों नहीं ले पाते? हमारा दिमाग लगभग 2,500,000 साल पुराने सर्वाइवल मैकेनिज्म (Survival Mechanism) पर काम करता है। हमारे पूर्वजों को जिंदा रहने के लिए हमेशा खतरों और नकारात्मक चीजों पर ध्यान देना पड़ता था। इसे मनोविज्ञान में Negativity Bias कहा जाता है। हमारा दिमाग हमेशा भविष्य की चिंता या आने वाली समस्याओं को खोजने में लगा रहता है। प्रकृति का उद्देश्य हमें केवल जीवित रखना था, खुश रखना नहीं। लेकिन मानव मस्तिष्क की सबसे बड़ी ताकत यह है कि हम अपनी चेतना (Prefrontal Cortex) का उपयोग करके इस नकारात्मक प्रवृत्ति को बदल सकते हैं और जागरूक होकर खुशियों का चयन कर सकते हैं। 3. जीवन का पूर्ण आनंद लेने के व्यावहारिक तरीके अपने जीवन की गुणवत्ता और मानसिक स्वास्थ्य को बेहतर बनाने के लिए आप इन वैज्ञानिक और व्यावहारिक तरीकों को अपना सकते हैं: A. तीनों काल खंडों (Time Zones) में जीवन को महसूस करें 1. अतीत का आनंद (Past): बीते दिनों की केवल बुरी यादों को न पकड़ें। अतीत की उन छोटी-छोटी खूबसूरत घटनाओं को याद करें जिन्होंने आपको खुशी दी थी। अपनी यादों को सकारात्मक दृष्टिकोण से एडिट करना सीखें। 2. वर्तमान में ठहराव (Present): आप जो भी कर रहे हैं, उसमें 100% मौजूद रहें। अगर आप बर्तन भी धो रहे हैं या टहल रहे हैं, तो केवल उसी क्रिया पर ध्यान केंद्रित करें। 3. भविष्य की उम्मीद (Future): आने वाले दिनों में किसी अच्छी घटना या छोटे-छोटे अवसरों की उत्सुकता से प्रतीक्षा करें। B. 'सavoring' के चार मुख्य कौशल शारीरिक अभिव्यक्ति (Behavioral Display): मुस्कुराने का प्रयास करें। यहाँ तक कि एक बनावटी मुस्कान भी आपके दिमाग को संदेश देती है कि आप सुरक्षित और खुश हैं। मन को ठहराना (Be Present): खुद से कहें, "इस वक्त मैं यह काम कर रहा हूँ और मैं इसका आनंद ले रहा हूँ।" खुशियों को साझा करना (Capitalizing): जब आपके साथ कुछ अच्छा हो, तो अपनों के साथ उसकी चर्चा करें और साथ मिलकर जश्न मनाएं। पॉजिटिव टाइम ट्रेवल: दिन के अंत में या शुरुआत में कुछ मिनट निकाल कर सुखद क्षणों को दोबारा अपने मन में दोहराएं। C. असफलताओं और कठिन समय का रस कैसे लें? जीवन में केवल सुख ही नहीं, असफलताएं और दुख भी आते हैं। कठिन समय को संभालने के लिए 'Failure Journal' की तकनीक अपनाएं: 1. जब भी कोई विफलता या दुखद घटना हो, उसे कागज पर लिखें और नीचे दो खाली लाइनें छोड़ दें। 2. एक महीने बाद: पहली खाली लाइन में लिखें कि उस बुरी घटना से आपने क्या सीखा। 3. दो महीने बाद: दूसरी खाली लाइन में लिखें कि उस घटना के कारण आपके जीवन में क्या नया और अच्छा बदलाव आया। यह अभ्यास कठिन से कठिन परिस्थितियों को भी अर्थ और मानसिक परिपक्वता प्रदान करता है। 4. जीवन के दो सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यदि आप जीवन में दिशाहीन महसूस कर रहे हैं, तो खुद से ये दो सवाल पूछें: 1. मैं जीवित क्यों हूँ? (मेरे जीवन का उद्देश्य क्या है?) 2. मैं किस चीज़ के लिए अपना जीवन समर्पित कर सकता हूँ? जब आप अपने उत्तर खोज लेते हैं, तो आपका जीवन केवल एक दिनचर्या नहीं रहता, बल्कि एक अर्थपूर्ण यात्रा बन जाता है। अपने वर्तमान पलों को जीना शुरू करें, हर पल का रस लें, और अपने मानसिक स्वास्थ्य को प्राथमिकता दें।
8:33 PM
Article Published by : PAVAN KUMAR SHARMA,' PAAVAN &MAAHIR
5 तरीके नये नये एक ।कलर डाप्लर अल्ट्रासोनोग्राफी टेस्ट(Ultrasound Test) -आजकल जितने भी रेडियोलॉजिकल टेस्ट हैं उनमे अल्ट्रासाउंड टेस्ट सबसे कॉमन टेस्ट में से एक है अल्ट्रासाउंड examination एक बहुत ही common test है और शायद ही कोई ऐसा व्यक्ति होगा जिसने इस टेस्ट का नाम ना सुना हो जब भी पेट में दर्द हो, लिवर या गॉलब्लेडर की परेशानी हो, या घर में नए मेहमान के आने की confirmation करनी हो तो डॉक्टर की सलाह होती है कि-“ए 5 तरीके नये नये एक ।कलर डाप्लर अल्ट्रासोनोग्राफी टेस्ट(Ultrasound Test) -आजकल जितने भी रेडियोलॉजिकल टेस्ट हैं उनमे अल्ट्रासाउंड टेस्ट सबसे कॉमन टेस्ट में से एक है अल्ट्रासाउंड examination एक बहुत ही common test है और शायद ही कोई ऐसा व्यक्ति होगा जिसने इस टेस्ट का नाम ना सुना हो जब भी पेट में दर्द हो, लिवर या गॉलब्लेडर की परेशानी हो, या घर में नए मेहमान के आने की confirmation करनी हो तो डॉक्टर की सलाह होती है कि-“एक अल्ट्रासाउंड करवा लीजिए।" आखिर यह Ultrasound क्या चीज़ है? क्या इसमें कोई सुई लगती है या कोई खतरनाक किरणें निकलती हैं? आइए इसे बिल्कुल सीधी भाषा में समझते हैं। मान लीजिए आप एक गहरे कुएं के पास खड़े हैं और नीचे चिल्लाते हैं—आपकी आवाज टकराकर वापस आती है, जिसे हम echo यानी गूंज कहते हैं। अल्ट्रासाउंड मशीन ठीक इसी सिद्धांत पर काम करती है। इसमें कोई हानिकारक X-ray रेडिएशन नहीं होता। इसमें एक छोटी सी डिवाइस होती है जिसे Probe कहते हैं। डॉक्टर त्वचा पर एक ठंडा सा Gel लगाते हैं और इस probe को ऊपर घुमाते हैं। यह मशीन इंसान के कान से न सुनी जा सकने वाली High-frequency Sound Waves (ध्वनि तरंगें) शरीर के अंदर भेजती है। ये तरंगें अंदरूनी अंगों से टकराकर जब वापस आती हैं, तो कंप्यूटर स्क्रीन पर आपके अंगों की एक साफ-सुथरी तस्वीर (Live Image) बना देती हैं। डॉक्टर इसे कब कराने की सलाह देते हैं? शरीर के अंदर किसी भी तरह की हलचल या दिक्कत को पकड़ने के लिए यह सबसे भरोसेमंद और शुरुआती साधन है: * Pregnancy (गर्भावस्था): पेट में पल रहे बच्चे की धड़कन देखने, उसकी ग्रोथ जांचने और सही पोजीशन का पता लगाने के लिए। आजकल तो ये टेस्ट इतना एडवांस हो गया है कि जब बच्चा माँ के पेट में रहता है यानी गर्भ में रहता है और अगर उस बच्चे के पेट के अंदर अगर कोई प्रॉब्लम है तो ये उसको भी दिखा देता है * Abdominal (पेट की समस्याएं): गॉलब्लेडर में पथरी (Gallstones), किडनी स्टोन (Kidney stones), या लिवर में फैट (Fatty liver) Appendicitis, पेशाब की थैली, Spleen देखने के लिए * Musculoskeletal System (जोड़ों और मांसपेशियों की जांच): मांसपेशियों का फटना, लिगामेंट में सूजन, या जोड़ों के आसपास पानी भर जाने पर। * Blood Vessels (नसें): अगर पैरों की नसों में थक्का हो जाना।
![]() |