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जलेबी तेरे कितने नाम..

जलेबी जलेबी यह शब्द वैदिक साइंस पेज पर सुनकर थोड़ा सा अचंभित होना स्वभाविक है किन्तु वास्तविकता यह है कि जलेबी हमारी संस्कृति का हिस्सा है जो की औषधि के साथ साथ बहुत ही स्वादिष्ट मिष्ठान भी है जो काफी गुणकारी भी है तो चलिए आज आपको जलेबी के विषय में कुछ रोचक और दुर्लभ जानकारी देते हैं दुनिया के 90 फीसदी लोग जलेबी का संस्कृत और अंग्रेजी नाम नहीं जानते? सुबह जलेबी के नाश्ते में है बहुत गुणकारी, साथ ही जाने…. जलेबी से जुड़े दिलचस्प किस्से….. क्या है जलेबी? – जाने उलझनें भी मीठी हो सकती हैं, जलेब,इस बात की मिसाल है। जलेबी का जलजला जलेबी में जल तत्व की अधिकता होने से इसे जलेबी कहा जाता है। मानव शरीर में 70 फीसदी पानी होता है, इसलिए इसे खाने से जलतत्व की पूर्ति होती है। जलेबी को रोगनाशक ओषधि भी बताया है। गर्म जलेबी चर्म रोग की बेहतरीन चिकित्सा है। जलेबी तेरे कितने नाम.. संस्कृत में कुण्डलिनी, महाराष्ट्र में जिलबी तथा बंगाल में जिलपी कहते है । जलेबी का भारतीय नाम जलवल्लिका है। अंग्रेजी में जलेबी को स्वीट्मीट (Sweetmeet) और सिरप फील्ड रिंग कहते हैं। जलेबी के भेद वेद में भी लिखे है। महिलाएं अपने केशों से “जलेबी जूड़ा” भी बनाती हैं। जलेबी का जलवा… बंगाल में पनीर की, बिहार में आलू की, उत्तरप्रदेश में आम की, म.प्र. के बघेलखण्ड-रीवा, सतना में मावा की जलेबी खाने का भारी प्रचलन है। कहीं-कहीं चावल के आटे की और उड़द की दाल की जलेबी का भी प्रचलन है। ग्रामीण क्षेत्रों में दूध-जलेबी का नाश्ता करते हैं। जलेबी तेरे रूप अने जलेबी डेढ अण्टे, ढाई अण्टे और साढे तीन अण्टे की होती है। अंगूर दाना जलेबी, कुल्हड़ जलेबी आदि की बनावट वाली गोल-गोल बनती है। जलेबी से तात्पर्य…. जलेबी दो शब्दों से मिलकर बनता है। जल +एबी अर्थात् यह शरीर में स्थित जल के ऐब (दोष) दूर करती है। शरीर में आध्यात्मिक शक्ति, सिद्धि एवं ऊर्जा में वृद्धि कर स्वाधिष्ठान चक्र जाग्रत करने में सहायक है। जलेबी के खाने से शरीर के सारे ऐब (रोग दोष )जल जाते हैं । जलेबी ओषधि भी है…. जलेबी अर्थात जल+एबी। यह शरीर में जल के ऐब, जलोदर की तकलीफ मिटाती है। जलेबी की बनावट शरीर में कुण्डलिनी चक्र की तरह होती है। अघोरी की तिजोरी….. अघोरी सन्त आध्यात्मिक सिद्धि तथा कुण्डलिनी जागरण के लिए सुबह नित्य जलेबी खाने की सलाह देते हैं । मैदा, जल, मीठा, तेल और अग्नि इन 5 चीजों से निर्मित जलेबी में पंचतत्व का वास होता है । जलेबी खाने से पंचमुखी महादेव, पंचमुखी हनुमान तथा पाॅंच फनवाले शेषनाग की कृपा प्राप्त होती है! अपने ऐब (दोष) जलाने, मिटाने हेतु नित्य जलेबी खाना चाहिये । वात-पित्त-कफ यानि त्रिदोष की शांति के लिए सुबह खाली पेट दही के साथ, वात विकार से बचने के लिए-दूध में मिलाकर और कफ से मुक्ति के लिए गर्म-गर्म चाशनी सहित जलेबी खावें । रोग निवारक जलेबी…. 【】जलेबी ओषधि भी है जो लोग सिरदर्द, माईग्रेन से पीड़ित हैं वे सूर्योदय से पूर्व प्रातः खाली पेट २से 3 जलेबी चाशनी में डुबोकर खाकर पानी नहीं पीएं सभी तरह मानसिक विकार जलेबी के सेवन सेे नष्ट हो जाते हैं। 【】जलेबी पीलिया से पीड़ित रोगियों के लिए यह चमत्कारी ओषधि है। सुबह खाने से पांडुरोग दूर हो जाता है। 【】जिन लोगों के पैर की बिम्बाई फटने या त्वचा निकलने की परेशानी रहती हो हो वे 21 दिन लगातार जलेबी का सेवन करें। जलेबी का जलवा…. जलवा दिखाने की इच्छा रखने वालों को हमेशा सुबह नाश्ते में जलेबी जरूर खाना चाहिये, जिन्हे ईश्वर से जुड़ने की कामना हो, तब जलेबी खायें। आयुर्वेदिक जड़ी बूटी जलेबी… जंगली जलेबी नामक फल उदर एवं मस्तिष्क रोगों का नाश करता है। भावप्रकाश निघण्टु में उल्लेख है – जो जंगल जलेबी खावै, दुःख संताप मिटावै। जलेबी खाये जगत गति पावै! जलेबी खाने वालों को ब्रह्मचर्य का विधिवत् पालन करना चाहिये । ‘‘टपकी जाये जलेबी रस की’’ अतः आयुर्वेद में विवाह होने तक स्वयं पर अंकुश रखने का निर्देश है। जलेबी केे फायदे… जलने, कुढन में उलझे लोग यदि जानवरों को जलेबी खिलाये तो मन शांत होता है। क्योंकि मन में अमन है, तो तन चमन बन जाता है और तन ही हमारा वतन है नहीं तो सबका पतन हो जाता है इसे जतन से संभालो। जलेबी की कहावतें….. खाये जलेबी बनो दयालु तहि चीन्हे नर कोई। तत्पर हाल-निहाल करत हैं रीझत है निज सोई। जलेबी खाने से दया, उदारता उत्पन्न होती है। पहचान बनती है। आत्मविश्वास आता है। टूटी की नही बनी है बूटी झूठी की नही बनी है खूॅंटी फूटी को नही बनी है सूठी रूठी तो बने काली कलूटी अर्थात- जिस व्यक्ति का आत्मविश्वास अंदर से टूट जाये उसको ठीक करने की कोई बूटी यानी ओषधि आज तक नहीं बनी है। जो आदमी बार -बार बदलता है इनकी एक खूटी यानि ठिकाना नही होता। जिसकी किस्मत फूटी हो, जो भाग्यहीन हो, उसका भला सूफी-संत भी नही कर सकते और स्त्री रूठ जाये तो काली का भयंकर रूप धारण कर लेती है। अतः इन सबका इलाज जलेबी है। रोज सुबह जलेबी खाओ। भव सागर से पार लगाओ । खाली पेट करे मुख मीठा विद्वान वाद-विवाद बसो दे झूठा ….. बाबा कीनाराम सिद्ध अवधूत लिखते हैं – बिनु देखे बिनु अर्स-पर्स बिनु, प्रातः जलेबी खाये जोई । तन-मन अन्तर्मन शुद्ध होवे वर्ष में निर्धन रहे न कोई एक संत ने जलेबी का नाता आदिकाल से वताया है- पार लगावे चैरासी से, मत ढूके इत और। जलेबी का नियम से प्रातःकाल सेवन करें, तो बार-बार क जन्म-मरण से मुक्ति मिलती है। जलेबी के अलावा अन्य मिठाई की कभी देखें भी नहीं। एक बहुत मशहूर कहावत है कि- तुम तो जलेबी की तरह सीधे हो एक लोक गीत है – ■ मन करे खाये के जिलेबी ■ जब मोसे बनिया पैसा माॅंगे, वाये दूध-जलेबी खिलादऊॅंगी जलेबी बनाने हेतु आवश्यक सामग्री:- मैदा 900 ग्राम, उड़द दाल 50 ग्राम पानी में गला कर पीस कर 500 ग्राम मैदा में 50 ग्राम दही मिलाकर दो दिन पूर्व खमीर हेतु घोल कर रखे शेष मैदा जलेबी बनाते समय खमीर में मिलाये शक्कर करीब 1 किलो 300-400 ML पानी में डालकर चाशनी बनाये। जलेेबी को बहुत स्वादिष्ट बनाने के लिए चाशनी में एक चम्मच नीबू का रस और केशर मिला सकते हैं। जलेबी के खाने से लाभ…. एषा कुण्डलिनी नाम्ना पुष्टिकान्तिबलप्रदा। धातुवृद्धिकरीवृष्या रुच्या चेन्द्रीयतर्पणी।। (आयुर्वेदिक ग्रन्थ भावप्रकाश पृष्ठ ७४०) अर्थात – जलेबी कुण्डलिनी जागरण करने वाली, पुष्टि, कान्ति तथा बल को देने वाली, धातुवर्धक, वीर्यवर्धक, रुचिकारक एवं इन्द्रिय सुख और रसेन्द्रीय को तृप्त करने वाली होती है। जलेबी का अविष्कार… दुनिया में सर्वप्रथम जलेबी का अविष्कार किसने किया यह तो ज्ञात नहीं हो सका। लेकिन उत्तरभारत का यह सबसे लोकप्रिय व्यंजन है। भारत की जलेबी अब अंतरराष्ट्रीय मिठाई है। प्राचीन समय के सुप्रसिद्ध हलवाई शिवदयाल विश्वनाथ हलवाई के अनुसार जलेेबी मुख्यतः अरबी शब्द है। तुर्की मोहम्मद बिन हसन “किताब-अल-तबिक़” एक अरबी किताब जलेबी का असली पुराना नाम जलाबिया लिखा है। 300 वर्ष पुरानी पुस्तकें “भोजनकटुहला” एवं संस्कृतमें लिखी “गुण्यगुणबोधिनी” में भी जलेबी बनाने की विधि का वर्णन है। घुमंतू लेखक श्री शरतचंद पेंढारकर ने जलेबी का आदिकालीन भारतीय नाम कुण्डलिका बताया है। वे बंजारे बहुरूपिये शब्द और रघुनाथकृत “भोज कौतूहल” नामक ग्रन्थ का भी हवाला देते हैं। इन ग्रंथों में जलेबी बनाने की विधि का भी उल्लेख है। मिष्ठान भारत की जान जैसी पुस्तकों में जलेबी रस से परिपूर्ण होने के कारण इसे जल-वल्लिका नाम मिला है। जैन धर्म का ग्रन्थ “कर्णपकथा” में भगवान महावीर को जलेबी नैवेद्य लगाने वाली मिठाई माना जाता है।

अनोखीबाई

अनोखीबाई अनोखीबाई की आदत थी बात से बात निकालना और फिर उसे फिरकी पर चढ़ाकर सूत की तरह कताई करना। जब तक वह हर किसी की जड़ें न खोद लेती उसे चैन न पड़ता। सुबह तक वह सबसे पहले अखबार उठा लेती और सोये हुए पति के मुंह से मक्खियां उड़ाते हुए बेपर की उड़ाने लगती। कोई बुरी खबर होती तो चिल्‍लाने लगती,देखो तो संसार में अनार्थ हो रहा है,एक तुम हो जो अब तक सो रहे हो। यह देखते हो कोई रोहिणी चक्‍कर काटने लगी है धरती के।यहां आवे तो नासपीटी की हड्डी-पसली एक कर दूं। अनोखीबाई के पति शामतलाल की शामत तो उसी शाम आ गयी थी जिस दिन उन्‍होंने शादी का फंदा गले में डाला!अनोखीबाई के माता-पिता परिचित थे। वे शामतलाल को समझाते हुए बोले थे,बेटा!अब तुम ही ध्‍यान रखना।‘ शामतलाल का तभी माथा ठनका और उसने घूंघट में से ताकती-झांकती आँखों में हाथ-पांव मारने शुरू कर दिये थे।अनोखी बाई के मधुर स्‍वभाव से आस पड़ोस को परिचित होने में शायद देर लगी हो, पर शामतलाल को कुछ घंटे में ही सब समझ आने लगा था। इसीलिए पहले दिन से ही वे अपनी प्रिय धर्म पत्‍नी के लिए चाय बनाने लगे।अनोखीबाई उन्‍हें बदले में ताजा समाचार सुनाती।समाचारों पर अपने कमेंट देती और शाम को जब शामतलाल लौटकर आते तो वह फिर उनका मगज चाटना शुरू कर देती।शाम की चोरी या डकैती की ताजा खबरें वह चाय के साथ ऐसे पेश करती जैसे पति को गरमागरम समोसे या कचौरी दे रही हो। एक दिन शामतलाल लौटे तो अनोखी बोली, ‘’सुनते हो जी वह अन्‍नपूर्ण के घर डाकू आए और पच्‍चीस हजार के जेवर ले गए।‘’ शामतलाल घबराए से बोले,‘’तब तो बहुत बुरा हुआ।‘’ ‘’बुरा?अरे इस अन्‍नपूर्ण के घर तो कभी फूटी कौड़ी नहीं होती।नकली गहने,नकली मोती और मिलावट उसका पहला धर्म है।पच्‍चीस हजार ताकती जेवर की तो बात ही छोड़ो,उसके घर एक सुच्‍चा छल्‍ला भी नहीं! मैं तो कहती हूं चोर डाकुओं को ये अखबारें पढ़कर अपना स्‍टेटमेंट देना चाहिए।बताना चाहिए कि खबर झूठ है।इसके घर तो कानी कौड़ी न पाकर चोरों ने सिर पीट लिया होगा।या फिर दया आई हो तो वे कुछ माल भी छोड़ गए हों।मैं अन्‍नापूर्णा को खूब जानती हूँ।'' शामतलाल ने अनोखीबाई की इस अनोखी बात पर एक ठण्‍डी सांस भरते हुए कहा, ’शुक्र है तुम किसी चोर या उठाईगीर की बीबी नही,वरना तुम तो सलाह देकर उसकी ऐसी मति फेर देती कि वह बेचार अपना भांडाफोड करके जेल की हवा खा रहा होता।‘’ हवा खाने की बात पर अनोखीबाई की नजर अखबार में पंखे से लटक-कर आत्‍महत्‍या करने वाले तीन व्‍यक्तियों पर पड़ गई।अब तो शमतलाल की शाम के चाय पानी का भी स्‍कोप खत्‍म हो गया।अनोखी वहीं धम्‍म से बैठ गई और बोली,’समझ नहीं आता कि इस उमस भरी गर्मी में,लोगों को हवा खाने का इना चाव चढ़ता है कि वे पंखे से ही लटक जाते हैं।यह देखो जी, अनोखी ने फिल्‍मी हीरोइनों की पंखों से लटकने वाली कतरनें सम्‍मुख रख दीं। फिर बोली,’अच्‍छा यह तो कहो जब मरने के लिए उमदा से उमदा तरीके मौजूद हैं, ऊंची से ऊंची हैं तो फिर यह पंखों से लिपट मरने का शोक क्‍यों सिर पर सवार होने लगा है।हर रोज कितने ही पंखे से लटके लोग मिलते हैं। गोया पंखे का काम हवा देना न होकर लोगों को लटक जाने की प्रेरणा देना हो गया। पंखें से साड़ी लटकाना,साड़ी का फंदा गले में डालना,क्‍या है यह सब?’’ शामतलाल बोले–‘’सारा धंधा साड़ी के फंदे से शुरू होता है। हर रोज नयी साड़ी की मांग,बढ़ती महंगाई,सबका गला घोंट रही है।‘’पर अनोखी ने शामतलाल की बात तेजी से काटते हुए कहा–’साड़ी का फंदा किसी को नहीं मारता।यह तो रेशमी जकड़ है।बात कुछ और ही लगती है।एक बात बताओ,ये सब लोग किसी कम्‍पनी के पंखे से लटके हैं।आज तक तो किसी कंपनी का यह विज्ञापन नहीं सुना,हमारी कंपनी के पंखे खरीदिए,लटक जाएं तो भी पंखे को आंच न आए,बढि़या मजबूत टिकाऊ पंखे!असल में लोडशैडिंग अगर इतनी ज्‍यादा रही तो पंखे हवा देने की बजाय सिर्फ इसी काम के लिए रह जाएंगे।‘’ फिर अनोखीबाई ने सिर उठाकर अपने छत के पंखे को गौर से देखा।जब से इस घर में यह पंखा आया था, भली प्रकार चल न पाया था।गर्मियों में प्रात: बत्‍ती बंद रहती और बंद न भी होती तो पूरा फ्यूज उड़ जाता। अनोखी को बार-बार लगता था कि न चलने की वजह से शायद यह पंखा भी बेकार हो चुका हो जैसे किसी के घुटने जुड़ गए हों। यही सोचकर वह फिर बोली, ‘’सुनते हो जी,मैं तो सोचती हूं कि यह तीन पंख वाला पंखा,एक जरा-सी हत्‍थी के सहारे तो खड़ा है,इससे कोई लटक ही कैसे सकता है।‘’ ‘’अनोखीबाई को एकटक पंखे को निहारते देख शामतलाल का माथा ठनका।वे बोले,‘’लटकने वाली तो लटक गई पर पीछे वालों को तो उमस भरी गर्मीं में तड़पने को छोड़ गई। पंखा तो फिर भी पंखे वाले से सुधर सकता है।‘’ शामतलाल ने अनोखीबाई की आंखों में बढ़ती हुई उत्‍सुकता देखी तो उन्‍हें खटका लगा। वे तुरंत बोल उठे,‘’दरअसल यह पंखे से लटकने का माजरा ही कुछ और है। तुम मत सोचो वरना मेरी मुसीबत हो जाएगी। तुम्‍हारी यह ढाई मन की देह पंखा बेचारा नहीं संभल पाएगा। और पंखे के साथ-साथ छत भी नीचे होगी। तुम एक हाथ में छत थामे दूसरे हाथ में उस गरीब पंखे के पंखों को,मुर्गे के पंखों की तरह तोड.,मरोडकर,मेरी राह में आंखें बिछाए खड़ी होगी और तुम तो जानती हो आजकल छतें बन पाना कितना महंगा पड़ता है।‘’ और उस दिन से शामतलाल हर रोज अपने कमरे में लगे इकलौते पंखे के लिए प्रार्थना करके जाते हैं। और दफतर से आते ही उसे सही सलामत पाकर खुदा से पंखे की लम्‍बी उमर के लिए खैर मनाते हैं!

वीर शम्भा जी

वीर शम्भा जी का जन्म 14 मई 1657 को हुआ था। आप वीर शिवाजी के साथ अल्पायु में औरंगजेब की कैद में आगरे के किले में बंद भी रहे थे। आपने 11 मार्च 1689 को वीरगति प्राप्त की थी। इस लेख के माध्यम से हम शम्भा जी के जीवन बलिदान की घटना से धर्म रक्षा की प्रेरणा ले सकते हैं. इतिहास में ऐसे उदाहरण विरले ही मिलते है। औरंगजेब के जासूसों ने सुचना दी की शम्भा जी इस समय आपने पाँच-दस सैनिकों के साथ वारद्वारी से रायगढ़ की ओर जा रहे है। बीजापुर और गोलकुंडा की विजय में औरंगजेब को शेख निजाम के नाम से एक सरदार भी मिला जिसे उसने मुकर्रब की उपाधि से नवाजा था। मुकर्रब अत्यंत क्रूर और मतान्ध था। शम्भा जी के विषय में सुचना मिलते ही उसकी बांछे खिल उठी। वह दौड़ पड़ा रायगढ़ की और. शम्भा जी आपने मित्र कवि कलश के साथ इस समय संगमेश्वर पहुँच चुके थे। वह एक बाड़ी में बैठे थे की उन्होंने देखा कवि कलश भागे चले आ रहे है और उनके हाथ से रक्त बह रहा है। कलश ने शम्भा जी से कुछ भी नहीं कहाँ बल्कि उनका हाथ पकड़कर उन्हें खींचते हुए बाड़ी के तलघर में ले गए परन्तु उन्हें तलघर में घुसते हुए मुकर्रब खान के पुत्र ने देख लिया था। शीघ्र ही मराठा रणबांकुरों को बंदी बना लिया गया। शम्भा जी व कवि कलश को लोहे की जंजीरों में जकड़ कर मुकर्रब खान के सामने लाया गया। वह उन्हें देखकर खुशी से नाच उठा। दोनों वीरों को बोरों के समान हाथी पर लादकर मुस्लिम सेना बादशाह औरंगजेब की छावनी की और चल पड़ी। औरंगजेब को जब यह समाचार मिला तो वह ख़ुशी से झूम उठा। उसने चार मील की दूरी पर उन शाही कैदियों को रुकवाया। वहां शम्भा जी और कवि कलश को रंग बिरंगे कपडे और विदूषकों जैसी घुंघरूदार लम्बी टोपी पहनाई गयी। फिर उन्हें ऊंट पर बैठा कर गाजे बाजे के साथ औरंगजेब की छावनी पर लाया गया। औरंगजेब ने बड़े ही अपशब्द शब्दों में उनका स्वागत किया। शम्भा जी के नेत्रों से अग्नि निकल रही थी परन्तु वह शांत रहे। उन्हें बंदी ग्रह भेज दिया गया। औरंगजेब ने शम्भा जी का वध करने से पहले उन्हें इस्लाम काबुल करने का न्योता देने के लिए रूह्ल्ला खान को भेजा। नर केसरी लोहे के सींखचों में बंद था। कल तक जो मराठों का सम्राट था। आज उसकी दशा देखकर करुणा को भी दया आ जाये। फटे हुए चिथड़ों में लिप्त हुआ उनका शरीर मिटटी में पड़े हुए स्वर्ण के समान हो गया था। उन्हें स्वर्ग में खड़े हुए छत्रपति शिवाजी टकटकी बंधे हुए देख रहे थे। पिता जी पिता जी वे चिल्ला उठे- मैं आपका पुत्र हूँ। निश्चित रहिये। मैं मर जाऊँगा लेकिन….. लेकिन क्या शम्भा जी …रूह्ल्ला खान ने एक और से प्रकट होते हुए कहां। तुम मरने से बच सकते हो शम्भा जी परन्तु एक शर्त पर। शम्भा जी ने उत्तर दिया में उन शर्तों को सुनना ही नहीं चाहता। शिवाजी का पुत्र मरने से कब डरता है। लेकिन जिस प्रकार तुम्हारी मौत यहाँ होगी उसे देखकर तो खुद मौत भी थर्रा उठेगी शम्भा जी- रुहल्ला खान ने कहा। कोई चिंता नहीं , उस जैसी मौत भी हम हिन्दुओं को नहीं डरा सकती। संभव है कि तुम जैसे कायर ही उससे डर जाते हो। शम्भा जी ने उत्तर दिया। लेकिन… रुहल्ला खान बोला वह शर्त है बड़ी मामूली। तुझे बस इस्लाम कबूल करना है। तेरी जान बख्श दी जाएगी। शम्भा जी बोले बस रुहल्ला खान आगे एक भी शब्द मत निकालना मलेच्छ। रुहल्ला खान अट्टहास लगाते हुए वहाँ से चला गया। उस रात लोहे की तपती हुई सलाखों से शम्भा जी की दोनों आँखें फोड़ दी गयी उन्हें खाना और पानी भी देना बंद कर दिया गया। आखिर 11 मार्च को वीर शम्भा जी के बलिदान का दिन आ गया। सबसे पहले शम्भा जी का एक हाथ काटा गया, फिर दूसरा, फिर एक पैर को काटा गया और फिर दूसरा पैर। शम्भा जी कर पाद विहीन धड़ दिन भर खून की तल्य्या में तैरता रहा। फिर सायंकाल में उनका सर काट दिया गया और उनका शरीर कुत्तों के आगे डाल दिया गया। फिर भाले पर उनके सर को टांगकर सेना के सामने उसे घुमाया गया और बाद में कूड़े में फेंक दिया गया। मरहठों ने अपनी छातियों पर पत्थर रखकर आपने सम्राट के सर का इंद्रायणी और भीमा के संगम पर तुलापुर में दांह संस्कार कर दिया गया। आज भी उस स्थान पर शम्भा जी की समाधी है जो पुकार पुकार कर वीर शम्भा जी की याद दिलाती है कि हम सर कटा सकते है पर अपना प्यारे वैदिक धर्म कभी नहीं छोड़ सकते। मित्रों शिवाजी के तेजस्वी पुत्र शंभाजी के अमर बलिदान यह गाथा हिन्दू माताएं अपनी लोरियों में बच्चों को सुनाये तो हर घर से महाराणा प्रताप और शिवाजी जैसे महान वीर जन्मेंगे। इतिहास के इन महान वीरों के बलिदान के कारण ही आज हम गर्व से अपने आपको श्री राम और श्री कृष्ण की संतान कहने का गर्व करते है। आइये आज हम प्रण ले हम उसी वीरों के पथ के अनुगामी बनेंगे।।।

आपका शरीर कैसे जानता है कि यह रात है?

निशा निमंत्रण लिखते बच्चन दिन जल्दी जल्दी ढलता है । ढ़ल रात में काहे बदलता है ? जैविक व्याख्या: आपका शरीर कैसे जानता है कि यह रात है? आपका शरीर जानता है कि यह रात है क्योंकि आपकी आंखें प्रकाश को मापती हैं, और आपका मस्तिष्क एक अंतर्निहित समय प्रणाली चलाता है जो नींद, हार्मोन, तापमान और ऊर्जा को नियंत्रित करता है । आपका शरीर अनुमान नहीं लगा रहा है-यह आपके मस्तिष्क में एक छोटे से क्षेत्र द्वारा नियंत्रित एक जैविक घड़ी का अनुसरण करता है जिसे एससीएन (सुप्राचियास्मैटिक न्यूक्लियस) कहा जाता है । यहाँ यह कैसे काम करता है: 🔹 1. आपकी आंखें प्रकाश का पता लगाती हैं आपकी आंखों के अंदर, प्रकाश के मंद होने पर प्रकाश संश्लेषक नाड़ीग्रन्थि कोशिकाओं नामक विशेष कोशिकाएं महसूस होती हैं । वे सीधे एससीएन को एक संदेश भेजते हैं जिसमें कहा गया है: "प्रकाश कम हो रहा है-रात आ रही है । ” 🔹 2. एससीएन आपके शरीर को "नाइट मोड"में बदल देता है एक बार जब एससीएन संकेत प्राप्त करता है, तो यह आपके पूरे शरीर को समायोजित करना शुरू कर देता है: शरीर का तापमान कम करना अपने चयापचय धीमा मांसपेशियों को आराम सतर्कता कम करना 🔹 3. मेलाटोनिन जारी किया गया है आपके मस्तिष्क की पीनियल ग्रंथि मेलाटोनिन को छोड़ना शुरू कर देती है, जिसके लिए जिम्मेदार हार्मोन है: तंद्रा शांति मस्तिष्क की गतिविधि में कमी आराम के लिए अपनी कोशिकाओं को तैयार करना मेलाटोनिन का स्तर स्वाभाविक रूप से रात में बढ़ता है और सुबह गिरता है । 🔹 4. सुबह की रोशनी सब कुछ बंद कर देती है एक बार दिन की रोशनी सुबह आपकी आँखों से टकराती है: मेलाटोनिन उत्पादन बंद हो जाता है कोर्टिसोल धीरे से आपको जगाने के लिए उठता है आपका मस्तिष्क "दिन मोड" पर स्विच करता है यह चक्र हर 24 घंटे में दोहराता है — यही आपकी सर्कैडियन लय है । विज्ञान तथ्यों का ही पालन करें । बच्चे प्रत्याशा में होंगे नीड़ों से झाँक रहे होंगे यह ध्यान पगों में चिड़िया के भरता कितनी चंचलता है। आदम भी कहाँ बदलता है।

धूजते हुए हाथ

चोरों के हाथ नहीं धूजते डकैतों के हाथ नहीं धूजते बलात्कारियों के हाथ नहीं धूजते धन पशुओं के हाथ नहीं धूजते मुझे अच्छे लगे मेरे प्रधानमंत्री के वे धूजते हुए हाथ जिन्होंने संभाल रखा है हमारी अपेक्षाओं का लौह-भार धूजने चाहिए थे पहले के प्रधानमंत्रियों के हाथ लेकिन वे बहुत कम धूजे क्योंकि धूजने वाले हाथों के लिए चाहिए बहुत संवेदनशील हृदय! जब भी धूजे हैं हाथ मेरे देश के प्रधानमंत्रियों के शुभ ही हुआ है हर काम! जब भी नहीं धूजे हैं हाथ मेरे देश के प्रधानमंत्रियों के अशुभ ही हुआ है कुछ न कुछ! मुझे पता है : नेहरू जी के हाथ नहीं धूजे थे जब उन्होंने चीन से हाथ मिलाया था! इंदिरा जी के हाथ नहीं धूजे थे जब अमरीका ने दिखाई थी आँख! राजीव जी के हाथ नहीं धूजे थे जब उतार दिए गए थे लंका के जंगलों में हमारी मासूम सेनाओं के जत्थे! वाजपेयी जी के हाथ धूजे थे, जब पोकरण में हुआ था विस्फोट! जब कारगिल से लौटे थे शहीदों के शव जीत का झंडा लहरा कर! मनमोहन जी के हाथ धूजने न धूजने का कोई प्रश्न ही नहीं उठता क्योंकि दस सालों तक हम उनके हाथ ही ढूंढ़ते रहे! मोदी जी के धूजते हुए हाथों को देखकर मुझे बहुत ख़ुशी हुई मुझे सचमुच ऐसा लगा जैसे भारत नाम का चिरंतन युवा बालक अपने अभिभावक के हाथ से निवाला खा रहा भगवान करे जो भी प्रधानमंत्री बने उसके हाथ धूजते रहें ! कवियों के हाथों में हो धूजती हुई कलम! चित्रकारों के हाथों में धूजती हुई कूँची! वाद्यकारों के हाथों में हो धूजते हुए हारमोनियम तबले और गिटार! धूजते हुए हाथ कमज़ोरी या बीमारी नहीं ताक़त और स्वास्थ्य का प्रतीक हैं ! यह धूजते हुए हाथ ही बताते हैं कि बक़ौल अनवर शुऊर-- "शहपारा बन रहा है अभी बन नहीं गया" मोदी जी और कुछ बरसों तक धूजते रहने दीजिये अपने हाथ! यदि यह अभिनय भी है तब भी इस अभिनय के हम भारत के नागरिक आपको सौ में से एक सौ दस अंक देते हैं ! अभी कई ध्वज हैं जो ज़मीन में गड़े हैं, इन्हें उठना है मंदिरों के शिखरों तक! और मंदिरों को उठना है गहरी नींद से,जो कम से कम हज़ार पांच सौ बरस पुरानी है! --- यह धूजते हुए हाथ यह धूजते हुए हाथों के सफ़ेद रोम यह आँखों में सदियों के स्वप्न का उबलता जल यह चेहरे पर एक संकल्प की सिद्धि की संतुष्टि वसूल हो गया हमारा एक एक वोट! धूजते हुए हाथों से पूरी करता हूँ यह कविता! लड़खड़ाती हुई साँसों से पहुँचता हूँ अपने ही हस्ताक्षर तक! अराजक समकालीन कविता को देता हूँ नागरिक बोध का संस्कार! पुरस्कारों को दिखाता हूँ, अपने ललाट पर जड़ित, स्वाभिमानी दर्पण में उनका चेहरा! उछालता हूँ फूल ही फूल अभिनन्दन और तलवे चाटने के बीच खींचता हूँ,एक बहुत महीन लक़ीर हे ईश्वर! जिस दिन मेरे प्रधानमंत्री में हाथ नहीं धूजें मुझे साहस देना कि लिख सकूं एक बेहद ख़तरनाक कविता, और चीख़ सकूं रामधारी सिंह दिनकर के शिल्प में- "सिंहासन ख़ाली करो कि जनता आती है!"

Rasleela Nathdwara Style | Twin Eternals - Matter & Energy

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