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स्वतन्त्रता के उद्घोषक : श्री अरविन्द !

स्वतन्त्रता के उद्घोषक:श्री अरविन्द! भारतीय स्वाधीनता संग्राम में श्री अरविन्द का महत्त्वपूर्ण योगदान रहा है।उनका बचपन घोर विदेशी और विधर्मी वातावरण में बीता;पर पूर्वजन्म के संस्कारों के बल पर वे महान आध्यात्मिक पुरुष कहलाये। उनका जन्म 15 अगस्त, 1872 को डा. कृष्णधन घोष के घर में हुआ था।उन दिनों बंगाल का बुद्धिजीवी और सम्पन्न वर्ग ईसाइयत से अत्यधिक प्रभावित था।वे मानते थे कि हिन्दू धर्म पिछड़ेपन का प्रतीक है। भारतीय परम्पराएँ अन्धविश्वासी और कूपमण्डूक बनाती हैं।जबकि ईसाई धर्म विज्ञान पर आधारित है।अंग्रेजी भाषा और राज्य को ऐसे लोग वरदान मानते थे। डा. कृष्णधन घोष भी इन्हीं विचारों के समर्थक थे। वे चाहते थे कि उनके बच्चों पर भारत और भारतीयता का जरा भी प्रभाव न पड़े। वे अंग्रेजी में सोचें,बोलें और लिखें। इसलिए उन्होंने अरविन्द को मात्र सात वर्ष की अवस्था में इंग्लैण्ड भेज दिया। अरविन्द असाधारण प्रतिभा के धनी थे।उन्होंने अपने अध्ययन काल में अंग्रेजों के मस्तिष्क का भी आन्तरिक अध्ययन किया। अंग्रेजों के मन में भारतीयों के प्रति भरी द्वेष भावना देखकर उनके मन में अंग्रेजों के प्रति घृणा उत्पन्न हो गयी। उन्होंने तब ही संकल्प लिया कि मैं अपना जीवन अंग्रेजों के चंगुल से भारत को मुक्त करने में लगाऊँगा। अरविन्द घोष ने क्वीन्स कालिज,कैम्ब्रिज से 1893 में स्नातक परीक्षा उत्तीर्ण की। इस समय तक वे अंग्रेजी,ग्रीक,लैटिन,फ्रेंच आदि 10 भाषाओं के विद्वान् हो गये थे। इससे पूर्व 1890 में उन्होंने सर्वाधिक प्रतिष्ठित आई.सी.एस. परीक्षा उत्तीर्ण कर ली थी। अब उनके लिए पद और प्रतिष्ठा के स्वर्णिम द्वार खुले थे;पर अंग्रेजों की नौकरी करने की इच्छा न होने से उन्होंने घुड़सवारी की परीक्षा नहीं दी। यह जान कर गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर ने उन्हें‘स्वदेश की आत्मा’की संज्ञा दी।इसके बाद वे भारत आ गये। भारत में 1893 से 1906 तक उन्होंने बड़ोदरा(गुजरात)में रहते हुए राजस्व विभाग,सचिवालय और फिर महाविद्यालय में प्राध्यापक और उपप्राचार्य जैसे स्थानों पर काम किया। यहाँ उन्होंने हिन्दी,संस्कृत,बंगला,गुजराती,मराठी भाषाओं के साथ हिन्दू धर्म एवं संस्कृति का गहरा अध्ययन किया;पर उनके मन में तो क्रान्तिकारी मार्ग से देश को स्वतन्त्र कराने की प्रबल इच्छा काम कर रही थी। अतः वे इसके लिए युवकों को तैयार करने लगे। अपने विचार युवकों तक पहुँचाने के लिए वे पत्र-पत्रिकाओं में लेख लिखने लगेे। वन्दे मातरम्,युगान्तर,इन्दु प्रकाश आदि पत्रों में प्रकाशित उनके लेखों ने युवाओं के मन में हलचल मचा दी। इनमें मातृभूमि के लिए सर्वस्व समर्पण की बात कही जाती थी। इन क्रान्तिकारी विचारों से डर कर शासन ने उन्हें अलीपुर बम काण्ड में फँसाकर एक वर्ष का सश्रम कारावास दिया। कारावास में उन्हें स्वामी विवेकानन्द की वाणी सुनायी दी और भगवान् श्रीकृष्ण से साक्षात्कार हुआ। अब उन्होंने अपने कार्य की दिशा बदल ली और 4 अप्रैल, 1910 को पाण्डिचेरी आ गये,यहाँ वे योग साधना,अध्यात्म चिन्तन और लेखन में डूब गये। 1924 में उनकी आध्यात्मिक उत्तराधिकारी श्रीमाँ का वहाँ आगमन हुआ। 24 नवम्बर, 1926 को उन्हें विशेष सिद्धि की प्राप्ति हुई।इससे उनके शरीर का रंग सुनहरा हो गया। श्री अरविन्द ने अनेक ग्रन्थों की रचना की। अध्यात्म साधना में डूबे रहते हुए ही 5 दिसम्बर, 1950 को वे अनन्त प्रकाश में लीन हो गये।

डीएनए: संरचना और प्रतिकृति-एक सिंहावलोकन️

क्रियाएं। डीएनए: संरचना और प्रतिकृति-एक सिंहावलोकन️ डीएनए की संरचना ? एक एंटीपैरल ओरिएंटेशन में दो स्ट्रैंड्स से बना। चीनी-फॉस्फेट रीढ़ के साथ न्यूक्लियोटाइड्स (ए, टी, सी, जी) से निर्मित। स्ट्रैंड्स 5' से 3' छोर तक चलते हैं । विशिष्ट आधार जोड़े (एटी, सीजी) और स्टैक्ड बेस के बीच हाइड्रोफोबिक इंटरैक्शन के बीच हाइड्रोजन बॉन्ड द्वारा स्थिर। प्रतिकृति प्रक्रिया: डीएनए प्रतिकृति अर्धविराम है-प्रत्येक नए डबल हेलिक्स में एक मूल स्ट्रैंड और एक नया संश्लेषित स्ट्रैंड होता है । अनइंडिंग: हेलिकेज़ एसएसबी प्रोटीन द्वारा स्थिर स्ट्रैंड्स को अलग करता है। प्राइमिंग: प्राइमेस प्रतिकृति शुरू करने के लिए एक छोटे आरएनए प्राइमर को संश्लेषित करता है। बढ़ाव: डीएनए पोलीमरेज़ केवल 5'3' दिशा में नए किस्में बनाता है । अग्रणी बनाम लैगिंग स्ट्रैंड: एक स्ट्रैंड को लगातार संश्लेषित किया जाता है;दूसरे को टुकड़ों में संश्लेषित किया जाता है । सुपरकोलिंग राहत: डीएनए टोपोइसोमेरेस कांटे के आगे मरोड़ वाले तनाव (सुपरकोइल) को हटा देता है ।

बाबरी ढाँचा तीनों गुम्बद गिरा दिये (राष्ट्रीय कलंक का परिमार्जन !)

6 दिसम्बर/इतिहास-स्मृति राष्ट्रीय कलंक का परिमार्जन! भारत में विधर्मी आक्रमणकारियों ने बड़ी संख्या में हिन्दू मन्दिरों का विध्वंस किया। स्वतन्त्रता के बाद सरकार ने मुस्लिम वोटों के लालच में ऐसी मस्जिदों,मजारों आदि को बना रहने दिया। इनमें से श्रीराम जन्मभूमि मन्दिर (अयोध्या),श्रीकृष्ण जन्मभूमि (मथुरा)और काशी विश्वनाथ मन्दिर के सीने पर बनी मस्जिदें सदा से हिन्दुओं को उद्वेलित करती रही हैं। इनमें से श्रीराम मन्दिर के लिए विश्व हिन्दू परिषद् ने देशव्यापी आन्दोलन किया,जिससे 6 दिसम्बर, 1992 को वह बाबरी ढाँचा धराशायी हो गया। श्रीराम मन्दिर को बाबर के आदेश से उसके सेनापति मीर बाकी ने 1528 ई. में गिराकर वहाँ एक मस्जिद बना दी। इसके बाद से हिन्दू समाज एक दिन भी चुप नहीं बैठा। वह लगातार इस स्थान को पाने के लिए संघर्ष करता रहा। 23 दिसम्बर, 1949 को हिन्दुओं ने वहाँ रामलला की मूर्ति स्थापित कर पूजन एवं अखण्ड कीर्तन शुरू कर दिया। 'विश्व हिन्दू परिषद्' द्वारा इस विषय को अपने हाथ में लेने से पूर्व तक 76 हमले हिन्दुओं ने किये;जिसमें देश के हर भाग से तीन लाख से अधिक नर नारियों का बलिदान हुआ;पर पूर्ण सफलता उन्हें कभी नहीं मिल पायी। विश्व हिन्दू परिषद ने लोकतान्त्रिक रीति से जनजागृति के लिए श्रीराम जन्मभूमि मुक्ति यज्ञ समिति का गठन कर 1984 में श्री राम-जानकी रथयात्रा निकाली,जो सीतामढ़ी से प्रारम्भ होकर अयोध्या पहुँची। इसके बाद हिन्दू नेताओं ने शासन से कहा कि श्री रामजन्मभूमि मन्दिर पर लगे अवैध ताले को खोला जाए।न्यायालय के आदेश से 1 फरवरी, 1986 को ताला खुल गया। इसके बाद वहाँ भव्य मन्दिर बनाने के लिए 1989 में देश भर से श्रीराम शिलाओं को पूजित कर अयोध्या लाया गया और बड़ी धूमधाम से 9 नवम्बर,1989 को श्रीराम मन्दिर का शिलान्यास कर दिया गया।जनता के दबाव के आगे प्रदेश और केन्द्र शासन को झुकना पड़ा। पर मन्दिर निर्माण तब तक सम्भव नहीं था,जब तक वहाँ खड़ा ढांँचा न हटे। हिन्दू नेताओं ने कहा कि यदि मुसलमानों को इस ढाँचे से मोह है,तो वैज्ञानिक विधि से इसे स्थानान्तरित कर दिया जाए;पर शासन मुस्लिम वोटों के लालच से बँधा था। हर बार न्यायालय की दुहाई देता रहा। विहिप का तर्क था कि आस्था के विषय का निर्णय न्यायालय नहीं कर सकता। शासन की हठधर्मी देखकर हिन्दू समाज ने आन्दोलन और तीव्र कर दिया। इसके अन्तर्गत 1990 में वहाँ कारसेवा का निर्णय किया गया। तब उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह की सरकार थी,उन्होेंने घोषणा कर दी कि बाबरी परिसर में एक परिन्दा तक पर नहीं मार सकता;पर हिन्दू युवकों ने शौर्य दिखाते हुए 29 अक्तूबर को गुम्बदों पर भगवा फहरा दिया। बौखला कर दो नवम्बर को मुलायम सिंह ने गोली चलवा दी,जिसमें कोलकाता के दो सगे भाई राम और शरद कोठारी सहित सैकड़ों कारसेवकों का बलिदान हुआ। इसके बाद प्रदेश में भाजपा की सरकार बनी,एक बार फिर 6 दिसम्बर,1992 को कारसेवा की तिथि निश्चित की गयी। विहिप की योजना तो केन्द्र शासन पर दबाव बनाने की ही थी;पर युवक आक्रोशित हो उठे। उन्होंने वहाँ लगी तार बाड़ के खम्भों से प्रहार कर बाबरी ढाँचे के तीनों गुम्बद गिरा दिये। इसके बाद विधिवत वहाँ श्री रामलला को भी विराजित कर दिया गया। इस प्रकार वह बाबरी कलंक नष्ट हुआ और तुलसी बाबा की यह उक्ति भी प्रमाणित हुई- 'होई है सोई,जो राम रचि राखा।'

नोम चॉम्स्की (आधुनिक भाषाविज्ञान के संस्थापक)

क्या चौमस्की 'गुणाढ्य की गुणसूत्र गाथा' हैं? छद्म रूप में? भाषाविज्ञान के लिए नोम चॉम्स्की का योगदान. नोम चॉम्स्की बीसवीं और इक्कीसवीं शताब्दी के सबसे प्रभावशाली भाषाविदों में से एक हैं और व्यापक रूप से आधुनिक भाषाविज्ञान के संस्थापक माने जाते हैं । उनके विचारों ने एक वर्णनात्मक और व्यवहारवादी दृष्टिकोण से एक संज्ञानात्मक और वैज्ञानिक अनुशासन में स्थानांतरित करके भाषा के अध्ययन में क्रांति ला दी। चॉम्स्की के काम ने न केवल भाषा विज्ञान में,बल्कि मनोविज्ञान,दर्शन और संज्ञानात्मक विज्ञान में भी भाषा को कैसे समझा,अध्ययन और समझाया,बदल दिया । चॉम्स्की के सबसे महत्वपूर्ण योगदानों में से एक- 'जनरेटिव व्याकरण का सिद्धांत' है। उनकी ग्राउंडब्रेकिंग बुक सिंटैक्टिक स्ट्रक्चर्स (1957) में,उन्होंने तर्क दिया कि भाषा केवल नकल और आदत के माध्यम से नहीं सीखी जाती है,जैसा कि व्यवहारवादियों ने दावा किया है,लेकिन मानव मन में आंतरिक नियमों के एक सेट द्वारा उत्पन्न होता है । इस सिद्धांत के अनुसार,व्याकरणिक नियमों का एक सीमित सेट अनंत संख्या में वाक्य उत्पन्न कर सकता है। इस विचार ने पहले के भाषाई मॉडल से एक कट्टरपंथी प्रस्थान को चिह्नित किया और आधुनिक वाक्यात्मक सिद्धांत की नींव रखी । जेनेरिक व्याकरण से निकटता से संबंधित चॉम्स्की की सार्वभौमिक व्याकरण की अवधारणा है । उन्होंने प्रस्तावित किया कि सभी मानव भाषाएं एक सामान्य अंतर्निहित संरचना साझा करती हैं क्योंकि मनुष्य जैविक रूप से भाषा के लिए एक जन्मजात क्षमता से संपन्न होते हैं । सार्वभौमिक व्याकरण में सभी भाषाओं और मापदंडों के लिए सामान्य सिद्धांत होते हैं जो भाषाओं में भिन्न होते हैं। यह सिद्धांत बताता है कि कैसे बच्चे जटिल व्याकरणिक प्रणालियों को तेजी से और सीमित इनपुट के साथ प्राप्त करते हैं! एक समस्या चॉम्स्की के जनरेटिव व्याकरणा सिद्धांत को 'उत्तेजना की गरीबी' के रूप में संदर्भित किया जाता है। ” चॉम्स्की ने क्षमता और प्रदर्शन के बीच महत्वपूर्ण अंतर भी पेश किया। क्षमता एक वक्ता के आदर्श,भाषा के आंतरिक ज्ञान को संदर्भित करती है,जबकि प्रदर्शन वास्तविक स्थितियों में भाषा के वास्तविक उपयोग को संदर्भित करता है,जो स्मृति सीमाओं,विकर्षणों या त्रुटियों से प्रभावित हो सकता है । भाषाई क्षमता पर ध्यान केंद्रित करके,चॉम्स्की ने मानसिक व्याकरण पर जोर दिया जो सतह-स्तरीय भाषण व्यवहार के बजाय भाषा को रेखांकित करता है । एक अन्य प्रमुख योगदान गहरी संरचना और सतह संरचना के बीच का अंतर है। गहरी संरचना अंतर्निहित वाक्यात्मक संबंधों का प्रतिनिधित्व करती है जो अर्थ व्यक्त करते हैं,जबकि सतह संरचना एक वाक्य का वास्तविक बोली जाने वाली या लिखित रूप है । परिवर्तनकारी नियम बताते हैं कि गहरी संरचनाओं को सतह संरचनाओं में कैसे परिवर्तित किया जाता है । हालांकि बाद में चॉम्स्की के अपने सिद्धांतों में संशोधित किया गया,इस अंतर ने वाक्यात्मक विश्लेषण और भाषाई सिद्धांत को गहराई से प्रभावित किया । चॉम्स्की के काम ने व्याकरण के क्रमिक मॉडल का विकास भी किया,जिसमें परिवर्तनकारी-जनरेटिव व्याकरण,सरकार और बाध्यकारी सिद्धांत और न्यूनतम कार्यक्रम शामिल हैं। न्यूनतम कार्यक्रम भाषा को सबसे किफायती और सरल सिद्धांतों के साथ समझाने का प्रयास करता है,यह सुझाव देता है कि भाषाई संरचनाएं ध्वनि और अर्थ की जरूरतों को पूरा करने के लिए बेहतर रूप से डिज़ाइन की गई हैं । यह दृष्टिकोण समकालीन भाषाई अनुसंधान को आकार देना जारी रखता है। भाषाविज्ञान से परे,चॉम्स्की के सिद्धांतों का गहरा प्रभाव पड़ा मनोवैज्ञानिक,संज्ञानात्मक विज्ञान,तथा भाषा का दर्शन। एक मानसिक संकाय के रूप में भाषा पर जोर देकर,उन्होंने संज्ञानात्मक क्रांति शुरू करने में मदद की,मन और सीखने के व्यवहारवादी सिद्धांतों को चुनौती दी । उनके विचारों ने प्रभावित किया कि शोधकर्ता मस्तिष्क,अनुभूति और मानव स्वभाव का अध्ययन कैसे करते हैं । अंत में,भाषा विज्ञान में नोम चॉम्स्की का योगदान एक सहज,नियम-शासित और संज्ञानात्मक प्रणाली के रूप में भाषा के उनके पुनर्गठन में निहित है । जनरेटिव व्याकरण,सार्वभौमिक व्याकरण और उनके विकसित सैद्धांतिक ढांचे के माध्यम से,चॉम्स्की ने भाषाविज्ञान को एक कठोर विज्ञान में बदल दिया । उनका काम भाषाई विचार पर हावी है और यह समझने के लिए आवश्यक है कि मानव भाषा कैसे काम करती है। जै-जै गुणाढ्य, भाषिकी साध्य, गुणसूत्र कथा, महिमा अनंत!

भारतीय वायुसेना के कमांडर इन चीफ सुब्रतो मुखर्जी (EXAMPLE OF UNCERTAINTY OF DEATH)

भारतीये वायुसेना के कमांडर इन चीफ सुब्रतो मुखर्जी सुब्रतो मुखर्जी का जन्म 6 मार्च 1911को एक प्रतिष्ठित बंगाली परिवार में हुआ,उनकी शिक्षा भारत और यूनाइटेड किंगडम दोनों में हुई। वह रॉयल एयर फोर्स में शामिल हुए और बाद में 1933 में भारतीय वायु सेना(आईएएफ)के पहले रंगरूटों में से एक थे।उन्होंने 1933 से 1941 तक नंबर 1 स्क्वाड्रन आईएएफ के साथ उड़ान भरी। उन्होंने उत्तर-पश्चिम सीमांत प्रांत में व्यापक कार्रवाई देखी। इस कार्यकाल के दौरान और प्रेषणों में इसका उल्लेख किया गया था। 1942 में कमांड नंबर 1 स्क्वाड्रन में लौटने से पहले उन्होंने 1941 में स्टाफ कॉलेज,क्वेटा में दाखिला लिया।उड़ान प्रशिक्षण के निदेशक के रूप में वायु मुख्यालय में जाने से पहले उन्होंने 1943 से 1944 तक आरएएफ स्टेशन कोहाट की कमान संभाली। उन्हें 1945 में ओबीई से सम्मानित किया गया था। भारत के विभाजन के बाद,उन्हें रॉयल इंडियन एयर फ़ोर्स का डिप्टी एयर कमांडर नियुक्त किया गया।इंपीरियल डिफेंस कॉलेज में उच्च कमान पाठ्यक्रम पूरा करने के बाद,उन्हें 1954 में भारतीय वायुसेना का कमांडर-इन-चीफ नियुक्त किया गया। उन्होंने भारतीय वायुसेना को एक ऑल-जेट बल में बदलने का निरीक्षण किया। 1955 से,उन्होंने चीफ्स ऑफ स्टाफ कमेटी के अध्यक्ष के रूप में भी कार्य किया । उन्हें कई चीजें पहली बार करने का श्रेय प्राप्त है: 1938 में एक उड़ान की कमान संभालने वाले पहले भारतीय,1939 में एक स्क्वाड्रन की कमान संभालने वाले पहले भारतीय,1943 में एक स्टेशन की कमान संभालने वाले पहले भारतीय और अंत में,सेवा की कमान संभालने वाले पहले भारतीय। नवंबर 1960 में,एयर इंडिया ने टोक्यो,जापान के लिए अपनी सेवा का उद्घाटन किया। मुखर्जी और एयर कमोडोर(बाद में एसीएम )प्रताप चंद्र लाल,इंडियन एयरलाइंस कॉर्पोरेशन के तत्कालीन महाप्रबंधक इस उड़ान में यात्री थे। 8 नवंबर 1960 को टोक्यो में उतरने के बाद,मुखर्जी अपने एक दोस्त,भारतीय नौसेना अधिकारी के साथ एक रेस्तरां में भोजन कर रहे थे। भोजन का एक टुकड़ा उसकी श्वास नली में फंस गया,जिससे उसका दम घुट गया। डॉक्टर को बुलाने से पहले ही मुखर्जी की मृत्यु हो गई। अगले दिन,उनका पार्थिव शरीर पालम हवाई अड्डे,नई दिल्ली ले जाया गया ।

एपिजेनेटिक्स इन एक्शन : द हनीबी स्टोर-

पराजेनेटिक परिवर्तन। मिथाइलेशन एपिजेनेटिक्स इन एक्शन:द हनीबी स्टोरी एपिजेनेटिक्स बताता है कि अंतर्निहित डीएनए अनुक्रम को बदले बिना जीन अभिव्यक्ति कैसे बदल सकती है । एक आकर्षक उदाहरण मधुमक्खियों (एपिस मेलिफेरा) से आता है । रानी और श्रमिक मधुमक्खियां आनुवंशिक रूप से समान हैं,फिर भी वे व्यवहार,शरीर विज्ञान और उपस्थिति में भिन्न हैं। मुख्य अंतर? आहार। रानी मधुमक्खियों को शाही जेली खिलाई जाती है,जबकि श्रमिक मधुमक्खियों को अमृत प्राप्त होता है। रॉयल जेली में ऐसे यौगिक होते हैं जो एंजाइम साइटोसिन मिथाइलट्रांसफेरेज़ को रोकते हैं,जो सामान्य रूप से डीएनए पर साइटोसिन बेस में मिथाइल समूह(–सीएच) जोड़ता है । जब मिथाइलेशन अवरुद्ध होता है,तो कुछ जीन सक्रिय हो जाते हैं,जिससे रानी मधुमक्खी का विकास होता है । वैज्ञानिकों ने भी इस प्रभाव को दोहराया है—शाही जेली जैसी स्थितियों को देखते हुए कार्यकर्ता मधुमक्खियों ने रानी जैसे लक्षण विकसित करना शुरू कर दिया है । यह एपिजेनेटिक्स है: डीएनए मिथाइलेशन या हिस्टोन प्रोटीन में संशोधन जैसे परिवर्तन जो डीएनए अनुक्रम को बदले बिना जीन अभिव्यक्ति को प्रभावित करते हैं । अन्य उदाहरणों में शामिल हैं: हिस्टोन संशोधन (मिथाइल या फॉस्फेट समूह) एक्स-महिला स्तनधारियों में निष्क्रियता,जहां भ्रूण के विकास के दौरान एक एक्स गुणसूत्र बेतरतीब ढंग से बंद हो जाता है । बायोकैमिस्ट्री-एपिजेनेटिक्स-जेनेटिक्स-डीएनए मिथाइलेशन

जीनोम (पिक्सेल)-तीन आयामी संरचन

20 से अधिक वर्षों से,वैज्ञानिकों ने मानव जीनोम के पूर्ण अनुक्रम को जाना है।लेकिन सबसे महत्वपूर्ण प्रश्नों में से एक अनुत्तरित रहा:यह कोड जीवन को नियंत्रित करने के लिए जीवित कोशिकाओं के अंदर शारीरिक रूप से खुद को कैसे व्यवस्थित करता है? उस प्रश्न का अब अभूतपूर्व स्पष्टता के साथ उत्तर दिया गया है। रेडक्लिफ डिपार्टमेंट ऑफ मेडिसिन के भीतर काम करने वाले ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं ने जीनोम की तीन आयामी संरचना का अब तक का सबसे विस्तृत नक्शा तैयार किया है,जो एक ही डीएनए बेस जोड़ी के लिए सभी तरह से हल किया गया है। एमसीसी अल्ट्रा नामक एक नई विकसित विधि का उपयोग करते हुए,टीम सीधे यह देखने में सक्षम थी कि डीएनए नाभिक के अंदर कैसे सिलवटों,छोरों और झुकता है। इससे पता चलता है कि जीन शारीरिक रूप से कैसे उजागर या छिपे हुए हैं,यह निर्धारित करते हुए कि कौन से जीन चालू हैं और कौन से चुप रहते हैं । यह खोज जीव विज्ञान के एक मुख्य सिद्धांत को फिर से परिभाषित करती है। यह सिर्फ आनुवंशिक कोड नहीं है जो मायने रखता है। इस तरह अंतरिक्ष में उस कोड की व्यवस्था की जाती है । प्रत्येक कोशिका के अंदर,लगभग दो मीटर डीएनए को एक मिलीमीटर के दसवें हिस्से से छोटे नाभिक में पैक किया जाता है। डीएनए सपाट नहीं होता है । यह संगठित छोरों और डोमेन बनाता है जो दूर के क्षेत्रों को संपर्क में लाते हैं । ये लूपिंग संरचनाएं नियामक स्विच के रूप में कार्य करती हैं,जिससे कुछ जीनों को दूसरों को निष्क्रिय रखते हुए पढ़ा जा सकता है । अब तक,वैज्ञानिक केवल अपेक्षाकृत कम संकल्प पर इस वास्तुकला का निरीक्षण कर सकते थे। एमसीसी अल्ट्रा एकल अक्षर परिशुद्धता पर इन इंटरैक्शन को कैप्चर करता है,यह बताता है कि डीएनए के गैर-कोडिंग क्षेत्र शारीरिक रूप से जीन से कैसे जुड़ते हैं और विनियमित करते हैं । यह मायने रखता है क्योंकि नब्बे प्रतिशत से अधिक बीमारी से जुड़े आनुवंशिक बदलाव इन नियामक क्षेत्रों के भीतर जीन के बाहर पाए जाते हैं । यह समझकर कि ये स्विच तीन आयामी अंतरिक्ष में कैसे काम करते हैं,शोधकर्ता कैंसर,हृदय रोग और ऑटोइम्यून विकारों के अध्ययन के साथ-साथ नए चिकित्सीय लक्ष्यों की पहचान करने के लिए नए उपकरण प्राप्त करते हैं । अध्ययन में एक नए मॉडल का भी परिचय दिया गया है जिसमें सुझाव दिया गया है कि विद्युत चुम्बकीय बल जीन गतिविधि के स्थानीय द्वीपों में लूपिंग डीएनए के आकार समूहों में मदद कर सकते हैं,जो जीन जीनोम के भीतर एक साथ व्यक्त किए जाते हैं । पहली बार,जीनोम की वास्तुकला अब सैद्धांतिक या अनुमानित नहीं है।यह दिख रहा है । यह काम एक प्रमुख मोड़ है कि हम आनुवंशिकी,बीमारी और जीवन के भौतिक यांत्रिकी को कैसे समझते हैं । वैज्ञानिकों ने अभूतपूर्व विस्तार से जीनोम की संरचना पर कब्जा कर लिया! ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय,2025 क्रेडिट रेडक्लिफ(मेडिसिन विभाग)

महाराजा रणजीत सिंह

महाराजा रणजीत सिंह महाराजा रणजीत सिंह शेर-ए पंजाब के नाम से प्रसिद्ध हैं। महाराजा रणजीत एक ऐसी व्यक्ति थे,जिन्होंने न केवल पंजाब को एक सशक्त सूबे के रूप में एकजुट रखा,बल्कि अपने जीते-जी अंग्रेजों को अपने साम्राज्य के पास भी नहीं फटकने दिया। महाराजा रणजीत सिंह का जन्म: 13 नवंबर 1780, गुजरांवाला, (वर्तमान पाकिस्तान) में हुआ था l बात सन् 1812 की है। पंजाब पर महाराजा रणजीत सिंह का एकछत्र राज्य था। उस समय महाराजा रणजीत सिंह ने कश्मीर के सूबेदार अतामोहम्मद के शिकंजे से कश्मीर को मुक्त कराने का अभियान शुरू किया था। इस अभियान से भयभीत होकर अतामोहम्मद कश्मीर छोड़कर भाग गया।कश्मीर अभियान के पीछे एक अन्य कारण भी था,अतामोहम्मद ने महमूद शाह द्वारा पराजित शाहशुजा को शेरगढ़ के किले में कैद कर रखा था। उसे कैदखाने से मुक्त कराने के लिए उसकी बेगम वफा बेगम ने लाहौर आकर महाराजा रणजीत सिंह से प्रार्थना की और कहा कि मेहरबानी कर आप मेरे पति को अतामोहम्मद की कैद से रिहा करवा दें,इस अहसान के बदले बेशकीमती कोहिनूर हीरा आपको भेंट कर दूंगी। शाहशुजा के कैद हो जाने के बाद वफा बेगम ही उन दिनों अफगानिस्तान की शासिका थी। इसी कोहिनूर को हड़पने के लालच में भारत पर आक्रमण करने वाले अहमद शाह अब्दाली के पौत्र जमान शाह को स्वयं उसी के भाई महमूद शाह ने कैदखाने में भयंकर यातनाएं देकर उसकी आंखें निकलवा ली थीं। जमान शाह अहमद शाह अब्दाली के बेटे तैमूर शाह का बेटा था,जिसका भाई था महमूद शाह। अस्तु,महाराजा रणजीति सिंह स्वयं चाहते थे कि वे कश्मीर को अतामोहम्मद से मुक्त करवाएं।अत: सुयोग आने पर महाराजा रणजीत सिंह ने कश्मीर को आजाद करा लिया। उनके दीवान मोहकमचंद ने शेरगढ़ के किले को घेर कर वफा बेगम के पति शाहशुजा को रिहा कर वफा बेगम के पास लाहौर पहुंचा दिया। राजकुमार खड्गसिंह ने उन्हें मुबारक हवेली में ठहराया।पर वफा बेगम अपने वादे के अनुसार कोहिनूर हीरा महाराजा रणजीत सिंह को भेंट करने में विलम्ब करती रही,यहां तक कि कई महीने बीत गए। जब महाराजा ने शाहशुजा से कोहिनूर हीरे के बारे में पूछा तो वह और उसकी बेगम दोनों ही बहाने बनाने लगे।जब ज्यादा जोर दिया गया तो उन्होंने एक नकली हीरा महाराजा रणजीत सिंह को सौंप दिया,जो जौहरियों के परीक्षण की कसौटी पर नकली साबित हुआ। रणजीत सिंह क्रोध से भर उठे और मुबारक हवेली घेर ली गई,दो दिन तक वहां खाना नहीं दिया गया।वर्ष 1813 की पहली जून थी जब महाराजा रणजीत सिंह शाहशुजा के पास आए और फिर कोहिनूर के विषय में पूछा।धूर्त शाहशुजा ने कोहिनूर अपनी पगड़ी में छिपा रखा था। किसी तरह महाराजा को इसका पता चल गया,अत:उन्होंने शाहशुजा को काबुल की राजगद्दी दिलाने के लिए'गुरुग्रंथ साहब'पर हाथ रखकर प्रतिज्ञा की,फिर उसे'पगड़ी-बदल भाई'बनाने के लिए उससे पगड़ी बदल कर कोहिनूर प्राप्त कर लिया। पर्दे की ओट में बैठी वफा बेगम महाराजा की चतुराई समझ गईं।अब कोहिनूर महाराजा रणजीत सिंह के पास पहुंच गया था और वे संतुष्ट थे कि उन्होंने कश्मीर को आजाद करा लिया था।उनकी इच्छा थी कि वे कोहिनूर हीरे को जगन्नाथपुरी के मंदिर में प्रतिष्ठित भगवान जगन्नाथ को अर्पित करें। हिन्दू मंदिरों को मनों सोना भेंट करने के लिए वे प्रसिद्ध थे।काशी के विश्वनाथ मंदिर में भी उन्होंने अकूत सोना अर्पित किया था।परन्तु जगन्नाथ भगवान (पुरी)तक पहुंचने की उनकी इच्छा कोषाध्यक्ष बेलीराम की कुनीति के कारण पूरी न हो सकी। महाराजा रणजीतसिंह अस्वस्थ हो रहे थे। 1838 में लकवा का आक्रमण हुआ,यद्यपि उपचार किया गया और अंग्रेज डाक्टरों ने भी इलाज किया,लेकिन 27 जून 1839 ई. को उनका प्राणांत हो गया।

Ghazal-206

क्यों खयालों में कोई एक ख्याल अच्छा है जो ग़ज़ल बन पड़े तो ही मेरा हाल अच्छा है//1 मैं किसी हुस्न परी के ही तलब मैं हूँ जिंदा कोई हासिल तो हो जिसका की ज़माल अच्छा है//2 तू बिछड़ता तो भी ये कारवाँ चलता रहता तेरे होने नही होने से तो मेरा ये मलाल अच्छा है//3 कतरा कतरा लहू जलता गया अंदर से मेरे और वो सोचता है खूँ में उबाल अच्छा है//4 जब तरन्नुम में नही आता सलीका पढ़ने का फिर तो पढ़ने का तहत में ही कमाल अच्छा है//5 शायरी करना अदब मैं खरा व्यापार है मेरा कोई तो देखे की इस बनिए का माल अच्छा है//6 बोसा इक गाल पे देकर मैं यहीं सोचता हूँ दूसरी और का शायद तेरा गाल अच्छा है//7 एक ही बात पे मैंने दे दी जागीर मेरी कैसा भी है वो मगर उसका जमाल अच्छा है//8 क्यों मेरा तुझसे भी मिलना नही मुमकिन अब तक कुछ है अफ़सोस मगर मेरा ये हाल अच्छा है//9 'Maahir'

खानअब्दुल गफ्फार खाँ (सीमान्त गांधी)

24 दिसम्बर/जन्म-दिवस भारत रत्न सीमान्त गांधी आज जैसा कटा-फटा भारत हमें दिखाई देता है,किसी समय वह ऐसा नहीं था। तब हिमालय के नीचे का सारा भाग भारत ही कहलाता था;पर मुस्लिम आक्रमण और धर्मान्तरण के कारण इनमें से पूर्व और पश्चिम के अनेक भाग भारत से कट गये। अफगानिस्तान से लगे ऐसे ही एक भाग पख्तूनिस्तान के उतमानजई गाँव में 24 दिसम्बर, 1880 को अब्दुल गफ्फार खाँ का जन्म हुआ।उन दिनों इसे भारत का नार्थ वेस्ट या फ्रण्टियर क्षेत्र कहा जाता था। इस क्षेत्र के लोग स्वभाव से विद्रोही एवं लड़ाकू थे।अंग्रेज शासकों ने इन्हें बर्बर और अपराधी कहकर यहाँ‘फ्रंटियर क्राइम्स रेगुलेशन ऐक्ट’लगा दिया और इसके अन्तर्गत यहाँ के निवासियों का दमन किया। अब्दुल गफ्फार खाँ का मत था कि शिक्षा के अभाव में यह क्षेत्र पिछड़ा है और लोग मजबूरी में अपराधी बन रहे हैं। इसलिए 17 वर्ष की अवस्था में इन्होंने मौलवी अब्दुल अजीज के साथ मिलकर अपने गाँव में एक विद्यालय स्थापित किया,जहाँ उनकी मातृभाषा में ही शिक्षा दी जाती थी। थोड़े समय में ही इनके विद्यालय की ख्याति हो गयी।इससे प्रेरित होकर और लोगों ने भी ऐसे ही मदरसे खोले। 1921 में इन्होंने अंजुमन इस्लाह अल् अफशाना आजाद हाईस्कूल की स्थापना की।इस प्रकार इनकी छवि शिक्षा के माध्यम से समाज सेवा करने वाले व्यक्ति की बन गयी। हाईस्कूल करने के बाद ये अलीगढ़ आ गये,जहाँ इनकी भेंट अनेक स्वतन्त्रता सेनानियों से हुई।वहाँ ये गांधी जी के विचारों से अत्यधिक प्रभावित हुए। पेशावर की खिलाफत समिति के अध्यक्ष पद पर रहकर इन्होंने सीमा प्रान्त में शिक्षा का पर्याप्त विस्तार किया। इसके बाद ये सेना में भर्ती हो गये।एक बार ये अपने एक सैनिक मित्र के साथ अंग्रेज अधिकारी से मिलने गये। वहाँ एक छोटी सी भूल पर इनके मित्र को उस अधिकारी ने बहुत डाँटा।अब्दुल गफ्फार खां के मन को इससे भारी चोट लगी और इन्होंने सेना छोड़ दी। अब इन्होंने एक संस्था‘खुदाई खिदमतगार’तथा उसके अन्तर्गत‘लाल कुर्ती वालंटियर फोर्स’बनाई। इसके सदस्य लाल रंग के कुर्ते पहनते थे। खान अब्दुल गफ्फार खाँ ने सदा अहिंसात्मक तरीके से अंग्रेजों का विरोध किया। प्रतिबन्ध के बावजूद ये जनसभाओं का नेतृत्व करते रहे।इस कारण इन्हें कई बार जेल जाना पड़ा। एक बार जब इन्हें पकड़कर न्यायालय में प्रस्तुत किया गया,तो न्यायाधीश ने व्यंग्य से पूछा-क्या तुम पठानों के बादशाह हो? तब से ये‘बादशाह खान’के नाम से प्रसिद्ध हो गये।गांधीवादी रीति के समर्थक होने के कारण इन्हें ‘सीमान्त गांधी’ भी कहा जाता है। इन्होंने 1942 में‘भारत छोड़ो आन्दोलन’में उत्साहपूर्वक भाग लिया और जेल गये। विभाजन की चर्चा होने पर इन्हें बहुत कष्ट होता था।पाकिस्तान कैसा मजहबी,असहिष्णु और अलोकतान्त्रिक देश होगा,इसकी इन्हें कल्पना थी। इसलिए ये बार-बार कांग्रेस के नेताओं और अंग्रेजों से प्रार्थना करते थे उन्हें भूखे पाकिस्तानी भेड़ियों के सामने न फेंके। उनके क्षेत्र को या तो भारत में रखें या फिर स्वतन्त्र देश बना दें;पर यह इच्छा पूरी नहीं हो सकी।15 अगस्त, 1947 को पख्तूनिस्तान पाकिस्तान का अंग बन गया। बादशाह खान भारत में भी अत्यधिक लोकप्रिय थे।शासन ने 1987 में उन्हें‘भारत रत्न’देकर सम्मानित किया। 20 जनवरी, 1988 को 98 वर्ष की आयु में भारत के इस घनिष्ठ मित्र का देहान्त हुआ।

"उर्मिला निद्रा"

उर्मिला के विषय में उसकी निद्रा बड़ी प्रसिद्ध है जिसे "उर्मिला निद्रा" कहा जाता है। अपने 14 वर्ष के वनवास में लक्ष्मण एक रात्रि के लिए भी नहीं सोये, जब निद्रा देवी ने उनकी आँखों में प्रवेश किया तो उन्होंने निद्रा को अपने बाणों से बींध दिया, जब निद्रा देवी ने कहा कि उन्हें अपने हिस्से की निद्रा किसी और को देनी होगी तब लक्ष्मण ने अपनी निद्रा उर्मिला को दे दी। इसीलिए कहते हैं कि लक्ष्मण वन में 14 वर्षों तक जागते रहे और उर्मिला अयोध्या में 14 वर्षों तक सोती रही। भारत में आज भी कुम्भकर्ण निद्रा के साथ-साथ उर्मिला निद्रा का भी जिक्र उन लोगों के लिए किया जाता है जिसे आसानी से जगाया ना सके। ये इसलिए भी जरुरी था कि रावण के पुत्र मेघनाद को ये वरदान प्राप्त था कि उसे केवल वही मार सकता है जो 14 वर्षों तक सोया ना हो! यही कारण था जब श्रीराम का राज्याभिषेक हो रहा था तो अपने वचन के अनुसार निद्रा देवी ने लक्ष्मण को घेरा और उनके हाथ से छत्र छूट गया, इसी कारण वे सो गए और राम का राज्याभिषेक नहीं देख पाए, उनके स्थान पर उर्मिला ने राज्याभिषेक देखा। एक तरह से कहा जाये तो मेघनाद के वध में उर्मिला का भी उतना ही योगदान है जितना कि लक्ष्मण का, जब लक्ष्मण के हाँथों मेघनाद की मृत्यु हो गयी तो उसकी पत्नी सुलोचना वहाँ आती है और क्रोध पूर्वक लक्ष्मण से कहती है "हे महारथी! तुम इस भुलावे में मत रहना कि मेरे पति का वध तुमने किया है, ये तो दो सतियों के अपने भाग्य का परिणाम है, यहाँ पर सुलोचना ने दूसरे सती के रूप में उर्मिला का ही सन्दर्भ दिया है। यहाँ एक प्रश्न और आता है कि अगर उर्मिला 14 वर्षों तक सोती रही तो उसने अपने पति के आदेशानुसार अपने कटुम्ब का ध्यान कब रखा, इसका जवाब हमें रामायण में ही मिलता है कि उर्मिला को ये वरदान था कि वो एक साथ तीन-तीन जगह उपस्थित हो सकती थी और तीन अलग-अलग कार्य कर सकती थी और उनका ही एक रूप 14 वर्षों तक सोता रहा। वाकई उर्मिला के विरह और त्याग को जितना समझा जाये उतना कम है, शायद इसीलिये सीता ने एक बार कहा था, "हजार सीता मिलकर भी उर्मिला के त्याग की बराबरी नहीं कर सकती"।

कर्मक्षेत्रे-रणक्षेत्रे -

क्षत्रिय के लिए है धर्मयुद्ध : अपने आप आ प्राप्त हुआ यह युद्ध मानो स्वर्ग का ही द्वार है आ खुला । इस प्रकार का यह युद्ध अवसर पार्थ ! भाग्यशाली क्षत्रिय लोग ही पाते कभी ॥३२/अध्याय २ ॥ श्लोक में आये कुछ शब्दों का विचार : यदृच्छया उपपन्नम् : अर्थात अपने आप आ उपस्थित हुए । पांडवों ने युद्ध नहीं चाहा था लेकिन दुर्योधन के उनके नीतियुक्त अधिकार- उनके राज्य को न लौटाने के कारण ,युद्ध की नौबत आई । युद्ध में परिवार के लोगों की हत्या का कारण काल की गति है, इसलिए वह शोक करने के योग्य नहीं है । सुखिन : - भाग्यवान अपने कर्तव्य का पालन करने में जो सुख है वह सांसारिक भोगों को भोगने में नहीं है । जिनको कर्तव्य-पालन का अवसर प्राप्त हुआ है ,उनको बड़ा भाग्यशाली समझना चाहिए । कर्मक्षेत्रे-रणक्षेत्रे

अष्टावक्र संहिता ; अध्याय XVIII : शान्ति

अष्टावक्र संहिता ; अध्याय XVIII : शान्ति अष्टावक्र उवाच : यस्य बोधोदये तावत् स्वप्नवत् भवति भ्रम : तस्मै सुखैकरूपाय नम : शान्ताय तेजसे ॥१॥ अष्टावक्र ने कहा : जिसके बोध होने पर भ्रम मिंट जाता स्वप्न की भाँति । उस सुख-स्वरूप शान्त तेजपुँज को मेरा नमन अनेक बार ॥१॥ अर्जयित्वा अखिलान् अर्थान् भोगान् आप्नोति पुष्कलान् । न हि सर्व परित्यागमन्तरेण सुखी भवेत ॥२॥ अर्जित कर भरपूर संपति सुख के अनेकों भोग भोग परन्तु सुख पाता है नर तभी जब अन्तर्मन से त्यागता सभी ॥२॥ कर्तव्यदु:खमार्तन्ड : ज्वालादग्धान् अन्तरात्मन : । कुत : प्रशमपीयूष- धारासारमृते सुखम् ॥३॥ कर्तव्य-दु:खों के प्रखर ताप की ज्वाला से दग्ध अन्तर्मन । तब तक शान्ति पाता नहीं जब तक पीयूष अमृत की धार से नहाता नहीं ॥३॥

AURAT KA AASHKAAR

महिलाओं से ही घर है समाज है। मगर ताना एक ही है यह कि पुरूष प्रधान समाज है। परिवार के सभी कार्य स्त्री की सहमति से मगर आरोप "करेंगे तो अपने मन की"। पुरूष भी दिन रात मेहनत करें तो यह उसकी जिम्मेदारी और औरत काम करेगी तो कहेगी "नौकरानी बना दिया"। स्त्री के पास अपने पैसे होते हैं और होता है स्त्री धन और पुरुष सब कमाकर भी उसका अपना कुछ नहीं। क्योंकि वह समझता है पैसे पर पहला हक परिवार का है। विडम्बना यह कि पुरुष अत्याचारी होता है, भले ही वह भूखा रहकर रात दिन मेहनत करें, धूप में बोझा उठाये या रात दिन व्यापार में व्यस्त रहे। बात महिला समानता की जो अग्रणीय है उसको किससे समानता चाहिए? पूजा पाठ शादी विवाह बिना पत्नी की इच्छा और सहयोग कभी नहीं सम्भव घर पर अधिकार माँ का,पत्नी का और बेटी का। विचार संघर्ष माँ पत्नी बहु बेटी का आखिर पुरुष कहाँ है इस सबमें? कालांतर से वर्तमान तक महिलायें आगे बढ़ी नये कीर्तिमान गढ़ी परन्तु कितनी महिलाओं ने श्रेय दिया पिता पति भाई या पुरुष मित्र को मगर कहा जाता है सफल व्यक्ति के पीछे महिला का योगदान। अगर महिला बात करती है समानता की शायद छोड़ना पड़ जाए वह बहुत कुछ जो उसे मिलता है समानता के अधिकारों से अधिक महिला होने के कारण और शायद तब यही कहा जायेगा पुरूष अत्याचारी अहंकारी हैं।

Transfer RNA (tRNA)

Transfer RNA (tRNA) is a crucial molecule in protein synthesis, characterized by its cloverleaf structure and function as an adapter that translates mRNA codons into amino acids. Structure of tRNA Primary Structure: tRNA is a single strand of ribonucleotides, typically consisting of 70-90 nucleotides. It contains modified bases that contribute to its stability and function. The primary structure includes several key regions: Acceptor Arm: This end of the tRNA molecule has a CCA sequence at the 3' end, where the corresponding amino acid attaches. Anticodon Arm: Contains the anticodon, a sequence of three nucleotides that pairs with the complementary codon on mRNA during translation. D Arm and TΨC Arm: These regions contain specific modified bases that help in the recognition and binding of tRNA to the ribosome and mRNA. Secondary Structure: The tRNA molecule folds into a cloverleaf shape due to intramolecular base pairing. This structure includes four arms: the acceptor arm, D arm, TΨC arm, and anticodon arm, which are stabilized by hydrogen bonds between complementary bases. Tertiary Structure: The cloverleaf structure further folds into a compact "L" shape, which is essential for its function in the ribosome during protein synthesis. Function of tRNA Amino Acid Transport: tRNA serves as a carrier for specific amino acids, bringing them to the ribosome based on the sequence of codons in the mRNA. Each tRNA molecule is specific to one amino acid, ensuring that proteins are synthesized accurately. Codon-Anticodon Pairing: The anticodon on tRNA pairs with the corresponding codon on mRNA in an antiparallel manner, which is crucial for the correct translation of the genetic code into a polypeptide chain. Peptide Bond Formation: During translation, the ribosome facilitates the formation of peptide bonds between the amino acids brought by tRNA, linking them together to form a growing protein chain. Role in Translation: tRNA moves through the ribosome's A (aminoacyl), P (peptidyl), and E (exit) sites, playing a vital role in the elongation of the polypeptide chain until the entire protein is synthesized. In summary, tRNA is an essential component of the protein synthesis machinery, with a unique structure that allows it to function effectively in translating the genetic code into functional proteins. Its ability to carry amino acids and pair with mRNA codons ensures the accuracy and efficiency of protein synthesis.

AURAT KA AASHKAR

स्त्री कभी संतुष्ट नहीं होती! स्त्री से प्रेम में अगर आप ये उम्मीद करते हैं कि वो आपसे पूरी तरह खुश है तो आप नादानी में हैं! ये स्त्री के मूल में ही नहीं है! अगर आप बहुत ज्यादा केयर करते है तो उससे भी ऊब जाएगी, अगर आप बहुत उग्र हैं तो वो उससे भी बिदक जाएगी, अगर आप बहुत ज्यादा विनम्र हैं तो वो उससे भी चिढ जाएगी, अगर आप उससे बहुत ज्यादा बात करते हैं तो वो आपको टेक इट फौर ग्रांटड लेने लगेगी, अगर आप उससे बहुत कम बात करते हैं तो वो मान लेगी कि आपका चक्कर कहीं और चल रहा है! यानी आप कुछ भी कर लीजिए वो संतुष्ट नहीं हो सकती, ये उसका स्वभाव है वो एक ऐसा डेडली काॅम्बीनेशन खोजती है जो बना ही न हो बन ही न सकता हो! ठीक वैसे ही जैसे कपड़ा खरीदने जाती है तो कहती कि इसी कलर में कोई दूसरा डिजाइन दिखाओ,इसी डिजाइन में कोई दूसरा कलर दिखाओ कपड़े का गट्ठर लगा देती है! बहुत परिश्रम के बाद एक पसंद आ भी गया, तो भी संतुष्ट नहीं हो सकती! आखिरी तक सोचती है कि इसमे ये डिजाइन ऐसे होता तो परफैक्ट होता! इन सबके बावजूद एक बहुत बड़ी खूबी भी है स्त्री के अंदर, एक बार उसे कुछ पसंद आ गया तो उसे आखिरी दम तक सजो के रखती है वो चाहे रिश्ते हो या चूड़ी! रंग उतर जाएगा चमक खत्म हो जाएगी पर खुद से जुदा नहीं करेगी, बस यही खूबी स्त्री को विशिष्ट बनाती है! स्त्री से प्रेम में अगर आप ये उम्मीद करते हैं कि वो आपसे पूरी तरह खुश है तो आप नादानी में हैं, ये स्त्री के मूल में ही नहीं है!

वीर तुम अड़े रहो,रजाई में पड़े रहो!

रजाईधारी सिंह'दिनभर'की अमिट छाप! वीर तुम अड़े रहो,रजाई में पड़े रहो! ठंड है भाई ठंड है,यह बड़ी प्रचंड है, कक्ष शीत से भरा,है बर्फ से ढकी धरा, यत्न कर संभाल लो,ये समय निकाल लो, वीर तुम अड़े रहो,रजाई में पड़े रहो। चाय का मजा रहे,पकोड़ा दल सजा रहे, मुंह कभी थके नहीं,रजाई भी हटे नहीं, लाख मिन्नतें करे,स्नान से बचे रहो, वीर तुम अड़े रहो,रजाई में पड़े रहो! एक प्रण किए हुए,है कंबलों को लिए, तुम निडर डटो वहीं,पलंग से हटो नहीं, मम्मी की लताड़ हो,या डैडी की दहाड़ हो, वीर तुम अड़े रहो,रजाई में पड़े रहो! शब्दों के बाण से,या बेलनों की मार से, पत्नी जी भड़क उठे,या चप्पलें खड़क उठे, लानतें हज़ार हों,धमकियां या प्यार हो, वीर तुम अड़े रहो,रजाई में पड़े रहो! बधिर बन सुनो नहीं,कर्म से डिगो नहीं, प्रातः हो कि रात हो,संग हो न साथ हो, पलंग पर पड़े रहो,तुम वहीं डटे रहो, वीर तुम अड़े रहो,रजाई में पड़े रहो! रजाईधारी सिंह 'दिनभर'

6 दिसम्बर/इतिहास-स्मृति श्रीराम जन्मभूमि मन्दिर

6 दिसम्बर/इतिहास-स्मृति राष्ट्रीय कलंक का परिमार्जन! भारत में विधर्मी आक्रमणकारियों ने बड़ी संख्या में हिन्दू मन्दिरों का विध्वंस किया। स्वतन्त्रता के बाद सरकार ने मुस्लिम वोटों के लालच में ऐसी मस्जिदों, मजारों आदि को बना रहने दिया। इनमें से श्रीराम जन्मभूमि मन्दिर (अयोध्या), श्रीकृष्ण जन्मभूमि (मथुरा) और काशी विश्वनाथ मन्दिर के सीने पर बनी मस्जिदें सदा से हिन्दुओं को उद्वेलित करती रही हैं। इनमें से श्रीराम मन्दिर के लिए विश्व हिन्दू परिषद् ने देशव्यापी आन्दोलन किया, जिससे 6 दिसम्बर, 1992 को वह बाबरी ढाँचा धराशायी हो गया। श्रीराम मन्दिर को बाबर के आदेश से उसके सेनापति मीर बाकी ने 1528 ई. में गिराकर वहाँ एक मस्जिद बना दी। इसके बाद से हिन्दू समाज एक दिन भी चुप नहीं बैठा। वह लगातार इस स्थान को पाने के लिए संघर्ष करता रहा। 23 दिसम्बर, 1949 को हिन्दुओं ने वहाँ रामलला की मूर्ति स्थापित कर पूजन एवं अखण्ड कीर्तन शुरू कर दिया। 'विश्व हिन्दू परिषद्' द्वारा इस विषय को अपने हाथ में लेने से पूर्व तक 76 हमले हिन्दुओं ने किये; जिसमें देश के हर भाग से तीन लाख से अधिक नर नारियों का बलिदान हुआ; पर पूर्ण सफलता उन्हें कभी नहीं मिल पायी। विश्व हिन्दू परिषद ने लोकतान्त्रिक रीति से जनजागृति के लिए श्रीराम जन्मभूमि मुक्ति यज्ञ समिति का गठन कर 1984 में श्री रामजानकी रथयात्रा निकाली! जो सीतामढ़ी से प्रारम्भ होकर अयोध्या पहुँची। इसके बाद हिन्दू नेताओं ने शासन से कहा कि श्री रामजन्मभूमि मन्दिर पर लगे अवैध ताले को खोला जाए। न्यायालय के आदेश से 1 फरवरी, 1986 को ताला खुल गया। इसके बाद वहाँ भव्य मन्दिर बनाने के लिए 1989 में देश भर से श्रीराम शिलाओं को पूजित कर अयोध्या लाया गया और बड़ी धूमधाम से 9 नवम्बर, 1989 को श्रीराम मन्दिर का शिलान्यास कर दिया गया। जनता के दबाव के आगे प्रदेश और केन्द्र शासन को झुकना पड़ा। पर मन्दिर निर्माण तब तक सम्भव नहीं था, जब तक वहाँ खड़ा ढांँचा न हटे। हिन्दू नेताओं ने कहा कि यदि मुसलमानों को इस ढाँचे से मोह है, तो वैज्ञानिक विधि से इसे स्थानान्तरित कर दिया जाए; पर शासन मुस्लिम वोटों के लालच से बँधा था। वह हर बार न्यायालय की दुहाई देता रहा। विहिप का तर्क था कि आस्था के विषय का निर्णय न्यायालय नहीं कर सकता। शासन की हठधर्मी देखकर हिन्दू समाज ने आन्दोलन और तीव्र कर दिया। इसके अन्तर्गत 1990 में वहाँ कारसेवा का निर्णय किया गया,तब उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह की सरकार थी। उन्होेंने घोषणा कर दी कि बाबरी परिसर में एक परिन्दा तक पर नहीं मार सकता; पर हिन्दू युवकों ने शौर्य दिखाते हुए 29 अक्तूबर को गुम्बदों पर भगवा फहरा दिया। बौखला कर दो नवम्बर को मुलायम सिंह ने गोली चलवा दी, जिसमें कोलकाता के दो सगे भाई राम और शरद कोठारी सहित सैकड़ों कारसेवकों का बलिदान हुआ। इसके बाद प्रदेश में भाजपा की सरकार बनी। एक बार फिर 6 दिसम्बर, 1992 को कारसेवा की तिथि निश्चित की गयी। हिप की योजना तो केन्द्र शासन पर दबाव बनाने की ही थी; पर युवक आक्रोशित हो उठे। उन्होंने वहाँ लगी तार बाड़ के खम्भों से प्रहार कर बाबरी ढाँचे के तीनों गुम्बद गिरा दिये। सके बाद विधिवत वहाँ श्री रामलला को भी विराजित कर दिया गया। इस प्रकार वह बाबरी कलंक नष्ट हुआ और तुलसी बाबा की यह उक्ति भी प्रमाणित हुई-होई है सोई, जो राम रचि राखा।

"बा-अदब ! बा-मुलाहिज़ा ! होशियार !

नाम में क्या रखा है? दिल में रखो तो बात बने! 'इज़्ज़त शब्दों की पोशाक में नहीं,नीयत की धड़कनों में रहती है'। कभी-कभी लोग नामों की इबारत में ऐसी गंभीरता ढूंढ लेते हैं,जैसे दिल का GPS वहीं अटका हुआ हो,या जैसे जीवन की पूरी श्रद्धा वहीं टंगी हो। आज एक भाई ने शिकायत दर्ज कराई कि- आप“हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम” या “हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा को" सिर्फ़ मुहम्मद कह देते हैं,इससे दुख होता है।" मैंने विनम्रता की चाय घोलते हुए कहा,कि भैया- हमारे यहां तो श्रीकृष्ण कभी कृष्ण,श्रीराम कभी राम,और हनुमानजी कभी हनुमान ही कह दिए जाते हैं! किसी की श्रद्धा को इससे चोट नहीं लगती,क्योंकि प्यार शब्दों की लंबाई से नहीं,दिल की चौड़ाई से चलता है। मैंने हल्की-सी शरारत के साथ पूछा कि अगर नामों को लेकर इतनी ही शाही गैरत है,और बात नामों की गरिमा तक जा ही पहुंची! तो क्या फिर अकबर बादशाह के आगमन के उद्घोष की तरह यूँ सम्बोधित किया जाए,अर्थात “आपका मतलब ये वाला अंदाज़ तो नहीं?” "शाहे-ंशाह,बादशाह अकबर आलमपनाह तशरीफ़ ला रहे हैं!" या अधिक फ़ारसी-राजसी रूप में: "हज़रत-ए-बादशाह अकबर,जलालुद्दीन मुहम्मद,आलमपनाह! बारगाह में तशरीफ़ ला रहे हैं!" या फिर, "बा-अदब! बा-मुलाहिज़ा! होशियार! हुज़ूर-ए-आलिया, बादशाह-ए-हिंद तशरीफ़ ला रहे हैं!" और साथ में एक दरबारी मुनादी ची (उद्घोषक) भी नियुक्त कर लिया जाए?

न्यूरोलिंग्विस्टिक्स,और भाषा

न्यूरोलिंग्विस्टिक्स,और भाषा यह उस पर कंप्यूटर घटकों के साथ एक मस्तिष्क दिखाता है यह इस विचार को मजबूत करता है कि मस्तिष्क पहले से अधिक तरल और संदर्भ-संचालित तरीके से अर्थ को एकीकृत करता है । मस्तिष्क भाषा के लिए एआई जैसी संगणना का उपयोग करता है। सारांश: मानव मस्तिष्क एक चरण-दर-चरण अनुक्रम में बोली जाने वाली भाषा को संसाधित करता है जो बारीकी से मेल खाता है कि बड़े भाषा मॉडल पाठ को कैसे बदलते हैं । पॉडकास्ट सुनने वाले लोगों से इलेक्ट्रोकार्टिकोग्राफी रिकॉर्डिंग का उपयोग करते हुए, शोधकर्ताओं ने पाया कि शुरुआती मस्तिष्क प्रतिक्रियाएं शुरुआती एआई परतों के साथ संरेखित होती हैं, जबकि गहरी परतें ब्रोका के क्षेत्र जैसे क्षेत्रों में बाद में तंत्रिका गतिविधि के अनुरूप होती हैं । निष्कर्ष भाषा के पारंपरिक सिद्धांतों को चुनौती देते हैं जो गतिशील, संदर्भ-संचालित गणना को उजागर करने के बजाय निश्चित नियमों पर भरोसा करते हैं । टीम ने भाषाई विशेषताओं के साथ तंत्रिका संकेतों को जोड़ने वाला एक समृद्ध डेटासेट भी जारी किया, जो भविष्य के तंत्रिका विज्ञान अनुसंधान के लिए एक शक्तिशाली संसाधन प्रदान करता है । मुख्य तथ्य स्तरित संरेखण: प्रारंभिक मस्तिष्क प्रतिक्रियाओं ने शुरुआती एआई मॉडल परतों को ट्रैक किया, जबकि गहरी परतें बाद में तंत्रिका गतिविधि के साथ संरेखित हुईं । नियमों पर संदर्भ: एआई-व्युत्पन्न प्रासंगिक एम्बेडिंग ने शास्त्रीय भाषाई इकाइयों की तुलना में मस्तिष्क गतिविधि की बेहतर भविष्यवाणी की । नया संसाधन: शोधकर्ताओं ने भाषा तंत्रिका विज्ञान में तेजी लाने के लिए एक बड़ा तंत्रिका–भाषाई डेटासेट जारी किया । नेचर कम्युनिकेशंस में प्रकाशित एक अध्ययन में, हिब्रू विश्वविद्यालय के डॉ एरियल गोल्डस्टीन के नेतृत्व में शोधकर्ताओं ने प्रिंसटन विश्वविद्यालय के प्रोफेसर उरी हसन और एरिक हैम के साथ गूगल रिसर्च के डॉ मारियानो स्कैन के सहयोग से, हमारे दिमाग के बीच एक आश्चर्यजनक संबंध का खुलासा किया । तीस मिनट के पॉडकास्ट को सुनने वाले प्रतिभागियों से इलेक्ट्रोकार्टिकोग्राफी रिकॉर्डिंग का उपयोग करते हुए, टीम ने दिखाया कि मस्तिष्क एक संरचित अनुक्रम में भाषा को संसाधित करता है जो जीपीटी -2 और लामा 2 जैसे बड़े भाषा मॉडल के स्तरित वास्तुकला को प्रतिबिंबित करता है । अध्ययन में क्या पाया गया जब हम किसी को बोलते हुए सुनते हैं, तो हमारा मस्तिष्क प्रत्येक आने वाले शब्द को तंत्रिका गणनाओं के कैस्केड के माध्यम से बदल देता है । गोल्डस्टीन की टीम ने पाया कि ये परिवर्तन समय के साथ एक पैटर्न में सामने आते हैं जो एआई भाषा मॉडल की स्तरीय परतों को समानता देता है । प्रारंभिक एआई परतें शब्दों की सरल विशेषताओं को ट्रैक करती हैं, जबकि गहरी परतें संदर्भ, स्वर और अर्थ को एकीकृत करती हैं । अध्ययन में पाया गया कि मानव मस्तिष्क गतिविधि एक समान प्रगति का अनुसरण करती है: प्रारंभिक तंत्रिका प्रतिक्रियाएं प्रारंभिक मॉडल परतों के साथ संरेखित होती हैं, और बाद में तंत्रिका प्रतिक्रियाएं गहरी परतों के साथ संरेखित होती हैं । यह संरेखण ब्रोका के क्षेत्र जैसे उच्च-स्तरीय भाषा क्षेत्रों में विशेष रूप से स्पष्ट था, जहां शिखर मस्तिष्क की प्रतिक्रिया बाद में गहरी एआई परतों के लिए हुई थी । गोल्डस्टीन के अनुसार, " हमें सबसे ज्यादा आश्चर्य हुआ कि मस्तिष्क के लौकिक अर्थ का खुलासा बड़े भाषा मॉडल के अंदर परिवर्तनों के अनुक्रम से कितना मेल खाता है । भले ही इन प्रणालियों को बहुत अलग तरीके से बनाया गया हो, दोनों को समझने की दिशा में एक समान चरण-दर-चरण बिल्डअप पर अभिसरण लगता है" यह क्यों मायने रखता है निष्कर्ष बताते हैं कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता केवल पाठ उत्पन्न करने का एक उपकरण नहीं है । यह यह समझने में एक नई विंडो भी पेश कर सकता है कि मानव मस्तिष्क कैसे अर्थ को संसाधित करता है । दशकों तक, वैज्ञानिकों का मानना था कि भाषा की समझ प्रतीकात्मक नियमों और कठोर भाषाई पदानुक्रमों पर निर्भर करती है । यह अध्ययन उस दृष्टिकोण को चुनौती देता है । इसके बजाय, यह भाषा के लिए एक अधिक गतिशील और सांख्यिकीय दृष्टिकोण का समर्थन करता है, जिसमें अर्थ प्रासंगिक प्रसंस्करण की परतों के माध्यम से धीरे-धीरे उभरता है । शोधकर्ताओं ने यह भी पाया कि शास्त्रीय भाषाई विशेषताएं जैसे कि फोनेम और मॉर्फेम ने मस्तिष्क की वास्तविक समय की गतिविधि के साथ-साथ एआई-व्युत्पन्न प्रासंगिक एम्बेडिंग की भविष्यवाणी नहीं की थी । यह इस विचार को मजबूत करता है कि मस्तिष्क पहले से अधिक तरल और संदर्भ-संचालित तरीके से अर्थ को एकीकृत करता है । तंत्रिका विज्ञान के लिए एक नया बेंचमार्क क्षेत्र को आगे बढ़ाने के लिए, टीम ने सार्वजनिक रूप से भाषाई विशेषताओं के साथ जोड़े गए तंत्रिका रिकॉर्डिंग का पूरा डेटासेट जारी किया । यह नया संसाधन दुनिया भर के वैज्ञानिकों को प्रतिस्पर्धी सिद्धांतों का परीक्षण करने में सक्षम बनाता है कि मस्तिष्क प्राकृतिक भाषा को कैसे समझता है, कम्प्यूटेशनल मॉडल के लिए मार्ग प्रशस्त करता है जो मानव अनुभूति से अधिक निकटता से मिलते जुलते हैं । प्रमुख सवालों के जवाब दिए: प्रश्न: मस्तिष्क की भाषा प्रसंस्करण एआई मॉडल से कैसे मिलती है? ए: मस्तिष्क बोली जाने वाली भाषा को संगणना के अनुक्रम के माध्यम से बदल देता है जो बड़े भाषा मॉडल की उत्तरोत्तर गहरी परतों के साथ संरेखित होता है । प्रश्न: अर्थ समझने के लिए यह अध्ययन क्यों महत्वपूर्ण है? ए: यह भाषा के नियम-आधारित सिद्धांतों को चुनौती देता है, इसके बजाय यह सुझाव देता है कि अर्थ आधुनिक एआई सिस्टम के समान गतिशील, संदर्भ-संचालित प्रसंस्करण के माध्यम से उभरता है । प्रश्न: शोधकर्ताओं ने क्या संसाधन जारी किया? ए: भाषाई सुविधाओं के साथ इलेक्ट्रोकार्टिकोग्राफी रिकॉर्डिंग को सार्वजनिक रूप से उपलब्ध डेटासेट, प्रतिस्पर्धी भाषा सिद्धांतों के नए परीक्षणों को सक्षम करता है । नोट्:- यह लेख एक तंत्रिका विज्ञान समाचार संपादक द्वारा संपादित किया गया था । सार अस्थायी संरचना की प्राकृतिक भाषा प्रसंस्करण में मानव मस्तिष्क से मेल खाती स्तरित पदानुक्रम की बड़ी भाषा मॉडल बड़े भाषा मॉडल (एलएलएम) मानव मस्तिष्क में भाषा प्रसंस्करण को समझने के लिए एक रूपरेखा प्रदान करते हैं । पारंपरिक मॉडल के विपरीत, एलएलएम स्तरित संख्यात्मक एम्बेडिंग के माध्यम से शब्दों और संदर्भ का प्रतिनिधित्व करते हैं । यहां, हम प्रदर्शित करते हैं कि एलएलएमएस की परत पदानुक्रम मस्तिष्क में भाषा की समझ की अस्थायी गतिशीलता के साथ संरेखित होती है । 30 मिनट की कथा सुनने वाले प्रतिभागियों से इलेक्ट्रोकार्टिकोग्राफी (ईसीओजी) डेटा का उपयोग करते हुए, हम दिखाते हैं कि गहरी एलएलएम परतें बाद की मस्तिष्क गतिविधि से मेल खाती हैं, खासकर ब्रोका के क्षेत्र और अन्य भाषा से संबंधित क्षेत्रों में । हम जीपीटी -2 एक्सएल और लामा -2 से प्रासंगिक एम्बेडिंग निकालते हैं और समय के साथ तंत्रिका प्रतिक्रियाओं की भविष्यवाणी करने के लिए रैखिक मॉडल का उपयोग करते हैं । हमारे परिणाम समझ के दौरान मॉडल की गहराई और मस्तिष्क की अस्थायी ग्रहणशील खिड़की के बीच एक मजबूत संबंध प्रकट करते हैं । हम प्रतीकात्मक दृष्टिकोणों के साथ एलएलएम-आधारित भविष्यवाणियों की तुलना भी करते हैं, मस्तिष्क की गतिशीलता को पकड़ने में गहन शिक्षण मॉडल के लाभों पर प्रकाश डालते हैं । हम भाषा प्रसंस्करण के प्रतिस्पर्धी सिद्धांतों का परीक्षण करने के लिए अपने संरेखित तंत्रिका और भाषाई डेटासेट को एक सार्वजनिक बेंचमार्क के रूप में जारी करते हैं । एआईकृत्रिम बुद्धि मस्तिष्क अनुसंधान ब्रोका का क्षेत्र ज्ञान गहरी सीखना जेरूसलेम लंगागेल मशीन सीख

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